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मेरी उम्र २५ साल है, पेशे Sex Stories से एक डॉक्टर हूँ। कॉलेज ख़तम किये छः महीने ही हुए हैं। मैंने अपनी डिग्री शिमला से की है। मैं कॉलेज से ही उम्र में बड़ी उम्र की औरतों का बहुत शौकीन हूँ।
एक बार मैं घर से शिमला जा रहा था बस में। रास्ते में एक बहुत खूबसूरत लड़की बस में चढ़ी और मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गई। रंग एकदम गोरा और भरी भरी काया ! बस फिर क्या था, मैं सोचने लगा कि कैसे उसके साथ बैठूं !
एक स्टाप पर जाकर जब बस रुकी तो मैं कुछ लेने के बहाने बस से उतरा और उसे कहा कि मेरी सीट का ख्याल रखे। पर जब मैं वापिस चढ़ा तो वहाँ कोई मोटा सा अंकल बैठा हुआ था। बस मैं उसे भला बुरा कहता हुआ उस लड़की के साथ बैठ गया।
अब वो मुझे घूर कर देखने लगी। मैं भी चुपचाप उसे अनदेखा करके बैठ गया। फिर धीरे से उसकी तरफ देखा, उसके स्तन उसके बिन बाजू के ब्लाऊज़ से दिख रहे थे। मैं अपने आप पर काबू न कर पाया और मेरा लण्ड झटके मारने लगा।
पर जैसे उसने मुझे घूर कर देखा, मेरी हिम्मत नहीं हुई दोबारा उसकी आँखों में देखने की।
करीब एक घंटे बाद उसने मुझे खुद बोला- मैंने आपको पहले कहीं देखा है !
मैं सकपका गया। मैंने पूछा- कहाँ?
वो बोली- नहीं जानती, पर देखा ज़रूर है।
मेरे दिल में ख़ुशी के लड्डू फूट रहे थे।
मैंने उसे कहा- शायद आपने मुझे मेडिकल कॉलेज में देखा होगा।
तब वो बोली- हाँ ! मैं अपनी बहन को चेक करवाने आई थी।
बस फिर क्या था, बातों का सिलसिला शुरु हो गया। अब मैं समझा कि वो मुझे घूर कर देख नहीं रही थी बल्कि पहचानने की कोशिश कर रही थी।
जब उसने मुझे बताया कि वो दो बच्चों की अम्मा है तो मैं हक्का-बक्का रह गया।
फिर उसने मुझे अपनी सारी कहानी सुनाई कि कैसे उसकी शादी छोटी उम्र में हो गई और उसका अकेलापन।
जैसे कोई मरीज डॉक्टर से कोई बात नहीं छुपाता वैसे ही वो अपनी हर बात बताती गई!
और मैं भी एक अच्छे डॉक्टर की तरह उसकी हर बात सुनता गया।
जब वो बस से उतरी तो उसने मुझे अपना फ़ोन नम्बर दिया और अपने घर की तरफ चली गई और मैं अपने हॉस्टल की तरफ !
तब तक मेरे दिमाग में कुछ भी उल्टा सीधा नहीं था। अब घर से इतने दिनों बाद आया था तो दोस्तों के साथ मिलकर शाम को थोड़ी सी शराब पी ली और फिर अपने कमरे में सोने चला गया। तभी मेरी आँखों के सामने नीरू का चेहरा घूमने लगा (नीरू जो लड़की मुझे बस में मिली) उसके गोल मटोल स्तन, उसकी दिल को चीर देने वाली हँसी, उसका भोला सा चेहरा और उसकी भारी गाण्ड ! यह सब मेरी आँखों के सामने घूमने लगे।
मैंने मोबाइल निकाला और लगा दिया नंबर !
रात के १२ बज रहे थे, मैंने सोचा कि वो सो गई होगी तो मैंने फ़ोन काट दिया।
थोड़ी देर बाद उसका फ़ोन आया और मुझे पूछने लगी कि फ़ोन क्यूँ किया?
मैंने कहा- बस तुम्हारी याद आ रही थी, इसलिए कर लिया। पर सॉरी मुझे समय का ख्याल नहीं रहा !
वो बोली- नहीं ! मैं जाग रही थी !
मैंने पूछा- वो क्यूँ?
वो बोली- बस मुझे भी तुम्हारी याद आ रही थी !
बस मेरा मन खुश हो गया। थोड़ी देर और बातें चली और उसने बताया कि वो अकेली सोती है अपने पति के साथ नहीं।
इस तरह मैंने उसे अगले दिन मिलने के लिए बुला लिया।
वो दूसरे दिन ठीक मेरे बताये हुए समय पर पहुँच गई जब हॉस्पिटल बंद होने का वक़्त होता है।
मैंने उससे पूछा- कहाँ चलें?
वो बोली- तुमने बुलाया है ! तुम हो ले चलो कहीं भी !
मैं अपनी फुद्दुपंथी पे इतना पछताया कि किसी कमरे का इंतजाम भी नहीं किया था मैंने।
मैंने नहीं सोचा था कि वो आते हो मुझसे ऐसे बोलेगी, पर क्या कर सकते थे, मैं उसे हॉस्पिटल के पीछे एक सुनसान जगह पर ले गया और कहा- तुम बहुत खुबसूरत हो नीरू ! मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ !
तो वो यह बात सुन कर डर गई और बोली कि उसके दो बच्चे हैं और वो उनसे बहुत प्यार करती है। वो इन बन्धनों से बंधी हुई है।
पर मेरे उसे समझाने पर कि मैं किसी को नहीं पता लगने दूंगा हमारे बारे में, उसने मुझे चूमने दिया। धीरे धीरे मैं उसके वक्ष को चूमने लगा। मुझे पता हो नहीं चला कब मेरा हाथ उसके पिछवाड़े पर चला गया और वहां उंगली करने लगा।
वो बहुत उत्तेजित हो गई थी। वो मुझसे छिटकते हुए बोली- बस, बहुत हो गया ! तुम हद पार कर रहे हो !
वैसे बात भी सही थी, वहां कोई भी आ सकता था। मैंने उसे जाने दिया और वो भागते हुए वहाँ से चली गई।
फिर रात को मैंने उसे फोन किया और अपने किये पर सॉरी बोला। उसे मिलने के लिए बुलाया फिर से !
पहले तो उसने ना-नुकुर की पर उसके दिल में जो मेरे लण्ड को चखने की चाह थी, शायद वोही खाज उसे मेरे पास मिलने के लिए ले आई।
इस बार मैं पूरी तरह से तैयार रहना चाहता था। वो बुधवार का दिन था और मैं बुधवार को नॉन-वेज़ खा लेता हूँ। वो आई और चुपचाप मेरे साथ चलने लग पड़ी। हम मेरे दोस्त के कमरे पर पहुंचे, हॉस्टल तो ले जा नहीं सकता था नहीं तो जोर आजमाइश वाला चोदन हो जाता उसका।
कमरे पर पहुँचते हो मैंने उसका पर्स एक कोने में फ़ेंक दिया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया। वो थोड़ा शरमाई।
मैंने पूछा तो बोली- डर लगता है !
मैंने उसे कहा- दो बच्चों की माँ होकर डर लगता है तुझे?
तो बोली- यह बात नहीं है ! डर लगता है कहीं तुमसे प्यार न हो जाए !
मैंने उसे समझाया कि डरने की कोई ज़रूरत नहीं है, देख, मैं ठहरा अकेला लोंडा अभी, और कल को मेरी शादी हो जायेगी, और मैं हूँ डॉक्टर तो सोसाइटी में तो कभी नहीं पता लगने दूंगा। बाकी सब तुम पर है कि तुम सुख चाहती हो या नहीं !
वो यह सब सुनते हो मेरी बाँहों में लिपट गई, मैंने उसे चूमना शुरू कर दिया और न जाने कब उसके स्तन मेरे हाथों मैंने आ चुके थे, और मैं पहुँच गया स्वर्ग वाटिका में।
धीरे-धीरे मेरा हाथ उसके नाड़े की तरफ बढ़ गया। मैंने हलके से उसका नाड़ा खींच दिया। जिस काले सूट की मैं तारीफ कर रहा था वो अब बेडशीट का काम कर रहा था और उसकी लाल कच्छी आवाज़ दे दे कर मुझे बुला रही थी कि आओ और मुझे उधेड़ दो।
मेरे लण्ड का आकार जो कभी ७ इंच से बड़ा नहीं हुआ था, आज १ इंच ज्यादा होने की दौड़ में था।
वो मेरे ऊपर अपने भारी पिछवाड़े को सटा कर बैठी हुई थी। मैंने उसके नंगे स्तन अपने मुँह में लेकर जैसे हो चबाये कि वो सिस्कारियां भरने लगी, उसकी ऐसी आवाजें सुनकर मेरा बुरा हाल हो गया। मेरा लण्ड तो मानो जैसे सुन्न हो गया। बस मुझे तो उसका भरा हुआ शरीर ऐसे लग रहा था कि एक एक हिस्सा खा जाओ।
उसकी मेमने की तरह गदराई हुई फुदी के सुनहरे बाल !
उन्हें अपनी जीभ से सहलाते हुए मैं फुदी के द्वार पर पहुंचा, पर वहीं पर उसने मुझे रोक लिया और वो सी सी सी करती हुई मुझसे लिपट गई, मेरे कान में धीरे से फुसफुसाती हुई बोली- इतनी ख़ुशी इकट्ठी मत दो कि मैं संभाल न पाऊँ !
इससे पहले वो कुछ और बोल पाती उसकी आँखों से आंसू बह निकले, उधर आँखों से आंसू और इधर फुदी से आंसू !
अब मैं समझ नहीं पा रहा था मैं किन आंसुओं पर ध्यान दू..
फिर मैंने चुने फुदी के आंसू और अपनी दो उँगलियों से उसकी फुदी सहलाने लगा और उसे औंधे मुंह लेटा कर अपना लण्ड-बाबा उसकी फुदी पे लगाया। मेरा लण्ड उसके अंदर जाता गया और वो मेरी तरफ धक्के लगाते हुए और अंदर अंदर, बस थोड़ा और, सी सिस इस सी ,, उईईईम उइंमा बस थोड़ा और बस थोड़ा और,,,, आज मुझे मत छोड़ना अधूरी….
मैं बरसों की प्यासी हूँ ! मुझे भर दो अपने गरम लौड़े से…
इतना कुछ सुनने के बाद भी मेरा लण्ड था कि बस लगा हुआ था बुरी तरह से… तभी नीरू पूरा जोर लगा कर मुझे अपनी और खींचने लगी… मैं समझ गया कि वो झड़ रही है… मैंने सोचा फटाफट अपना काम भी निपटा लो वरना फिर उसे पता नहीं कब इतनी पॉवर आये, पहले तो मैं उसे खाना चाहता था, पर अब शायद वोही मुझे खा रही थी… उसकी सिस्कारियों के दौरान मेरी चमड़ी पे उसने अपने नाखूनों से कई घाव कर दिए थे, बहुत जंगली थी वो…
तो दोस्तो, मैंने कई बार मजे लिए उससे पर मैं उसे आज भी नहीं भूल पाया हूँ….. वो जहाँ भी रहे खुश रहे…हमे मिले हुए पूरा एक साल हो गया है… मैं आज भी उसे याद करता हूँ… और इसी तलाश में हूँ कि वैसी कोई मस्त फुदी फिर मिल जाए …
आपको मेरी कहानी कैसी लगी मुझे ज़रूर लिखें… Sex Stories
यह कहानी प्रगति का अतीत सेAntarvasnaआगे की कहानी है। पाठकों से अनुरोध है कि इसको पढ़ने से पहले
प्रगति के पिताजी को मास्टरजी की नीयत पर शक हो चला था। वर्ना वे सिर्फ प्रगति को अकेले में अपने घर में पढाने के लिए क्यों बुलाते। उन्हें यह भी समझ आ गया कि प्रगति शरीर से अब जवान हो चली थी पर मन अभी भी बच्चों जैसा था। इस लड़कपन की उम्र में अक्सर लड़कियाँ भटक जाती हैं क्योंकि उनके शरीर में जो भौतिक और रासायनिक बदलाव आ रहे होते हैं, उनके चलते वे आसानी से लुभाई जा सकती हैं। उन्हें अपने जिस्म की ज़रूरतें का अहसास होने लगता है और वे समझ नहीं पाती कि उन्हें क्या करना चाहिए। उनके मन में माँ-बाप के दिए दिशा -निर्देश, समाज के लगाये बंधनों और संसकारों की बंदिश एक तरफ रोक रही होती है तो दूसरी तरफ उनके शरीर में उपज रही नई उमंगों और तरंगों का ज्वार-भाटा उन्हें तामसिकता की तरफ खींच रहा होता है। वे इस दुविधा में फँसी रहती हैं कि उनके लिए क्या उचित है और क्या नहीं।
प्रगति के पिताजी ने इसी में भलाई समझी कि उन्हें यह गाँव छोड़ कर कहीं और चले जाना चाहिए जहाँ प्रगति और मास्टरजी का मेल न हो सके और प्रगति नए सिरे से अपना जीवन शुरू कर सके। वे चाहते थे कि प्रगति पढ़-लिख कर इस काबिल बन जाए कि वह अपना और अपने परिवार का ध्यान रख सके। उन्होंने निश्चय कर लिया कि इस गाँव को छोड़ने का समय आ गया है। भाग्यवश, उनके एक मित्र का हैदराबाद से सन्देशा आ गया कि वहाँ एक सरकारी अफसर को एक ऐसे परिवार की ज़रुरत है जो उसके घर का काम, बच्चे की देख-रेख, बगीचे का ध्यान और ड्राईवर का काम, सभी कुछ कर सके। इसके एवज़ में वह परिवार को घर के अलावा, बच्चों के स्कूल का दाखिला, स्कूल का खर्चा और अच्छी तनख्वाह देने को तैयार है। उसे बस एक ईमानदार और संस्कारी परिवार की ज़रुरत है।
यह सन्देशा पा कर प्रगति के पिताजी खुश हो गए और उन्होंने अपने मित्र को अपनी तरफ से हामी भर दी। कुछ दिनों बाद वहाँ से भी मंजूरी आ गई और जैसे ही स्कूलों की छुट्टी शुरू हुई, प्रगति अपने परिवार सहित हैदराबाद रवाना हो गई। जाते वक़्त वह मास्टरजी से बहुत मिलना चाहती थी पर पिताजी ने उस पर कड़ा अंकुश लगा रखा था। सो बेचारी मन मसोस कर रह गई और एक अनजान शहर की तरफ चल पड़ी। उधर मास्टरजी भी एक आखरी बार प्यारी प्रगति से हम-बदन होना चाहते थे पर उनकी कोई तरकीब काम नहीं आई और वे भी अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाए। न जाने उन्हें प्रगति जैसी कोई और लड़की मिलेगी या नहीं। उन्होंने अपनी खोज शुरू कर दी।
प्रगति ने हैदराबाद में जब अपना नया घर देखा तो वह ख़ुशी से फूली नहीं समाई। उसने सपने में भी एक ऐसे घर की कल्पना नहीं की थी। उसके सभी घर वाले भी बहुत खुश थे। घर एक बहुत बड़ी कॉलोनी में था जो कि सिर्फ वरिष्ठ सरकारी अफसरों के लिए थी। कॉलोनी में सभी ज़रुरत की सहूलियतें मौजूद थीं- दूकानें, पोस्ट-ऑफिस, डिस्पेंसरी, बैंक, खेल के मैदान, झूले वगैरह। बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे, वातावरण ख़ुशी से चहक रहा था।
जिस अफसर के घर में उन्हें रहना था उसका नाम शालीन था। उसके साथ उसकी पत्नी मयूरी और एक आठ साल का बेटा आकाश रहता था। घर बहुत सुन्दर था और हर तरह की ज़रूरतों के सामान से लैस था। उनके नौकरों का घर भी अच्छा था और उसमें एक कमरा, रसोई और बाथरूम था। शालीन ने उनके कमरे में रंगीन टीवी लगवा दिया था और बच्चों की पढ़ाई के लिए मेज़-कुर्सी का अलग से प्रबंध था। इस कारण कमरा थोड़ा छोटा लग रहा था।
शालीन ने प्रगति के पिताजी को कह दिया था कि अगर उनको जगह कम लगे तो बच्चे उनके घर में सो सकते हैं। प्रगति के पिताजी शालीन के इस मानविक रुख से बहुत प्रभावित हुए और आभार भरी नज़रों से उन्हें धन्यवाद के अलावा कुछ नहीं दे सके।
कुछ ही दिनों में प्रगति का परिवार और शालीन का परिवार एक दूसरे को अच्छे लगने लगे और उनमें एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर का भाव पनप गया। मयूरी भी प्रगति के सभी घरवालों के साथ प्यार से पेश आती और उनको अपने नए घर को बसाने में हर तरह की मदद करती। आकाश भी प्रगति और उसकी दोनों बहनों, अंजलि और दीप्ति, के साथ घुल-मिल गया था और उन्हें अपने खिलौनों से खेलने देता था। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।
प्रगति के सभी घरवाले हैदराबाद आने के निर्णय से खुश थे और वे कोई ऐसी हरकत नहीं करना चाहते थे जिससे शालीन के परिवार का कोई भी सदस्य उनसे नाखुश हो। प्रगति की माँ घर का सारा काम बड़ी उत्सुकता से करती, उसके पिताजी बगीचे का ध्यान रखते और बाहर का कोई भी काम ख़ुशी और तत्परता से करते। प्रगति, अपनी बहनों के साथ मिलकर घर के छोटे-मोटे कामों में हाथ बटाती और फुर्सत होने पर आकाश के साथ खेलती।
समय अच्छा बीत रहा था।
धीरे धीरे दिन बीतते गए और मौसम ने करवट बदली। सर्दियों के दिन आने लगे। मयूरी ने उनके लिए गरम कपड़ों का इंतजाम किया। अपने और शालीन के पुराने कपडे प्रगति के माँ-बाप को दिए और आकाश के पुराने कपड़े अंजलि और दीप्ति के काम आये। प्रगति के लायक गरम कपड़े नहीं थे सो मयूरी ने उसे अपने घर में रहने की इजाज़त दे दी क्योंकि वहाँ हीटर लगा हुआ था।
अब प्रगति लगभग पूरा समय शालीन के घर में ही रहने लगी। सिर्फ खाना खाने और स्कूल जाते वक़्त वह घर से बाहर निकलती। मयूरी को प्रगति के घर में रहने से काफ़ी आराम हो गया था। वह उसके सारे काम कर देती और मयूरी को ठाठ से रहने देती।
आकाश को भी अपनी नई “दीदी” से लगाव हो गया था और वे दोनों काफ़ी समय एक साथ गुज़ारने लगे थे।
एक दिन शालीन दफ्तर से देर से घर आया। उसे दफ्तर का कुछ ज़रूरी काम और भी करना था। सबके सोने का समय हो गया था सो उसने खाना खाने के बाद मयूरी और आकाश को सोने को कह दिया और वह पढ़ाई के कमरे में चला गया। उसे नहीं पता था वहाँ ज़मीन पर प्रगति सोई हुई थी। खैर, उसे सोता छोड़ कर वह अपने लैपटॉप पर काम करने लगा। जहाँ वह बैठा था, वहाँ से प्रगति सोती हुई साफ़ दिखाई दे रही थी।
यौवन की दहलीज पर पाँव रख चुकी एक खुश लड़की जिस तरह चिंता-मुक्त स्थिति में सोती है वैसे ही प्रगति शालीन से कोई एक गज दूर सो रही थी। उसके पाँव शालीन की तरफ थे और उसने अपने दाईं ओर करवट ले रखी थी जिस कारण उसकी पीठ शालीन की तरफ थी।
ठण्ड बढ़ रही थी सो शालीन ने उठ कर प्रगति को कम्बल उढ़ा दिया और हीटर चालू कर दिया। ऐसा करने से प्रगति ने नींद ही नींद में करवट ली और वह सीधी हो कर सोने लगी। शायद वह कोई अच्छा सपना देख रही होगी क्योंकि उसके अधरों पर हलकी सी मुस्कान खेल रही थी और उसके स्तन साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। शालीन का ध्यान अपने काम से हठ कर प्रगति के स्तनों पर टिक गया।
शालीन अपने नाम-स्वरूप एक शांत स्वभाव का आदमी था जो अपने व्यवसाय में बहुत सफल और उन्नत था। उसके दफ्तर में सभी उसे भविष्य का प्रबन्ध-निदेशक समझते थे। वह हृदय से कृपालु और उदार प्रवर्ति का इंसान था तथा सभी वर्गों के लोगों के प्रति उसमें आदर भाव व्याप्त था।
वैसे वह करीब चालीस वर्ष का था लेकिन दिखने में कोई भी उसे तीस-बत्तीस का समझ सकता था। खेल-कूद में रूचि, नियमित रूप से व्यायाम और हलके आहार के कारण उसने अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखा हुआ था। उसके चेहरे पर सदैव एक हलकी मुस्कान और आत्मविश्वास झलकता था। वह एक आदर्श पति और पिता था जिसका सारा संसार मयूरी और आकाश के चारों तरफ घूमता था। उनके लिए वह अपने दफ्तर से भी झगड़ा मोल ले सकता था।
शालीन ने कुरता-पायजामा और ऊपर से गरम शॉल ले रखा था। प्रगति ने मयूरी की एक पुरानी ड्रेस पहनी हुई थी जो उसके लिए काफ़ी ढीली थी। ठण्ड से बचने के लिए, उसने नीचे एक बनियान पहन रखी थी। शालीन की नज़रें यह नहीं जान पा रहीं थीं कि उसने चड्डी पहनी है या नहीं।
धीरे धीरे शालीन को प्रगति के अपने नजदीक होने का अहसास होने लगा और उसका ध्यान दफ्तर के काम से बिलकुल हट गया। वह एक-टक प्रगति को देखता रहा और उसके रूप को सराहने लगा। उसके अधखुले होटों से सफ़ेद दांतों की झलक, उसकी साँसों की सरसराहट और उसके साथ उसके वक्ष की मंद-मंद हरकत शालीन को विचलित कर रही थी। उसका मन डोल रहा था और शादी के बाद से पहली बार उसे किसी पराई लड़की को देख कर काम-वासना की अनुभूति हो रही थी।
अचानक हीटर की गर्मी के कारण, प्रगति ने सोते सोते ही अपनी टांगों से कम्बल को दूर कर दिया और एक गहरी सांस लेकर सोने लगी। शालीन को मानो करंट लग गया। प्रगति की टांगें उस ढीली ड्रेस में से घुटनों तक बाहर झाँक रहीं थीं। उसके स्तन सिर्फ बनियान के कारण छुपे हुए थे।
शालीन का शरीर अंगड़ाई लेने लगा और उसका मन तामसिकता की रेखा के पास आ गया। उसे भी गर्मी सी लगने लगी और उसने अपना शॉल उतार दिया। उसको पायजामे में अपने लिंग के वज़न का अहसास होने लगा।
उसने यकायक उठकर हीटर का रुख प्रगति से दूर कर दिया और उसके पास रखी चटाई पर बैठ गया। कांपते हाथों से उसने प्रगति के कम्बल को उठा कर उढ़ाने की कोशिश की पर कम्बल प्रगति की टांगों में फंसा हुआ था। उसे छुड़ाने की कोशिश में प्रगति की आँख खुल गई और अपने पास शालीन को देख कर वह अचंभित हो गई और फिर शरमा गई।
शालीन भी घबरा सा गया पर अपने आप को सँभालते हुए बोला,”तुम्हें उढ़ा रहा था … ठण्ड लग जायेगी .. “
प्रगति कुछ नहीं बोली, पर उसका हाव-भाव बहुत कुछ कह गया। एक तो उसने कोई आपत्ति या संकोच नहीं जताया और दूसरे उसने शालीन को शर्मिंदा या कसूरवार महसूस नहीं होने दिया। उसे मास्टरजी के साथ बिठाये पल याद आ गए और उसके चेहरे पर शर्म, उत्सुकता और ख़ुशी का एक अद्भुत मिश्रण छा गया। उस चेहरे को देख कर शालीन की घबराहट दूर हुई और उसने मन ही मन चैन की सांस ली। उसे डर था कि कहीं प्रगति चिल्ला ना दे।
“तो फिर उढ़ा दीजिये !” प्रगति ने आखिर कह ही दिया और आँखें मूँद लीं।
शालीन ने उसे कम्बल से उढ़ा दिया। वह उठने ही वाला था कि प्रगति ने करवट बदली और उसकी पीठ और चूतड़ फिर से उघड़ गए। शालीन ने हिम्मत करके कम्बल को प्रगति के जिस्म से ढीला किया और दोबारा उढ़ा कर कम्बल को उसके शरीर के नीचे दबाने लगा जिससे वह फिर से ना उघड़े। ऐसा करते वक़्त उसके हाथों और उँगलियों ने पहली बार प्रगति के शरीर का स्पर्श किया और उसको यह बहुत ही कामोत्तेजक लगा।
शायद प्रगति को भी शालीन का स्पर्श अच्छा लगा। उसने एक ठंडी सांस ली और सोने का नाटक करने लगी।
शालीन अपने दफ्तर के काम से पूरी तरह विरक्त हो चुका था। उसका दिमाग सिर्फ प्रगति के मांसल शरीर और अपने मन में उपज रहे कामुक विचारों पर केन्द्रित था। अचानक उसमें प्रगति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की लालसा जागने लगी और वह काम-वासना के लोभ में लिप्त होने लगा।
जब आदमी काम-वासना में लिप्त हो जाता है तो उसका विवेक सात्विक विचारों का त्याग कर देता है और उसे सिर्फ एक ही लक्ष्य दिखता है …. अपनी कामाग्नि बुझाने का !
शालीन ने थोड़ी और हिम्मत दिखाई और प्रगति को ऐसे छूने लगा मानो उसका कम्बल ठीक कर रहा हो।
प्रगति भी कहाँ सोई थी !! उसकी आँखें मूंदी हुई थीं पर उसका जिस्म पूरी तरह जगा हुआ था। आज कितने दिनों बाद किसी मर्द का हाथ उसके जिस्म को लगा था।
उसकी पुरानी यादें फिर से ताजा हो गईं और उसके जिस्म की सोई हुई प्यास फिर से जागने लगी। उसकी योनि तत्काल गीली हो गई और उसने अपनी टांगें भींच लीं। फिर यह सोच कर कि कहीं शालीन यह ना समझे कि उसे उससे डर लग रहा है और वह चला जाये, प्रगति ने अपनी टांगें ढीली करके थोड़ी खोल दीं।
हर इंसान को शारीरिक-संकेत पढ़ने आते हैं, तो शालीन को प्रगति की इस हरकत से बड़ा हौसला मिला और उसने उसके शरीर को निश्चिंत हो कर सहलाना शुरू कर दिया।
प्रगति सोने का नाटक अच्छी तरह से कर रही थी। भगवान ने लड़कियों को यह एक अच्छा सहारा दिया हुआ है। दुनिया भर की लड़कियाँ सोने का सहारा लेकर शारीरिक सुख का आनंद उठती हैं जिस से उनके मन में ग्लानि भाव भी नहीं रहता और वे पूरा मज़ा भी ले लेती हैं !!
प्रगति ने भी सोने का नाटक करते हुए करवट बदल ली और पीठ के बल लेट गई; इसके साथ ही उसने अपने पांव से अपने कम्बल को नीचे खिसका दिया जिससे उसका वक्ष-स्थल उघड़ गया और उसके उभरे हुए स्तन बनियान की बंदिश को चेतावनी देने लगे। शालीन को रिझाने के लिए उसने अपनी साँसें भी गहरी कर दीं जिससे उसका वक्ष और भी ऊपर-नीचे होने लगा।
शालीन ने भी अपनी तरफ से नाटक जारी रखा और ऐसा प्रतीत होने दिया मानो प्रगति के करवट बदलने का उसे अहसास नहीं हुआ है और वह पहले की तरह अपने हाथ चलाता रहा। तो, जहाँ उसके हाथ पहले उसके कंधे और कमर को सहला रहे थे, अचानक उसके स्तनों को सहलाने लगे।
प्रगति ने ज़रा सी भी आपत्ति नहीं दिखाई और गहरी नींद के बहाने शालीन के सहलाव का पुरजोर मज़ा लूटने लगी।
हालाँकि, शालीन के हाथ और प्रगति के स्तनों के बीच बनियान और ड्रेस का कपड़ा था फिर भी दोनों को बहुत मज़ा आ रहा था। शालीन ने उठ कर और दबे पांव जा कर कमरे का दरवाज़ा चुपके से बंद कर दिया और कमरे की बत्ती भी बुझा दी। अब कमरे में सिर्फ लैपटॉप की रौशनी थी। अँधेरा हो तो चोरी करने वालों की हिम्मत बढ़ जाती है। यहाँ भी यही हुआ।
प्रगति ने अँधेरा होते ही ढीली ड्रेस से अपनी टांगें उघाड़ लीं और बनियान को थोड़ा ऊपर कर लिया जिससे जब तक शालीन वापस आया, प्रगति का पेट और घुटने तक की टांगें उघड़ी हुई थीं और वह पहले की तरह गहरी नींद में सोई हुई थी !!
अब तक तो शालीन प्रगति को कपड़ों के ऊपर से ही सहला रहा था पर अब उसने उसके नंगे पेट को पहली बार छुआ। इस स्पर्श का करंट सीधा उसके लंड को लगा और वह अकड़ने लगा। शालीन समझ गया कि प्रगति सोने का सिर्फ बहाना कर रही है वर्ना वह कब की उठ गई होती। उसने प्रगति की इस स्वीकृति का अभिवादन करते हुए अपने हाथों के घुमाव का दायरा और बढ़ाया और रास्ते में आने वाले कपड़ों को भी हटाने लगा।
अब प्रगति भी समझ गई कि शालीन उसके शरीर को हासिल करना चाहता है। धीरे धीरे उन दोनों को प्रगति के सोने के नाटक को ख़त्म करना पड़ा। कब तक यह स्वांग चलता क्योंकि अब शालीन ने उसके स्तन नंगे कर दिए थे और उसकी ड्रेस भी लगभग कन्धों तक ऊपर पहुंचा दी थी।
जैसे ही शालीन के हाथ प्रगति के नग्न स्तनों को छुए प्रगति ने नींद खुलने का नाटक किया और शालीन की तरफ करवट बदल कर अपना मुँह उसकी गोदी में छुपा लिया। प्रगति को पता नहीं था कि गोदी में तो शालीन का अकड़ा हुआ लंड विराजमान था, फिर भी उसने अपना मुँह नहीं हटाया और उसके विराट लंड के समीप अपना चेहरा घुसा कर मानो फिर से सो गई।
शालीन का लंड पहले ही कड़क था अब प्रगति के मुँह को पास पाकर और उसकी गर्म साँसों से प्रभावित हो कर वह और भी विशालकाय हो रहा था। शालीन ने थोड़ा सरक कर अपने लंड को प्रगति के होटों के पास कर लिया और उसके पेट और नाभि को प्यार से सहलाने लगा।
अचानक, शालीन को बेडरूम की बत्ती जलने और आकाश के बाथरूम जाने की आवाज़ ने झंकझोर कर रख दिया। उसकी कामाग्नि एक ही क्षण में काफ़ूर हो गई और वह एक ही झटके में खड़ा हो गया और प्रगति ने भी अपने आपको संवार लिया। शालीन ने कमरे की बत्ती जला दी और दरवाज़ा चुप-चाप खोल दिया। उसका लिंग तो पूरा मुरझा ही गया था। उसने बाहर झाँक कर देखा कि मयूरी सोई हुई थी और आकाश बाथरूम से वापस आ रहा था।
“गुड नाईट, पापा !” आकाश ने सोई हुई आवाज़ में कहा और अपने बिस्तर पर जा कर सो गया।
“गुड नाईट, बेटा !” कहते हुए शालीन ने ठंडी सांस ली और भगवान का शुक्रिया अदा किया कि आकाश या मयूरी ने उसे प्रगति के साथ नहीं पकड़ा। उसने सोच लिया कि वह ऐसा ख़तरा अब नहीं उठाएगा और पूरी सूझ-बूझ और तैयारी के साथ ही अगला कदम उठाएगा। इस निश्चय के साथ उसने अपना लैपटॉप बंद किया और कमरे की बत्ती बुझा दी।
बाहर जाते वक़्त उसने एक बार प्यार से प्रगति के सर को छुआ और हलके से “गुड नाईट” कह दिया। प्रगति ने भी “गुड नाईट” फुसफुसाया और अपने आप को कम्बल में लपेट लिया। अब शालीन और प्रगति चोर हो चुके थे और उनमें एक गुप्त रिश्ते का बीज पनपने लगा था।
यहाँ तक की कहानी कैसी लगी और आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए “प्रगति का समर्पण-2” पढ़ना न भूलें। Antarvasna
अरे सुरेश, बड़े दिनों बाद दिखे, आज कल कहां Sex Stories रहते हो?’
‘मंथली एक्ज़ाम चल रहे थे न आंटी। अब इस साल मैं 12वीं में आ गया हूं।’
‘तुम्हारी क्लास में लड़कियाँ कितनी हैं?’
’12
‘और लड़के?’
’36 ‘
‘बड़ी किस्मत वाली हैं एक एक के तीन तीन लौंडे।’
‘पर मुझे तो कोई घास नहीं डालती।’
‘अरे कोई नहीं, मैं सिखा दुंगी तुम्हे लड़की कैसे पटाते हैं।’
‘प्लीज़ आंटी जल्दी सिखाओ।’
‘तुम्हारी कोई गर्ल फ़्रेण्ड है या नहीं?
‘है न, रीता।’
‘क्या करते हो उसके साथ?’
‘बातें, और क्या?’
‘क्या गर्ल फ़्रेण्ड के साथ केवल बातें करते हैं?’
‘नहीं, आंटी, वो न थोड़ी कंज़रवेटिव है।’
‘कंज़रवेटिव न होती तो क्या करते?’
‘तो सब कुछ कर देता।’
‘मतलब क्या-साफ़ साफ़ बताओ मुझे?’
‘मुझे शरम लगती है।’
‘मैं तुमको कैसी लगती हूं?’
‘बहुत अच्छी।’
‘मतलब क्या क्या अच्छा लगता है?’
‘आपका चेहरा बहुत अच्छा लगता है।’
‘मतलब मैं बुड्ढी हो गयी हूं चेहरे के सिवा कुछ अच्छा ही नहीं है।’
‘है न।’
‘तो बताओ न।’
‘आप गुस्साओगे तो नहीं?’
‘मैं क्यों गुस्साऊं, अपनी बढ़ाई किस को अच्छी नहीं लगती।’
‘आप का न फ़्रंटसाइड बहुत अच्छा है।’
‘फ़्रंटसाइड मतलब?’
‘वो ब्लाउज़ के भीतर।’
‘उसमे अच्छा क्या है तुमने अंदर देखा है कभी?’
‘नहीं पर बहुत बड़ा है न।’
‘मतलब तुम्हें बड़ी चूची पसंद हैं।’
‘हां।’
‘तो सीधे बोलो न मुझे आपके बड़े ब्रेस्ट पसंद हैं।’
‘बोलो बोलो।’
‘मुझे आपकी बड़ी चूची पसंद हैं।’
‘गुड, शाबाश, और क्या क्या पसंद है तुम्हें?’
‘आपका बैकसाइड।’
‘पर उसमें क्या?’
‘आपका बैकसाइड छोटा और स्लिम है न।’
‘मतलब तुम्हें छोटे बटक्स चाहिये।’
‘हां।’
‘बड़े परखी हो।’
‘तुम्हारी रीता की बैक साइड कैसी है?’
‘छोटी और स्लिम, पर पता नहीं आगे जाकर फ़ैल न जाये।’
‘क्यों? क्या पीछे से डाल कर फ़ैलाने का इरादा है?’
‘धत्।’
‘और तुम्हारी गर्ल फ़्रेण्ड की चूची कैसी हैं?।’
‘मीडियम है, आप जैसे बड़े नहीं हैं।’
‘बार बार दबाने से न बढ़ जाते हैं। चूत और चूची को जितना मसलो उतना बढ़ते जाते हैं।’
‘अब अब दबायेगा रोज रोज?
‘दबवायेगी तब न।
‘कभी मसला है उसकी चूची को?’
वो तो छूने ही नहीं देती।
क्या? छूने ही नहीं देती?
अपने ब्रेस्ट ।
हिन्दी में बोलो पूरा एक बार में
वो अपनी चूची छूने ही नहीं देती।
चिन्ता मत करो मैं तुम्हें ऐसे ट्रिक्स बताऊंगी और सिखाऊंगी कि वो खुद तुम्हें चूची मसलवाने की रिक्वेस्ट करेगी।
सचमुच। आप बड़ी अच्छी हो।
अच्छा अगर मैं तुम्हें फ़्री छोड़ दूं तो क्या करोगे?
धत्। आप तो आंटी हो?
फ़िर ये तुम्हारे पैंट के भीतर कड़ा कड़ा क्यों हो गया ये सवाल सुनकर?
आई एम सोरी, आप गुस्सा न करो।
एक शर्त पर अगर तुम सच सच बोलोगे, ये कड़ा कैसे हो गया?
आप भी सेक्सी हो न इसलिये।
तो बताओ न फ़्री मिल गये तो क्या क्या करोगे?
फ़्री थोड़े ही न छोड़ेंगे आप।
लेसन 1- हाथ की सफ़ाई
तो तुम्हारा पहला लेसन है हाथ की सफ़ाई। आदमी और औरत हाथ से क्या कुछ कर और करा सकते हैं और कितना मजा दे और ले सकते हैं?
तुम बताओ हाथ से क्या कर सकते हो?
हाथ से चूची को पकड़ सकते हैं?
और?
और क्या अपना हाथ जगन्नाथ।
तुम सच मुच घामड़ हो।
क्यों और कुछ भी करते हैं? प्लीज़ बताइये न आंटी।
अच्छा बताती हूं। आदमी औरत के हर अंग को दबा के सहला के उसे मजे दे सकता है।
कैसे?
अभी दिखाती हूं।
आज मेरे बदन में बड़ा दर्द है, थोड़ा बोडी लोशन लगा दोगे?
हां।
पर कुछ और तो नहीं करोगे, फ़्री समझ के?
नहीं।
तो लो ये लोशन मेरे कंधे, पीठ और कुल्हों पे लगा दो।
मैं पेट के बल लेट जाती हूं।
अपना टी शर्ट तो उतार दो आंटी।
लो उतार दिया अब ब्रा उतारने को मत कहना। और ये लेट गयी मैं पेट के बल। कंधे को धीरे धीरे दबाओ और बोडी लोशन लगाओ। हां, ऐसे ही, अब थोड़ा प्रेस करो, वेरी गुड। अब यही मेरे पीठ पर करो। वाह! शाबाश। अब मेरी जीन्स को थोड़ा नीचे सरकाओ और पैंटी को भी। थोड़ा लोशन मेरे चूतड़ों पर लगाओ और धीरे धीरे उस पर मालिश।
अरे नहीं, गांड में मत डालो लोशन, शैतानी नहीं। बस, हो गया।
आंटी थोड़ा और दबाऊं न। आपने जीन्स क्यों बंद कर ली? बड़ा मजा आ रहा था।
अच्छा अब आगे दबाने की ट्रैनिंग देती हूं।
आगे मतलब ऊपर या नीचे
क्या मतलब? साफ़ बोलो।
वो ब्रा के भीतर या पैंटी के भीतर।
तू तो बड़ा सयाना हो गया है। साफ़ साफ़ क्यों नहीं पूछता चूत या चूची?
हां वही।
वही क्या?
चूत या चूची दबाने की ट्रैनिंग?
तुझको कौन सी पसंद है।
दोनो।
बड़ा लोभी है तू।
अगली ट्रैनिंग चूत दबाने की। वहां अपना हाथ डाल के धीरे धीरे सहलाना चाहिये।
कहां?
चूत पे और कहां?
फिर न, उंगली को चूत के छेद में डाल कर धीरे धीरे फ़िंगर करते हैं।
इससे न, लड़की/औरत गर्म हो जाती है, तुम न अपनी गर्ल फ़्रेण्ड पर ट्राइ करना और बताना कैसा लगा उसे।
आंटी थोड़ा प्रेक्टिस तो करा दो प्लीज़।
तुम तो बड़े लोभी निकले।
अच्छा चलो पर केवल दो मिनट।
थैंक यू ।
कहां से शुरु करें?
मेरे जीन्स के बटन खोलो।
खोल दिया।
क्या मस्त जांघ है आपकी।
तुम्हें पसंद आयी?
हां।
तो चूम ले जी भर के?
चाट चाट चाट ! अब अपना हाथ मेरी पैंटी के अंदर डालो।
आंटी एक बार चूत तो दिखा दो अपनी।
आज नहीं, अगली बार।
और धीरे धीरे इसे सहलाओ।
छेद पर नहीं थोड़ा ऊपर। चूत के छेद से ऊपर जो थोड़ा उठा हुआ भाग है उसे क्लाइटोरिस बोलते हैं। औरतों को न सबसे ज्यादा मजा वहीं मिलता है।
चूत से भी ज्यादा?
हां।
आंटी आपको तो कितना पता है। आइ एम लकी कि आप मुझे सब बता रहीं हैं।
सहलाते रहो धीरे धीरे।
अब जरा स्पीड बढ़ाओ – जोर से और जोर से। बस। मैं आ गयी।
विकाश आज तुमने बड़े मजे दिये मुझे। ऐसे भी मैं किसी का उधार नहीं रखती।
मैं तुम्हें इनाम देना चाहती हूं।
क्या आइस क्रीम?
नहीं, उससे भी बढ़िया।
अरे, ये तुम्हारा पैंट के भीतर क्यों इतना कड़ा हो गया है?
कोई स्टील रोड छुपा रखा है क्या।v
नहीं तो?
क्या मैं खुद हाथ लगा कर देखती हूं।
जरा अपनी पैंट के जिप तो खोलो।
अरे तुम्हारा तो कितना मोटा लंड है।
आंटी आप इसको पकड़ते हो न तो बड़ा अच्छा लगता है।
कभी तुम्हारी गर्ल फ़्रेण्ड ने पकड़ा है इसे।
नहीं वो न शरमाती है शायद।
तो भूखों मरेगी साली। कोई नहीं मैं तुम्हें ऐसे तरीके सिखाउंगी कि इसके बिना जी नहीं पाएगी तेरी छोकरी। बस एक बार उसे आदत लगने दे। अच्छा ये जो मैं तुम्हारे लंड को दबा रही हूं ये कैसा लग रहा है?
बहुत अच्छा।
तो ले आज मैं तुझे हाथ से ही लाती हूं।
आंटी थोड़ा और जोर से दबाओ।
थोड़ा तेजी से प्लीज़।
और तेजी से।
फच फच फच।
ये मैंने आपका ब्लाउज़ खराब कर दिया और थोड़ा सा तो चेहरे पर भी पड़ गया, अरे आप इसे चाट क्यों रही हो?
तू चिंता मत कर आगली बार एक बूंद भी बाहर नहीं जयेअगा सारा मैं अंदर ले लुंगी।
आंटी आपके हाथों में तो जादु है।
तू देखता जा और कहां कहां जादु है साले। आंटी के तो अंग अंग में जादु है।
विकाश, ये जो मैंने तुम्हारी ट्रैनिंग करायी किसी को बताना नहीं।
जी ।
अपनी गर्ल फ़्रेण्ड को भी नहीं?
जी अच्छा।
और अपनी गर्लफ़्रेण्ड के ऊपर ट्राइ करके बताना उसे कैसा लगा?
जी।
पर करुंगा कहां?
सिनेमा हाल में, पार्क में, खाली क्लास रूम में, जहां मौका मिले।
वो कैसे?
और कभी ट्रैनिंग की जरुरत हो तो आ जाना।
तो आज शाम को आ जाऊं?
अरे बदमाश पहले ये ट्रैनिंग तो प्रेक्टिस करले रीता पर?
जब तुम्हारे अंकल नहीं हों तब आना ट्रैनिंग के लिये।
क्यों?
तुम्हारे अंकल न नहीं चाहते कि मैं किसी को ट्रैनिंग दूं। वो सारी ट्रैनिंग खुद ही लेना चाहते हैं
बड़े स्वार्थी हैं अंकल। Sex Stories
दोस्तो और सजनियो ! कहानी एकदम सच्ची है और मेरा यह Antarvasna दावा है कि दोस्तों के लन्ड फ़नफ़ना जायेंगे और आन्टियों, भाभियों और कुवांरी कन्याओं की चूतें पानी छोड़ जायेंगी।
मैं एम पी का रहने वाला हूं। बात उस समय की है जब मेरी बीवी ने कहा कि मेरी भाभी को शहर से बुला कर ले आओ। अभी उसके स्कूल की छुटटी भी हैं, घूम जायेगी।
मैं जब उसे लेने गया तो साले ने अपनी पत्नी सुनीता (मेरी सलहज) को हंस कर मेरे साथ भेज दिया। वो २२ साल की है। उसको तब तक बच्चा नहीं हुआ था। लेकिन उसके दूध बड़े बड़े मल्लिका शेरावत की तरह हैं। गाड़ी में जब ए सी कोच में चढ ही रहे थे कि भीड़ के कारण मेरा लन्ड उसकी गोल गान्ड से लग गया।
मुझे तो मानो करंट लग गया और साथ ही उसे भी अहसास हुआ कि जीजाजी का लन्ड खड़ा है।
१८ घण्टे के सफ़र के दौरान मैं सोचता रहा कि इसे कैसे चोदूं। खैर घर आ गये हम।
पड़ोस की एक भाभी को बच्चा होने वाला था, इस कारण मेरी बीवी एक रात उनके साथ अस्पताल में रही। उस रात को सुनीता जो कि दूसरे कमरे में सोती थी, ने लाईट जलाई। मैं तुरन्त उठा और पूछा- क्या बात है?
उसने कहा- मेरी कमर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है।
मैंने उसे बाम की शीशी दे दी। वो अपने कमरे में चली गयी। लेकिन मुझे नीन्द नहीं आ रही थी। मैं अपने दोनो बच्चों को सोते छोड़ कर उसके कमरे में पहुंच गया और बोला कि लाओ मैं बाम लगाता हूं।
पहले तो उसने आनाकानी की परन्तु फ़िर मान गयी। लेकिन बाम लगाने के लिये मैक्सी को ऊपर उठाना पड़ता, इसलिये उसने संकोच करके फ़िर मना कर दिया। परन्तु दर्द तेज होने के कारण उसने मुझे फ़िर बुलाया।
मैने कहा- सुनीता, एक दर्द निवारक गोली खा लो ठीक हो जायेगा। पर उसे डर था कि अगर उसे प्रेगनैन्सी हो चुकी हो तो कुछ नुकसान ना हो जाये।
आखिर उसने बाम लगवाने के लिये हां कर दिया। जैसे ही मैंने उसकी मैक्सी उठाई, उसकी चिकनी जांघे देख कर मेर लन्ड बेकाबू हो गया। मालिश करते करते मेरे हाथ उसकी साईड से दब रही चूचियों को भी स्पर्श कर रहे थे।
मैंने धीरे धीरे उसके चूतड़ों की तरफ़ मालिश शुरू कर दी। मैंने महसूस किया कि उसके रौंगटे खड़े हो रहे हैं थोड़ी देर में सुनीता पलट गयी और मुझे ऐसी नज़रों से देखा कि वह मुझे धन्यवाद देना चाहती है।
सुनीता मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर सहलाने लगी। बस मुझे ग्रीन सिगनल मिल गया। मैंने तुरन्त अपने दोनो हाथों से उसकी चूचियां दबा दी। उसने मुझे कस कर पकड़ लिया। मैने धीरे धीरे अपना हाथ उसकी चूत में घुसा दिया। अब वह कराह रही थी।
आखिर उसने मेरे लन्ड को हाथ में लेकर कहा- जीजाजी, अब इसे अन्दर करो। फ़िर उसके बाद जो सुबह चार बजे तक चुदाई का दौर चला कि पूछो मत।
चुदाई करते समय उसने बताया कि जीजाजी आपका लन्ड मेरे पति से बड़ा और मोटा भी है। शादी के बाद आज प्यास बुझी। आज मुझे पूरा विश्वास है कि मैं इस बार प्रेगनैन्ट हो जाउंगी
और ऐसा ही हुआ। ठीक नौ महीने बाद सुनीता को एक सुन्दर सा बेटा हुआ। एक दिन सुनीता ने मेरी ससुराल में ही पूछ लिया कि इस उपकार के लिये क्या गिफ़्ट दूं। मैंने जो बहुत दिन से सोच रखा था, मांग लिया, कि मुझे तुम्हारी गान्ड मारनी है।
सुनीता ने कहा- जीजाजी, गान्ड क्या जितने भी मेरे पास छेद हैं आप सब में अपना लन्ड डाल सकते हैं।
तो एक दिन अवसर मिलने पर दिन में ही मैंने सुनीता की तीन बार गान्ड मारी। परन्तु तीसरी बार जब गांड मार कर उठ रहे थे, तक तक सास आ गयी। उन्हें तेल की शीशी गलत जगह पड़ी मिली। शायद उन्हें शक हो गया था।
सभी दोस्तों से निवेदन है कि यदि शादीशुदा होकर बीवी की गान्ड नहीं मारी तो समझो कुछ नहीं किया। Antarvasna
हेलो दोस्तो! मैं अपने दोस्त सूरज के Sex Stories यहाँ घूमने गया था। उसके परिवार में वो, उसकी बहन सिया और मम्मी डैडी हैं। मेरा पहला यौन-सम्बंध सिया संग हुआ था।
रात के करीब नौ बजे खाना खाने के बाद सूरज, सिया और मैं रज़ाई औढ़े अंताक्षरी खेल रहे थे। मेरी बगल में सूरज और सामने सिया बैठी थी। आध घण्टे से मेरे पैर मुड़े होने के कारण दर्द करने लगे थे तो मैंने अपने पैर सीधे कर लिए।
मुझे महसूस हुआ कि मेरा पैर किसी मुलायम चीज़ से छू रहा है। मैंने अपने पैर के अंगूठे को धीरे धीरे हिलाया तो समझ गया कि वो मुलायम चीज़ सिया की चूत है, परन्तु सिया मुझे कुछ कह नहीं रही थी, चुपचाप अन्ताक्षरी खेल रही थी। एक घण्टे बाद हम तीनों एक साथ सो गए। बीच में सूरज सोया था। मेरी आंखों से नींद गायब थी। मैं कैसे भी सिया को चोदना चाहता था।
रात के करीब दो बजे सिया बिस्तर से उठ कर बाथरूम जा रही थी, मैं भी उठा, उसके पीछे पीछे बाथरूम में घुस गया और उसे पीछे से अपनी बाहों में ले लिया।
पहले तो वो घबराई, ऐसे दिखाने लगी कि रात वाली घटना से अन्जान हो, लेकिन मैं पूरे जोश में था, जैसे ही उसकी चूत पर हाथ रखा, वो चिहुंक गई और अपनी आंखें बंद कर ली- प्लीज़ रंजन भैया मत करो! मुझे कुछ होता है!’
‘क्या होता है?’
‘पता नहीं लेकिन बहुत अच्छा लगता है!’
‘अब और मज़ा आएगा मेरी प्यारी सिया! साथ दोगी?’
‘हाँ! लेकिन मैं गर्भवती तो नहीं हो जाऊँगी?’
‘नहीं’
मैंने उसकी चूची पर हाथ रखा ओर आहिस्ते से सहलाने लगा। मैं उसके कमसिन होठों का रस पीने लगा- कैसा लग रहा है?’
‘शऽऽऽ मत पूछिए बस करते रहिए आहऽऽऽ’
मैंने उसकी कमीज़ को ऊपर से खोल दिया, अन्दर उसने गंजी पहनी थी। गंजी के ऊपर से मैं सिया की चूची मसलने लगा।
सिया भी अपना हाथ मेरे लण्ड के ऊपर रख कर लण्ड को मसलने लगी। थोड़ी देर बाद उसने मेरा पायज़ामा खोल दिया। मेरे लण्ड को अन्डरवीयर से निकाल कर अपने हाथ से मुठ मारने लगी। मैं भी ताव में आ गया और उसकी गंजी उतार कर उसकी चूचियों को आज़ाद कर दिया और मुंह में ले कर चूसने लगा।
‘हायऽऽऽ जरा जोर से दबाईए ना! बहुत मज़ा आ रहा है!’
‘तुमने पहले किसी से…’
‘नहीं भाई, लेकिन ब्लू फ़िल्म देखती हूं!’
‘अच्छा! ‘
‘क्या आप मेरी बुर को चूसना पसन्द करेंगे?’
‘क्यों नहीं.. लेकिन पहले तुम मेरे लण्ड को चूस लो… उसके बाद…’
सिया नीचे झुकी और मेरे लण्ड को अपने मुंह में ले कर चूसने लगी। मैंने उसकी सलवार उतार कर उसे पूरी तरह नंगी कर दिया। मेरे शरीर पर भी कोई कपड़ा नहीं था, हम दोनों बिल्कुल नंगे थे।
‘क्या हम एक दूसरे का बुर और लण्ड चूसें?’
‘हाँ बिल्कुल!’
वो जमीन पर लेट गई, मैंने अपना लण्ड उसके मुंह में डाल दिया और अपना चेहरा उसकी बुर पे ले गया। सिया की बुर की खुशबू मुझे पागल कर रही थी। मैं अपनी जीभ से उसकी बुर का रस पीने लगा।
‘अब प्लीज़ मुझे चोदिए!’
मैं खड़ा हो गया, उसने लेटे हुए अपने पांव ऊपर किए। मैंने अपना लण्ड जैसे ही उसकी बुर पर रखा, सिया की बुर भट्टी की तरह जल रही थी। उसके चूसने से मेरा लण्ड गीला था। मैंने जोर से लण्ड को उसकी बुर में डाला- प्लीज़ निकाल लो! बहुत दर्द हो रहा है’
मैंने देखा मेरे लण्ड का आधा सुपारा उसकी बुर में है और बुर से खून निकल रहा है। मैं उसके होंठ चूसने लगा ओर जोर जोर से चूचियों को मसलने लगा, धीरे से लण्ड को भी अन्दर करता रहा।
थोड़ी देर में सिया कमर हिलाने लगी। मैं भी अब पूरे जोर से उसकी बुर को चोदने लगा.’आ आ अई आहऽऽऽ और तेज़ऽऽ…’
‘उफ़्फ़’
‘आआह्हऽऽ’
‘मेरा गिरने वाला हैऽऽऽ प्लीज़ और तेज़ऽऽ!’
सिया मुझसे चिपकने लगी। इस तरह हम दोनों एक साथ झड़ गए और काफ़ी देर तक एक दूसरे के साथ चिपके रहे।
उसके बाद हम बिस्तर पर आकर सो गए। Sex Stories
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