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मास्टरजी क्योंकि पीठ की Hindi Sex Storiesमालिश में मग्न थे, सुलेखा की योनि गीली होने का दृश्य नहीं देख पाए। उनकी नज़र पीठ की तरफ और ध्यान चूतड़ों से स्पर्श करती अपनी निकर पर था जिसके कारण उनका लिंग कठोर से कठोरतर होता जा रहा था।
उन्हें याद नहीं आ रहा था कि इससे पहले उनका लंड इतनी जल्दी कब दुबारा सम्भोग के लिए तैयार हुआ हो!! उन्हें अपने आप पर गर्व होने लगा पर साथ ही चिंता भी होने लगी कि इस अवस्था से कैसे निपटें? वे नहीं चाहते थे कि सुलेखा को उनका विराट लंड दिख जाये। उन्हें डर था वह घबरा कर भाग न जाए।
स्थिति पर काबू पाने के लिए वे सुलेखा के ऊपर से हट गए और उसकी बगल में बैठ कर उसकी गर्दन और कन्धों को सहलाने लगे। उन्होंने सुलेखा के निचले शरीर पर चादर भी उढ़ा थी।
सुलेखा के कामोत्तेजन को जैसे अचानक ब्रेक लग गया। उसे थोड़ा बुरा लगा पर राहत भी महसूस की। उसे अपने ऊपर गुस्सा भी आ रहा था कि अपने ऊपर संयम क्यों नहीं रख पा रही है।
उसे लगा कि मास्टरजी क्या सोचेंगे अगर उन्हें पता लगा कि उसके शरीर में कैसी कशिश चल रही है। वे तो उसका इलाज करने में लगे हैं और वह किसी और प्रवाह में बह रही है!
अपने ऊपर सुलेखा को शर्म आने लगी और मन ही मन मास्टरजी का धन्यवाद किया कि वे उसके ऊपर से उठ गए और उसको ढक दिया। अब उन्हें सुलेखा की योनि की अवस्था का पता नहीं चलेगा, जो कि सम्भोग के लिए तत्पर हो रही थी।
थोड़ी देर में मास्टरजी का लिंग मायूस हो कर सिकुड़ गया और सुलेखा की योनि भी बुझ सी गई। दोनों को इससे राहत मिली।
सुलेखा नहीं चाहती थी कि मास्टरजी को उसकी कामोत्तेजना के बारे में पता चले। कहीं वे उसे बुरी और बदचलन लड़की न समझने लगें।
उधर मास्टरजी नहीं चाहते थे कि सुलेखा उनके लिंग के विराट रूप को देख ले। उन्हें डर था सुलेखा डर के मारे भाग ही न जाए। वे सुलेखा के साथ अपने रिश्ते को धीरे धीरे विकसित करना चाहते थे और एक लम्बा सम्बन्ध बनाना चाहते थे।
मास्टरजी को जब यकीन हो गया कि उनका लंड नियंत्रण में आ गया है और उनकी निकर के आकार को नहीं ललकार रहा तो वे उठ खड़े हुए और सुलेखा को चित लेट जाने का आदेश दे कर कमरे से बाहर चले गए।
सुलेखा एक आज्ञाकारी शिष्या कि भांति चादर के नीचे ही करवट बदल कर सीधी हो गई। हालाँकि वह चादर के नीचे थी, फिर भी सहसा उसने अपने हाथों से अपने स्तन ढक लिए ताकि उसके वक्ष की रूपरेखा चादर पर न खिंचे।
वहाँ मास्टरजी ने गुसलखाने में जाकर अपने नटखट लंड को नियंत्रण में लाने के लिए एक बार फिर मामला हाथ में लिया और हस्त मैथुन करने लगे।
वे दुबारा अपने आप को ऐसी स्थिति में नहीं लाना चाहते थे जहाँ उन्हें सुलेखा से हाथ धोना पड़े। कुछ देर के प्रयास के बाद मास्टरजी का लंड एक बार फिर लावा उगलने लगा, पर इस बार पहले की भांति का ज्वालामुखी नहीं था। एक फुलझड़ी के मानिंद था।
मास्टरजी को इस राहत से तसल्ली मिली और वे एक नए भरोसे के साथ सुलेखा के पास आ गए। उनका लिंग एक भीगी बिल्ली की तरह असहाय सा निकर में लटक रहा था और गवाएँ हुए दो मौकों का अफ़सोस कर रहा था।
सुलेखा के चित्त लेटने से एक समस्या यह खड़ी हुई कि अब दोनों एक दूसरे को देख सकते थे। पर दोनों ही एक दूसरे से आँख नहीं मिलाना चाहते थे क्योंकि दोनों के मन में ग्लानि भाव था। एक अजीब सी चुप्पी का वातावरण छा गया था।
इतने में सुलेखा ने अपने हाथ चादर से बाहर निकाल कर अपनी आँखों पर रख लिए और आँखें मूँद लीं। उसे शायद ज्यादा शर्म महसूस हो रही थी क्योंकि नंगी तो वह थी!!!
उसकी इस हरकत से दो फायदे हुए। एक तो दोनों की आँखों का संपर्क टूट गया और दूसरे सुलेखा के वक्ष स्थल से उसके हाथों का बचाव चला गया।
सुलेखा की साँसें उसकी छाती को ऊपर नीचे कर रहीं थीं जिस से उसके स्तनों के ऊपर रखी चादर ऊपर नीचे खिसक रही थी। इस चादर की रगड़ से उसकी चूचियों में गुदगुदी हो रही थी और वे उभर कर खड़ी हो गई थीं। उसके वक्ष की रूप रेखा अब चादर पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी। मास्टरजी को यह दृश्य बहुत अच्छा लगा।
मास्टरजी ने अपने काम पांव की तरफ से आरम्भ किया। वे सुलेखा की छाती पर पड़ी चादर को नहीं छेड़ना चाहते थे। उन्होंने सुलेखा के पांव से लेकर जांघों तक की चादर उघाड़ दी और तेल की मालिश करने लगे।
तलवे तो पहले ही हो चुके थे फिर भी उन्होंने तलवों पर कुछ समय बिताया क्योंकि वे सुलेखा को गुदगुदा कर उसकी उत्तेजना को कायम रखना चाहते थे। तलवों के विभिन्न हिस्सों का संपर्क शरीर के विभिन्न अंगों से होता है और सही जगह दबाव डालने से कामेच्छा जागृत होती है। इसी आशा में वे उसके तलवों का मसाज कर रहे थे।
सुलेखा को इसमें मज़ा आ रहा था। कुछ देर पहले उसकी कामुक भावनाओं पर लगा अंकुश मानो ढीला पड़ रहा था। मास्टरजी की ऊँगलियाँ उसके शरीर में फिर से बिजली का करंट डाल रही थीं।
धीरे धीरे मास्टरजी ने तलवों को छोड़ कर घुटनों के नीचे तक की टांगों को तेल लगाना शुरू किया। यह करने के लिए उन्होंने सुलेखा के घुटने ऊपर की तरफ मोड़ दिए।
चादर पहले ही जाँघों तक उघड़ी हुई थी। घुटने मोड़ने से सुलेखा की योनि प्रत्यक्ष हो गई। सुलेखा ने तुंरत अपनी टाँगें जोड़ लीं। पर इस से क्या होता है!?
उसकी योनि तो फिर भी मास्टरजी को दिख रही थी हालाँकि उसके कपाट बिल्कुल बंद थे।
मास्टरजी ने खिसक कर अपने आप को सुलेखा के और समीप कर लिया जिस से उनके हाथ सुलेखा की जांघों तक पहुँच सकें।
सुलेखा की साँसें और तेज़ हो गईं और उसने अपने दोनों हाथ अपनी आँखों पर और कस कर बांध लिए।
मास्टरजी ने सुलेखा के घुटनों से लेकर उसकी जांघों तक की मालिश शुरू की। वे उसकी जांघों की सब तरफ से मालिश कर रहे थे और उनके अंगूठे सुलेखा की योनि के बहुत नज़दीक तक भ्रमण कर रहे थे।
सुलेखा को बहुत गुदगुदी हो रही थी और वह अपनी टाँगें इधर उधर हिलाने लगी। ऐसा करने से मास्टरजी के अंगूठों को और आज़ादी का मौका मिल गया और वे उसकी योनि के द्वार तक पहुँचने लगे।
सुलेखा ने शर्म से अपनी टांगें सीधी कर लीं और आधी सी करवट ले कर रुक गई। उसने अपनी टाँगें भी जोर से भींच लीं।
मास्टरजी ने उसकी इस प्रतिक्रिया का सम्मान किया और कुछ देर तक कुछ नहीं किया। सुलेखा की प्रतिक्रिया उसके कुंवारेपन और अच्छे संस्कारों का प्रतीक था और यह मास्टरजी को अच्छा लगा।
उनकी नज़र में जो लड़की लज्जा नहीं करती उसके साथ सम्भोग में वह मज़ा नहीं आता। वे तो एक कमसिन, आकर्षक, गरीब, असहाय और कुंवारी लड़की का सेवन करने की तैयारी कर रहे थे और उन्हें लगता था वे मंजिल के काफी नज़दीक पहुँच गए हैं।
थोड़े विराम के बाद उन्होंने सुलेखा को करवट से सीधा किया और बिना टांगें मोड़े उसकी मालिश करने लगे। उन्हें शायद नहीं पता था कि सुलेखा की योनि फिर से गीली हो चली थी और इसीलिए सुलेखा ने इसे छुपाने की कोशिश की थी।
सुलेखा ने अपने होंट दांतों में दबा रखे थे और वह किसी तरह अपने आप को क़ाबू में रख रही थी जिससे उसके मुँह से कोई ऐसी आवाज़ न निकल जाए जिससे उसको मिल रहे असीम आनंद का भेद खुल जाए।
मास्टरजी ने स्थिति का समझते हुए सुलेखा की जांघों पर से ध्यान हटाया। उन्होंने उसके पेट पर से चादर को ऊपर लपेट दिया और उसके पतले पेट पर तेल लगाने लगे।
सुलेखा को लग रहा था मानो उसका पूरा शरीर ही कामाग्नि में लिप्त हो गया हो। मास्टरजी जहाँ भी हाथ लगायें उसे कामुकता का आभास हो।
यह आभास उसकी योनि को तर बतर करने में कसर नहीं छोड़ रहा था और सुलेखा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे!!
उसे लगा थोड़ी ही देर में उसकी योनि के नीचे बिछी चादर गीली हो जायेगी।
मास्टरजी को शायद उसकी इस दशा का भ्रम था। कुछ तो वे उसकी योनि देख भी चुके थे और कुछ वे सुलेखा के शारीरिक संकेत भी पढ़ रहे थे। उन्हें पुराने अनुभव काम आ रहे थे।
सुलेखा के पेट पर हाथ फेरने में मास्टरजी को बहुत मज़ा आ रहा था। इतनी पतली कमर और नरम त्वचा उनके हाथों को सुख दे रही थी।
वे नाभि में अंगूठे को घुमाते और पेट के पूरे इलाके का निरीक्षण करते।
उनकी आँखों के सामने सुलेखा की योनि के इर्द गिर्द थोड़े बहुत घुंघराले बाल थे जो योनि को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे।
सुलेखा ने अपनी टाँगें कस कर जोड़ रखी थीं जिससे योनि ठीक से नहीं दिख रही थी पर फिर भी मास्टरजी की नज़रों के सामने थी और उनकी नज़रें वहाँ से नहीं हट रही थीं।
अब मास्टरजी ने सुलेखा की छाती पर से चादर हटाते हुए उसके सिर पर डाल दी। अब वह कुछ नहीं देख सकती थी और उसके हाथ भी चादर के नीचे क़ैद हो गए थे।
मास्टरजी को यह व्यवस्था अच्छी लगी। इसकी उन्होंने योजना नहीं बनाईं थी। यह स्वतः ही हो गया था। मास्टरजी को लगा भगवान् भी उसका साथ दे रहे हैं।
मास्टरजी ने पहली बार सुलेखा के स्तनों को तसल्ली से देखा। यद्यपि वे इतने बड़े नहीं थे पर मनमोहक गोलनुमा आकार था और उनके उभार में एक आत्मविश्वास झलकता था। उनके शिखर पर कथ्थई रंग के सिंघासन पर गौरवमई चूचियाँ विराजमान थीं जो सिर उठाए आसमान को चुनौती दे रही थीं।
सुलेखा की आँखें तो ढकी थीं पर उसे अहसास था कि मास्टरजी उसके नंगे शरीर को घूर रहे होंगे। यह सोच कर उसकी साँसें और तेज़ हो रही थीं उसका वक्ष स्थल खूब ज्वार भाटे ले रहा था।
मास्टरजी का मन तो उन चूचियों को मूंह में लेकर चूसने का कर रहा था पर आज मानो उनके लिए व्रत का दिन था।
तेल हाथों में लगाकर उन्होंने सुलेखा के स्तनों को पहली बार छुआ।
इस बार उन्हें बिजली का झटका सा लगा। इतने सुडौल, गठीले और नरम वक्ष उन्होंने अभी तक नहीं छुए थे। उनका स्पर्श पा कर स्तन और भी कड़क हो गए और चूचियाँ तन कर और कठोर हो गईं।
जब उनकी हथेली चूचियों पर से गुज़रती तो वे दबती नहीं बल्कि स्वाभिमान में उठी रहतीं। मास्टरजी को स्वर्ग का अनुभव हो रहा था।
इसी दौरान उन्हें एक और अनुभव हुआ जिसने उन्हें चौंका दिया, उनका लिंग अपनी मायूसी त्याग कर फिर से अंगडाई लेने की चेष्टा कर रहा था।
मास्टरजी को अत्यंत अचरज हुआ।
उन्होंने सोचा था कि दो बार के विस्फोट के बाद कम से कम 12 घंटे तक तो वह शांत रहेगा। पर आज कुछ और ही बात थी।
उन्हें अपनी मर्दानगी पर गरूर होने लगा।
चिंता इसलिए नहीं हुई क्योंकि सुलेखा का सिर ढका हुआ था और वह कुछ नहीं देख सकती थी।
मास्टरजी ने अपने लिंग को निकर में ही ठीक से व्यवस्थित किया जिस से उसके विकास में कोई बाधा न आये।
जब तक सुलेखा की आँखें बंद थीं उन्हें अपने लंड की उजड्ड हरकत से कोई आपत्ति नहीं थी।
वे एक बार फिर सुलेखा के पेट के ऊपर दोनों तरफ अपनी टांगें करके बैठ गए और उसकी नाभि से लेकर कन्धों तक मसाज करने लगे।
इसमें उन्हें बहुत आनंद आ रहा था, खासकर जब उनके हाथ बोबों के ऊपर से जाते थे।
कुछ देर बाद मास्टरजी ने अपने आप को खिसका कर नीचे की ओर कर लिया और उसके घुटनों के करीब आसन जमा लिया। अपना वज़न उन्होंने अपनी टांगों पर ही रखा जिससे सुलेखा को थकान या तकलीफ़ न हो।
इधर सुलेखा को यह आँख मिचोली का खेल भा रहा था। उसे पता नहीं चलता था कि आगे क्या होने वाला है। यह रहस्य उसके आनंद को बढ़ा रहा था।
मास्टरजी के मसाज से उसकी योनि में तीव्र चंचलता पनप रही थी और वह किसी तरह योनि की कामना पूरी करना चाहती थी। पर लज्जा और मास्टरजी के डर से लाचार थी।
उस भोली को यह समझ नहीं आ रहा था कि मास्टरजी से डरने की तो कोई बात ही नहीं है। वे तो खुद इसी इच्छा पूर्ति के प्रयास में लगे हैं।
लज्जा का अब सवाल कहाँ उठता है? वह इस से ज्यादा नंगी थोड़े ही हो सकती है, भला! पर उसका विवेक तो वासना के भंवर में नष्ट हो गया था।
मास्टरजी को अपना नया आसन बहुत लाभदायक लगा। यहाँ से वे पैरों को छोड़ कर सुलेखा के पूरे जिस्म को निहार भी सकते थे और ज़रुरत पड़ने पर छू भी सकते थे।
उन्होंने जानबूझ कर अभी तक सुलेखा के चरम गुप्तांगों पर हाथ नहीं लगाया था। यह सुख वे अंत में लेना चाहते थे।
अब वे सुलेखा की योनि और गुदा का मसाज करने वाले थे। इस विचार के आने से उनके लंड में फिर से रक्त भरने लगा और वह तीसरी बार उदयमान होने लगा।
मास्टरजी ने मसाज की दो क्रियाएँ शुरू कीं। एक तो वे अपने हाथ सुलेखा की जाँघों से लेकर ऊपर कन्धों तक ले जाते और वापस आने पर अपने अंगूठों से उसकी योनि के चारों तरफ मसाज करते।
पहली बार जब उन्होंने ऐसा किया तो सुलेखा उछल पड़ी। उसकी योनि को आज तक किसी और ने नहीं छुआ था।
अचानक मास्टरजी के हाथ लगने से उसको न केवल अत्यंत गुदगुदी हुई, उसका संतुलन और संयम भी लड़खड़ा गया। उसके उछलने से हालाँकि उसके चेहरे से चादर नहीं हटी पर मास्टरजी का तना हुआ लंड ज़रूर उसकी योनि और नाभि को रगड़ गया।
यद्यपि लंड निकर के अन्दर था फिर भी उसका संपर्क सुलेखा को निश्चित रूप से पता चला होगा।
मास्टरजी ने सुलेखा से पूछा- क्या हुआ सुलेखा? मुझ से कोई गलती हुई क्या?
सुलेखा ने जवाब दिया- नहीं मास्टरजी, मैं चौंक गई थी। आप इलाज जारी रखिये!
यह कह कर वह फिर से लेट गई इस बार उसकी टांगें अपने आप थोड़ी खुल गई थीं।
मास्टरजी बहुत खुश हुए। उन्हें पता था कि सुलेखा पर काम वासना ने कब्ज़ा कर लिया है। वह अब उनके हाथों की कठपुतली बन कर रह गई है।
अब मास्टरजी निश्चिंत हो कर सुलेखा की नाभि से लेकर उसकी योनि तक का मसाज करने लगे।
उन्होंने धीरे धीरे योनि के बाहरी होटों को सहलाना शुरू किया और फिर अंदरूनी छोटे होंट सहलाने लगे।
योनि का गीलापन उनको मसाज में मदद कर रहा था।
सुलेखा की देह किसी लहर की तरह झूमने लगी थी। थोड़ी थोड़ी देर में उसकी काया सिहर उठती और उसका जिस्म डोल जाता।
अब मास्टरजी ने अपनी एक ऊँगली सुलेखा की चूत में थोड़ी सी सरकाई।
सुलेखा के मुँह से एक आह निकल गई।
वह कुछ भी आवाज़ नहीं निकालना चाहती थी फिर भी निकल गई।
मास्टरजी योनिद्वार पर और उसके आधा इंच अन्दर तक मसाज करने लगे। सुलेखा एक नियमित ढंग से ऊपर नीचे होने लगी।
प्रकृति अपनी लीला दिखा रही थी। काम वासना के सामने किसी की नहीं चलती तो सुलेखा तो निरी बालिका थी।
मास्टरजी अब एक ऊँगली लगभग पूरी अन्दर बाहर करने लगे। उनकी ऊँगली किसी हद तक ही अन्दर जा रही थी।
सुलेखा के कुंवारेपन का सबूत, उसकी झिल्ली, ऊँगली के प्रवेश का विरोध कर रही थी।
मास्टरजी को इस अहसास से अत्यधिक संतोष हुआ। अगर सुलेखा कुंवारी नहीं होती तो मास्टरजी को ज़रूर दुःख होता।
अब तो उनके हर्ष की सीमा नहीं थी। वे एक कुंवारी योनि का उदघाटन करेंगे इस ख्याल से उनके लंड ने एक ज़ोरदार सलामी दी और जा कर मास्टरजी के पेट से सट गया।
मास्टरजी ने हाथ बढा कर सोफे पर से एक तकिया खींच लिया और सुलेखा के चूतड़ों के नीचे रख दिया। इस से सुलेखा की गांड भी अब मास्टरजी के अधीन हो गई।
उन्होंने दोनों हाथों में तेल लगाकर एक हाथ से चूतड़ों पर मालिश शुरू की तथा दूसरे से उसकी चूत की। वे इस बात का ध्यान रख रहे थे कि उनकी ऊँगली से गलती से सुलेखा की झिल्ली न भिद जाए।
यह सौभाग्य तो वे अपने लंड को देना चाहते थे। इसलिए चूत की मालिश बहुत कोमलता से कर रहे थे। उन्होंने अपनी ऊँगलियाँ हौले हौले योनि के ऊपर स्थित मटर के पास ले गए जो कि स्त्री की कामाग्नि का सबसे संवेदनशील अंग होता है।
उसे छूते ही सुलेखा के मुँह से एक मादक चीख निकल गई। उसका अंग प्रत्यंग हिल गया और योनि में से 2-3 बूँद द्रव्य रिस गया।
मास्टरजी ने उसके योनि-रस में ऊँगलियाँ भिगो लीं और उन गीली उँगलियों से उसकी गांड के छेद की परिक्रमा करने लगे।
एक हाथ उनका मटर के दाने के आस पास घूम रहा था। सुलेखा आनंद के हिल्लोरे ले रही थी। अब उसकी देह समुद्र की मौजों की तरह लहरें ले रही थी उसका ध्यान इस दुनिया से हट कर मानो ईश्वर में लीन हो गया था।
अब उसे किसी की परवाह नहीं थी।
वह बेशर्मी से मास्टरजी का सहयोग करने लगी थी और निडर हो कर आवाजें भी निकाल रही थी।
उसकी योनि में सम्भोग की तीव्र ज्वाला भड़क उठी थी। उसका तड़पता शरीर भरपूर शक्ति के साथ मास्टरजी की ऊँगली को चूत में डलवाने के प्रयास में लगा था।
और अगर मास्टरजी सावधान नहीं होते तो सुलेखा मास्टरजी की ऊँगली से ही अपने कुंवारेपन को लुटवाने में कामयाब हो जाती।
मास्टरजी ने अवसर का लाभ उठाते हुए एक गीली ऊँगली सुलेखा की गांड के छेद में दबा दी। जैसे ही उन्होंने दबाव डाला उनके दरवाज़े की घंटी बज गई।
वे एकदम चौंक गए।
उन्हें लगा उनके दरवाज़े की घंटी का बटन सुलेखा की गांड में कैसे आ गया!!
उधर सुलेखा भी हड़बड़ा कर उठ गई और अपने कपड़े ढूँढने लगी। उसे अचानक शर्म सी आने लगी।
मास्टरजी ने उसे इशारे से दूसरे कमरे में जाने को कहा और खुद कपड़े पहनते हुए कमरे को सँवारने लगे।
इस दौरान उनका लंड भी मुरझा गया था जो कि अच्छा हुआ।
जब कमरा ठीक हो गया वे दरवाज़े की तरफ जाने लगे पर कुछ सोचकर रुक गए और सुलेखा के पास जा कर उसे पीछे के दरवाज़े से निकाल कर घर जाने को कह दिया।
उन्होंने उसके कान में कल फिर इसी समय आने को भी कह दिया। सुलेखा ने सर हिला कर हामी भर दी और चुपचाप घर को चल दी।
वे नहीं जानते थे कौन आया है और कितनी देर रुकेगा।
इसके आगे क्या हुआ, अन्तर्वासना में पढ़िये अगले अंक में!!!
आपको यहाँ तक की कहानी कैसी लगी मुझे ज़रूर बताइए। आपके पत्रों और सुझावों का मुझे इंतज़ार रहेगा, ख़ास तौर से महिला पाठकों का क्योंकि लड़कियों के दृष्टिकोण का मुझे आभास नहीं है। उनके परामर्श मेरे लिए ज़रूरी हैं। Hindi Sex Stories
हेलो! मेरा नाम निक है और मैं मुंबई के Indian Sex Stories बांद्रा में रहता हूँ। यह मेरी पहली कहानी है जो कि एक हकीक़त भी है। मैं मुंबई में पिछले 3 साल से रह रहा हूँ। मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ यहाँ काम की तलाश में आया था। ( सुनने में शायद यह थोड़ा फ़िल्मी लगता है) लेकिन यह सच है।
मुझे मुंबई आये अभी कुछ दिन ही हुए थे कि मुझे मेरे एक स्थानीय मित्र ने बताया कि मुंबई में कई लड़के “ज़िगोलो” या पुरुष-वेश्या बन कर अपनी ज़िन्दगी गुजार रहे हैं। पहले तो मुझे उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं हुआ लेकिन एक दिन ” मुंबई मिरर “(एक पत्रिका) में ज़िगोलो’ज़ पर एक लेख पढ़ कर मुझे यकीन हो गया कि यह एक हकीक़त है।
लेकिन यह बात वहीं आई गई हो गई और मैं फिर से नौकरी की तलाश में जुट गया।
कुछ दिन बाद की बात है, मैं रात घर पर बिस्तर में लेटा था। मेरे कमरे में मेरे सभी साथी सो रहे थे, रात का शायद 1 बजा होगा, पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैंने सोचा- थोड़ा घूम कर आता हूँ, शायद अच्छा लगे।
यही सोच कर मैंने कपड़े पहने और स्टेशन की ओर निकल गया। स्टेशन रात के समय कुछ अजीब सा लग रहा था। कुछ सेक्स-वर्कर लड़कियां, कुछ नशेड़ी और बहुत सारे अपराधी किस्म के लोग वहां थे। मेरे मन में झिजक पैदा हुई, लेकिन मैंने सीधा जाकर चर्चगेट की टिकट ले ली। मैं जल्दी जल्दी प्लेटफ़ार्म पर पहुंचा और मैं चर्चगेट जाने वाली ट्रेन में चढ़ गया।
कुछ 20-25 मिनट में मैं चर्चगेट स्टेशन पहुँच गया। वहां काफी चहल-पहल थी। जिसे देख कर मेरा डर थोड़ा कम हुआ, आखिर एक 23 साल का लड़का जो कि शहर में नया और अनजान हो, रात में अकेलेपन से डरता ही है।
फ़िर भी मैं पता नहीं क्यूँ वहाँ आस-पास घूमता रहा, यह सोच कर कि कोई मुझे ज़िगोलो समझ कर अपने साथ ही ले जाए, क्योंकि मैं दिखने में काफ़ी अच्छा हूँ और कई लड़कियों ने मुझे अपना साथ भी दिया है।
बहरहाल, घूमते घूमते अभी कुछ मिनट ही हुए थे कि मैंने देखा कि कहीं से बहुत सारी कारें आ रही थी, शायद किसी डिस्को में पार्टी खत्म हुई थी। मैं उस तरफ़ से मुड़ गया और फ़िर से स्टेशन की तरफ़ चलने लगा। तभी मैंने देखा कि मुझे कोई कार में से इशारे कर रहा है। मैं बहुत घबरा गया क्योंकि वो औरत नहीं मर्द था। मुझे लगा कोई समलिंगी पुरुष होगा, इसलिए मैं तेज़ी से आगे बढ़ गया।
लेकिन इस बार उसने मुझे “हैलो सफ़ेद कमीज़!” कह कर आवाज़ लगाई। मैंने हिम्मत जुटा कर उसकी तरफ़ देखा, उसने मुझे कार के पास बुलाया और मैं डरते हुए कार के पास गया।
वहाँ मैंने देखा कि वो एक ड्राईवर था। मुझे लगा कि वो कोई जगह पूछेगा, लेकिन उसने कहा- मैडम ने बात करनी है, कार में बैठो!
यह सुनते ही मैं हक्का-बक्का रह गया। रात के ढाई बज़े एक “ब्लैक कैमरी” में सफ़र करने वाली औरत मुझसे कर में बात करना चाहती है। मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले वो गाड़ी आगे बढ़ने लगी। पता नहीं मुझे क्या हुआ और मैं जल्दी से कार में बैठ गया।
कार में बैठते ही मेरी खुशी को जैसे पर लग गए, एक 30-32 साल की औरत जिसकी सूरत देख कर यूँ लगे मानो कोई सिनेमा की हिरोईन हो, मेरे पास बैठी थी। वो काले रंग के ईवनिंग गाऊन में यूँ लग रही थी जैसे स्ट्राबेरी को चॉकलेट में डूबो कर रखा हो।
मेरे मुँह से छोटे से ‘हाय’ के अलावा कुछ नहीं निकला। इतने में गाड़ी चलने लगी और मैं थोड़ा सम्भल कर बैठ गया। 2-3 मिनट तक कोई बात नहीं हुई, ड्राईवर की नज़र पीछे देखने वाले शीशे में से मेरे ऊपर ही थी। शायद उसके लिए यह रोज़ की बात थी। थोड़ी देर में उस औरत ने मुझे बोला- हाय! मेरा नाम हिया है।
मैंने भी अपना नाम बताया। मेरा नाम सुनकर वो मुझसे मेरे बारे में पूछने लगी। ऐसा लग रहा था मानो वो रात के पौने तीन बज़े मेरा इन्टरव्यू ले रही हो। मैं तोते की तरह जवाब देता गया। बातों बातों में मैंने उसका फ़ीगर देखना शुरू किया। उसका फ़ीगर इतना अच्छा नहीं था , उसके स्तन छोटे थे और पेट भी बाहर था लेकिन फ़िर भी उसके चेहरे ने सभी कमियाँ छुपा ली थी। उसकी नज़र शायद मेरे चेहरे पर थी और एक पल बाद उसका हाथ मेरी कमर पर। जैसे ही उसने मुझे छुआ यूँ लगा जैसे 440 वाट का करंट लगा हो, क्योंकि पहली बार किसी नारी ने पहल की थी मेरे साथ। खैर, हिया ने ड्राईवर से कहा कि गाड़ी रोक कर वो उतर जाये और टैक्सी लेकर घर चला जाये और उसे कुछ पैकेट दिए, जिसे लेकर वो बिना पीछे देखे चला गया। अब हम दोनों गाड़ी में अकेले थे, उसने मुझसे पूछा “क्या तुम गाड़ी चलाओगे?”
हाँ में सर हिला दिया मैंने। तब उसने मुझे अपनी गाड़ी की चाबी दी और बोली- चलो!
मैं पागल हो रहा था कि एक अनजान औरत बिना कुछ जाने मुझे अपने साथ रात में ले जाने को तैयार है, क्या मेरी किस्मत इतनी अच्छी है?
लेकिन शायद किस्मत नाम ही है अप्रत्याशित का!
मैं ड्राईवर सीट पर आ गया और वो अगली सीट पर! मैं कार चलने लगा, उसने मेरे बालों में हाथ डाला और कहने लगी,”काफी घबराए हुए लग रहे हो!”
मैंने डर के कहा- नहीं तो! मैं ठीक हूँ!
तो हंसते हुए बोली- ठीक है! चिन्ता मत करो मैं तुम्हें खा नहीं जाऊँगी!
मैंने सर हिला दिया और वो मुझे रास्ता बताने लगी।
एक घण्टे चलने के बाद हम मुम्बई के मड आईलैण्ड इलाके में थे, वहाँ पहुंचते ही मैं समझ गया कि हिया किसी बड़े उद्योगपति की पत्नी है क्यूंकि या तो वहाँ ऐसे बंगले हैं जहाँ फ़िल्मों की शूटिंग होती है या धनकुबेरों के फ़ार्म हाऊस!
उसने मुझे गाड़ी रोक कर पीछे बैठने को कहा और खुद गाड़ी चला कर बंगले के अन्दर ले गई।
मैं और हिया एक साथ जैसे ही कमरे में पहुंचे, उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपने स्तनों पर रख लिया और मैं आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी बात मानता रहा।
मैं उसके स्तनों से खेलता रहा और वो मेरे शर्ट के बटन खोलती रही. हम लोग यही करते करते उसके शयनकक्ष की ओर बढ़ने लगे और बीच में पड़े म्यूज़िक सिस्टम को उसने ओन कर दिया। मैं प्रफ़ुल्लित हो रहा था और मैं उसे चूमने लगा। तब तक मेरे हाथ उसकी ब्रा को अन्दर से खोल चुके थे और उसके हाथ मेरे शर्ट को।
अब हम एल आलीशान बंगले के शयनकक्ष में थे और वहाँ एक विशालाकार पलंग था। उसने मुझे वहाँ बैठने को कहा और चली गई। मुझे लगा शायद उसे लू जाना था।
दस मिनट बाद जब वो आई तो मैं हैरान था, उसने अर्ध-पारदर्शी अन्तःवस्त्र पहने थे जिसमें उसकी शेव की हुई चूत और प्यारे से स्तन साफ़ साफ़ दिख रहे थे, मैं तो पहले से ही अपने सारे कपड़े उतार कर कम्बल के अन्दर घुसा हुआ था। मेरे कपड़े ज़मीन पर देख कर वो हंसी और रोशनी कम करके वो मेरे पास आ कर बैठ गई।
अब तो मैं पागल हो चुका था इसलिए उस पर टूट पड़ा। मैं उसे एक कुत्ते की तरह चूसने चाटने लगा और वो मुझे बिल्ली की तरह नाखून मारने लगी। मैंने उसके होंटों पे अपने होंट ऐसे चिपका दिए जैसे फ़ैवीक्विक लगा हो। वो मुझे ले कर करवटें बदलती रही और र्मैं उसके पूरे शरीर का मानो नाप ले रहा था। थोड़ी देर में उसकी ब्रा और पैन्टी जमीन पर पड़े मेरे कपड़ों को चूम रही थी।
मेरे सामने थी एक उच्च वर्ग की तथाकथित आधुनिक महिला!
मैंने कम्बल को दूर फ़ेंका और उसे अपनी गोद में उठा कर खड़ा कर दिया।
मैं उसके नर्म नर्म स्तन दबाता रहा और वो मेरे बालों को खींचती रही। मैंने उसके सारे बदन पर अपने होंटों की निशानी लगा दी थी।
मेरा लण्ड आज पहली बार इतना उतावला था, शायद इसलिए कि अज उसे पहली बार एक आँटी मिलने वाली थी जो उससे कहीं ज्यादा अनुभवी थी। मेरा लौड़ा हाथ में ले कर वो बोली- थोड़ा छोटा है, पर प्यारा सा है, बहुत स्वादिष्ट लगता है!
मैंने उसकी बात काटी और बोला-अगर खाना चाहती हो तो चख कर देखो ना!
मेरा इतना बोलना ही था कि मेरा लण्ड उसके मुँह में था। मैं पागल हो रहा था और वो मुझे पागल कर रही थी। सुबह के पाँच बज रहे थे और मुझे लग रहा था कि यह सुबह कभी आए ही ना!
वो कभी मेरे लौड़े को चूसती तो कभी मेरे अण्डकोषों को! और अपनी उंगलियों से मेरे छोटे छोटे चूचुकों को मसल रही थी। मेरा पूरा बदन जल रहा था, मैंने उसे एक झटके में उठाया और पलंग पर लिटा दिया। अब मैं उसे चूमने लगा और उसकी प्यारी सी चूत तक पहुंच गया। मैं तो पागलों की तरह उसकी फ़ुद्दी चाटने और सहलाने लगा और वो मेरा मुँह उसमें घुसवाती रही।
काफ़ी देर ऐसा ही चलता रहा। फ़िर उसने मुझे कहा- हमें जल्दी करना पड़ेगा क्योंकि मुझे जाना भी है।
सुन कर मानो मेरे खड़े लण्ड पर चोट हो गई।
तब वो हंस के बोली- अरे मूर्ख! अभी भी मेरे पास एक घण्टा है, परेशान मत हो!
यह सुनते ही मैं उस पर कूद पड़ा क्योंकि मैं एक पल भी व्यर्थ गंवाना नहीं चाहता था। मैंने उसके दोनों पांव अपने कन्धे पर रखे और एक ही झटके में अपना छः इन्च ला लन्ड उसकी चूत में प्रविष्ट करा दिया। मुझे लगा वो चीखेगी, लेकिन वो तो सिर्फ़ यह बोली- बुरा नहीं है!
और मैं जोर जोर से उसे चोदने लगा, थोड़ी देर में मैं चरम सीमा पर पहुंचने लगा तो मैंने अपना लण्ड निकाल लिया और उसे कहा- मेरे ऊपर आ जाओ!
वो मेरे ऊपर आ गई और मेरी सवारी करने लगी। दस मिनट में वो अपने चर्मोत्कर्ष पर थी और वो जंगली बिल्ली की तरह चीखी। मैं उसकी चीख सुनकर पागल हो गया और जोर जोर से धक्के मारने लगा। दो मिनट बाद मैं भी अपने को रोकने में असमर्थ पा रहा था तो मैंने अपना लौड़ा उसकी चूत से निकाला और उसके मुंह के पास ले गया। उसने मेरा लण्ड अपने मुंह में ले लिया और पालतू कुतिया की तरह चाट चाट कर मेरा सारा वीर्य ऐसे गटक गई मानो कोई स्वास्थ्य पेय हो।
मैंने उसके गालों को चूम लिया और उसे अपने बगल में लिटा लिया। उसने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया, मेरे सिकुड़ चुके लण्ड को हाथ में लेकर सहलाने लगी।
थोड़ी देर में उसने मुझे कहा- मेरे ख्यल से अब हमें चलना चाहिए। यह कह कर वो बाथरूम में चली गई। मैंने भी उठ कर अपने कपड़े पहने और दरवज़े के पास उसका इन्तज़ार करने लगा।
वो एक आकर्षक शर्ट और जीन्स पहन कर बाहर आई और मुझसे कहा- चलो चलें! तुम्हें नींद भी आ रही होगी। चलो मैं तु्म्हें छोड़ आती हूँ।
बाहर आते हुए उसने मुझे 1000 रुपए के कुछ नोट देने चाहे लेकिन मैंने मना कर दिया उअर यह कह दिया कि मुझे आपका साथ अच्छा लगा! मैं वो नहीं हूँ जो आप सोच रही हैं!
यह सुन कर वो हंसने लगी और मेरी कमर पकड़ कर मुझे कार में बिठा कर बांद्रा तक छोड़ दिया, जाते जाते मुझे कहने लगी- मैं भी बांद्रा में रहती हूँ।
सुन कर मुझे झटका सा लगा और खुशी भी हुई। पर मुझे अचानक याद आया कि मैंने हिया का ना तो फ़ोन नम्बर लिय और ना ही कोई पता वगैरह। और अपने पर ही क्रोधित होने लगा।
घर जाकर अचानक मुझे लगा कि मेरी पैन्ट की जेब में कुछ है तो मैंने देखा कि उसमें 1000 के 5 नोट और हिया का कार्ड था।
मुझे नहीं पता कि कब उसने ये सब मेरी जेब में रखा! Indian Sex Stories
दोस्तों सभी ने मेरी एक-एक Sex Stories कहानी पसन्द की और मुझे अपनी गाँड मरवाने की दास्ताँ अन्तर्वासना पर देख गुरुजी के पाँव छूने का दिल करता है। जो मेरी चुदाई की दास्ताँ और मेरी की हुई मेहनत पर पानी नहीं फिरने देते।
ट्रेन में मैंने दो फौजियों के साथ ख़ूब मस्ती की। उन्होंने मुझे अपना नम्बर तक दे डाला लेकिन मैंने उनसे मिलना ज़रूरी नहीं समझा क्योंकि मैं सफर में बने सम्बन्ध को वहीं छोड़ देता हूँ।
दोस्तों एक बार मैं कॉलेज के लिए बस पकड़ने के लिए खड़ा था। इन्तज़ार था किसी खचाखच भरी बस का। तभी एक मिनी बस आई, मैं चढ़ गया और मेरी निगाहें किसी ऐसे मर्द को तलाश कर रहीं थीं जिसे देख मैं समझ लूँ कि कहीं वो मेरी हरक़त पर बवाल तो नहीं मचा देगा।
तभी मैंने एक मूछों वाला कड़क सा मर्द देखा। मुझे लगा कि वो सही रहेगा। ख़ैर मैं उसके आगे खड़ा हो गया। मैंने देखा था उसका वो भाग काफी फूला हुआ था, मैं उसके पास ही आगे खड़ा हो गया। 5 मिनट वैसी ही उधर-उधर का जायज़ा लेकर मैंने धीरे से गाँड को हरक़त में लाने की कोशिश की और पहले धीरे से उसपर दवाब दिया। भीड़ की वज़ह से जब धक्का लगा तो हम झुक गए। फिर मैंने गाँड गोल-गोल तरीके से घुमानी शुरु की, अपना जलवा और तज़ुर्बा शुरु किया। उसको मैंने अहसास दिला दिया कि मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी गाँड उसके लंड से घिस रहा हूँ। उसके लंड में भी हरक़त महसूस हुई। साफ़ लगा कि वह खड़ा हो रहा था।
मैंने गाँड को और दबाया। मैंने एक हाथ से ऊपर डंडे को पकड़ रखा था, धीरे से दूसरा हाथ नीचे लेकर गया। भीड़ में किसी का ध्यान वहाँ नहीं था। मैंने हाथ से उसको छू लिया। उसे बहुत अच्छा लगा। मैंने और सहलाया और उसने कान के क़रीब आकर बोला- कहाँ जाना है?’
मैंने उसे बताया कि कॉलेज।
उसने कहा,’बहुत मज़ा आ रहा है, लेकिन यहाँ ठीक नहीं है। अगले स्टॉप पर उतर जाते हैं।’
मैंने अनजान बनकर पूछा- ‘लेकिन वहाँ क्या होगा?’
उसने कहा,’यार उतर तो सही, मेरे दोस्त का एक गेस्ट-हाउस है। हमसे कौन सा पैसे लेगा। चले हैं न वहाँ।’
ऐसे ही कान में फुसफुसात हुए, इधर-उधर देख बातें करते हुए उसका लंड मसल दिया।
उसने कहा,’साले गाँडू, यहीं खड़ा करके जुलूस मत निकलवा देना’
दोनों बस से उतर गए, सीधा गेस्ट-हाउस गए। उसका दोस्त वहाँ नहीं था, रूम-सर्विस वाला लड़का था। वह प्यार से उससे मिला, एक कोने में ला जाकर कुछ कहा, उसने एक चाबी उसे दी और हम दोनों दूसरी फ्लोर पर एक ए.सी. कमरे में पहुँच गए।
उसने कहा,’अच्छा कमरा है।’ और उसने दरवाज़ा लॉक कर दिया और सीधा मुझे पकड़ लिया और मेरी गाँड मसलने लगा, मेरे मम्मे दबाने लगा।
मैंने अपनी शर्ट उतार दी और फिर देखते ही देखते सिर्फ अण्डरवीयर में रह गया। उसके बाद मैं उठा और उसके भी सारे कपड़े उतार दिए और उसको खड़ा कर ख़ुद घुटनों के बल बैठ कर सीधा ही उसके लंड को मुँह में भर कर चूसने लगा। वो आहें भर-भरकर मुझसे चुसवा रहा था। मैं भी उसके नुकीले लंड को बड़े मज़े से चूस रहा था, क्या लंड मिला था।
मैंने कुछ देर चूसने के बाद उसको कहा कि अब चोद लो और झट से उसके सामने घुटनों के बल झुक कर घोड़ी बन गया।
वो बोला,’ऐसे ही घोड़ी बने-बने कुतिया की तरह चलता हुआ आ और मेरा चूस।’
मैंने कुछ देर चूसने के बाद अपनी गोरी गाँड उसकी ओर कर दी और कॉण्डोम चढ़ा दिया और बोला- चल डाल दे।
उसने भी घुसाना शुरु किया। कामासूत्र के कॉण्डोम में बहुत चिकनाई से जिससे मुझे बहुत आनन्द आ रहा था। हाय राजा… फाड़ डाल मेरी आज… धो डाल मुझे।
ले साले, यह ले- कह जब वो झटके मारता तो जान निकाल देता।
बहुत दम था उसकी जाँघों में। ज़बर्दस्त चोद रहा था। हाय, ऐसा ही मर्द मैं तलाशता हूँ, जो कमीना ऐसे ही घिस-घिस कर ले मेरी।
उसने मुझे पलट कर सीधा कर दिया और बीच में आते हुए लंड गाँड पर रख नीचे घड़ी लगा कर डाल दिया, जिस से गाँड कस सी गई। वो भी मास्टर निकला इन कामों का। बोला ‘साले अब बोल, रगड़ का मज़ा मिलता है?’
‘हाँ मिलता है’
कुछ ही पलों में उसका भी अन्त हो गया। अह…अहहहह… अहह… आधा घंटा ऐसे ही वो मेरी गाँड मारता रहा और बोला,’झड़ने वाला हूँ। उसने बाहर निकाला और मेरी छाती पर बैठ अपने लंड से कॉण्डोम निकाल, वीर्य मेरे मुँह में डाल दिया और बोला,’थोड़ा चूस दे।’
मैंने मूठ मारते हुए चूसना चालू किया और उसने एकदम अपने हाथ में नियंत्रण लेते हुए तेज़ी से हिला-हिला कर सारा माल मेरे मुँह में डाल दिया। एक-एक क़तरा चाट-चाट कर मैंने साफ़ कर दिया। कुछ देर हम एक-दूसरे से चिपके रहे और मैंने फिर से उसके लंड को थाम कर सहलाना शुरू कर दिया।
वो फिर से हरक़त में आने लगा। देखते-ही-देखते उसका बाम्बो फिर से दहाड़ने लगा और पता नहीं चुदाई का मास्टर था, दूसरी बार दस मिनट चूसता रहा, फिर भी झड़ा नहीं। उसके बाद बोला,’अब तू ख़ुद चुदेगा। तू इसपर बैठ कर उछल।’
मैंने वैसा ही किया। एक घंटा चुदाता रहा। मेरी गाँड लाल हो गई, तब कहीं जाकर वह झड़ने के क़रीब आया। इस बार उसने माल मेरी कमर पर उगल दिया और कुछ गाँड की छेद पर डाल उस पर लंड रगड़ दिया। इससे मुझे बहुत सुख सा मिला। उसका गरम माल लगते ही सारी खुज़ली खतम हो गई।
दोस्तों यह थी दोस्तों सभी ने मेरी एक-एक कहानी पसन्द की और मुझे अपनी गाँड मरवाने की दास्ताँ अन्तर्वासना पर देख गुरुजी के पाँव छूने का दिल करता है। जो मेरी चुदाई की दास्ताँ और मेरी की हुई मेहनत पर पानी नहीं फिरने देते।
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दोस्तों एक बार मैं कॉलेज के लिए बस पकड़ने के लिए खड़ा था। इन्तज़ार था किसी खचाखच भरी बस का। तभी एक मिनी बस आई, मैं चढ़ गया और मेरी निगाहें किसी ऐसे मर्द को तलाश कर रहीं थीं जिसे देख मैं समझ लूँ कि कहीं वो मेरी हरक़त पर बवाल तो नहीं मचा देगा।
तभी मैंने एक मूछों वाला कड़क सा मर्द देखा। मुझे लगा कि वो सही रहेगा। ख़ैर मैं उसके आगे खड़ा हो गया। मैंने देखा था उसका वो भाग काफी फूला हुआ था, मैं उसके पास ही आगे खड़ा हो गया। 5 मिनट वैसी ही उधर-उधर का जायज़ा लेकर मैंने धीरे से गाँड को हरक़त में लाने की कोशिश की और पहले धीरे से उसपर दवाब दिया। भीड़ की वज़ह से जब धक्का लगा तो हम झुक गए। फिर मैंने गाँड गोल-गोल तरीके से घुमानी शुरु की, अपना जलवा और तज़ुर्बा शुरु किया। उसको मैंने अहसास दिला दिया कि मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी गाँड उसके लंड से घिस रहा हूँ। उसके लंड में भी हरक़त महसूस हुई। साफ़ लगा कि वह खड़ा हो रहा था।
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मैंने उसे बताया कि कॉलेज।
उसने कहा,’बहुत मज़ा आ रहा है, लेकिन यहाँ ठीक नहीं है। अगले स्टॉप पर उतर जाते हैं।’
मैंने अनजान बनकर पूछा- ‘लेकिन वहाँ क्या होगा?’
उसने कहा,’यार उतर तो सही, मेरे दोस्त का एक गेस्ट-हाउस है। हमसे कौन सा पैसे लेगा। चले हैं न वहाँ।’
ऐसे ही कान में फुसफुसात हुए, इधर-उधर देख बातें करते हुए उसका लंड मसल दिया।
उसने कहा,’साले गाँडू, यहीं खड़ा करके जुलूस मत निकलवा देना’
दोनों बस से उतर गए, सीधा गेस्ट-हाउस गए। उसका दोस्त वहाँ नहीं था, रूम-सर्विस वाला लड़का था। वह प्यार से उससे मिला, एक कोने में ला जाकर कुछ कहा, उसने एक चाबी उसे दी और हम दोनों दूसरी फ्लोर पर एक ए.सी. कमरे में पहुँच गए।
उसने कहा,’अच्छा कमरा है।’ और उसने दरवाज़ा लॉक कर दिया और सीधा मुझे पकड़ लिया और मेरी गाँड मसलने लगा, मेरे मम्मे दबाने लगा।
मैंने अपनी शर्ट उतार दी और फिर देखते ही देखते सिर्फ अण्डरवीयर में रह गया। उसके बाद मैं उठा और उसके भी सारे कपड़े उतार दिए और उसको खड़ा कर ख़ुद घुटनों के बल बैठ कर सीधा ही उसके लंड को मुँह में भर कर चूसने लगा। वो आहें भर-भरकर मुझसे चुसवा रहा था। मैं भी उसके नुकीले लंड को बड़े मज़े से चूस रहा था, क्या लंड मिला था।
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दोस्तों यह थी अमन की एक और चुदाई की दास्ताँ
अगली चुदाई लेकर जल्द हाज़िर होऊँगा, तब तक के लिए लंड एण्ड ओनली लंड की एक और चुदाई की दास्ताँ
अगली चुदाई लेकर जल्द हाज़िर होऊँगा, तब तक के लिए लंड एण्ड ओनली लंड Sex Stories
शालीन को रात को ठीक से नींद Antarvasna नहीं आई…। रह रह कर उसे प्रगति का चेहरा और बदन दिखाई देता ! उसे अपने संयम टूटने पर भी ग्लानि हो रही थी। वह एक भद्र पुरुष था और अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था। उसकी पत्नी भी उससे प्यार करती थी। उसका किसी और लड़की की ओर आकर्षित होना समझ नहीं आ रहा था।
शायद उसे मरदाना प्रवृति का ज्ञान नहीं था। पुरुष की प्रवृति उसे एक साथ कई यौन सम्बन्ध बनाने को आतुर करती है। उसका प्रजनन में जिम्मा सिर्फ अपना बीज डालने तक सीमित होता है। प्रकृति ने इसके बाद प्रजनन की सारी जिम्मेदारी नारी पर छोड़ दी है। इसीलिए नारी यौन सम्बन्धों को लेकर पुरुषों के मुकाबले अधिक गंभीर होती है। उसे अपने साथी चुनने में देर तो लगती है पर उसका चुनाव निर्णायक और दीर्घकालीन होता है। वह अक्सर अपने साथी के साथ अडिग सम्बन्ध कायम रखती है। इसका कारण प्रकृति के उस सिद्धांत पर निर्भर है जिसने नारी को मातृत्व के समस्त बोझ से लादा हुआ है। पुरुष का क्या है…..। किसी भी मादा के साथ सम्बन्ध बनाने को सदैव तत्पर रहता है ! यौन संबंधों में स्त्री-पुरुष के बीच यही एक बड़ा रूचि-विरोध है। मर्द को लगता है वह एक समय कितनी भी लड़कियों से प्यार कर सकता है और औरत को सिर्फ एक आदमी का प्यार पर्याप्त होता है।
खैर, शालीन की रात उधेड़बुन में ही निकल गई। सुबह दफ्तर जाते वक़्त मयूरी से आँखें नहीं मिला पा रहा था। वह फिर से किशोरावस्था में जा पहुंचा था जहाँ उसे उलझन, व्याकुलता और लज्जा का आभास हो रहा था। वह भौतिकता और आध्यात्मिकता के अंतर्द्वंद्व में फँस गया था। जब भी पुरुष पर ऐसी उलझन आई है देखा गया है कि अक्सर भौतिकता की ही विजय हुई है। काम, क्रोध, मोह और ईर्ष्या पर तो केवल साधू ही काबू पा सकते हैं। शालीन को यह निश्चित हो गया कि वह एक सामान्य पुरुष है, कोई साधू या देवता नहीं। उसका मस्तिष्क प्रगति की कामुक काया की छवि नहीं मिटा पाया और उसके जिस्म को हासिल करने की तीव्र लालसा को पूरा करने की ओर प्रेरित हो गया। कहते हैं यौनाकर्षण दुनिया की सबसे ताक़तवर शक्ति होती है। इसे हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है।
दफ्तर में भी शालीन का मन अपने काम में नहीं लग रहा था। दोस्तों की बातचीत, चुटकुले या दफ्तरी उथल-पुथल से परे वह अपने आप में गुम था। उसका दिमाग ऐसी तरकीब जुटाने में लगा था जिससे वह प्रगति के साथ यौन संसर्ग कर सके और किसी को पता ना चले। जब मन में किसी लक्ष्य को पाने की तीव्र इच्छा होती है, तो दिमाग उसका हल निकाल ही लेता है; खासतौर से अगर वह इच्छा जिस्म के निचले हिस्सों से सम्बंधित हो। ऐसा ही हुआ और शालीन को एक उपाय सूझ गया। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।
घर लौटते समय वह बिजली के सामान की दूकान से कुछ सामान ले आया और एक कारीगर को भी साथ ले लिया। घर पहुँच कर सामान्य तरीके से मयूरी को बताया कि बिजली की बचत और उससे सुरक्षा के लिए वह नया फ्यूज़ बॉक्स लगवा रहा है जिससे बिजली की बचत भी होगी और आग लगने का खतरा भी नहीं रहेगा। मयूरी को कोई आपत्ति नहीं हुई और कारीगर ने अपना काम शुरू किया। शालीन ने उसे निर्देश दिया कि वह किस तरह से कमरों में बिजली और पॉवर के कनेक्शन चाहता है। हर कमरे के लिए बिजली का अलग और पॉवर का अलग स्विच नए फ्यूज़ बॉक्स में लगवा दिया। जिस से घर में जहाँ चाहें बिजली या पॉवर या दोनों को चालू या बंद कर सकते हैं।
यह होने के बाद, उसने सर्दी का आश्रय लेते हुए पूरे घर में कालीन या दरी बिछवाने का आदेश दे दिया। वह चाहता था कि रात को उसके चलने-फिरने की आहट ना हो। जिस कमरे में प्रगति सोती थी उसकी अलमारी में उसने टॉर्च, कुछ तौलिये, चादरें, के वाय जेली की ट्यूब, अपने कुर्ते-पजामे और प्रगति के लिए लूंगी और कुर्ती छुपा कर रख दीं। उसने यकीन किया कि मयूरी के बेडरूम में कोई टॉर्च, मोमबत्ती या माचिस नहीं है। जो थीं उसने छुपा दीं जिससे आसानी से मिल ना सकें। उसने सोच लिया था कि रात को, सबके सोने के बाद, वह प्रगति के कमरे को छोड़ बाकी सारे कमरों की लाइट फ़्यूज़ बॉक्स से बंद कर देगा। जिससे जब वह प्रगति के कमरे में हो और अगर रात को मयूरी या उसके बेटे की आँख खुले तो वे घर में उजाला ना कर पायें। वह चाहता था कि वे उसको मदद के लिए पुकारें और वह अँधेरे अँधेरे में वापस अपने बेडरूम पहुँच सके। इससे वह प्रगति के साथ रंगे हाथों नहीं पकड़ा जायेगा।
सब तैयारी होने के बाद शालीन बेसब्री से रात का इंतज़ार करने लगा। इस दौरान एक दो बार उसको प्रगति घर में दिखाई दी पर उसने उसके साथ आँखें चार नहीं कीं। उसकी अन्तरात्मा उसको कुरेद रही थी पर उसके तन-मन में लड्डू फूट रहे थे। खाना खाकर और थोड़ी देर टीवी देखकर सब सोने लगे। कुछ ही देर में घर में सन्नाटा सा छा गया और सबके सोने की आवाजें आने लगीं।
शालीन को इसी का इंतज़ार था। जब उसे यकीन हो गया मयूरी और आकाश सो गए हैं, वह चुपचाप उठा और अपनी सुनियोजित योजना को अंजाम देने लगा। उसे पता था एक बार आँख लग जाने के बाद मयूरी गहरी नींद सोती है और ज्यादातर सुबह ही जागती है। आकाश कभी कभी रात को सुसु के लिए उठता है पर वह भी 3-4 घंटे के बाद। शालीन निश्चिंत हो कर फ्यूज़ बॉक्स की ओर गया और प्रगति के कमरे के आलावा बाकी सभी कमरों की बिजली के स्विच बंद कर दिए। इससे घर में घुप अँधेरा हो गया पर कमरों के हीटर और फ्रीज वगैरह चलते रहे। अब सोने वालों की आँख अगर खुल भी गई तो वे कुछ देख नहीं पाएंगे और जल्दी से हिल-डुल नहीं पाएंगे।
अब उसने मयूरी और आकाश के बेडरूम का दरवाज़ा भेड़ दिया और प्रगति के कमरे में आ गया। कमरा बंद करके उसने बाथरूम की बत्ती जला ली और उसका दरवाज़ा भी लगभग बंद कर दिया जिससे दरवाज़े की दरार से कमरे को रोशनी मिलती रहे। इतनी रोशनी उसके लिए काफी थी। उसे प्रगति का सोता (या सोने का नाटक करता) शरीर साफ़ दिख रहा था।
वह प्रगति के पास आ कर बैठ गया और इस बार बिना हिचक के उसके ऊपर से कम्बल हटा दिया। उसे यह जान कर ख़ुशी हुई की प्रगति ने घुटने तक पहुँचने वाली फ्रॉक पहन रखी थी और बनियान की जगह ब्रा थी। इस पोशाक में उसका काम आसान हो जायेगा। उसे प्रगति की समझदारी पर गर्व हुआ और वह समझ गया कि प्रगति भी शालीन के कल के दुस्साहस को ख़ुशी से स्वीकार कर चुकी है।
हीटर की गर्मी कमरे को गर्म किये हुई थी और प्रगति के समीपन ने शालीन को गर्म कर दिया था। शालीन ने अपने हाथ हीटर से गर्म करके प्रगति की टांगों पर फेरने शुरू किये। उसके तलवों का रगड़ कर गरम किया और पांव की उँगलियों को मसला। फिर ऊपर आते हुए घुटने से नीचे की टांगों को सहलाने लगा और बाद में घुटनों की मालिश की। प्रगति आराम से आँखें बंद किये लेटी हुई शालीन की हरकतों का मज़ा ले रही थी।
वैसे शालीन को यह तो पता चल गया था कि प्रगति उसके नटखट इरादों से वाक़िफ़ है पर यह नहीं जानता था कि वह उसके साथ किस हद तक जा सकता है। आखिर (उसकी नज़र में) वह एक नादान और अल्हड़ बालिका थी। उसे यह नहीं पता था कि प्रगति का कौमार्य लुट चुका है और वह यौन सुख से अपरिचित नहीं है। (कृपया अन्तर्वासना डॉट कॉंम पर “प्रगति का अतीत 1, 2, 3, 4 & 5” पढ़ें) वह तो उसके साथ ऐसे पेश आ रहा था मानो वह एक अबोध कन्या हो। वह उसके साथ जल्दबाजी करके उसको डराना नहीं चाहता था। वह उसकी कामुकता और यौन के प्रति उत्सुकता बढ़ाना चाहता था।
कुछ देर टांगें सहलाने के बाद उसने एक हाथ उसके सिर पर फेरना शुरू किया और दूसरे हाथ से घुटनों के ऊपर जाँघों के तरफ बढ़ने लगा। वह उसे गुदगुदा रहा था और पोले पोले हाथों से उसकी जाँघों के रोंगटे खड़े कर रहा था। प्रगति अब ज्यादा देर तक सोने का नाटक नहीं कर पाई क्योंकि उसकी गुदगुदी उसे हिलने-डुलने को मजबूर कर रही थी और उसके अंतर्मन से ऊह-आह निकलने को हो रही थी।
आखिर उसने आँखें खोल ही लीं और शालीन की तरफ झुकी झुकी नज़रों से देखते हुए अपनी आँखों पर अपनी कलाई का पर्दा डाल दिया। यह शालीन को इशारा था कि उसे कोई आपत्ति नहीं है और शालीन समझ गया।
शालीन ने ज्यादा समय बर्बाद ना करते हुए उसकी फ्रॉक को ऊपर की तरफ उठा दिया। प्रगति ने भी अपने कूल्हे ऊपर करके उसकी मदद की और फ्रॉक उसके स्तनों के ऊपर होकर गले तक आ गई। अब वह ब्रा और चड्डी में थी और उसने अपनी टांगें शर्म के कारण भींच लीं। शालीन ने उसकी टांगों को घुटनों से पकड़ कर अलग किया और आश्वासन के तौर पर उसके कन्धों को थपथपा दिया।
अब शालीन ने पोले पोले हाथों और उँगलियों से उसकी ब्रा के ऊपर से उसके मम्मों और पेट तथा जांघ के अंदरूनी हिस्सों को उकसाना शुरू किया। साथ ही उसने चड्डी के ऊपर से ही उसकी योनि के ऊपर भी हाथ फिराना शुरू कर दिया। दोनों को मज़ा आ रहा था और शायद दोनों ही प्रगति की ब्रा और चड्डी से जल्दी छुटकारा चाहते थे। दोनों उत्तेजित हो गए थे और उतावले और बेचैन भी। ऐसे में जब शालीन ने प्रगति को आधी करवट लिटा कर उसकी ब्रा के हुक ढीले किये तो मानो दोनों को राहत मिली। शालीन ने ब्रा एक तरफ रख दी और एक शर्मीली प्रगति को सीधा किया जो अपने हाथ आँखों पर से हटा कर अपने स्तनों पर ले आई थी। शालीन ने दृढ़ता के साथ उसके दोनों हाथ बगल में इस तरह कर दिए मानो उन्हें वहाँ से ना हिलाने का आदेश दे रहा हो। प्रगति इन मामलों में अब काफ़ी समझदार थी और उसने अपने हाथ परे कर लिए।
शालीन को प्रगति के यौवन भरे, मांसल, छरहरे और गदराये हुए स्तन बहुत मादक लगे। उनके अहंकारी चुचूक शालीन को निमंत्रित भी कर रहे थे और चुनौती भी दे रहे थे। शालीन ने कितने सालों से ऐसे मदभरे और कमसिन स्तन नहीं देखे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था पहले वह उन्हें छुए या मुँह में ले। उसने दुविधा दूर करते हुए, एक को मुँह में और एक को हाथ में ले लिया और सीधा स्वर्ग का अनुभव करने लगा।
वैसे अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुए होंगे पर इतने सुडौल, लचीले और उभरे हुए थे कि शालीन उन्हें छू और चूस कर फूला नहीं समा रहा था। एक भूखे बच्चे की तरह उसके चूचे चूसने लगा और दूसरे को अपनी हथेली से गोल गोल घुमाने लगा। एक स्तन पर कड़ा प्रहार और दूसरे पर कोमल स्पर्श का विरोधाभास प्रगति को विस्मय में डाल रहा था। शालीन ने आपे से बाहर हो कर जब उसकी चूची को काटने की कोशिश की तो प्रगति ने अनायास अपना स्तन उसके मुँह से निकाल लिया। साथ ही उसके मुँह से एक दर्द की ऊई.. निकल गई।
शालीन को जब अपनी करतूत का आभास हुआ तो उसने तत्काल प्रगति को हार्दिक संवेदना ज़ाहिर की और अपने कान पकड़ने का इशारा किया। प्रगति को मालूम था कि शालीन जान बूझ कर उसे दर्द नहीं पहुँचा रहा था पर यौन-वेग में ऐसा हो जाता है। तो उसने शालीन को कान पकड़ने से मना करते हुए सहज भाव से उसका सिर खींच कर अपने दूसरे स्तन के पास ले आई। शालीन ने प्रगति को आँखों ही आँखों में आभार प्रकट किया और आँखों के सामने परोसे हुए आकर्षक व्यंजन को भोगने लगा। जिस चूची को उसने यौनावेश में काट सा लिया था उसे प्यार से सहला कर मानो मना रहा था। प्रगति को शालीन का बर्ताव अच्छा लगा।
कुछ देर स्तनपान करने के बाद शालीन का चंचल मुँह अलग स्वाद की कामना करने लगा। उसने स्तन से मुँह उठा कर सीधा प्रगति के लरजते और रसीले होटों पर रख दिया। उसने यह नहीं सोचा था कि वह प्रगति का चुम्बन लेगा पर उसके मनमोहक आचरण को देखकर उससे रहा नहीं गया और उसने सच्चे प्यार की मोहर प्रगति के होटों पर लगा ही दी। प्रगति थोड़ी अचंभित तो हुई पर उससे ज्यादा उसे गौरव का अहसास हुआ। शालीन जैसे उच्च अधिकारी का चुम्बन उसके लिए बहुत मायने रखता था। शरीर को हाथ लगाना या सम्भोग करना लड़की को इतना मान नहीं देता जितना होटों पर दिया हुआ प्यारा चुम्बन। यह वासना और प्रेम में फ़र्क़ दर्शाता है।
अब शालीन ने प्रगति के कपड़े उतारने का अभियान जारी किया। प्रगति ने निर्विरोध उसका सहयोग किया और शीघ्र ही वह पूरी तरह निर्वस्त्र हो गई। शालीन के चुम्बन से मिले गौरव और उसके हाथों की हरकत से प्रगति का शरीर काफी रोमांचित हो चुका था और प्रमाण स्वरुप उसकी योनि काफी भीग गई थी। उधर प्रगति की नंगी काया को देख कर शालीन का लिंग अपनी शालीनता त्याग कर तामसिक रूप धारण करने लगा था। उसने अहतियात के तौर पर कमरे का दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दिया और अपने कपड़े उतार कर प्रगति के पास आ गया।
प्रगति ने पहली बार शालीन का नग्न शरीर देखा और शरमा कर अपना मुँह फेर लिया। पर उसने छोटी सी झलक में ही शालीन के लिंग के आकार और उसके बाकी शरीर को देख लिया था। उसे यह देख कर अच्छा लगा कि शालीन अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखता होगा क्योंकि इतनी उम्र होने पर भी वह हृष्ट-पुष्ट था। उसके अंग तंदुरुस्त लग रहे थे, उसके सीने पर मुलायम बाल थे, पेट सपाट था और लिंग के आस-पास के बाल कतरे हुए थे। हालाँकि, वह कोई पहलवान या फिल्मी हीरो नहीं लग रहा था पर एक निरोग और स्वस्थ युवक समान ज़रूर नज़र आ रहा था। प्रगति उसको देख कर खुश हो गई। उसे ऐसा लगा शायद शालीन मास्टरजी के मुकाबले बहतर प्रेमी साबित होगा। (मास्टरजी के बारे में जानने के लिए “प्रगति का अतीत” कहानी पढ़िए) उसे ऐसा लगा मानो शालीन उसके साथ ज्यादा ज़ोरदार सम्भोग कर पायेगा।
शालीन ने प्रगति की योनि को छू कर देखा कि वह उसके साथ समागम के लिए पूरी तरह तैयार है। आम तौर पर वह सम्भोग के पहले ज्यादा से ज्यादा देर तक लड़की को उत्तेजित करने की क्रिया करता था पर आज उसके पास समय कम था। शालीन को पता था कि हर लड़की को यौन में उतना ही मज़ा आता है जितना कि मर्दों को। पर सदियों के सामाजिक बंधनों और संस्कारों की बंदिशों ने नारी-जाति को यौन आनंद का इज़हार करने पर पाबंदी सी लगा रखी है। उनको यह जताया जाता है कि यौन सुख का दिखावा सिर्फ बुरे आचरण की लड़कियाँ ही करती हैं। अच्छे संस्कारों वाली लड़कियाँ यौन ज्ञान से अपरिचित होती हैं और यौन सुख का आनंद वे बेधड़क नहीं ले सकतीं। यह हमारे समाज की मान्यताओं की विडम्बना है।
पर शालीन चाहता था कि वह जब किसी लड़की के साथ यौन करे तो उसको पूरा सुख दे और उसको मज़ा लेने का पूरा अधिकार हो। वह अपनी यौन-संगिनी की ख़ुशी की किलकारी सुनना चाहता था। उसने कहीं यह भी पढ़ा था कि लगभग हर लड़की यौन चरमोत्कर्ष (परम यौन आनन्द) को पाने की क्षमता रखती है बशर्ते उसे ठीक से उत्तेजित और उसके साथ धैर्य से सम्भोग किया जाये। आज वह इसी बात को आजमाना चाहता था। वह लिंग योनि सम्भोग के माध्यम से प्रगति को चरमोत्कर्ष प्राप्त करवाना चाहता था।
इसी आशय से उसने उत्सुकता से तपती प्रगति के नग्न बदन को अपने आलिंगन में जकड़ लिया और उसके होटों को चूमते हुए अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी। प्रगति ने भी शालीन को कस कर पकड़ लिया और उसके मुँह का अपनी जीभ से मुआयना करने लगी। समय की कमी होने के कारण शालीन ने जल्दी जल्दी उसके पूरे जिस्म पर हाथ फेरा और उसको पीठ के बल लिटाने लगा। पर प्रगति ने नीचे झुक कर उसके लिंग को अपने मुँह में ले लिया। शालीन इसके लिए तैयार नहीं था वह पहले से ही उत्तेजित था और ऊपर से प्रगति के आकस्मिक हमले से उसके नियंत्रण को झटका लगा। उसके लाख ना चाहने के बावज़ूद वह एक-दो मिनट में ही अपना संतुलन खो बैठा और प्रगति के मुँह से लिंग निकालने का प्रयत्न करने लगा, वह उसके मुँह में वीर्योत्पात नहीं करना चाहता था।
पर प्रगति का इरादा कुछ और ही था उसने उसके लिंगमुख को अपने होटों में इस तरह दबा लिया कि वह बाहर नहीं आ पाया। इससे शालीन की व्याकुलता और बढ़ गई और वह और भी जल्दी और वेग के साथ वीर गति को प्राप्त होने लगा। उसका करीब दो हफ्ते का संजोया हुआ रस प्रगति के मुँह में बरसने लगा। वीर्य की हर फुहार के साथ शालीन का शरीर झकझोर रहा था। कोई पांच-छः पिचकारियों के बाद शालीन और उसका लिंग शांत हुआ। शालीन के जीवन में पहली बार किसी ने उसका लिंग-पान किया था। वह उत्कर्ष के शिखर पर था और उसने कृतज्ञता से प्रगति को उठा कर उसके वीर्य से सने होटों को चूमते हुए अपने गले लगा लिया। वे कुछ देर तक ऐसे ही रहे और फिर पकड़ ढीली करके बिस्तर पर लेट गए।
शालीन को बरसों से यह कामना थी कि कोई उसके लिंग को चूसे पर पत्नी के अरुचि के कारण ऐसा नहीं हो पाया था। आज जब वह बिल्कुल इसके लिए तैयार नहीं था, प्रगति ने न केवल उसका लिंग मुँह में ले लिया, बल्कि उसका रस-पान भी कर लिया। तो शालीन को तो मानो स्वर्ग मिल गया था। अब तो प्रगति को तृप्त करने के लिए शालीन और भी दृड़ संकल्प हो गया। वह जल्दी से जल्दी अपने मर्दांग को दोबारा आवेश में लाना चाहता था जिससे वह प्रगति का ऋण तत्काल चुका सके। प्रगति मानो शालीन की मनोस्थिति भांप गई थी। उसने शालीन के भाले में जान डालने के उद्देश्य से उसको हाथों में ले लिया और हौले-हौले सहलाने लगी।
कुछ देर में उसने शालीन को पीठ के बल लिटा कर उसके ऊपर आसन जमा लिया अपने मुँह और जीभ से उसके निम्नान्गों को चाटने लगी। प्रगति की पीठ शालीन की तरफ थी जिससे जब वह झुकती तो उसकी गांड शालीन को दिखाई देती। कभी कभी उसकी जांघों के बीच से उसके डोलते हुए स्तन भी दिख जाते। प्रगति की मौखिक क्रिया और उसके मादक अंगों के दृश्य से शालीन के शिथिल लिंग को मूसल बनने में ज्यादा देर नहीं लगी। जैसे ही उसके लंड में जान आई उसने प्रगति को अपने ऊपर से हटा कर पीठ के बल लिटा दिया और स्वयं उसके ऊपर आ गया। वह अपने कड़कपन को खोना नहीं चाहता था। बिना समय गंवाए उसने प्रगति की योनि पंखुड़ियों को अपने लिंग-नोक से रगड़ना शुरू किया। साथ ही अपने मुँह से उसके कसे हुए दूधिया टीलों पर आक्रमण कर दिया। उसकी जीभ का सामना उसके स्तनों पर विराजमान अहंकारी चुचूकों से हुआ जो किसी के सामने नतमस्तक नहीं होना चाहती थीं। शालीन की जीभ चोंच-समान चूचियों के चारों तरफ लपलपाने लगी।
उधर नीचे उसका लंड-शीर्ष धीरे धीरे जोर लगाते हुए प्रगति के योनि कपाट खोलने की चेष्टा कर रहा था। प्रगति ने मदद करते हुए अपनी जांघें थोड़ी और खोल दीं। शालीन का सुपारा योनि की कोपलों के ऊपर हल्का-हल्का वार कर रहा था और बीच बीच में उसके योनि-मुकुट पर टपकी मार रहा था।
प्रगति की ओखली शालीन के मूसल के लिए बिलकुल तैयार थी। उसके निम्न होटों से रस फूट चुका था जिससे गुफ़ा का रास्ता चिकना हो गया था। शालीन के दंड का मुकुट भी इस रस में भीग गया था जिस से जब वह प्रगति की सुरंग पर हल्का वार करता तो फिसलन के कारण अन्दर जाने लगता। पर शालीन अभी प्रवेश नहीं करना चाहता था। उसका उद्देश्य प्रगति को परमोत्कर्ष तक ले जाने का था। वह शनैः शनैः उसको कामुकता के शिखर पर ले जाना चाहता था। इसके लिए आत्म-नियंत्रण और धीरज की ज़रुरत थी। उसने अपने मुँह का ध्यान स्तनों से हटा कर प्रगति के पेट पर केन्द्रित किया। रेशम से रोएँ से ढका सपाट पेट शालीन के गालों को जब लगा तो उसकी हलकी दाढ़ी से प्रगति को बहुत गुदगुदी हुई। उसने अपने आप को इधर उधर हिलाया जिससे शालीन के लंड का सुपारा अपने लक्ष्य से हटकर यहाँ वहां लगने लगा।
शालीन ने गुदगुदाना बंद किया और प्रगति को काबू में करके फिर से उसकी म्यान में अपनी तलवार की नोक डालने लगा। शालीन ने तय कर लिया था कि वह जल्दबाजी में लंड को पूरा नहीं घोंपेगा। वह लगातार करीब आधा या एक इंच तक चूत में लंड डाल कर उसे मानो छेड़ रहा था। प्रगति की लालसा बढ़ रही थी और वह सांप रूपी लंड को जल्दी से उसके बिल में पहुँचाना चाहती थी। उसने अपनी टांगें और खोल दीं और शालीन के छोटे प्रहारों का जवाब अपने कूल्हे उठा उठा कर देने लगी जिससे उसका लट्ठ ज्यादा अन्दर चला जाये। पर शालीन होशियार था। उसने प्रगति को अपने प्रयास में सफल नहीं होने दिया। बस एक इंच तक का प्रवेश करता रहा जिससे प्रगति की योनि व्याकुल से व्याकुलतर होती गई। प्रगति अब किसी तरह अपनी चूत को लंड से भरना चाहती थी। अब शालीन ने प्रगति का हाथ लाकर उसकी एक ऊँगली उसके योनि-मटर पर रख दी और उसको हलके से सहलाने का इशारा कर दिया। प्रगति अपनी कलिका को सहलाने लगी। इससे उसकी उत्तेजना और भी बढ़ गई और वह कसमसाने लगी।
अब शालीन ने ब्रह्मास्त्र छोड़ते हुए अपनी तर्जनी ऊँगली को मुँह में गीला करके प्रगति की गांड में डाल दी और धीरे धीरे उसे अन्दर-बाहर करने लगा। प्रगति को इसकी अपेक्षा नहीं थी और वह सिहर उठी। उसके शरीर में मादकता का तूफ़ान उठने लगा और उसके धैर्य का बाँध टूटने लगा। वह हर हालत में शालीन के लंड को मूठ तक अपने कुंए में डलवाना चाहती थी। उसने अपने कूल्हों का प्रहार बढ़ाया और अपनी आँखों से अपनी इच्छ्पूर्ति की मानो भीख सी मांगने लगी। शालीन को इसी मौक़े का इंतज़ार था। उसने अपनी बरछी को पूरा बाहर निकाला और फिर पूरे वेग से उसे जड़ तक प्रगति की व्याकुल चूत में घुसेड़ दिया। जैसे बरसों से तपते रेगिस्तान को बारिश की झड़ी मिल गई हो, प्रगति की योनि लंड को पूरा अन्दर पाकर मानो मोक्ष को प्राप्त हो गई। उसके पूरे जिस्म में एक मरोड़ सी आई और वह एक ही पल में चरमोत्कर्ष को न्यौछावर हो गई। करीब आधे मिनट तक उसका जिस्म उत्कर्ष शिखर से उत्पन्न झटकों का सामना करता रहा और फिर धीरे से आनंद के सागर में डूब गया।
शालीन अपनी सफलता पर खुश था। प्रगति उसे अच्छी लग रही थी और उसके आनंद से उसे ख़ुशी मिल रही थी। उसे लगा कि उसने प्रगति का लिंग-पान वाला ऋण चुका दिया है। जब प्रगति को होश आया तो शालीन ने धीरे धीरे अपना पिस्टन फिर से चालू किया। उसका लंड इस दौरान थोड़ा शिथिल हो गया था पर एक दो झटकों के साथ ही अपनी पूरी मस्ती में आ गया। अब वह निश्चिन्त हो कर लम्बे लम्बे वार करने लगा। प्रगति को इतना यौन सुख पहले कभी नहीं मिला था। वह धन्य हो गई थी और उसका रोम रोम शालीन का आभारी हो रहा था। अब वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार थी। शालीन के झटकों से मेल खाते हुए वह अपने चूतड़ उठा रही थी जिससे लंड ज्यादा से ज्यादा गहराई तक अन्दर जा सके। उसको समझ नहीं आ रहा था कि किस तरह वह शालीन को और अधिक मज़े दिलवाए। उधर शालीन एक बार फव्वारा छोड़ चुका था तो उसको जल्दी स्खलन का डर नहीं था। वह कभी तेज़ और कभी धीमी गति से तथा कभी हल्के तो कभी गहरे वारों से प्रगति की चूत-सेवा कर रहा था।
प्रगति ने सोचा शालीन को और अधिक खुश करने के लिए वह अपनी गांड उसे भेंट कर दे। पर उसे डर था कि कहीं शालीन उसके इस आचरण से उसे गलत ना समझ ले। पर अपनी इज्ज़त की परवाह ना करते हुए उसने पहल कर ही दी। जब शालीन अपने झटकों में थोड़ा रुका तो प्रगति ने अपने आप को उससे पृथक किया और इससे पहले कि शालीन कुछ सोचे उसने उसके लंड को मुँह में लेकर अपने थूक से अच्छी तरह गीला कर दिया। फिर थूक उँगलियों पे लेकर अपनी गांड के छेद में और उसके आस-पास लगा दिया। शालीन बिलकुल हतप्रभ रह गया। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसके जीवन की दो सबसे बड़ी मनोकामनाएँ एक ही दिन में पूरी हो जाएँगी। गांड मारने की लालसा उसे ना जाने कब से थी। उसने सोचा भी था कि किसी दिन वह प्रगति को इसके लिए मनाने की कोशिश करेगा पर कुंआ खुद प्यासे के पास आएगा इसकी उम्मीद नहीं थी।
उसका लंड प्रगति की गांड के छेद को देख कर एकदम तन गया। उसने गांड मारने की विधि अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रखी थी और वह जानता था कि केवल थूक से गांड में प्रवेश मुमकिन नहीं है। और अगर होगा भी तो प्रगति को बहुत दर्द होगा। तो उसने उठ कर अलमारी से के वाय जेली की टयूब निकाल ली और प्रगति को दिखाई। प्रगति ने सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी और गांड मरवाने के लिए उपयुक्त कुतिया-आसन में आ गई। शालीन ने उँगलियों में जेली लगा कर उसकी गांड में अच्छी तरह लगा दी और फिर एक ऊँगली अन्दर डाल कर उसके छेद को ढीला करने लगा। प्रगति को गांड मरवाने का अनुभव था पर शालीन के लिए यह पहला अवसर था। तो प्रगति ने उसको इशारों से अनुदेश देने शुरू कर दिए। अपनी गांड की अंदरूनी मांसपेशी ढीली करते हुए उसने शालीन की ऊँगली पूरी अन्दर डलवा ली। फिर दो उँगलियाँ और बाद में तीन उँगलियों से गांड में प्रवेश करवा लिया।
इतना होने के बाद प्रगति ने शालीन के लंड के ऊपर अच्छे से जेली लगा दी। उसका लंड वैसे ही अच्छे से तना हुआ था। फिर उसने शालीन को उसकी गांड में अच्छे से जेली लगाने के लिए इशारा किया। जब यह हो गया तो प्रगति ने कुतिया आसन में आकर अपने चूतड़ खोल लिए और अपना सिर बिस्तर पर रख कर शालीन को प्रवेश करने का इशारा किया। शालीन ने प्रगति के कूल्हों की ऊँचाई को इस तरह व्यवस्थित किया जिससे उसका लंड आराम से उसकी गांड के छेद तक पहुँच जाये। फिर उसने एक नौसिखिये की तरह अपना लंड गांड में डालने का प्रयत्न किया। पर वह फिसल गया। जब एक दो और प्रयत्न भी विफल रहे तो प्रगति ने पलट कर शालीन को चिंता नहीं करने का संकेत किया और एक बार फिर जेली का लेप दोनों के गुप्तांगों पर कर दिया। उसने शालीन को कुछ नहीं करने का अनुदेश दिया और फिर से कुतिया आसन में आ गई। उसने अपनी गांड को शालीन के लंड के सुपारे के साथ लगाया और धीरे धीरे पीछे की तरफ जोर लगाने लगी। जब सुपारा छेद में घुसने को हुआ तो प्रगति ने गांड को थोड़ा ढीला किया और सुपारे को अन्दर ले लिया।
सुपारे के अन्दर जाते ही शालीन की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और वह चोदना शुरू करने वाला था कि प्रगति ने उसे रुकने का इशारा किया।
कुछ देर बाद प्रगति ने पीछे की ओर धक्का देना शुरू किया। लंड थोड़ा और अन्दर गया और रुक गया। अब प्रगति ने एक बार अपनी गांड की अंदरूनी मसल को ढीला करते हुए जोर से पीछे को धक्का मारा और लंड लगभग पूरा अन्दर चला गया। इसमें प्रगति की हल्की सी चीख निकल गई पर उसने पीछे की तरफ दबाव बनाए रखा और लंड को पूरा अन्दर डलवा लिया। शालीन को अत्यंत ख़ुशी हो रही थी। उसने खरबूजे को चाकू पर गिरते देखा था। उसका लंड प्रगति की तंग गांड में अन्दर तक फंसा हुआ था। गांड इतनी तंग थी कि लंड हरकत करने लायक नहीं था। पर इस गिरफ़्तारी में भी शालीन को मज़ा आ रहा था। उसने धीरे धीरे हरकत करनी शुरू की। पहले थोड़ा सा और फिर थोड़ा और उसका लंड अन्दर बाहर होने लगा। प्रगति को भी मज़ा आ रहा था। उसने भी अपने आप को आगे पीछे करके गांड मरवाना शुरू किया। बहुत लोगों में यह भ्रम है कि लड़कियों को गांड मरवाना अच्छा नहीं लगता। सच तो यह है कि अगर ठीक से किया जाये तो कई लड़कियों को गांड मरवाने में चुदवाने से ज्यादा मज़ा आता है। प्रगति भी ऐसी लड़कियों में से एक थी।
शालीन को लगा कि जेली सूख सी रही है और घर्षण में मज़ा नहीं आ रहा तो उसने लंड सुपारे तक बाहर निकाल कर उसकी छड़ पर और जेली लगा ली। अब गांड मारने में आसानी हो गई। उसने अपने वारों की रफ़्तार और गहराई बढ़ाई और लगभग चुदाई के बराबर अन्दर-बाहर करने लगा। उसके इस आक्रमण से प्रगति को और भी मज़ा आने लगा और उसने भी हिचकोले लेने शुरू कर दिए। शालीन ने प्रगति की दोनों चुटिया पकड़ ली और उनको अपनी तरफ खींच खींच कर गांड मारने लगा मानो घुड़सवारी कर रहा हो।
कुछ देर बाद उसने प्रगति को आगे की तरफ धक्का देते हुए उसको कुतिया आसन से निकाल कर पेट के बल लिटा दिया। उसके चूतड़ों के नीचे तकिया रख कर उन्हें ऊपर उठा दिया और इस अवस्था में उसको पेलने लगा। यह आसन उसको बहुत ही मज़े दे रहा था क्योंकि इसमें उसका पूरा अगला शरीर प्रगति के पूरे पिछले शरीर के संपर्क में था। लंड को घर्षण भी अच्छा मिल रहा था। शालीन ने अपने हाथ प्रगति के नीचे से डालते हुए उसके बोबों को पकड़ लिया। अब उसके हाथों में स्तन थे और उसका लंड उसकी गांड में पूरा घुसा हुआ था। उसका सीना प्रगति की पीठ पर रगड़ खा रहा था और उसकी जांघें प्रगति के चूतड़ों को मल रहीं थीं। शायद इसी को स्वर्ग कहते हैं।
इस आसन में प्रगति कुछ ज्यादा नहीं कर पा रही थी पर शालीन अपनी मन मर्ज़ी कर रहा था। उसको गांड मारने में बहुत मज़ा आ रहा था। अब उसका फव्वारा दोबारा छूटने को हो रहा था। उसने अपने झटके और लम्बे कर दिए और लगभग पूरा लंड बाहर निकाल निकाल कर अन्दर घोंपने लगा। उसका लावा उमड़ने वाला था पर शालीन यह चरम आनंद के क्षण और बढ़ाना चाहता था। उसने अपनी पूरी आत्मशक्ति का उपयोग करते हुए अपने स्खलन पर नियंत्रण बनाये रखा और गांड मारता रहा।
प्रगति को यह आसन एक समर्पण सा लग रहा था क्योंकि वह कुछ नहीं कर सकती थी। उसका पूरा जिस्म शालीन ने मानो दबोच रखा था। वह शालीन को मज़ा दे रही थी और इसी में उसको मज़ा आ रहा था। यह अलग बात है कि गांड में भी उसे अत्यधिक आनंद की अनुभूति हो रही थी। आखिर वह क्षण आ ही गया जब शालीन अपनी परम कोशिश के बाद भी अपने चरमोत्कर्ष को और टाल नहीं पाया और उसने एक आखरी ज़ोरदार वार किया और अपनी पिचकारी प्रगति की गरम गांड में छोड़ दी।
फिर वह बहुत देर तक प्रगति के ऊपर ऐसे ही लेटा रहा जब तक उसका तृप्त लंड अपने आप गांड से बाहर नहीं आ गया। फिर उसने प्रगति को पलट कर उसके ऊपर पुच्चियों की बौछार कर दी !
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