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मैं पुलिस स्टेशन से बाहर Hindi Sex Stories आया और अपनी मोटर साईकल उठा कर सीधे राहुल के घर आ गया। अभी सवेरे के साढ़े आठ ही बजे थे…हमेशा की तरह राहुल घर पर नहीं था। उसे शायद यह मालूम नहीं था कि आज उसका इस घर में अन्तिम दिन है। घर में सरोज नहीं थी…दिव्या ही मिली।
‘आज तो जल्दी आ गये… क्या हुआ रात को नींद नहीं आई क्या…?’ उसकी चुलबुली हरकत मेरे मन को बहुत अच्छी लगी।
‘दिव्या…बस रात को तो मैं तुम्हारे ही सपने देखता रहा… तुम्हारे जैसी कमसिन और जवान लड़की जिसे मिल जाये…उसकी तो किस्मत ही खुल जाये…’ मेरी बात सुन कर वो और इठलाने लगी।
‘अब अन्दर भी चलो… ‘ मुझे वो धक्का देते हुए बोली…’बोलो अब क्या इरादा है…!’
‘बस एक मीठा सा चुम्मा…’ मैंने शरारत से कहा।
‘है हिम्मत तो ले लो…!’ उसने हंस कर कहा।
‘ऐसे नहीं… पहले अपनी आँखें बंद करो…फिर देखो मेरा कमाल…’
उसने अपनी आँखें बन्द कर ली और अपना गोरा और चिकना चेहरा आगे कर दिया… मैंने उसके होंठ पर अपने होंठ रख दिये… उसके कांपते होंठो का स्पर्श मुझे रोमांचित कर गया। एकदम नरम होंठ…गुलाब की पंखुड़ियों की तरह… हम दोनों एक दूसरे के होंठो को चूसने लगे… दोनों ही मदहोश होने लगे। कुछ देर बाद अलग हुए तो दोनों के चेहरे की रंगत बदली हुई थी। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका था। उसकी आंखों में भी गुलाबी डोरे खिंच चुके थे।
दिव्या ने थोड़ा सा शर्माते हुए और फिर से आँखें बन्द करके कहा,’जो…मेरी छातियों को पकड़ लो…हाय… मसल डालो…’ उसने अपनी छाती आगे को उभार दी, उसके तने हुए उरोज बाहर को उभर आये। मैंने उसकी चूंचियो पर अपना हाथ रख दिया। और हौले हौले से दबाने लगा। उसके मुख से सिसकारी निकलने लगी। वो भी मेरे हाथों पर ज्यादा दबाने के लिये और दबाव डालने लगी।
मैंने उसकी कमर में हाथ डाल कर एक हाथ से उसके उभारों को मसलना शुरू कर दिया और अब मेरी कमर वाला हाथ चूतड़ों के ऊपर आ कर थम गया। मेरे हाथ उसके बोबे और चूतड़ दबा रहे थे और दिव्या अपने जिस्म को मेरे जिस्म से बल खा कर रगड़ रही थी। उसके मुँह से आह… हाय… मां री… जैसी सिसकारियाँ निकल रही थी। मैंने उसे दीवार से सटा कर उसकी चूत को पकड़ कर दबा दी। वो चिहुंक उठी…
‘हाय छोड़ दे जोऽऽऽ… मैं मर गई…’ वो मदहोश सी झूम गई। मैंने उसकी चूत नहीं छोड़ी… स्कर्ट के बाहर से ही उसकी चूत मसलता रहा… उसकी चूत पानी छोड़ रही थी… मेरे हाथ को गीलापन लगने लगा था।
वो मस्ती में झुकने लगी… पर उसने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया… ‘क्या कर रहे हो जोऽऽऽ… मुझे मार डालोगे क्या???… अब बस अब…नहीं रहा जा रहा है…’ उसकी उत्तेजना बहुत बढ़ गई थी… बेहाल हुई जा रही थी…
मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया और प्यार से उसे बिस्तर पर लेटा दिया। उसकी आँखें बंद थी। मैंने उसका स्कर्ट ऊपर कर दिया… उसकी पानी छोड़ती हुई गीली चूत सामने थी। गुलाबी रंग… हल्की भूरी भूरी झांटे… चूत के दोनों लब फ़ड़फ़ड़ा रहे थे… मैंने अपनी पैन्ट उतार दी… और अपना मोटा और तन्नाया हुआ लण्ड उसकी पनीली चूत पर रख दिया। चिकनापन इतना था कि रखते ही सुपाड़ा अन्दर घुस पड़ा और छेद में उतर गया।
‘घुसा दे रे… हाय… जरा जोर लगा दे…जो…’ उसकी बैचेनी बढ़ रही थी… पूरा लण्ड लेने को उतावली हो रही थी… मैं उस पर झुक पड़ा… और जोर लगा कर लण्ड अन्दर सरकाने लगा। वो भी अपनी चूत का पूरा जोर लगा रही थी। जब दोनों और बेकरारी बराबर हो तब भला तेजी को कौन रोक सकता था। वो भरपूर जवान… खिलती हुई कली… पूरा जोश… नतीजा ये कि धक्का पर धक्का… गजब की तेजी… चूत का उछाल… लण्ड को सटासट चला रहा था। मैंने उसके बोबे भींच लिये…
‘और जोर से भींचो… मेरे राजा… चोद दो आज मुझे…!’ उसकी वासना बढ़ती जा रही थी… मेरा लण्ड पूरी गहराई तक पहुंच रहा था… उसकी चूत जवान थी…कोई भी लण्ड पूरा ले सकती थी। मेरा लण्ड भी मानो कम लम्बा लग रहा था।
अचानक मेरे चूतड़ पीछे से किसी ने दबा दिये… मैंने देखा तो सरोज थी…चुदाई के जोश में वो कब आई पता ही नहीं चला। उसने मुझे इशारा किया। मैंने समझ गया… मैंने तुरन्त ही दिव्या के बोबे जोर जोर से मसलने और खींचने लगा। उसने भी मेरे चूतड़ दबाना चालू रखा।
‘जो मत करो… मैं झड जाऊंगी… हाऽऽऽय ना करो…’ पर मैंने बेरहमी से दिव्या के बोबे मसलना जारी रखा… और धक्के चूत में गड़ा कर मारने लगा। उसे जबर्दस्त चुदाई चाहिये थी।
‘मैं मर गई… राम रे… चुद गई… मेरी फ़ाड़ डाल जो… हाय मैं गई…’ उसके जिस्म में उबाल आ गया था। उसे नहीं पता था कि उसकी मां उसके पास खड़ी है। मेरी उत्तेजना भी बहुत बढ़ गई थी… पर अब दिव्या का शरीर ऐंठने लग गया था। वो मुझे अपनी ओर जोर से खींचने लगी थी। अचानक उसने पूरी ताकत से मुझे चिपका लिया और उसकी चूत लहरा उठी।
वो झड़ने लगी थी।
सरोज ने दिव्या का जिस्म जोर जोर से सहलाना शुरु कर दिया था। उसकी चूत का कसना और ढीला होना…उसका पानी छोड़ना मुझे बहुत सुहाना लग रहा था। सरोज बराबर उसका जिस्म सहलाये जा रही थी।
‘झड़ जा बेटी… निकाल दे पूरा पानी…’ सरोज उसे प्यार से कह रही थी।
‘मांऽऽऽ… हाय मेरी मां ऽऽऽ… तेरी बेटी तो चुद गई… जो ने तो मेरा दम निकाल दिया…’ दिव्या हांफ़ते हुए बोली। मैंने अपना लण्ड दिव्या की चूत से बाहर निकाल दिया।
‘लेकिन मेरा लण्ड तो देखो ना…अभी तक ये फ़ुफ़कार रहा है… सरोज तुम ही शान्त कर दो…’ मैंने अपनी बात भी कही… दिव्या भी अब बिस्तर से उठ चुकी थी।
‘जो…मम्मी की गाण्ड मार दो… मां की गाण्ड बहुत नरम है…!’ अचानक दिव्या ने मुझे सुझाया।
सरोज ने शरम से अपना मुख छिपा लिया। मैंने सरोज को तुरन्त घोड़ी बना दिया। और साड़ी खींच दी। सरोज की गोरे गोरे चूतड़ों की दोनों फ़ांके सामने आ गई। सरोज ने अपनी दोनों टांगें फ़ैला कर अपने गाण्ड का छेद खोल दिया। फिर मुझसे शर्माते हुए बोली,’हाय… मत करो जो… मैं मर जाऊंगी…’ फिर दिव्या की तरफ़ देखा -‘ दिव्या तू जा ना यहाँ से…’
‘मां, मेरे सामने ही गाण्ड चुदवा लो ना…! मुझे भी तो एक इसका एक्स्पीरीएन्स चाहिये ना…!’
‘चल हट… बेशरम… तेरे सामने चुदूंगी तो शरम नहीं आयेगी?’
‘मैं भी तो आपके सामने चुदी थी ना… जो लग जाओ ना अब…’ दिव्या ने पास पड़ी तेल की शीशी से तेल मां की गाण्ड में लगा दिया… ‘अब चोद दो मां की गाण्ड को…!’
मुझे लगा कि बस स्वर्ग है तो यहीं है… मां बेटी मुझसे इतने उत्साह से चुदवा रही थी…मैं तो सातवें आसमान पर पहुंच गया। मैंने अपना लण्ड सरोज की गाण्ड के छेद पर लगा दिया और जोर लगाया, छेद में तेल भरा हुआ था मेरा सुपाड़ा फ़क की आवाज करता हुआ छेद में फ़ंस गया।
‘उईऽऽ…मां… हाय रे…घुस गया…!’ सरोज सिसक उठी। दिव्या अपनी मां के बोबे पकड़ कर धीरे धीरे मलने लगी और प्यार करने लगी।
‘जो… मेरी प्यारी मां को तबियत से चोदो… मां को आनन्द से भर दो… देखो ना मां को कितना अच्छा लग रहा है…’ दिव्या मां की ओर प्यार से देख रही थी। सरोज ने अपनी आँखें बन्द कर ली थी।
मैं अब अपना लण्ड जोर लगा कर अन्दर सरकाने लगा। मेरे लण्ड को छोटे से छेद में घुसने के कारण तेज मीठा सा सा मजा आने लगा। पर सरोज ने अपने दांत भींच लिये। उसे हल्का सा दर्द हो रहा था।
दिव्या मां को मजा देने के लिये उसके बोबे मसल रही थी। मेरा लण्ड गाण्ड में पूरा घुस चुका था। सरोज ने मुझे मुड़ कर देखा और आंख मार दी…
‘लण्ड है या लोहा… मेरी तो फ़ाड़ के रख दी… अब मारो ना जोर से गाण्ड को…’
मैंने हरी झण्डी पाते ही स्पीड बढ़ा दी। वो सिसक उठी। मजे में उसकी फिर आँखें बन्द होने लगी।
‘चोद दे मेरी मां को… प्यार से भर दो मां को… मेरी प्यारी मां…’ अब दिव्या सरोज को चूमने लगी थी। बोबे पर तो दिव्या ने कब्जा जमा रखा था। मैंने कमर में हाथ डाल कर उसकी चूत में अपनी अंगुली डाल दी। और डबल चुदाई करने लगा। उसका दाना मसलने लगा। उसे तेज मजा आने लगा।
‘हाय रे छोड़ दे अब रे… लगा…जोर से लगा… मेरी मांऽऽऽ… मार दी रे मेरी…’ सरोज ना जाने क्या क्या कहती रही। उसकी गाण्ड अब मक्खन की तरह चिकनी हो गई थी। लण्ड सटासट चल रहा था। अति उत्तेजना से उसका दाना अचानक ही फ़ड़फ़ड़ा उठा और सरोज झड़ने लगी। ये देख कर कर दिव्या ने भी मां को कस लिया।
मैंने भी झड़ने के चक्कर में स्पीड बढ़ा दी। मेरा सुपाड़ा फ़ूल कर कुप्पा हो रहा था। सहनशीलता सीमाएं पार करती जा रही थी और आखिर अन्तिम पड़ाव आ ही गया। मैंने तुरन्त अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। दिव्या ने देखते ही देखते मेरे लण्ड को मुठ्ठी में भर लिया और कस कर दबा कर मुठ मार दिया। मेरे लण्ड ने पिचकारी लम्बी और दूर तक उछाल दी।
‘हाय मम्मी… देखो तो… माल तो फ़व्वारे की तरह निकल रहा है…’
सरोज ने बिना समय गवांये झट से मेरा लण्ड मुख में भर लिया… अब वीर्य सरोज के मुख में भर रहा था… और वो उसे एक ही घूंट में पी गई। अब वह बचे खुचे वीर्य को भी निचोड़ रही थी… दिव्या अपनी मां की इस हरकत को ध्यान से देख रही थी…
‘मम्मी… ये क्या गन्दापना कर रही हो… इसे भी कोई पीता है क्या?’
मैंने दिव्या को समझाया कि ये तो पौष्टिक होता है और आनन्ददायक होता है… दिव्या ने कपड़े से मां की गाण्ड का तेल पोंछ दिया फिर मेरा लण्ड भी साफ़ कर दिया। सरोज ने दिव्या को गले लगा लिया। और चूमने लगी…
‘देखा जो…माँ को तुमने मस्त कर दिया… मुझे बहुत अच्छा लगा…मेरी प्यारी मांऽऽ…’ कह कर सरोज से अलग हो गई।
मैंने सरोज से बात पलटते हुए कहा- ‘आज राहुल नहीं दिख रहा है…?’
‘वो चारों आज शाम को गांव जा रहे हैं न… देर से आयेगा…’ सुनते ही मैं चौकन्ना हो गया।
‘अब तो वो तुम दोनों को पीटता तो नहीं है ना…’
‘वो जंगली है… कल देखो मुझे कितना मारा… दिव्या के तो बोबे तक नोच डाले… साला मरता भी तो नहीं है…हमारी जिन्दगी नर्क बना रखी है’ कह कर सरोज ने मेरे सीने पर सर रख दिया। दिव्या भी मां की पीठ से चिपक कर रोने लगी। तो सच में वो इतना निर्दयी और क्रूर है।
मैंने उन्हें अलग करते हुए कहा…’मुझे अब चलना चाहिये…शाम को आऊंगा।’ मैं मुड़ कर बाहर आ गया। वो दोनों मुझे प्यार से निहारते रही।
मैं तुरन्त पुलिस स्टेशन गया और अंकल से मिला… उन्हें सब कुछ बताया… कि वो सभी गांव जाने की तैयारी में है।
‘शायद उन्हें भनक लग गई है… चलो…’ उन्होंने जीप तैयार की और सभी सिपाहियो को आज्ञा दी। मैंने अपनी बाईक उठाई और उनके आगे आगे चला। पान-वाले की दुकान पर पहला छापा मारा।
मैंने भाग कर टूसीटर पर बैठे मौन्टी और सुरजीत को जा दबोचा। मौन्टी ने मुझे पीछे धक्का दे दिया और मौके की नजाकत देख कर भागने लगा। मैंने उछल कर एक फ़्लाईंग किक मार कर उसे गिरा दिया।
इतने में दो पुलिस वालों ने उन्हें धर दबोचा। हैप्पी का पीछ करके अंकल ने उसे हथकड़ी पहना दी। पान की दुकान को सील कर दी। जीप वहां से कॉलेज पहुंची। मुझे राहुल पर नजर रखने को कहा और साथ में दो पुलिस वालों को भी हिदायत दी। अंकल प्रिन्सिपल से मिलने ओफ़िस में चले गये। कुछ ही समय में अंकल और प्रिन्सिपल राहुल की क्लास के सामने थे।
राहुल देखते ही समझ गया और खिड़की से कूद कर भागने लगा। पर खिड़की के बाहर मुझे देखते ही उसके होश उड गये। उसे हथकड़ी डाल दी गई। समय पर पूरा अभियान निपट गया। चारों दोस्तों को और पान वाले को हवालात में बंद कर दिया गया। अब चला तलाशी अभियान ।
पुलिस मेरे साथ सबसे पहले राहुल के यहाँ पहुंची। राहुल भी साथ था। दिव्या और सरोज ने मुझे और राहुल को पुलिस के साथ देखा तो घबरा गई।
‘साब इसने कुछ नहीं किया… जो तो अच्छा लड़का है…’ अंकल ने मेरी तरफ़ देखा।
‘क्या बात है जो… बड़ी तरफ़दारी हो रही है… ये लो… अब इसका ध्यान रखना वरना साले की थाने में इसकी टांगें तोड दूंगा…’ अंकल में मेरी तरफ़ गुस्से में देखा और मुझे सरोज की तरफ़ धक्का दे दिया।
‘जी… जी… मैं ध्यान रखूंगी…’ घबराई सी सरोज मेरा हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई।
‘साली… हरामजादी… जो के साथ खड़ी है… आने तो दे मुझे… तुम दोनों मां बेटी के हाथ पांव ना तोड़े तो देखना !’
मैंने राहुल के कान में कहा…’तू फ़िकर मत कर यार… मैं तेरी मां और बहन को रोज़ चोदूंगा… मस्त चीज़ें है दोनों…’
‘भड़वे… तेरी तो मैं… ‘ उसी समय अंकल का एक हाथ उसके मुँह पर पड़ा… उसके होंठो से खून छलक पड़ा।
मैंने राहुल की तरफ़ मुस्करा कर देखा… ‘तू क्या समझा था… कामिनी के साथ तूने जो किया था… वो चुपचाप बैठती…’ अब उसकी नजरें ऊपर उठी… वो समझ चुका था… कि ये सब क्यों हुआ है… उसका सर एक बार फिर झुक गया।
‘आगे से अगर ये जो… राहुल के साथ दिखा तो साला जेल जायेगा…’ अंकल अपने डायलोग बोले जा रहे थे। सरोज और दिव्या को अब भी कुछ समझ में नहीं आया। उनकी नजर में बस राहुल एक अपराधी था।
कामिनी का बदला उन दोनों के समझ में नहीं आया था। इतने में पुलिस वाले सारे घर की तलाशी ले कर कुछ समान ले कर आ गये। उसे वहीं पर सील कर दिया और हम तीनों के उस पर हस्ताक्षर करवा लिये।
वो मुझे छोड़ कर आगे तलाशी अभियान में निकल गये। मैं अंकल की अदाओं पर मुसकरा उठा। सरोज और दिव्या मुझसे प्यार करके लिपट कर रोने लगे। मैंने उन्हें समझाया
‘मैं कोई चोर थोड़े ही हूँ… मुझे तो बस इन्होंने यहां से निकलते देखा तो पकड़ लिया… हां राहुल ड्रग्स बेचने के चक्कर में पकड़ा गया है जाने कितने सालों के लिये अन्दर जायेगा।
उन दोनों ने राहुल से पीछा छूटने पर चैन की सांस ली… उनकी नजर में मैं पुलिस से बच गया और मुझे प्यार से बिस्तर पर सुला दिया। दोनों एक एक करके मुझे प्यार करने लगी… अचानक मुझे कामिनी का ख्याल आया।
‘मैं शाम को आऊंगा… रात भर मजे करेंगे… बाय…’ मैं सीधा वहां से कामिनी के पास आया। उसे सारी बात बताई… कामिनी खुश थी… उसने मुझे प्यार से चूम लिया…
‘बात कहां तक पहुंची… कार्यक्रम चालू है…?’ कामिनी और नेहा ने मुस्करा कर पूछा्।
‘दोनों ही बहुत सेक्सी है… खूब मजा आता है और अब तो दोनों ही मेरी फ़ेन है… क्यों जल गई ना…’ मैंने शरारत की नजरो से देखा।
दोनों ने मुझे पकड़ लिया और मेरी पिटाई शुरू कर दी… Hindi Sex Stories
मैंने जवानी Hindi Sex Stories की दहलीज़ पर कदम रखा ही था कि मेरे सामने मेरी जवानी का लुफ़्त उठाने के लिये लोगों की नजरें उठने लग गई थी। उनकी नजरें जैसे मेरे उभारों को मसल कर रख देना चाहती थी। जिसे देखो उसकी नजरें मेरी उभरती हुई चूंचियों पर ही पड़ती थी, मानो अन्दर मेरी नंगी चूंचियों को टटोल रही हो। फिर उनकी नजरें सीधी मेरी टाईट जीन्स में चूत को ढूंढती थी, कि शायद वहां कुछ नजर आ जाये। सबसे अधिक मेरे सुडौल चूतड़ों को लोगों की नजरें सहलाती थी। क्या बच्चे, क्या जवान और फिर बूढ़े तो कमाल ही करते थे, उनकी आंखों में चमक आ जाती थी और बड़ी आस भरी नजरों से मेरी जवानी को ताकते थे।
उनकी इस कमजोरी को मैं जानती थी, और जान कर के मैं इस बात का आनन्द उठाती थी। मैं भी उसके लण्ड की ओर चुपके से देखा करती थी और उसके उठान को देख कर मेरी चूत भी फ़डक उठती थी। उनके ढीले पेण्ट में से कुछ तो हिलते हुये दिख ही जाता था। बूढों में ये खास बात होती है कि वे लड़कियों की बात अपने मन में ही रखते हैं और युवा और जवान इसे सभी को बताते हैं।
घर पर आकर मैं वासना की मारी मोमबत्ती को ऊपर से लौड़े का शेप देकर उसे कभी गाण्ड में तो कभी चूत में घुसा लेती थी। इसी चक्कर में मेरी चूत की झिल्ली फ़ट चुकी थी, पर मैंने यह मोमबत्ती चूत और गाण्ड में घुसेड़ना बन्द नहीं किया। पर मुझे इसको घुसेड़ने से पत्थर जैसा अह्सास होता था। चूत का दाना मल कर और चूंचियों की घुन्डियाँ मसल मसल कर अपना रति-रस निकाल ही लेती थी। मेरी उमर के जवान युवक युवतियाँ इस बात को समझते होंगे कि जवानी मात्र एक बला है और ये सभी को चोदने या चुदवाने को प्रेरित करती है। पर लण्ड कोई मिलता ही नहीं था। बस मर्द कहने को ये मेरे शर्मा अंकल ही थे जिनसे मैं चुदने का भरकस प्रयत्न कर रही थी। उनकी पत्नी लगभग तीन वर्ष पहले एक बीमारी में चल बसी थी। तब से वो कुंवारा सा जीवन यापन कर रहे थे।
उन्हीं बूढ़ों में से … बूढ़े तो नहीं पर हां… उसके नजदीक ही थे… मेरे मकान मालिक भी थे। कहने को तो वो मुझे बेटी कहते थे पर जवान लड़कियों में मर्दों को पहचानने की एक खास नजर होती है। मैं भी उन्हें खूब पहचानती थी। उनके बेटी कहने का अन्दाज मेरे दिल को घायल कर देता था। क्योंकि कहीं पे निगाहे कहीं पे निशाना रहता था। मुझे लगता था कि अंकल की यह वासना भरी कभी तो उन्हें मुझे चोदने पर विवश करेगी। शायद यही रिश्ता बना कर मेरे नजदीक रहना चहते थे। मेरे कॉलेज से आने के बाद मुझे वो खाना खिलाते थे फिर मैं सो जाती थी। शाम को शर्मा अंकल कार में घूमने जाते थे और मुझे जरूर पूछते थे।
झील की पाल पर वो दूसरे बुजुर्ग लोगों के साथ घूमते थे और मैं जवान लडकों के झुण्ड के बीच इठलाती हुई टहलती थी। अधिकतर तो यह होता था कि कोई ना कोई मेरी क्लास का साथी मिल जाता था, और अन्य लड़के बेचारे आह भरते हुए मेरी अदा पर फ़्लेट हो जाते थे। मेरे उभरे हुए मटके जैसे गोल-गोल चूतड़ उनके दिल में कहर ढाते थे। मुझे याद है कि एक बार मेरे पीछे एक मेरा क्लास का साथी पिट भी चुका था… यानि मेरे पीछे झगडा…।
उन जवान बूढों के बीच भी मैं खूब इतराया करती थी और उनकी चहेती बन गई थी। वे तथाकथित बूढ़े कभी कभी मुझे बेटी कहकर मेरे गालों पर प्यार भी कर लेते थे और उनकी तबीयत फिर से रंगीन होने लगती थी। मुझे मालूम था कि यह प्यार नहीं है, उसमें मुझे वासना की महक आती थी। फिर आता था दौर सामने बनी दुकानों पर आईसक्रीम या चाट खाने का, अंकल मुझ पर खूब खर्चा करते थे। वहां से सीधे घर पर आते थे। जब कभी मैं अंकल के साथ नहीं होती थी तो वो मुझे जरूर पूछा करते थे।
अंकल घर पर आकर मुझे कमरे में छोड़ने आते थे, फिर मैं उन्हें एक गरमा-गर्म चाय पिलाती थी। इस दौरान मैं उनकी दिल की इच्छा पूरी कर देती थी। उन्हीं के सामने मैं अपने कपड़े बदलती थी, उन्हें जानबूझ के अपने जवान सुडौल चूतड़ पेण्टी के ऊपर से दिखाती थी। शमीज के ऊपर से ही उन्हें मेरे छोटे छोटे उभरते हुये मम्मे भी दर्शाती थी और घर के कपड़े पहन लेती थी। उन्हें यह दर्शाती थी कि जैसे मुझे सेक्स के बारे में कुछ नहीं मालूम। पर उन्हें क्या पता था कि मैं उन्हें मजबूर करके चुदवाऊंगी और साथ में पैसे भी वसूलूंगी। और एक दिन ऐसा आ ही गया कि शर्मा अंकल ने मुझे लपेटने की कोशिश की और मैं झम से उनकी गोदी में जा गिरी और हो गया वासना का गर्मा-गर्म खेल। फिर तो मैं खूब चुदी और आज तक उन्हें नहीं छोड़ा है। जानते हो इसका राज… जी हां वो मेरी सारी जरूरतें पूरा करते थे।
आज भी मैं शर्मा जी के सामने कपड़े बदल रही थी। हमेशा की तरह उनका लण्ड खड़ा हो गया। मेरी जवानी की गहराईयों और उभारों को वो बडी बेदर्दी से नजरें जमा कर अन्दर तक देख रहे थे। वासना के मारे मेरी भी चूत के पास पेण्टी गीली हो गई थी। मैंने जानकर अपनी चूत का गीलापन उन्हें दिखाया। गीलापन देख कर उनकी आंखे चमक उठी। अब शायद उनके मन में आया होगा कि इस पार या उस पार। उन्होंने अचानक ही कहा “अरे नेहा बेटी, देख ये तेरे पांव पर क्या लगा है…!”
उनका नाटक मुझे मालूम था। मैं जान कर के उनके बहुत पास चली आई कि उन्हें मेरे शरीर का स्पर्श भी हो जाये। पहले तो मुझे शरम सी लगी, फिर मैंने अपना दिल कड़ा करके अपनी छोटी सी स्कर्ट जांघ तक उठा कर कहा,” ये यहां…?”
और उन्होंने मेरी जांघ सहला दी। उनका लण्ड खड़ा हो कर सलामी दे रहा था।
“अंकल ये तो तिल है… ये देखो यहाँ पर भी है… ये देखो !” मैंने अपना स्कर्ट और ऊंचा करके चूतड़ तक उठा दिया। ऐसा करने में मुझे बहुत शरम आई। मेरे गोरे गोरे चूतड़ देख कर उनसे रहा नहीं गया। मैंने उन्हें जानकर के उकसाया। उन्होंने अपना हाथ मेरे तिल पर फ़ेरते हुये एक चूतड़ पर भी घुमा दिया। चूतड़ पर हाथ लगते ही मेरा पूरा शरीर जैसे झनझना गया। मुझे लगा कि ये बुड्ढा तो अब मुझे चोद के ही मानेगा। मैंने अपनी चूंची पर तिल भी अपनी कमीज पूरी ऊपर उठा कर दिख दी। और मेरा दिल जोर से धड़क उठा। मेरे छोटे छोटे चूचुक देख कर अंकल तो पागल से हो गये। मैंने आंखे बंद कर ली, बस इन्तज़ार था चूचियों के पकड़े और दबाये जाने का… जैसे इन्तज़ार सफ़ल हुआ… उन्होने इस बार भी चूची के तिल को मेरी चूंची के साथ सहला दिया। उनका लण्ड पूरे उफ़ान के साथ पटकियाँ मार रहा था।
“अरे हां रे तेरे तो बहुत से तिल हैं…” उनकी आंखे फ़टी जा रही थी और लण्ड पैण्ट में ही तम्बू बना रहा था।
“अंकल और हाथ से सहलाओ ना… मुझे तो अच्छा लगने लगा है।” मैंने घायल पंछी के गले पर जैसे चाकू रख दिया। शर्मा जी अब बदहवास से होने लगे। उन्होने मुझे अपनी जांघो पर बैठा लिया और मेरी चूंचियां बड़े प्यार से सहलाने लगे। पंछी फ़ड़फ़ड़ा उठा…
“बेटी, तुम्हारे मम्मे तो बड़े प्यारे प्यारे हैं, रोज ही मुझसे मालिश करवा लिया करो!”
मेरी चूत में गीलापन और बढ़ गया। मैं अंकल की गोदी में बैठ गई। बैठते ही उनका खड़ा लण्ड मेरी गाण्ड से टकरा गया। मै उस पर अपनी गाण्ड दबा कर बैठ गई। अंकल कुत्ते की तरह लण्ड को बार बार उठाकर यहाँ-वहाँ मारने लगे। अब तो अंकल का लण्ड लग रहा था कि चूत में घुस ही जायेगा। पंछी अब काबू में था, अब कही नहीं जा सकता था वो।
“नेहा बिटिया, जरा ठीक से बैठ ना… अभी लग रही है !” अंकल में कसमसाते हुये कहा।
“अंकल मजा आ रहा है… और आप भी है ना इस उम्र में भी शरमाते हो !” मैं चोट पर चोट किये जा रही थी।
” ओहो… तू तो कितनी शरारती है… ये ले … बस अब तो मुझे भी मजा आया ना?”
शर्मा जी ने अपनी पैण्ट की जिप खोल दी और अपना तन्नाया हुआ नंगा लण्ड मेरी नंगी चूतड़ों की दरार में फ़िट कर दिया। मुझे उनके भारी लण्ड का नक्शा चूतड़ों के बीच महसूस होने लगा। मुझे दिल में एक मीठी सी गुदगुदी हुई और मैंने अपने अपने बदन को उनके ऊपर ढीला छोड़ दिया। जोश में अंकल ने मेरे होंठो को अपने होंठो से चूम लिया। मुझे विरोध ना करते देख कर अंकल के होंठ फिर से मेरे होंठो पर जम गये और मेरे नरम नरम अधरों का रसपान करने लग गये। मुझसे भी रहा ना गया, मैंने अपनी आंखे बंद कर ली और स्वर्ग जैसे सुख को भोगने लगी। आनन्द से भर उठी।
अंकल का लौड़ा मेरी गाण्ड में जोर मारने लगा था। मेरी गाण्ड में बड़ी तेज गुदगुदी सी होने लगी थी। मुझे मोमबत्ती की तरह उनका लण्ड गाण्ड में घुसता नजर आया।
“नेहा बेटी, आज मुझे आण्टी की याद आ गई… वो भी मेरी गोदी में मेरे लण्ड को ऐसे ही गाण्ड में घुसेड़ कर बैठती थी।” अंकल के लण्ड की टोपी पर चिकनाई की कुछ बूंदे निकल आई थी।
“अंकल, क्या मैं पेण्टी उतार दूँ… पूरा ही लण्ड गाण्ड में घुसेड़ दीजिये… मन में मत रखिये। आपका तो इतना चिकना हो रहा है !”
जाने कैसे मेरे मुख से यह निकल पड़ा। अंकल ने मुझे प्यार से खड़ा किया और आधी उतरी हुई पेण्टी नीचे खींच कर उतारने लगे।
” ये पेण्टी तो गीली हो गई है … क्या बहुत मजा आ रहा था ना।” अंकल ने चोदने के मूड़ में कहा।
“हाय अंकल … ऐसे मत कहिये ना… बस मुझे आण्टी वाला आनन्द दे दीजिये !” मैं उनके ये कहने से वास्तव में शरमा गई थी।
“नेहा, एक राज की बात बताऊं, आण्टी तो सालों से ठण्डी ही रहती थी, उनके जिस्म को हाथ भी नहीं लगाने देती थी, आखिर के दिनों में तो यूँ समझो कि हम भाई बहन की तरह रहते थे, भले ही वो मुझे राखी ही बांध दे !”
यह उनका मजाक था या वास्तविकता थी, पर उनका यह कथन उनके दिल की पीड़ा दर्शा रहा था। पर मैं तो मात्र लण्ड की भूखी थी। मैंने हंस कर उनकी बात टालते हुये उन्हें फिर से रूमानी दुनिया में ले आई। अंकल ने अपना लण्ड बाहर ही रखते हुये अपना पैण्ट और चड्डी उतार दी।
“लण्ड से खेलोगी…?”
“कैसे अंकल?”
“इसे हिलाओ, इसे मुठ मारो, इसकी चमड़ी ऊपर नीचे करो, मेरे लाल लाल सुपाड़े को सहलाओ, उसे प्यार करो, चूसो, टट्टों की चमड़ी को चुटकियों से मसलो, गोलियों को धीरे धीरे सहलाओ… ”
“इससे मजा आता है क्या …?”
“हां बहुत आनन्द आता है, लण्ड फ़ूल कर कड़क हो जाता है और फिर इसे चूत में लेने से असीम आनन्द आता है !”
“अरे वाह … यह तो मुझे मालूम ही नहीं था…” मेरा दिल खुशी के मारे उछलने लगा था। हाय इस अंकल की तो मैं…
“तो आओ बिस्तर पर आराम से सब कुछ करेंगे…” अंकल बिस्तर पर जा कर लेट गये।
मैंने कूलर चला दिया और साथ में सीलिंग फ़ेन भी। नंगे शरीर पर मस्त ठण्डी हवा आग का काम रही थी। मैंने अलमारी से अपनी लण्ड के आकार वाली मोमबती भी निकाल ली। अंकल यह सोच सोच कर ही अपना लण्ड कड़क किये जा रहे थे कि उन्हें अब सालों बाद शारीरिक सुख मिलने वाला है। मुझे उनकी इस हालत पर दया आ गई। उनके कहे अनुसार मैं एक एक करके उनके लण्ड के साथ खेलती रही। बीच बीच में उन्हें चूम भी लेती थी, उनकी गाण्ड में अंगुली भी कर देती थी। उनके टट्टों के साथ खेलने लगती थी, फिर हाथ में लेकर लण्ड पर मुठ मारने लगती। मैंने उनका लण्ड फ़िल्मों की तरह मुख में ले लिया और मुठ मार मार कर चूसने लगी। उनके चूतड़ भी ऊपर उठ उठ कर जैसे मुख को चोदने लगे। तभी मैंने मोमबत्ती को अपने थूक से गीला किया और उनकी गाण्ड में घुसाने लगी।
“अरे, ये क्या कर रही हो…? अच्छा धीरे से घुसाना… तो मजा आयेगा”
“अंकल आपने कभी ऐसा किया है?”
” नहीं मोमबत्ती तो नही, पर जवानी में मैंने कई बार गाण्ड मरवाई है और मारी है !”
और मैंने धीरे से उनकी गाण्ड में मोमबत्ती घुसेड़ दी। और लण्ड पर मुठ मारने लगी। लण्ड को चूसती भी जा रही थी। वो ज्यादा देर तक खेल को सह नहीं पाये और हाय कहते हुये उन्होंने अपना वीर्य छोड़ दिया। सारा वीर्य मेरे मुख में भरने लगा, मुझे बड़ी घिन आई, पर फ़िल्मों में जैसा देखा था मैंने उसे पीने की कोशिश की… सफ़ेद सफ़ेद सा, चिकना सा, लसलसा सा… पर एक बार तो मैं गटक गई। फिर किसी छिनाल की तरह उनका लण्ड पूर साफ़ कर दिया।
अंकल 50 वर्ष के थे… सो थक गये थे और उन्हें नींद आ गई। उनका शरीर अच्छा था, मुझे लगा कि 50 वर्ष शायद अधिक नहीं होते है… उनका बलिष्ठ लण्ड अभी भी किसी घोड़े की तरह ठुमक रहा था । मैं बाथ रूम में जाकर नहाई और फ़्रेश हो कर बाहर आ गई और कम्प्यूटर पर बैठ गई। रात को ग्यारह बजे उनकी नींद टूटी। उन्होंने उठ कर मुझे खाना खाने को कहा और अपने कमरे में चले गये। वहाँ से वो नहा धो कर खाना खाने बैठ गये। डिनर के बाद उन्होने मेरी बांह पकड़ी और अपने बेड रूम की तरफ़ ले चले। मैं खुशी से झूम उठी…
“अंकल अब क्या करोगे?… ठहरो मोमबत्ती तो ले लूं !” यह बात सुन कर अंकल मुस्करा उठे।
“अभी तक किया ही क्या है… अब सुहागरात के मजे ले लें !”
“ये सब नहीं यार अंकल, अब तो बस वही हो जाये…”
“हां उसी को तो सुहाग रात कहते हैं…!”
“क्या… चुदाई को सुहागरात कहते हैं … सीधे सीधे चुदाई की रात नहीं कहते?”
मेरे और अंकल के कपड़े एक एक करके उतरते जा रहे थे। अब दोनों ही मदरजात नंगे खड़े थे और हां साथ में उनका लण्ड भी खड़ा था। उनकी हालत देख कर मेरी हालत भी बिगड़ती जा रही थी। अंकल ने मुझे मुस्करा कर देखा और अपने हाथ खोल दिये, मैं पगली सी उनकी बाहों के घेरे में आती चली गई। अंकल के मुख से ठण्डी सी आह निकली। उनकी बाहें मेरी कमर पर कसती चली गई। उनका लोहे जैसा लण्ड मेरी चूत में गड़ने लगा। मैं अपनी चूत धीरे से सेट करके लण्ड लीलने का प्रयत्न करने लगी।
मेरी हालत किसी बिन चुदी कुतिया की तरह हो रही थी… चूत लण्ड मांग रही थी। चूंचियां कठोर हो गई थी। निपल कड़े हो गये थे। शरीर में तरावट आ चुकी थी। अंगुलियों की चुटकियां मेरे कड़े निपल में च्यूटी भर रही थी। पर करण्ट चूत में आ रहा था। चूत पानी से लबालब भर चुकी थी। मेरी आंखे भारी हो चली थी। मन में पहली बार लौड़ा लेने के अहसास से बदन लहक रहा था। मेरी ऐसी हालत देख कर अंकल ने प्यार से मुझे बिस्तर पर लेटा दिया और मेरी टांगें ऊपर की ओर उठने लगी।
“अंकल वो मोमबत्ती देना…!”
“अब इसकी जरूरत नहीं है… ये मेरा मोमबत्ता जो है !”
“नहीं अंकल, ये तो आपकी गाण्ड के लिये है…” अंकल हंस पड़े… वो समझ गये थे कि उन्हें भी ये मोमबत्ती अपनी गाण्ड में घुसानी पड़ेगी।
मैंने मोमबत्ती हाथ में ली और अंकल से कहा,”अंकल प्लीज… अब मत तड़पाओ…” अंकल एक जवान की तरह उछल कर मेरी टांगों के बीच में आ गये और उनका लण्ड हाथ में पकड़ कर चूत की पलकों पर रख दिया। मैंने भी चूत की पलकें खींच कर खोल दी। लण्ड ने गुलाबी चूत को देख कर फ़ुफ़कार भरी और अपना सर झुका कर आदर सहित टोपा अन्दर कर लिया। लण्ड का पहला प्यारा सा अहसास … मुझे मदहोश कर रहा था।
अंकल ने अपने तने हुये भारी लण्ड को जोर लगा कर अन्दर सरकाया। चिकनी चूत लण्ड पा कर लहलहा उठी। मैंने भी अपनी चूत ऊपर उठा कर लण्ड का तहे दिल से स्वागत किया। अंकल का पूरा लण्ड लीलने में मुझे कोई परेशानी आई।
“नेहा… तुम तो चुदी चुदाई लगती हो…!”
“हां अंकल… इस मोमबती ने मेरी चूत चोद चोद कर इण्डिया गेट बना दिया है !”
अंकल ने चूत को इण्डिया गेट नामकरण का मुस्कराते हुये स्वागत किया और अपना शरीर का सारा भार मेरे ऊपर डाल दिया। लण्ड जड़ तक बैठ चुका था। उनका हर एक धक्का बच्चे दानी पर ठोकर मार रहा था। उनका भारी जिस्म मुझे हल्का लग रहा था। लोहे जैसा लौड़ा मेरे बदन में घुसा हुआ सब सहने की ताकत दे रहा था। मेरी टांगें उनकी कमर में उठी हुई कस चुकी थी। मेरे मुख से बराबर मस्ती भरी चीखें और आहें निकल रही थी। मुझे लण्ड के द्वारा पहली चुदाई का आनन्द भरपूर आ रहा था। उनके हाथ मेरे कठोर चूंचियों को मसल मसल कर मीठी सी तरावट भरी गुदगुदी कर रहे थे। तभी मेरा हाथ उठा और अंकल के पिछवाड़े पर आ गया और उनकी गाण्ड के छेद में मैंने मोमबती घुसेड़ दी, जिसे अंकल ने एक खिलाड़ी की तरह सिसकारी भरते हुये झेल लिया। मैंने थोड़ी और कोशिश करके आधी से अधिक मोमबत्ती उनकी गाण्ड में घुसेड़ दी।
“आह्ह्ह मेरी नेहा, मेरी गाण्ड में मोमबत्ती और चुदाई का तालमेल कितना कितना ज्यादा मजा देता है…” अंकल का लण्ड और फ़ूल गया था। गाण्ड में फ़ंसा लण्ड उन्हें भी गुदगुदा रहा था। जोश में आ कर उन्होने अब अपना लण्ड कस कस कर चूत पर मारना आरम्भ कर दिया। हम दोनों की हाल एक जैसी थी। मैं पहली बार चुद रही थी और अंकल का लण्ड भी कई वर्षों बाद किसी चूत को चोद रहा था। सारा जिस्म चुदाई की मधुर कसक भरी मिठास से लबरेज हो चुका था। रति-रस बाहर आने को तड़प रहा था। मेरे दांत भिंचे जा रहे थे… शरीर में कसावट आने लगी थी। गरम चूत धुंआ सा उगलने लगी थी। शर्मा जी की सांसे जोर जोर से चल रही थी। पसीना सा छूटने लगा था। मैंने अंकल की गाण्ड में घुसी मोमबत्ती को जोर से पकड़ लिया और जोर लगा दिया। मोमबत्ती गाण्ड की गहराईयों में और धंसती चली गई।
“अंकल जीऽऽऽऽऽ, मारो लौड़ा कस कर मारो … हाय रे मेरी तो निकली रे… अंकल जी … अरे अरे रे अऽऽऽह्ह्ह्ह्ह्ह, उईईईईईऽऽऽऽऽ”
और मेरी चूत मचल उठी। रति-रस छूट गया। मैं जोर से झड़ गई। मेरा कसाव मोमबत्ती पर बढ़ता ही गया। अंत में अंकल के मुख से हाय निकल गई और उनके लण्ड ने यौवन रस की बाढ़ ला दी। उन्होंने अपना लण्ड बाहर खींच लिया था और अब भरपूर पिचकारियों की बौछार कर रहे थे। मैंने मोमबत्ती उनकी गाण्ड से निकाल दी। उनके लण्ड से ढेर सारा वीर्य निकला … उनका लण्ड अभी भी वीर्य निकालने के लिये जोर मार रहा था और दो एक बूंदे तो फिर भी निकलती ही जा रही थी। उनका बिस्तर वीर्य और मेरी चूत के पानी से काफ़ी गीला हो चुका था। अंकल मेरे जिस्म से हट कर एक तरफ़ निढाल से लुढ़क गये। उनकी सांस धौंकनी की तरह चल रही थी। दिल की धड़कन बहुत तेज थी। मुझे अंकल की संतुष्टि पर बहुत चैन आया… उन पर प्यार भी बहुत आया। मेरे मन के भीतर कहीं लग रहा था कि उन्हें अभी भी उनके भीतर वासना भरी कसक छुपी हुई है। उन्हें एक औरत की बेहद जरुरत है, बहन की नहीं… अंकल थकान से फिर भर चुके थे। रात बहुत निकल चुकी थी। मैं भाग कर अपने कमरे में चली आई। कोई देखने वाला, सुनने वाला कोई नहीं था, नंगी ही धम्म से बिस्तर पर कूद पड़ी और तकिया दबा कर सोने के लिये आंखे बंद कर ली…
जवान हो या बुड्ढा… लण्ड सभी के होता है … कहते हैं ना बड़े बूढे ज्यादा समझदार होते हैं … इसी का फ़ायदा उठाओ और उनसे खूब चुदो … आपको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है… उन्हें इस बात की अधिक चिन्ता रहती है… तो मेरी सहेलियों… इन्हें भी अपना साथी बनाओ… ना… ना… जीवन साथी नहीं … सिर्फ़ चुदाई का साथी Hindi Sex Stories
कई बार सपने में मैं अपनी सोनू भाभी को Antarvasna उनकी तारीफ में कहता था ..” भाभी आप बहुत खूबसूरत हो आपके रसीले होंठों का रस पीने के लिए कोई भी मर्द चाहेगा गोल गोल बड़ी आँखों में अजीब सी उलझन है आपकी पतली कमर देख कर कोई भी छूने को चाहेगा काजोल की जैसे बड़ी बड़ी चुचियां है आपकी दो मोटे कूल्हों को देखकर हर कोई दीवाना हो जाएगा सच कहूं भाभी आप एक हसींन हिरोइन जैसे दिखती हो.” वो मुस्कुरा कर कहती हैं-“बस बस बहुत तारीफ करते हो वो भी झूठी ” ये क्या कहा आपने मैं भी कुर्बान जाऊँ आप पर अगर झूठा निकला तो।
भैया को अक्सर शहर से बाहर जाना पड़ता है। एक बार भाभी ने काले रंग की साड़ी और ब्लाऊज पहना। भाभी गोरी हैं इसिलिए मैंने उसकी खूब तारीफ की और कहा- भाभी आप तो काले कपड़ो में बहुत ही खूबसूरत दिखाती हो वो मुस्कुरा के बोली झूठे कहीं के।
फिर कई दिनों तक मन में एक सपना सजाता रहा कि कब भाभी को पा लूं और कस के उनकी गरम नरम चूत में अपना मोटा लन्ड डाल के उन्हें चीखने पर मज़बूर कर दूं।
एक दिन भैया ने सुबह जल्दी बाहर जाना था और मैंने उन्हें स्टेशन तक छोड़ने जाना था। मैं केवल अंडरवीयर पहने कसरत कर रहा था कि अचानक भाभी आ गई। मुझे एक झटका सा लगा और मैंने एकदम अपनी कमर पर एक तौलिया लपेट लिया। भाभी मेरे पास आईं और बोली- देवर जी ! आपकी बोडी तो बहुत जानदार है। मेरी बाजू पकड़ कर कहा- क्या सख्त बाजू है। मेर लन्ड भाभी के नर्म हाथों का स्पर्श पाते ही मचलने लगा। भाभी ने तौलिये में मेरे लन्ड को फ़ूलते हुए देख लिया। फ़िर वो जल्दी से बोली- जल्दी तैयार हो जाओ, चलो तुम्हारे भैया राह देख रहे हैं, उनकी गाड़ी का वक्त हो रहा है। वो चली गई पर मेरा लन्ड गर्म हो चुका था। मैं भैया को स्टेशन छोड़ आया और फ़िर कालेज चला गया।
शाम को जब घर आया तो भाभी पड़ोस में गप्पें हान्क रही थी। मुझे देख कर वो अन्दर आ गई। आज उन्होंने गहरे नीले रंग का गाऊन पहन रखा था और अन्दर आ कर दरवाजा बंद करते ही उन्होंने कहा- क्यों देवर जी मैं काले कपडों में सुंदर लगती हूँ ना !
मैंने कहा- हाँ. तो उन्होंने मैं कैसी दिखती हू इन काले कपड़ो में ?
मैंने हँसते हुए कहा- भाभी तुमने तो नीले रंग का गाऊन पहना है.
उन्होंने शरारत से कहा उस दिन तो कहते थे भाभी तुम काली साड़ी और काले ब्लाऊज में अप्सरा लगती हो. आज क्या हुआ ? मैंने कहा- लेकिन भाभी आपने नीला गाऊन पहना हुआ है काला नहीं.
तभी मेरा ध्यान भाभी के कंधे पर दिख रहे ब्रा स्ट्रैप पर गया। मैंने आगे बढ़ कर ब्रा स्ट्रैप के नीचे उंगली डाल कर ऊपर को उठाया और कहा- अच्छा तो ये है काले रंग की ब्रा। लेकिन दिख तो नहीं रही, भाभी जरा दिखाओ ना।
” कुछ नहीं ! कुछ नहीं ! मैं तो मज़ाक कर रही थी “भाभी बोली।
मैंने कहा- भाभी प्लीज! दिखाओ ना ! प्लीज भाभी प्लीज ! बस एक झलक एक बार !
इतना सुनते ही भाभी ने अपना गाऊन निकल दिया मैं उसे देखते ही दंग रह गया सच भाभी काले रंग की चोटी सी ब्रा और काले रंग की बिल्कुल छोटी सी पैन्टी में थी। उसकी दोनों चूचियां आधी से ज्यादा नंगी थी जब पैन्टी उसकी आधी चूत को ही ढक पा रही थी दोनों ओर से चूत नंगी दिखाई दे रही थी ये नजारा देख कर मेरा लंड अंडरवियर में खड़ा होने लगा.
भाभी ने कहा ” उस दिन तो बड़ी तारीफ करते थे आज क्या हो गया ”. मैंने कहा “भाभी तुम्हारी चूचियां और चूत का कोई जवाब मेरे पास नहीं पहली बार किसी औरत का आधा बदन नंगा देखा है सच कह रहा हूँ तुम्हारी कसम भाभी इतनी खूबसूरत गदराई हुई जवानी पहली बार देख कर मैं बाग बाग हो गया हूँ ”
ये कहते हुए मैंने आगे कदम बढाया तो भाभी हिली नहीं अपनी जगह से. मैंने भाभी को कंधो से पकड़ कर अपने से चिपटा लिया।
उन्होंने मुझसे कहा- क्या कर रहे हो, पहले अन्दर चलो !
मैं समझ गया कि आज भाभी दावत दे रही हैं। अन्दर जाते ही मैंने अपनी शर्ट निकल दी ,ऊपर का बदन नंगा हो गया फिर बिना सोचे अपनी पैंट उतार दी सिर्फ़ अंडरवियर में आ गया मेरी नजर भाभी की चुचियों पर गई छोटी सी ब्रा और बड़े कद की चूचियां कब तक छुपाती. मैंने पीछे जा के हूक खोल दी। दो नंगे फल भाभी के बदन पर झूलने लगे .वो कसमसाई मैंने उनकी बिना परवाह किए पैंटी को एक ही झटके में उतार दी और अपना अंडरवियर को निकाल दिया.
उन्होंने नकली गुस्से से कहा- यह क्या कर रहे हो?
मैंने कुछ सुना नहीं मैंने अपनी बाहों में नंगी भाभी के जिस्म को दबोच लिया वो कराहने लगी की मैंने दोनों होंठों को उसके रसीले होंठों पर रख दिए और जी भर के उसका रस पान करने लगा एक हाथ से चुचियों को दबाता मसलता रहा दूसरे हाथ से उसका जिस्म पूरा कस के मेरे जिस्म से चिपकाया ये सब अचानक हो जाने से वो हाथ पाँव मारने लगी लेकिन उसका कुछ न चला ओर मैं भाभी के जिस्म को बुरी तरह रौंदने लगा होंठों के बीच जीभ डाल के मैंने उसे बुरी तरह चूमा उसके मुह में .. आह्ह्ह उफ़. .मोनू .. मैं तुम्हारी भाभी हूँ .. ये ग़लत है .. छोड़ दो मुझे ..जग गगग ..की आवाज निकलने लगी पर मैं पूरी तरह से उनकी भरी भरी चूचियों को दबाता रहा उसकी कड़ी निप्पल को दो उंगली के बीच ले के मसलने लगा भाभी अब सिस्कारियां भरने लगी ..नही .. प्लिज्ज़ ..उईई ईई… धीरे ..मोनू ऊउऊ ..लेकिन अब उसका विरोध ख़तम हो गया था.
हम दोनों की सांसे तेज होने लगी मैंने जम कर भाभी के पूरे बदन को बेतहाशा चूमा .. .. मेरे होंठ उसके बदन पर फिसलने लगे .. एकदम गोरा और चिकना बदन था .अभी तक मैंने उसकी चूत पर हाथ नहीं लगाया था .. वो दोनों जांघो को सिकोड़े हुए थी .. मेरे हाथ और होंठो के स्पर्श से वो… ऐसी आवाजे निकलने लगी थी. सोनू भाभी अब मीठी मीठी आहें भरने लगी मेरी ध्यान अब उसके पेट से होते हुए गहरी नाभि पर गया मैंने वहाँ सहलाया तो उन्होंने सिहर कर अपनी जांघे खोल दी और अब मेरी नजर उन की चूत पर पड़ी मैं झूम उठा एक भी बाल नहीं था गुलाबी रंग की चूत के बीच में एक लाल रंग का होल दिखाई दिया ये देख कर मुह में पानी आ गया.
भाभी के जिस्म को चारो ओर से चूमने सहलाने और दबाने के बाद चूचियों को प्यार से मुंह में लेकर कई बार चूसा भाभी का अंग अंग महक ने लगा उसकी दोनों चूचियां कड़ी ओर बड़ी हो गई उसके लाल लाल निप्प्ल उठ कर खड़े हो गए तीर की तरह नुकीले लग रहे थे. तब मेरी भाभी मुझसे जोर से लिपट गई। दो बदन एक दूसरे से रगड़ने लगे मेरी सांसे फूलने लगी हम दोनों तेजी से अपने मकसद की ओर आगे बढ़ने लग॥ 10 मिनट तक हम दोनों ने एक दूसरे को पूरा चूमा सहलाया। भाभी ने पहली बार शरमाते शरमाते लंड को पकड़ा तो बदन में बिजली सी दौड़ गई पहली बार मैंने कहा “मेरी जान उसके साथ खेलो शरमाओ मत अब हम दोनों में शर्म कैसी .”
मेरा बदन बहुत ही गरमा चुका था तब मैंने भाभी को फर्श पर लिटा दिया ओर उसके ऊपर आके जोर से चुचियों को फिर से दबाया पर बाद में मैंने चूत की तरफ़ देखा. चूत तो पूरी गीली थी. उसमे से जूस ऐसे निकल रहा था जैसे नल से पानी बह रहा हो. अब मैंने भाभी के पावों को चौडा किया तो उनकी फूली हुयी गुलाबी चूत पूरी तरह दिखने लगी .भाभी की गुलाबी चूत को देख कर मैंने कहा “भाभी सच बहुत ही चिकनी है तेरी ये चूत बिना बाल की गोरी उभरी हुई। दिल कर रहा है इसे खा जाऊँ ” इतना कह कर मैं उसकी चूत पर झुका और चूत के होठों को अपने होठों से चूमने लगा।
भाभी तो जैसे उछल पड़ी। ओह आ मोनू…॥अऽऽऽ ये क्या कर रहे हो…ऐसा तो तुम्हारे भैया भी नहीं करते कभी.. ओह मुझे अजीब सा लग रहा है। भाभी की सिस्कारियों से पूरा कमरा गूंजने लगा। मैं बड़े प्यार से भाभी की चूत को चूसता, चूमता चाटता रहा। वो अपने होठों पर जीभ फ़ेर रही थी और मचल रही थी कि अचानक चिल्लाई- मोनू छोड़ मुझे… आहऽऽमेरा हो रहा है…जोर से…कहते हुए मेरा सिर अपनी जान्घों में दबा लिया और मेरे बाल खींचने लगी।…भाभी ने आह ऽऽ भरते हुए जल्दी जल्दी तीन चार झटके पूरे जोरों से अपने चूतड़ उठा कर मारे। मैंने फ़िर भी उनको नहीं छोड़ा और अपनी जीभ से उनकी चूत से बहने वाले रस को चाट गया।
वो कह रही थी- अब हट जाओ मोनू, अब सहन नहीं हो रहा। अब अपनी प्यारी भाभी को चोदो। फ़ाड़ दो मेरी चूत को अपनी भाभी की चूत में घुस जाओ। मैं पहले से जानती थी कि तुम मुझे चोदना चाह्ते हो, मैं भी तुम से चुदना चाहती थीअब मैं भी भाभी की चूत का स्वाद अपने लौड़े को चखाना चाहता था। मैं भाभी के ऊपर आया तो भाभी ने सिर उठा कर मेरे लौड़े कि तरफ़ देखा। उन्होने कहा- देवरजी ! मैं तो मर जाऊँगी इतने मोटे और लम्बे से।
मैंने पूछा किस मोटे और लम्बे से?
वो शरमाते हुए बोली तुम्हारे लो ऽऽऽ लौड़े से !
मैंने कहा-कुछ नहीं होगा… और भाभी की टांगें चौड़ी की तो उनकी चूत के होंट ऐसे खुल गये जैसे किसी फ़ाइव स्टार होटल के दरवाजे अपने आप खुल जाते हैं किसी के आने पर। मैंने अपनी दो अंगुलियों से चूत को थोड़ा और खोला और अपना लन्ड का सिर उस पूरे खिले गुलाब के फ़ूल में रख दिया। भाभी ने कहा- थोड़ा अन्दर तो करो !
मैंने कहा- अभी करता हूं। यह कह कर मैं अपना लौड़ा धीरे धीरे बाहर ही रगड़ने लगा। भाभी बेचैन हो उठी। वो अपने चूतड़ ऊपर को उठा उठा कर लौड़े को अपनी चूत में डलवाने की कोशिश कर रही थी। मैं उनको तड़फ़ाते हुए उनकी सारी कोशिशें नाकाम कर दिए जा रहा था।
“अब डालो ना !” भाभी बोली।
“क्या डालूं… और कहाँ…” मैंने भाभी से पूछा।
“अच्छा बताऊँ तुझे? बहनचोद ! अपनी भाभी की चूत में अपना लौड़ा डाल और चोद साले ! भाभी तड़फ़ते हुए बोली।
भाभी के मुंह से ऐसी गालियां सुन कर मैं हैरान रह गया।
तभी भाभी ने एक ऐसा झटका दिया ऊपर की तरफ़ अपने चूतड़ों को कि एक बार में ही मेरा पूरा का पूरा लौड़ा भाभी की चूत की गहराई में उतर गया। भाभी के मुख से निकला- आह हय-मार दिया ! एक दर्द मिश्रित आनन्द भरी चीख !
अब मैं भाभी के ऊपर गिर सा गया और उनको हिलने का मौका ना देकर उनके होंट अपने होंटों से बंद कर दिये और अपने चूतड़ ऊपर उठा कर एक जोर का धक्का मारा तो भाभी फ़िर तड़प गई।
इसके बाद तो बस आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्… आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…धीरे…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्… आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…रुक जरा… हाँ… आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…जोर से… आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…हाँऽऽअः…हाँऽऽअः…हाँऽऽअः…ह्म्म… हाँऽऽअः
हम दोनों की एक जैसी आवाजें निकल रही थी। काफ़ी देर ऐसे ही चलता रहा। बीच बीच में भाभी बड़बड़ाती रही- मज़ा आ रहा है ! करते रहो ! चूसो !
भाभी की चूत लगातार पानी छोड़ रही थी और मेरा लौड़ा बड़े आराम से अन्दर बाहर आ जा रहा था। भाभी भी अपने चूतड़ उठा उठा कर सहयोग कर रही थी। वो मदहोश हुई जा रही थी। उनके आनन्द का कोई पारावार ना था। ऐसा मज़ा शायद उन्हें पहले नहीं मिला था।
अब मैं चरमोत्कर्ष तक पहुंचने वाला था। मैंने भाभी को कहा- ले सोनू ! ले ले मेरा सारा रस ! पिला दे अपनी चूत को !
“हाँ ! भर दे मेरी चूत अपने रस से मेरे मोनू भैया ! ” भाभी बोली।
और मैंने पूरे जोर से आखिरी धक्का दिया तो मेर लन्ड भाभी के गर्भाशय तक पहुंच गया शायद और वो चीख पड़ी- मार डालेगा क्या?
मेरे मुंह से निकला- बस हो गया ! मेरा लन्ड भाभी की चूत में पिचकारियां मार रहा था। भाभी भी चरम सीमा प्राप्त कर चुकी थी। फ़िर कुछ रुक रुक कर हल्के हल्के झटके मार कर मैं भाभी के ऊपर ही लेटा रहा। हम दोनों अर्धमूर्छित से पड़े रहे काफ़ी देर। पता नहीं कब नींद भी आ गई।
जब मेरी नींद खुली तो देखा कि भाभी उसी तरह नंगी मेरी बगल में बेसुध हो कर सो रही थी। उनके मुख पर असीम तृप्ति का आभास हो रहा था। उनके लबों पर बहुत हल्की सी मुस्कान भी दिख रही थी। मैं धीरे से उठा और रसोई में जाकर दो कप चाय बना कर लाया तो देखा भाभी वैसे ही सो रही थी। मैं उनके पास गया और उनके लबों को हल्के से चूम लिया। जैसे ही मेरे होंठ ने उनके होंठों को स्पर्श किया, भाभी ने आंखें खोल दी और मुस्कुरा कर मेरी आंखों में झांकने लगी।
मैंने भाभी से कहा- “तो सोने का बहाना कर रही थी आप?”
भाभी बोली- मैं तो तभी जाग गई थी जब तुम यहाँ से उठ कर गए थे, लाओ अब चाय तो पिला दो जो प्यार से बना के लाए हो।
हमने चाय पी। तब तक रात के आठ बज चुके थे। मैंने भाभी से पूछा- कैसा लगा?
भाभी ने शरमा कर नज़रें झुका ली, कुछ बोली नहीं।
मैंने उनकी ठोडी पकड़ कर उनका चेहरा ऊपर को उठाया और फ़िर पूछा कि कैसा लगा आज मेरे साथ।
भाभी शर्मिली मुस्कान के साथ बोली- बहुत मज़ा आया, मज़ा तो तुम्हारे भैया के साथ भी बहुत आता है, पर तुम्हारे अन्दर नया जोश है
“पहले ऐसा ही मज़ा आता था भैया के साथ?” मैंने पूछा।
” सच कहूं तो ऐसा मज़ा मुझे कभी नहीं आया, मुझे तो पता भी नहीं था कि इतना मज़ा भी आता होगा चुदाई में” भाभी ने कहा।
भाभी के मुंह से चुदाई शब्द सुन कर मैं अवाक रह गया। फ़िर मैंने भाभी से कहा- भाभी ! मैंने आपको इतना आनन्द दिया है, मुझे ईनाम मिलना चाहिए
” हाँ ! ईनाम के हकदार तो तुम हो। बोलो क्या चाहिए तुम्हें ईनाम में?” भाभी ने पूछा।
“मैं तो ऐसे ही कह रहा हूं, आप मिल गई, मुझे तो मेरा ईनाम मिल गया” मैंने कहा।
” नहीं, फ़िर भी मैं तुम्हें कुछ ना कुछ ईनाम जरूर दूंगी” भाभी ने कहा।
” जैसी आपकी मरजी ! अगर मैंने अपनी तरफ़ से कुछ मांग लिया तो देना पड़ेगा भाभी ! ” मैंने कहा।
” हाँ हाँ जरूर ! मेरे बस में हुआ तो जरूर दूंगी” भाभी ने आश्वासन दिया।
” अच्छा अब बताओ रात के खाने में क्या बनाऊँ? ” सोनू भाभी ने पूछा।
“अब क्या बनाओगी, मैं बाज़ार से ले आता हूं कुछ, वैसे भी मैं अभी सारी रात बाकी है। आप मुझे खाना, मैं आपको खाऊँगा” मैंने भाभी को छेड़ा।
मैंने बाज़ार जाने के लिए उठते हुए कहा- भाभी ! मैं बाज़ार से खाना ले कर आता हूं। आप बस ऐसे ही नंगी रहना, कपड़े नहीं पहनना।
भाभी भी मेरे साथ खड़ी हो गई यह कहते हुए कि दरवाजा भी तो बंद करना होगा। भाभी मेरे पीछे पीछे आईं और मुझे कहा देखो बाहर कोई है तो नहीं, मैं दरवाजा बंद कर लूं।
जब मैंने बाज़ार से आकर दरवाजे की घण्टी बजाई और भाभी ने दरवाजा खोला तो वो वही नीला गाऊन पहने थी।
अन्दर आते आते मैंने पूछा कि गाऊन क्यों पहना?
तो कमरे में पहुंच कर भाभी बोली- आज तो बस बच गई। अभी अभी थोड़ी देर पहले दरवाजे की घण्टी बजी थी और मैंने समझा तुम ही होगे और मैं बिना गाऊन पहने दरवाजा खोलने ही वाली थी कि मुझे पड़ोस वाली रितु की आवाज सुनाई दी। वो मुझे ही पुकार रही थी। मैंने दौड़ कर गाऊन पहना और फ़िर दरवाजा खोला।
क्या करने आई थी रितु? रितु वही जो चार पांच घर छोड़ कर रहती है, नमिता आन्टी की बेटी?
हाँ वही, तू तो सबको जानता है?
बड़ी मस्त चीज है वो, एक बार मिल जाए तो साली को चोद चोद कर चार छः बच्चों की माँ बना दूं।
“तेरा बस चले तो तू सारी दुनिया की लड़कियों को चोद चोद कर माँ बना दे” भाभी बोली।
“सारी दुनिया को नहीं तो भाभी आपको तो अब जरूर माँ बना दूंगा” मैंने कहा।
यह सुन कर भाभी भावुक हो उठी, उनकी आंखें गीली हो गई, वो बोली- तीन साल हो गए शादी को ! अब तक तो कोई आस बंधी नहीं, पता नहीं कब मैं माँ का शब्द सुनूंगी अपने लिए। और तुम क्या सोचते हो कि मैंने ये सारी रासलीला तुम्हारे साथ शारीरिक आनन्द के लिए रचाई है? यह सब मैंने औलाद का सुख पाने के लिए किया है। भाभी रोती जा रही थी और बोलती जा रही थी-” वैसे तो तुम्हारे भैया में कोई कमी नहीं है, वो मुझे सहवास का पूरा पूरा मज़ा देते हैं, पर पता नहीं क्यों मैं गर्भवती क्यों नहीं हो रही। अब देखो तुम क्या गुल खिलाते हो? इतना कह कर भाभी के चेहरे पर कुछ मुस्कुराहट आई।
मैंने आगे बढ़ कर भाभी को अपनी बाहों में भर लिया और कहा- भगवान ने चाहा तो अगले साल तक मैं चाचाऽऽ… नहीं आपके बच्चे का पापाऽऽ… नहीं बस चाचा… हाँ… चाचा ही ठीक है, बन जाऊँगा।
अगर ऐसा हो गया तो मैं तुम्हें मुंह मांगा ईनाम दूंगी- भाभी ने भरे गले से कहा।
तो अब दो ईनाम हो गये- एक तो आपने चाय पीते हुए वायदा किया था आज ही और दूसरा अब जो अगले साल या उससे भी पहले मिल सकता है। Antarvasna
आशु वैसे तो छोटे शहर से था, पर अपने कॉलेज में फुटबाल टीम का केप्टन था।
बाद में उसने एक जिम भी जॉइन किया और धीरे धीरे उस ज़िले के नामी जिम में वो ट्रेनर बन गया।
गोरा चिट्टा, लंबा कद, कसा हुआ कसरती बदन, घुँघराले काले बाल और पठानों वाली तहजीब।
कुल मिला कर आशु एक पढ़ा लिखा बांका गबरू था, जिसकी रगों में तहजीब और नफासत थी।
लेकिन घरेलू कलह से आजिज़ आकर वह नॉयडा आ गया.
उसने नोएडा आकर यहाँ सभी तरह के काम करने के लिए अपने को तैयार किया।
सुबह पाँच बजे उठकर वो पास वाली सोसाइटी में जाता और गार्ड रूम में रखी 10-12 बाल्टियों में पास की डेयरी से अपने सामने कढ़वा कर दूध लाता और फिर उन्हें फ्लैट्स में पहुंचाता।
अक्सर कुछ फ्लैट वालियाँ उससे नाश्ते का कुछ न कुछ सामान मँगवाती तो वो उनको लाकर देता।
फिर उन्हीं फ्लैट्स के मालिकों की गाड़ियाँ धोकर 9 बजे तक तैयार कर देता।
उसके बाद कहीं उसे फुर्सत मिलती अपनी चाय पीने की।
वो काम इतना मन लगाकर और तसल्लीबक्श करता कि उससे सभी मेमसाब बहुत खुश रहतीं।
आशु ने अपने शहर में पढ़ाई के दौरान ही दोस्त से ड्राइविंग भी सीख ली थी।
एक दो महीने टॅक्सी भी चलायी तो उसे गाड़ी चलाने की प्रैक्टिस तो हो गयी थी।
अब उसे नोएडा रहते दो साल होने को आए तो वो यहाँ के लोगों के तौर तरीकों और मेमसाब लोगों को इम्प्रेस करने के तरीकों से अच्छा वाकिफ हो गया था।
पर जिंदगी उसे जिस ओर मोड़ रही थी, ऐसा उसने सोचा भी नहीं था।
उसे भी अब हवा लग गयी थी। उसके पास बढ़िया स्मार्ट फोन था जिस पर वो सभी मेम साब लोगों से व्हाट्सएप्प पर संपर्क में रहता।
मेमसाब लोग भी उससे अपने सभी काम करवातीं और उसे कपड़ों, खाने और पैसों से नवाजती रहतीं।
चूंकि आशु के सलीके और पहनावे को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वो मात्र एक सफाई करने वाला लड़का है, तो मेमसाब लोग उसे अपने साथ गाड़ी चलाने से लेकर शॉपिंग में समान उठाने तक ले जातीं।
दिल्ली में तो वैसे भी काम निकालने के लिए सिर पर चढ़ा कर रखते हैं, तो लेडीज आशु को अपने साथ ही रेस्तराँ में खिला पिला भी देतीं।
सभी लेडीज आशु के साथ बहुत कम्फर्ट फील करती थीं।
सुबह जब आशु उनके फ्लैट में दूध देने जाता तो उस समय लेडीज ऐसे कपड़ों में दरवाजा खोलती कि आशु भी निगाहें नीची कर के बाल्टी पकड़ा देता।
पर हाँ … आशु और उनकी मुसकुराती हुई गुडमॉर्निंग जरूर होती।
उन लेडीज के क्लीवेज की गहराई और उसमें से झाँकते मम्मे, निप्पलों की नोकें और मटकती गांड, इन सबका अंदाज़ उनके लेडीज टेलर के अलावा सिर्फ आशु को था।
आशु रात को सोते समय मूठ मारते समय उन्हीं सबको याद करता।
अब आशु उनके मज़ाक़ों में भी शामिल हो जाता।
लेडीज को एक दूसरे की बुराई करने और राज़ जानने का बहुत शौक होता है।
तो आशु मियां इसका पूरा फायदा उठाते।
वो एक दूसरे की बातें बड़ी नमक मिर्च लगा कर गपियाते. पर आशु ने किसी के राज़ कभी किसी से शयर नहीं किए।
इसीलिए सभी लेडीज का उस पर बहुत विश्वास हो गया था।
आजकल हाईसोसाइटी कि लेडीज के अपने किस्से होते ही हैं।
तो आशु सबका राज़दार होता।
कौन मेमसाहब का अफेयर किस्से है, कौन मेमसाब छिपकर स्मोक या ड्रिंक करती है, किसकी अपने पति से कब और क्यों लड़ाई हुई, किसके पति का कहाँ चक्कर चल रहा है, किस मेमसाब का किससे नैनमटक्का होता है, यह सब जानकारी आशु को सबसे ज्यादा होतीं।
एक दिन उसे 109 नंबर वाली रेखा मेमसाब का मेसेज आया कि क्या वो कल दिन के लिए खाली है, उन्हें अपने फ्लैट की सफाई करवानी थी, वो सुबह उससे मिल ले।
रेखा लगभग 35 साल की बहुत हंसमुख और अच्छे स्वभाव की फेशनबेल महिला थी।
उनका एक ही बेटी थी जो बाहर किसी बोर्डिंग स्कूल में पढ़ती थी।
रेखा के पति अविनाश उससे बिलकुल उलट साँवले और साधारण व्यक्तित्व के व्यक्ति थे।
वो बड़े अधिकारी थे, अक्सर बाहर दौरों पर रहते।
जब वो यहाँ होते तो हर रात रेखा कि उनसे सेक्स को लेकर कहासुनी होती और फिर रेखा उनसे जबर्दस्ती सेक्स करवाती।
ये भी चर्चे थे कि अविनाश के दौरों पर उनके साथ उनकी एक कलीग जाती है जिसके साथ उनका चक्कर है।
हालांकि अविनाश रेखा के इस इल्ज़ाम को कोरी बकवास कहते।
अब रेखा का साफ फंडा था कि पति सिर्फ ढेर सारा पैसा कमा कर देता रहे और जब मौका हो उसकी बेड पर चुदाई सही से कर दे।
बाकी घर के बाहर वो कुछ भी करे।
अविनाश भी बजाए अपनी सफाई देने के रेखा की जेब पैसों से और उसकी चूत अपने माल से भर कर अपनी जान बचाते रहे।
रेखा को सिगरेट का शौक था, पर ये बात रेखा के अलावा सिर्फ उसकी बेटी या आशु जानता था।
अपने को रेखा खूब मेंटेन रखती।
जब रेखा अविनाश से लड़ती तो दूर खड़ा आशु सोचता कि इतनी खूबसूरत बीबी से अविनाश साहब की पटती क्यों नहीं।
आशु को तो 115 नंबर वाली मोनिका मेम ने चटकारे लेकर रेखा और अविनाश के किस्से बताए, इस गरज से कि कुछ आशु भी उन्हें बताए, पर आशु घाघ था, वो सुम्म मार जाता, जैसे उसे कुछ मालूम ही नहीं।
मोनिका खुद बहुत सेक्सी थीं।
वो जब नीचे पार्क में अपनी सहेलियों के बीच बैठी होती तो बताती कि रेखा और अविनाश का झगड़ा चुदाई को लेकर ही होता है।
रेखा चाहती है कि जब भी अविनाश यहाँ हों उसकी जम कर चुदाई करें, और अविनाश बस एक बार में ही थक कर सो जाते।
मोनिका और रेखा के बीच अश्लील किताबों और विडियोज़ का आदान प्रदान खूब होता था।
खैर जब अगली सुबह आशु 109 नंबर दूध की बाल्टी देने गया तो रेखा ने दरवाजा खोलते हुए कहा- आशु, सभी को दूध देकर मेरे पास होते जाना।
आशु पंद्रह मिनट बाद ही रेखा मेमसाहब के फ्लैट में पहुँच गया।
अविनाश बाहर जाने को तैयार खड़े थे, वो दो दिन के लिए अरुणाचल प्रदेश जा रहे थे।
आशु ने उनका सामान ले लिया और नीचे खड़ी टेक्सी में रख कर वापिस आया।
रेखा रोज की तरह लापरवाही से शॉर्ट्स और टी शर्ट पहने सिगरेट का धुआँ उड़ा रही थी, उसके शरीर की बनावट पूरी अंदर से झांक रही थी।
टेबल पर बैठे बैठे रेखा ने उसे चाय का कप दिया और बैठने को कहा।
वो बोली कि आज पूरे टाइम आशु उसके साथ रहे।
रेखा ने आशु को कुछ बोलने ही नहीं दिया और जबर्दस्ती दो हज़ार का नोट उसकी जेब में रख दिया।
अब आशु क्या कहता … उसने पूछा कि काम क्या है?
तो रेखा बोली कि घर साफ करवाना है, फिर शॉपिंग करनी है। अकेले उससे होगा नहीं।
रेखा ने उसको बोल दिया कि वह सुबह 9 बजे आ जाये और रात को देर भी हो सकती है, खाने की वो चिंता न करे।
आशु को ये मेमसाब अच्छी भी बहुत लगती थीं क्योंकि सोसाइटी में सबसे ज्यादा अच्छे से उससे वो ही बात करती थीं।
चाय पीकर आशु फटाफट चला गया और सारी गाड़ियाँ साफ कर के नहाकर रेखा के फ्लैट पर आ गया।
रेखा वैसे ही कपड़े पहने थी।
उसने आशु को सेंडविच और चाय दी।
नाश्ता करके आशु लग गया सफाई में। रेखा भी उसकी मदद करने लगी।
आशु ने कहा कि धूल धक्कड़ से आप दूर रहो।
पर रेखा नहीं मानी।
आशु साफ सुथरा ट्रेक सूट पहने था तो रेखा ने उससे कहा- ये कपड़े तो तुम्हारे गंदे हो जाएँगे, रुको मैं साहब के कोई कपड़े देती हूँ।
अब कहाँ अविनाश भारी शरीर के कहाँ आशु लंबा पतला समार्ट।
खैर रेखा ने उसे एक बरमुडा और टी शर्ट दी तो आशु ने जैसे तैसे पहन लिया।
अब आशु को डर था कि कहीं बरमूडा खिसक न जाये। वो तो नीचे अंडरवियर भी नहीं पहने था।
आशु का कसरती शरीर स्लीवलेस टी शर्ट से बाहर निकला पड़ रहा था।
रेखा उसे देख कर खूब हंसी।
आशु ने सीढ़ी पर खड़े होकर पंखे, ट्यूब लाइट, झूमर वगैरा साफ किए तो नीचे से रेखा ने उसकी सीधी को पकड़े रखा।
नीचे से रेखा को आशु का मोटा लंड बरमूडा में साफ दिख रहा था।
रेखा को मस्ती छाने लगी। उसके दिमाग में सेक्स का कीड़ा कुलबुलाने लगा।
नीचे कार्पेट उठाने में आशु ने रेखा की मदद चाही तो रेखा ने झुक कर कार्पेट उठाते समय अपने मम्मे आशु को दिखा दिये।
आशु ने मम्मे देख तो लिए पर वो रेखा मेमसाहब की नीयत से अंजान था तो मासूम बना रहा।
उसे लगा कि वो बहुत लापरवाह औरत है।
अब तो रेखा उससे बार बार टकराने का ड्रामा करती रही।
बेडरूम की सफाई में आशु को बेड के नीचे से कल रात का इस्तेमाल किया हुआ कंडोम मिला जिसे उसने बड़ी होशियारी से रेखा से छिपा कर कूड़े में रख लिया।
पर फिर भी उसका रेपर तो रेखा ने ही बड़ी बेशर्मी से उठाया।
बेडरूम साफ करते समय रेखा तो टांगें फैला कर वहीं सोफ़े पर लेट गयी।
आशु का लंड उसकी चिकनी जांघों और झूलते मम्मों को देख कर अब खड़ा हो गया था, जिस पर रेखा की निगाहें पड़ चुकी थीं।
बेड के नीचे की सफाई में आशु को एक मोटी मोमबत्ती मिली, जिसे रेखा ने हँसते हुए उससे ले लिया कि पता नहीं कब की पड़ी है।
हालांकि आशु भी समझ गया कि रेखा मेमसाब इससे अपनी चूत की गर्मी शांत करती हैं।
रेखा ने बियर की दो केन खोल लीं।
आशु के बहुत मना करने पर भी रेखा ने उसे जबर्दस्ती एक केन पिला ही दी।
दोपहर तक अधिकांश काम निबट गया।
अब फ्लैट्स में गंदगी आती भी कहाँ है। सब कुछ तो बंद रहता है।
आशु ने रेखा से एक घंटे की छुट्टी मांगी कि वो नहा कर खाना खा आएगा।
रेखा ने उससे कहा कि खाना उसने ऑर्डर कर दिया है और वो नहा उसी के बाथरूम में ले।
उसे रेखा ने तौलिया दे दिया।
आशु ने इतना खूबसूरत बाथरूम पहली बार इस्तेमाल किया।
वह फटाफट नहाया.
बाहर से रेखा कह रही थी- तुम जल्दी से नहा लो, फिर मैं नहाऊँगी।
आशु जल्दी से टॉवल लपेट के बाहर आया।
कपड़े तो उसने बाहर ही बदले थे।
उसके कसरती जिस्म और चौड़ी छाती को निहारती रेखा जल्दी से बाथरूम में घुस गयी।
आशु ने बाहर अपने कपड़े ढूँढे तो नहीं मिले। शायद सफाई में रेखा ने इधर उधर रख दिये होंगे।
उसने आवाज़ देकर पूछा भी कि मेमसाब मेरे कपड़े कहाँ रखे हैं तो अंदर से आवाज़ आई कि वहीं तो रखे थे तुमने, अभी आकर देखती हूँ।
थोड़ी देर में रेखा की अंदर से फिसलने की आवाज़ आई।
आशु ने एकदम पूछा- मेमसाब क्या हो गया?
रेखा बोली- फिसल गयी हूँ … ज़रा मदद करो।
उसने दरवाजा खोल दिया।
आशु टॉवल लपेटे अंदर गया तो रेखा तौलिया लपेटे खड़ी थी।
तब आशु ने उसे सहारा देने की कोशिश की तो रेखा ने हँसते हुए शावर चला दिया।
तेज पानी से दोनों भीग गए.
रेखा ने अपना और आशु दोनों का टॉवल उतार फेंका।
अब दोनों निपट नंगे थे।
रेखा तो उसका लंबा और मोटा तना हुआ लंड देख सकते में थी।
अब रेखा और आशु दोनों की ही सोचने समझने की ताकत के ऊपर चूत की चुलबुलाहट और लंड की गर्मी हावी हो गयी थी।
रेखा ने आशु को अपने से चिपटा लिया उसके गीले बालों को पीछे से पकड़ कर उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिये।
आशु नहीं समझ पाया कि वो क्या करे।
पर उसका लंड भी अब बेकाबू हो रहा था।
उसने अपने दोनों हाथों से रेखा के बालों को पीछे से पकड़ा और अपने होंठों पर रेखा के होंठों की पकड़ को मजबूती दे दी।
अब रेखा उसके होंठों को काटते हुए अपनी जीभ उसके मुंह में घुसा रही थी।
रेखा के मदमस्त मम्मे देख आशु तो मानों पगला गया।
उसने रेखा के मदमस्त मम्मों को नफासत से चूसना शुरू किया.
रेखा के हाथों में उसका लंड मचल रहा था, वह आशु को अपने अंदर लेने के लिए बेचैन हो रही थी।
आशु ने शावर जेल की शीशी लेकर रेखा के मम्मों और पीठ पर उड़ेल दी और कुछ अपनी छाती पर भी लगाया।
अब दोनों के बदन चिकने हो गए। दोनों लिपटते तो साथ ही बदन फिसलते।
रेखा के गोरे गोरे मम्मे अब आशु की छाती पर मसल कर फिसल रहे थे।
आशु ने हेंड शावर से रेखा के मम्मों, सिर, पीठ और आखिर में चूत को धोया।
ऐसे ही रेखा ने आशु को भी नहलाया।
अब आशु को रेखा ने नीचे फर्श पर बैठा दिया और बड़े संभालते हुए अपनी चिकनी चूत में उसका फनफनाता हुआ लंड ले लिया।
ऊपर से दबाव देते हुए उसने पूरा लंड गहराई तक अंदर किया और लगी ऊपर नीचे होने!
आशु भी उसके मम्मे चूस रहा था।
क्या गजब का स्टेमिना था रेखा में!
कुछ देर में ही आशु ने रेखा को अपने ऊपर से हटा कर अपना लंड मालकिन की चूत से निकाल लिया और उसे गोदी में उठा लिया।
रेखा ने भी उसकी गर्दन में बांहें डाल अपनी दोनों टांगें उसकी कमर पर लपेट दीं।
अब रेखा के मम्मे उसकी छाती से भिड़े हुए थे और दोनों के होंठ एक दूसरे में समा जाने की लड़ाई लड़ रहे थे।
आशु का लंड नीचे से रेखा की चूत के अंदर जाने की गुहार लगा रहा था।
अब आशु ने ज्यादा वक़्त न लगाते हुए रेखा को बेडरूम में आहिस्ता से बेड पर लिटा दिया और नीचे खिसक कर रेखा की चिकनी मखमली चूत में जीभ घुसा दी।
हॉट सेक्सी भाभी कसमसा गयी, उसने अपने हाथों से अपने मम्मे मसलने शुरू किए, उसकी दोनों एड़ियाँ अकुलाहट में एक दूसरे पर घूम रही थीं।
उसकी सीत्कारें निकल रही थीं।
वो सोच रही थी कि क्यों उसने इससे पहले इस बाँके मर्द को नहीं बुलाया।
क्यों वो उस खूसट अविनाश की खुशामद करती रही।
इधर आशु का मन तो रेखा के मम्मों पर अटका हुआ था।
उसने हाथ आगे बढ़ाए और रेखा के मम्मे दबोच लिए।
अब वो थोड़ा बेरहम हो चला था।
उसने अपनी जीभ रेखा की चूत से निकाली और अपने होंठ वापिस लेटी हुई रेखा के होंठों से मिला कर धीरे धीरे रेखा के बदन पर तैरने-सा लगा।
उसने अपने आपको अपनी बांहों पर साध रखा था और उसका लंड रेखा की चूत के ऊपर नीचे बार बार तैर-सा रहा था।
उसकी जीभ कभी रेखा की जीभ से चुहल करती, कभी नीचे आते समय रेखा के निप्पलस को चूमते हुए नीचे ऊपर हो जाती।
रेखा अब अपने हाथों से उसका लंड पकड़ कर अपनी चूत में घुसाने को बेताब थी पर आशु का लंड मेंढक की तरह उसके हाथ से हर बार फिसल जाता और उसकी चूत में आग और भड़क जाती।
मेरा नाम अखिल है। मैं मुम्बई Sex Stories का रहने वाला हूँ और मेरे बड़े भाई बंगलौर में एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में कार्यरत हैं। भैया की शादी आज से क़रीब २ वर्ष पूर्व हुई थी।
मुम्बई में मैं अकेला रहता था। अचानक मुझे बंगलौर जाना पड़ा क्योंकि मेरी नौकरी वहाँ लग गई थी। वहाँ पर भैया थे तो मैं उनके घर पर ही रहता था। मेरी भाभी को मैंने सिर्फ़ ३ बार देखा था। इसलिए हमारी दोस्ती कमज़ोर थी।
एक दिन भैया को विदेश जाना पड़ा। भैया मुझे कहकर गए- तुम भाभी का ध्यान रखना। घर में सिर्फ़ तुम दोनों ही हो।
मैंने कहा- ठीक है भैया।
मैं सुबह सुबह भैया को एयरपोर्ट पर छोड़ने गया।
जब आया तो भाभी नहाने चली गई थी। मैंने ज़ोरों से कई बार घण्टी बजाई, तो काफी देर बाद दरवाज़ा खुला। भाभी केवल तौलिए में थी। यह नज़ारा देखकर मेरा दिमाग़ ख़राब हो गया। मेरे मन में ख्याल आया कि मैं भाभी की प्यास बुझा दूँ। मैं अन्दर गया तो भाभी ने नाश्ता बना रखा था। नाश्ते के बाद हम ऑफिस के लिए निकल गए। जाते समय भाभी ने कहा- आज रात का खाना होटल में खाएँगे।
मैंने कहा- ठीक है।
रात को जब हम दोनों होटल जा रहे थे। मेरे पास बाईक थी। उस पर सिर्फ हम दोनों बैठे थे। भाभी की चूचियाँ मेरी पीठ से छू रहीं थीं। होटल में भाभी ने ऑर्डर दिया।
खाना खाने के बाद हम घर आए, तो भाभी अपने कमरे में चली गई। मैं टीवी देखने लग गया।
इतने में भाभी आई, बोली- तुम्हें नींद नहीं आ रही है क्या?
मैंने कहा- हाँ।
मुझे भी नहीं आ रही है।
अचानक टीवी पर ब्लू-फिल्म आने लग गई। मैंने उसी वक्त टीवी बन्द कर दिया। भाभी ने मुझे देखा और मुस्कुराई। मेरे पसीने छूट गए।
भाभी बोली- इतनी ठंडी में तुम्हारे पसीने क्यों छूट रहे हैं?
भाभी ने कहा- तुमने कभी ब्लू-फिल्म नहीं देखी क्या?
मेरी बोलती बन्द हो गई थी। भाभी मेरे पास आकर बैठ गई। मुझ पर हाथ फेरने लगी। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका था। भाभी की नज़र मेरे लिंग पर ही थी, कहा – ये तो तुम्हारे भैया से भी मोटा और लम्बा मालूम होता है।
भाभी ने कहा- तुमने तो मुम्बई में बहुत सी लड़कियों की ली होगी ना?
मैंने कहा- नहीं भाभी।
भाभी ने कहा- तुम मेरी प्यास बुझाओगे क्या?
मैंने कहा- भैया को मालूम हो गया तो?
वह खड़ी हो गई और कहा- तुम मुझे कमरे में लेकर जाओ।
मैं उन्हें कमरे में ले गया और बिस्तर पर लिटा दिया। भाभी ने उनका साड़ी और ब्लाऊज़ निकाल दी। उन्होंने काले रंग की ब्रा और पैन्टी भी पहन रखी थी। भाभी की फिग़र ३६-२४-३२ का है। चूचियाँ तो गोल-गोल और कठोर थे कि हाथ में नहीं आ पा रहे थे। चूत पर एक भी बाल नहीं था।
मैंने मेरी पैन्ट खोली तो मेरा लण्ड बाहर आ गया। भाभी ने लण्ड मुँह में लिया और चूसने लग गई। भाभी मेरा लंड लॉलीपॉल की तरह चूस रही थी। मैंने भाभी की चूत पर अपनी जीभ रख दी। वो मदहोश होती जा रही थी। भाभी की आँखों में अजीब सा नशा था।
भाभी बोली- अपने लंड से आज मेरी इतनी चुदाई करो, इतनी चुदाई करो कि मेरी सालों की प्यास बुझ जाए।
मैंने भाभी को लिटा कर कहा- भाभी अब आप सिर्फ आँखें बन्द कर के मज़े लो।
भाभी की चूत एकदम लाल थी। मैंने अपना मोटा लंड भाभी की चूत पर रख दिया और अन्दर डालने लगा। भाभी ने अपने होंठों को दाँतों से दबा रखा था। उनको बहुत मज़ा आ रहा था। भाभी की चूत इतनी गरम थी कि मेरा लण्ड अन्दर की गर्मी पा कर और भी मोटा हो गया था। अब मैंने पूरा लंड भाभी की चूत में डाल दिया और धक्के मारने लगा। भाभी अपनी कमर ऊपर उठा रही थी, और मेरा साथ दे रही थी।
लगभग ४० मिनट तक मैं भाभी को चोदता रहा।
भाभी ने मुझे कसकर पकड़ लिया और बोली- मेरा माल आने वाला है। मैं धक्का मार ही रहा था। मैंने सोचा कि भाभी झड़ने वाली है। मैं भी साथ में झड़ जाऊँ।
मगर वो बोली- बस करो।
वह हाँफ रही थी।
मैंने कहा- मैं अभी नहीं झड़ा हूँ !
तो जल्दी करो।
मैंने गति तेज़ कर दी और थोड़ी देर बाद मेरे लंड का रस भी भाभी की चूत में गिर रहा था। मुझे बहुत मज़ा आया।
थोड़ी देर तक हम दोनों ऐसे ही पड़े रहे फिर दोनों अलग-अलग हुए। जैसे ही भाभी की चूत से मैंने अपना लंड निकाला, ढेर सारा वीर्य उनकी चूत से बाहर निकलने लगा। चूत से सफ़ेद-सफ़ेद रस बाहर निकलते पहली बार देख रहा था।
मैं और भाभी थक गए थे। वो उठी और मुझे चूम लिया फिर मेरे लंड को चूम कर बोली- थैंक्स अखिल, प्लीज़ मुझे ऐसे ही चोदते रहना, इसके लिए तुम जो भी कहोगे, मैं वो करूँगी।
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