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मेरे मित्र ने मुझे कुछ ही दिन Antarvasna पहले अन्तर्वासना के बारे में कहा था। पढ़कर बहुत मज़ा आया और अपना भी अनुभव आप लोगों तक पहुँचाने का मन किया।
मुझमें एक आदत है- कोई भी लड़की मेरी तरफ़ देखती है तो दूसरे ही पल मैं उसके वक्ष को देखता हूँ और तुरन्त ही नीचे चूत की तरफ़ देखता हूँ और दांतों से होंट काटते हुए उसकी आँखों में देखता हूँ। अगर वो फ़िर मुझे देखती है तो जान जाता हूँ कि काम की है और उसी पर थोड़ा लाइन मारता हूँ।
तो दोस्तो, बात एक साल पहले की है। हमारे पड़ोस में सामने वाले घर में अपने रिश्तेदार के यहाँ एक नई लड़की रहने आई। उसका नाम रोमा है, 19 साल की पजाबी लड़की थी। दिखने में किसी हिरोइन से कम नहीं थी। जो भी देखता था तो देखता रह जाता था। पर बहुत ही घमन्डी थी। और दोस्तो, मुझे घमन्डी लड़की को चोदने को बहुत मन करता है। जब से आई, उसे चोदने का मन बना लिया था।
नसीब से हम दोनों का बेडरूम फ़स्ट-फ़्लोर पर ही था और दोनों की गैलरी भी आमने-सामने ही थी। दो तीन दिन निकल गये वो जरा भी इधर-उधर नहीं देखती थी।
एक दिन शाम को मेरी तबियत ठीक न होने के कारण मैं जल्दी ही घर आ गया था और सोने के लिये बेडरूम में आ गया तो देखा तो रोमा अपनी गैलरी में खड़ी थी। मैंने सोचा- मौका अच्छा है।फ़िर तुरन्त ही अपना पैन्ट उतार के, वो मुझे देख सके, उस तरफ़ मुँह करके अपने लण्ड को तेल लगा-लगा कर मालिश करने लगा।
जैसे ही उसने मुझे नंगा देखा, तुरन्त अपने कमरे में भाग गई। दोस्तो, मेरा लण्ड अगर किसी भी औरत या लड़की ने देखा तो चखने का मन बन ही जाता है। फ़िर मैंने खिड़की के काँच से देखा तो पता चला कि वो दरवाजे के पास कुर्सी डाल कर चुपके से मेरे कमरे में झांक रही थी। मैंने सोचा- मेरा काम हो गया।
फ़िर मैं भी कुर्सी ले कर दरवाजे के पास जाकर बैठ गया और तेल लगाकर मुठ मारने लगा। वो छुप-छुप के देख रही थी और शरमा रही थी और देख भी रही थी। उसे जरा भी पता नहीं था कि मैं जानबूझ के उसे दिखा रहा हूँ। फ़िर उसे और भड़काने के लिये ही मैंने मेरी भाभी से पानी लाने को कहा।
वो तो दंग रह गई। एक तो मैं पूरा नंगा था और भाभी को बुला रहा था। भाभी जैसे ही पानी लेकर आई, मुझे देखकर बोली- शरम नहीं आती? जब देखो तब लेकर बैठ जाते हो !
मैं उठ कर भाभी के पास गया और उसे पीछे से पकड़ लिया और मस्ती करते करते ठीक दरवाजे के पास लाकर भाभी के पीछे से ब्लाउज के उपर से ही भाभी के स्तन दबा रहा था। भाभी मुझे डाँटते हुए मुझसे छुटने की कोशिश कर रही थी और बोल रही थी- रात को आऊँगी ! जी भर के चोद लेना ! और कहने लगी- छोड़ो, कोई देख लेगा।
मुझे तो दिखाना ही था ! भाभी को कहाँ मालूम मेरी योजना। यह सोच कर मन ही मन मैं मुस्कुराने लगा और उनके बाल पकड़ के पीछे से चूमने लगा। हमारा यह नज़ारा देख कर रोमा और पगल हो रही थी और घूर घूर कर देख रही थी। मैं धीरे धीरे भाभी के स्तनों को दोनों हाथों से जोर जोर दबा रहा था। अब भाभी को मजा आ रहा था और मेरा विरोध करना बन्द कर दिया।
फ़िर मैंने एक हाथ से उसकी साड़ी को ऊपर उठाया और उसकी पैन्टी में हाथ डाल कर भाभी की चूत में उंगलियाँ डाल कर मसल मसल कर मुठ मारने लगा। थोड़ी देर में भाभी की साड़ी खुल गई तो मैंने पैन्टी भी उतार दी।
एक हाथ दरवाज़े पर टिका दिया और पीछे से अपना लण्ड भाभी की चूत के पास लाकर आगे से चूत को लगा कर ऊपर नीचे करने लगा। भाभी बेड पर ले जाने को बोल रही थी। मैंने मना किया और एक झटका मार दिया तो आधा लण्ड अन्दर चला गया। एन्गल ऐसा था कि चूत में घुसा हुआ आधा लण्ड रोमा को साफ़ दिखाई दे रहा था।
और रोमा को देख कर मैं भी जोश में आने लगा और भाभी को गपागप चोदे जा रहा था। ऊपर से दोनों हाथों से दोनों चूचियों को बेरहमी से दबा रहा था और साथ में भाभी के होंठों को चूस-चूस के मजे ले रहा था। हम दोनों के चक्कर में भाभी को मजा आ रहा था और मुँह से तरह तरह की आवाजे निकाल रही थी- आऽऽ आआ अह, या आह्ह, उफ़्फ़, बस, छोड़ो मुझे, जाने दो, कोई देख लेगा !
भाभी की आवाजों से रोमा भी उत्तेजित होने लगी। बीच बीच में लण्ड बाहर निकाल के अन्दर डाल रहा था। मलाई से लोट-पोट लण्ड देख कर रोमा से रहा नहीं जा रहा था। लण्ड अच्छा दिख रहा था। फ़िर झटके तेज करके लगा रहा था। दस मिनट तक एसे ही चोदता रहा, इतने में भाभी की चूत से पानी निकल गया तो वो मेरे हाथ से छुट गई और अपने कपड़े उठा के वहाँ से चली गई।
फ़िर मैंने रोमा के सामने आकर लण्ड हाथ में लेकर मुठ मार-मार कर पानी निकाल दिया। जैसे ही मेरे लण्ड से पानी निकला, तो पानी जैसे उसके मुँह में गिरा हो, उस तरह रोमा अपना थूक निगल रही थी। इतने में रोमा के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी तो वो उठकर गई और मैं भी छुप गया।
दूसरे दिन भाभी ने मुझसे चायनीज़ खिलौनों की दुकान से फ़ाईबर का लण्ड मंगवाया। भाभी को शादी हुई दो साल हुए, मेरे भैया से उनको चूत का सुख नहीं मिलता था। उसे अब तक भैया ने कम, मैंने ज्यादा चोदा है।
तो रात को 9-30 बजे जब मै बडरुम में गया तो देखा कि रोमा अपने कमरे में बैठकर टी वी देख रही थी और थोड़ी-थोड़ी देर बाद मेरे कमरे की तरफ़ देख रही थी। मैं समझ गया कि उसे चूत का खेल फ़िर से देख्नना है। फ़िर मुझे भी भाभी को फ़ायबर के लण्ड का मज़ा देना था।
जैसे ही मैंने भाभी को आवाज़ दी, रोमा ने अपने कमरे की लाइट बन्द कर दी और अपने बेड पे जाकर खिड़की में नजर टिका कर बैठ गई। पर टीवी चालू होने के वजह से साफ़ पता चल रहा था कि वो मुझे देख रही है।
घर पर आज भी मेरे और भाभी के अलावा कोई नहीं था। इतने में भाभी दूध ले कर ऊपर आ गई। भाभी को भी घर पर कोई न होने का पूरा मजा लेना था। आते ही वो भी सीधा बेड पे आ गई। मैंने सारे कपड़े उतार दिए और उनके बाल खुले करके लेटा दिया। फ़िर भाभी टांगें ख़िड़की की तरफ़ करके उसकी चूत चाटने लगा। फ़िर उंगलियों से मसलने के बाद जब चूत पूरी तरह गीली हो गई तो मैंने फ़ायबर का लण्ड भाभी की चूत में धीरे से घुसेड़ दिया।
घुसते ही भाभी चिल्लाई। रोमा को भी कुछ नया दिख रहा था। जैसे ही पूरा लण्ड अन्दर गया, भाभी और चिल्लाने लगी, क्योंकि वो काफ़ी मोटा था और लम्बा भी था।
मैं थोड़ी-थोड़ी देर में रोमा को देख रहा था। अब वो पूरी तरह से पलट कर हमें देख रही थी। फ़ायबर के लण्ड से थोड़ी देर चोदने के बाद मैंने भाभी को उल्टा करके कुतिया बनाया और भाभी की गाण्ड में थूक लगा के गीला कर दिया फ़िर धीरे से अपना लण्ड अन्दर घुसेड़ दिया। भाभी दर्द के मारे आहें भर रही थी। धीरे-धीरे भाभी की गाण्ड खुल गई। फ़िर मैं उठ-उठ कर चोदने लगा। तो भाभी का हाल- न कहा जाये न सहा जाये ! ऐसा था।
थोड़ी देर गाण्ड चोदने के बाद भाभी को उठा के बाल पकड़ कर मुँह में लण्ड दिया। वो लण्ड चूसने में माहिर है। मुँह से ही कभी कभी लण्ड ढीला करके पानी निकाल देती थी। थोड़ी देर बाद भाभी को सीधा करके दस बारह झटके मारते ही भाभी झड़ गई और ऐसे ही पलंग पर सो गई।
तब मैंने लाइट बंद कर दी और चुपके से दरवाजे से होकर गैलरी से कूद कर रोमा की गैलरी में गया और दरवाजे से अंदर जा के सीधा लाइट चालू किया जोर से कहा- क्या देख रही हो कब से?
रोमा एकदम डर गई। वो पूरी नंगी थी। उसकी उंगलियाँ चूत में थी। मैं उससे पास गया फ़िर भी वो उठी नहीं। उसे लगा कि उसकी चोरी पकड़ी गई। मौके का फ़ायदा उठा के मैंने उसे पकड़ लिया और उसे चूमने लगा। वो कुछ भी नहीं बोल पा रही थी।
फ़िर ज्यादा देर न करके उसे लिटा कर उसकी चूत में उँगली डाली तो पता चला चूत पूरी गीली और एकदम कंवारी थी। मैं अपना लण्ड चूत के मुख पर रख कर ऊपर-नीचे घिसाता रहा और फ़िर जोर से एक झटका दिया तो आधा लण्ड अन्दर घुस गया।
रोमा जोर से चिल्लाई- ओ…मा…॥
फ़िर रोमा ने अपनी जांघें जकड़ ली दर्द के मारे ! मुझे हिलने नहीं दे रही थी। रोमा का ध्यान दर्द से हटाने के लिये मैं उसके स्तन मसल रहा था। एक साथ दोनों जगह का आनंद लेते लेते रोमा ने अपनी टांगें थोड़ी चौड़ी कर ली। मैंने भी मौका देखकर जोर से दो चार झटके दिए तो इस बार पूरा लण्ड रोमा की चूत को फ़ाड के अंदर चला गया।
रोमा के मुँह से उप्स्स्स्स्स की आवाज निकली। फ़िर उसके चाहने पर भी ना रुका ! गपागप रोमा की मस्त चूत को चोदता ही रहा। उसके मुँह से आवाज रुक नहीं रही थी- आहाह्ह्ह्ह उईईई माँ ! और 5 मिनट में रोमा स्खलित हो गई। दस बारह झटके लगा के मैंने भी पूरा का पूरा पानी अंदर ही छोड़ दिया और चुपचाप अपनी चड्डी पहनकर अपने कमरे में आ गया।
रात को चार बजे एक बार देखने गया तो रोमा अभी भी ऐसे ही सोई हुई थी। उसका नंगा बदन देख के मेरे मन को लगा कि फ़िर मौका मिले ना मिले, एक बार और चोद लेता हूँ।
और फ़िर चालू हो गया। दस मिनट चोद के फ़िर पूरा पानी अंदर ही छोड़ कर आ गया।
तीन दिन के बाद रोमा अपने शहर चली गई। लेकिन उसने मुझे फ़िर नहीं देखा। बीस दिन के बाद अचानक वो फ़िर से आई और रात को मुझे अपने कमरे में बुलाया। मैं खुशी से गया तो पता चला कि उसका मासिक जो 15 तारीख को आता था वो नहीं आया ! वो तो डर गई थी, यही बताने खास वो यहाँ आई थी। मैंने उसे दवाई दी तो उसका मासिक हो गया।
अब हमारी अच्छी दोस्ती हो गई, अपना मोबाइल नम्बर दे गई। महीने में एक बार उसे मिलने जाता हूँ तो चोद के ही आता हूँ।
मैं यह कहानी भी उसे पूछ कर ही लिख रहा हूँ।
मेरे दोस्तो, मेरी कहानी कैसी लगी जरूर बताना। Antarvasna
सबसे पहले तो मैं गुरूजी Antarvasna को धन्यवाद कहना चाहूँगा कि उन्होंने हमें अपने उदास और वीरान जीवन में अन्तर्वासना की रंगीनियाँ भरने का मौका दिया। मैं पिछले दो सालों से अन्तर्वासना को रोज़ ही देखता हूँ। मैं अन्तर्वासना का नियमित पाठक हूँ, मैंने कई कहानियाँ पढ़ी हैं और आज मैं उनसे प्रेरणा लेकर अपनी सच्ची कहानी बताने जा रहा हूँ।
मेरी यह कहानी सच्ची है और मेरे साथ बीते हुए पलों को मैं आप के साथ बाँटना चाहता हूँ।
पहले मैं अपना परिचय दे रहा हूँ : मेरा नाम शिमत है, दिल्ली का रहने वाला, 21 साल का, और मैं 5 फीट 7 इंच का हूँ। मेरा रंग गोरा है, मेरा लण्ड 8 इंच का है, मैं देखने में ठीक लगता हूँ।
बात उन दिनों की है जब मैं मेरे मामा के घर गया हुआ था। वैसे तो मैं मामा के घर जाकर सिर्फ़ मजे ही करता था मतलब सिर्फ खाना-पीना अपने में ही मस्त रहता था।
मैंने कभी भी किसी लड़की की आज तक चूत नहीं देखी थी और मैं चूत देखने को बहुत लालयित था। मैं सोचता था कि कभी मुझे चूत के दर्शन करने को मिलेंगे क्या ! और मैं मुठ मार लिया करता था।
मैं एक दिन मेरे मामा के लड़के के कमरे में बैठा टीवी देख रहा था और वहाँ पर मामा की बेटी भी बैठी थी कि अचानक एक पप्पी का दृश्य आ गया। मैं थोड़ा सा शरमा गया और दीदी उठ कर चली गई, मैं वहीं पर बैठा रह गया। थोड़ी देर बाद मैंने टीवी बंद कर दिया और मैं किचन में जाकर कुछ खाने को देख रहा था, दीदी भी वहीं थी।
दीदी हंस के बोली- क्या चाहिए?
मैंने कहा- दीदी, मुझे कुछ खाने को चाहिए !
दीदी बोली- मैं अभी कुछ बना देती हूँ !
तो मैंने कहा- आप क्या बनाएँगी ?
तो दीदी बोली- जो तू कहे !
तो मैं बोला- गाजर का जूस बना दो !
दीदी गाजर लेने के लिए नीचे झुकी तो मेरा ध्यान उनके स्तनों पर चला गया और मैं देखता ही रह गया। फिर मैं नजर चुरा के चला गया और बाहर निकल आया।
थोड़ी देर बाद दीदी जूस लेकर आई और बोली- तेरा जूस तैयार है !
मैंने जूस पी लिया, अपने कमरे में जा कर बैठ गया और कम्प्यूटर चला कर मैं इंटरनेट पर गेम खेलने लगा। पर मेरा ध्यान तो वहीं वक्ष पर था। मैंने गेम खेलना बंद कर दिया और मैंने मामा के लड़के के नाम वाला फोल्डर खोल लिया और देखने लगा तो पता चला कि वो तो ब्लू फिल्म्स देखता है, तो मैं भी देखने लगा और अपने लण्ड को दबाने लगा। धीरे धीरे मुझे मज़ा आने लगा और मैं देखता रहा मैंने ध्यान ही नहीं दिया।
जब मैंने मॉनीटर में ध्यान से देखा तो ऐसा लगा कि मेरे पीछे कोई खड़ा है और मैंने डर कर कम्प्यूटर बंद कर दिया। जैसे ही मैं पीछे मुड़ा तो मैंने देखा कि दीदी एकदम वहाँ से भाग कर बाथरूम में घुस गई। मैं शरमा कर बाहर आ गया। अब मुझे अजीब सा लग रहा था कि दीदी मेरे बारे में क्या सोचेंगी और मैं डर कर रात को खाना खाने के बाद अपने कमरे में जाकर लेट गया। पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं बाथरूम में पेशाब करने गया तो मैंने वहाँ पर दीदी की ब्रा और पैंटी देखी। मैं तो वहीं पर पागल हो गया और मैं और सब चीजों को सूंघने लगा। मुझे मज़ा आने लगा और मैं यह भूल गया कि मैंने बाथरूम के दरवाज़े की कुण्डी नहीं लगाई है। मैं उन दोनों कपड़ों को सूंघता रहा।
फिर पीछे से आवाज आई- शिमत, क्या कर रहे हो ?
मैं डर गया और पीछे मुड़ कर देखा तो दीदी वहाँ पर खड़ी थी। मैंने वो ब्रा और पैंटी दोनों झट से नीचे फेंक दी और छत पर जाकर बैठ गया। वहीं पर बैठा रहा तो आधा घंटे बाद अचानक दीदी वहाँ पर आई और बोली- तुम यहाँ छत पर क्या कर रहे हो ?
तो मैं बोला- दीदी, कुछ नहीं ! मैं तो बस ऐसे ही यहाँ चला आया था।
दीदी बोली- नीचे अपने कमरे में चलो !
मैं बोला- दीदी, मुझे नींद नहीं आ रही ! मैं यहाँ पर बैठ जाता हूँ, जब नींद आएगी तो मैं चला जाऊंगा।
दीदी बोली- ठण्ड लग जायगी ! चलो नीचे !
मुझे डर लग रहा था, मैं डरता हुआ नीचे चला गया और अपने कमरे में जाने लगा तो दीदी बोली- कहाँ जा रहे हो?
मैं बोला- दीदी मैं अपने कमरे में जा रहा हूँ !
दीदी बोली- वहाँ पर मम्मी चली गई हैं, तुम मेरे कमरे में आ जाओ !
मैं डरता हुआ दीदी के कमरे में चला गया। वहाँ पर दो चारपाई थी तो मैं एक पर सो गया और लाइट बंद कर दी।
अचानक मुझे लगा कि मेरी चारपाई पर कोई आ गया है। मैंने देखा कि दीदी मेरी चारपाई पर बैठी है और दीदी का हाथ मेरे लण्ड पर रखा हुआ था।
मैं बोला- दीदी, आप क्या कर रहे हो ?
दीदी बोली- साले, इतना शरीफ मत बन ! तुझे सब पता है कि मैं क्या कर रही हूँ।
दीदी बोली- जब तू मेरे स्तन देख रहा था, तब तू क्या कर रहा था?
मैं बोला- दीदी, वो तो गलती से दिख गए थे !
तो दीदी बोली- साले तू मेरी पैंटी क्यों सूंघ रहा था?
मैं बोला- चलो छोड़ो, अब तो मज़े ले लो !
दीदी बोली- अब आया न लाइन पर !
तो मैंने झट से दीदी के स्तन पकड़ लिए और दबाने लगा। दीदी बोली- साले, हाथों में जान नहीं है क्या ? जोर से दबा !
तो मैं जोर से दबाने लगा फिर दीदी मैंने दीदी के होठों पर पप्पी ली और दीदी के होठों को जोर से चूमने लगा। दीदी को मज़ा आने लगा, वो भी मेरे होठों को जोर से चूमने लगी और मैं इतना मदहोश हो गया कि मैंने होठों को चाटना शुरू कर दिया। दीदी भी पागल हो गई और मेरे होठों को वो भी चाटने लगी।
मैंने दीदी के हाथों को अपने लण्ड पर रख दिया और कहा- मेरी मुठ मारो !
तो दीदी भी जोर से मुठ मारने लगी। फिर मैंने दीदी के पेट पर हाथ फेरा और दीदी के पेट को चूमने लगा। मैंने दीदी के पेट को चूम चूम कर गीला कर दिया और फिर दीदी की कमर को चूमने लगा। दीदी के बदन पर एक भी बाल नहीं है वो एक दम चिकनी हैं।
दीदी तड़फ़ने लगी और बोली- जल्दी से कुछ कर, नहीं तो मैं मर जाउँगी।
मैंने दीदी की गांड पर जीभ लगा दी। दीदी तो बिलकुल पागल हो गई और बोली- मैं तो मर गई, क्या गरम जीभ है तेरी ! और लगा !
मैंने दीदी की गांड को भी चाटना शुरू कर दिया। फिर क्या था, दीदी को तो होश नहीं था, वो तो पागल हो रही थी।
गुलाबी चूत से रिस रिस कर नमकीन पानी निकल रहा था, उसे चाटने में मुझे भी मजा आ रहा था और दीदी अपनी गांड उठा उठा कर मुखचोदन करा रही थी।
मैंने जैसे ही उसकी चूत पर जीभ लगाई तो वो तो पागल ही हो गई और बोली- जोर से चाट ! जल्दी से मेरी मार ! नहीं तो मैं मर जाउंगी !
तो मैंने अपना लण्ड निकाल कर उनके मुँह में डाल दिया और वो लण्ड देखते ही चिल्ला उठी- यह क्याऽऽऽ ?
मैंने कहा- लण्ड !
बोली- इतना बड़ा ऽऽ? मैं मर जाऊंगी !
मैंने कहा- एक बार मुँह में लेकर तो देख !
दीदी बोली- मजा आ रहा है !
वो मेरे लण्ड को कुत्ते की तरह चाट रही थी। फिर मैंने अपना लण्ड उनके मुँह में से निकाल कर उनकी चूत में डाल दिया और जोर जोर से झटके मारने लगा।
वो बोल रही थी- और जोर से मार !
और सिसकियाँ भरने लगी- आआआआ ऊऊऊऊऊऊओ जोर से मार साले !
तो मैंने उनकी गांड में डाल दिया तो वो बोली- मार दिया कुत्ते ! आराम से मार !
मैंने और जोर से शुरू कर दिया।
दीदी बोली- साले, बाहर निकाल ! दर्द हो रहा है !
तो मैं बोला- दीदी, बस थोड़ा और !
दीदी बोली- साले, मेरी गांड फट जायगी !
फिर मैंने बाहर निकाला और चूत में डाल दिया। फिर दीदी बोली- जोर से मार !
तो मैंने जोर से झटके मारने शुरू कर दिया। दीदी के मुँह से निकल रहा था- आआआआअ ऊऊऊऊओ आआआ ऊऊऊऊऊ !
मैंने फिर से दीदी के मुँह में डाल दिया और बोला- चूस !
दीदी मेरे लण्ड को लॉलीपोप की तरह चाट रही थी। दीदी अपना आपा खो बैठी थी और मेरे लण्ड को बुरी तरह चूस रही थी।
दीदी लण्ड चूसने के बाद बोली- शिमत, मुझे पागल बना दे ! मुझे बस चोदता जा ! मैं आज जी भर के चुदना चाहती हूँ।
मैंने फिर से लण्ड दीदी की चूत में डाल दिया और दीदी को कहा- अब मुझ में इतना दम नहीं है कि झटके मार सकूँ। आप ही कूद लो मेरे लण्ड पर !
दीदी मेरे लण्ड पर कूदने लगी, मैंने कहा- चूत में मज़ा नहीं आएगा ! आप अपनी गांड में फिर घुसवा लो !
दीदी बोली- मेरी गांड फट जाएगी !
तो मैंने कहा- कुछ नहीं होता !
तो दीदी ने गांड में घुसवा लिया और मैंने जोर से झटका मार कर दीदी की गांड में घुसा दिया। दीदी धीरे-धीरे से झटके मारने लगी और मज़ा आने लगा। मुझ में फिर से जोश आ गया और मैंने दीदी की गांड में जोर-जोर से झटके मारने शुरू कर दिया।
मैंने लंड को बाहर निकाला और वापस ज़ोऱ से अंदर डाला और धीरे धीरे से चोदने लगा, साथ में चूची को मुँह में लेकर चूसने लगा।
मैंने उससे पूछा- कैसा लग रहा है?
तो बोली- प्लीज़ मुझे मत पूछो !
मैंने उससे कहा- दीदी, तुमको आज मैंने एक बहन से पत्नी बना दिया है, तुम्हारी आज प्रौन्नति हुई है, तुझे चोदने में बहुत मज़ा आ रहा है, ऐसा मज़ा तो मुझे कभी नहीं आया !
उसने भी मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया। वाह क्या मुलायम होंठ थे, जैसे संतरे की नर्म नाज़ुक फांकें हों। कितनी ही देर हम आपस में जकड़े रहे, एक दूसरे को चूमते रहे। अब मैंने अपना हाथ उसकी चूत पर फिराना चालू कर दिया। उसने भी मेरे लंड को कस कर हाथ में पकड़ लिया और सहलाने लगी। मैंने जब उसके स्तन दबाये तो उसके मुँह से सीत्कार निकालने लगी- ओह…।
अब उसने अपने पैर ऊपर उठा कर मेरी कमर के गिर्द लपेट लिए थे। मैंने भी उसका सिर अपने हाथों में पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। जैसे ही मैं ऊपर उठता तो वो भी मेरे साथ ही थोड़ी सी ऊपर हो जाती और जब हम दोनों नीचे आते तो पहले उसके नितम्ब गद्दे पर टिकते और फिर गच्च से मेरा लंड उसकी चूत की गहराई में समां जाता। वो तो मस्त हुई आह उईई माँ ही करती जा रही थी।
अब मैं उसके मुँह को पकड़ कर चूमने लगा और उसका मुँह खोलकर जीभ अंदर डाल कर घुमाने लगा। एक हाथ उसकी चूत पर ही फिरा रहा था। अब चूत से भी पानी आने लगा था और मेरे हाथ गीले हो गए। मैंने गीला हाथ उसे दिखाते हुए कहा- दीदी, देखा अब तेरी चूत भी साथ दे रही रही है !
अब मैंने उसकी चूत को पूरा मुँह में ले लिया और जोर की चुसकी लगाई। अभी तो मुझे दो मिनट भी नहीं हुए होंगे कि उसका शरीर अकड़ने लगा और उसने अपने पैर ऊपर करके मेरी गर्दन के गिर्द लपेट लिए और मेरे बालों को कस कर पकड़ लिया। इतने में ही उसकी चूत से काम रस की कोई 4-5 बूँदें निकल कर मेरे मुँह में समां गई। आह, क्या रसीला स्वाद था। मैंने तो इस रस को पहली बार चखा था। मैं उसे पूरा का पूरा पी गया।
फिर मेरा छुटने को हो गया तो मैंने कहा- दीदी, मेरा छुट रहा है !
तो वो बोली- मेरे मुँह में छोड़ दे।
तो मैंने उनके मुँह पर छोड़ दिया और शान्त हो गया।
थोड़ी देर बाद अचानक अपने लंड पर किसी के स्पर्श से मैंने आंखे खोली तो देखा कि दीदी उससे खेल रही है और उसे खड़ा करने की कोशिश कर रही है। मेरे आँख खोलते ही मुझे अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा। मैं समझ गया कि अब भी दीदी की चाहत पूरी नहीं हुई तो मेरा फिर से खड़ा हो गया और मैंने फिर से दीदी की चूत में घुसा दिया। इस बार मैंने लण्ड चूत पर रखा और धीरे-धीरे नीचे होने लगा और लण्ड चूत की गहराइयों में समाने लगा। चूत बिल्कुल गीली थी, एक ही बार में लण्ड जड़ तक चूत में समा गया और हमारी झाँटे आपस में मिल गईं। अब मेरे झटके शुरु हो गए और दीदी की सिसकियाँ भी…
दीदी आआआहहहह अअआआआहहह करने लगी। कमरा उनकी सिसकियों से गूँज रहा था। जब मेरा लण्ड उनकी चूत में जाता तो फच्च-फच्च और फक्क-फक्क की आवाज़ होती। मेरा लण्ड पूरा निकलता और एक ही झटके में चूत में पूरा समा जाता। दीदी भी गाँड हिला-हिला कर मेरा पूरा साथ दे रही थी। मैंने झटकों की रफ्तार बढ़ा दी, अब तो खाट भी चरमराने लगी थी। पर मेरी गति बढ़ती जा रही थी। हम दोनों पसीने से नहा रहे थे जबकि सर्दी का मौसम था।
और फिर दीदी बोली- धीरे मार ! तूने तो मेरी चूत ही फ़ाड़ दी।
मैंने कहा- अभी तो कुछ नहीं हुआ है, अभी तो काम बाकी है !
मैंने तुरंत दीदी की गांड में घुसा दिया। फिर क्या था, दीदी चिल्लाने लगी और बोली- साले, तूने तो आज मेरी गांड भी फ़ड़ दी और मेरी चूत भी !
मैंने कहा- अभी तो चूचियाँ भी बाकी हैं !
मैंने झट से चूचियों पर कब्ज़ा कर लिया और उन्हें दबाने और चूसने लगा और मुंह में लण्ड की पिचकारी मार दी।
अब जब भी मैं मामा के घर जाता हूँ और जब हमें मौका मिलता है तो हम सेक्स कर लेते हैं और म़जा ले लेते हैं।
कभी घोड़ी-कुतिया तो कभी किचन में एक टांग पर। कुल मिलाकर दीदी के साथ बिताये वो हर पल आज भी मेरी आंखों के सामने आते हैं तो बस उसे चोदने की इच्छा जागृत हो जाती है।
उम्मीद है कि मेरी पहली कहानी आप सभी को पसंद आई होगी।
मुझे अपनी राय बताएँ इस कहानी पर ! मैं इंतजार करूँगा। Antarvasna
मैं अपने पाठकों से देरी के लिए माफ़ी Indian Sex Stories चाहती हूँ !और शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ र्वासना की पूरी टीम का कि उन्होंने मेरी कहानी अधूरी होने के बावजूद प्रकाशित की।
मैं अपनी पिछली कहानी टीचर्स डे में एक जगह ऐसी छोड़ी थी जहाँ पे में चाहती थी कि मेरे पाठक मुझसे सवाल करें…पर वो सवाल केवल मुझे एक ही इन्सान ने पूछा था .. जिसका जवाब मैं उन्हें दे चुकी हूँ .!!
साथ ही मेरी मेरे पाठकों से गुजारिश है कि मेरी कहानी पढ़के ये ना सोचें कि मैं एक अदद पार्टनर की तलाश मैं हूँ मैं जैसी हूँ सम्पूर्ण हूँ .. मुझे किसी की जरूरत नहीं इसलिए मुझे भद्दे और अश्लीलता भरे मेसेज ना करें, मेरी मेरे पाठको से इल्तिजा है की वो अगर ईमेल करके अपने विचार प्रस्तुत करेंगे तो अच्छा रहेगा.
अब कहानी पे आते हैं ..
टीचर्स डे के अगले दिन रविवार था यानि छुट्टी .. मैं सारा दिन उसके बारे मैं सोचती रही कि वो ऐसा क्यूँ है… जब मैं उस से बात नहीं करती तो मुझे दूर से निहारता है और जब मैं उसे अपनी और आकर्षित करती हूँ तो मुझे डांट देता है…
रात होते होते मैंने ये तय किया कि मैं उस से कल जाके बात करुँगी…
मैं अपने स्कूल की हेड गर्ल थी और सुबह पहले पीरियड से पहले और प्रार्थना के बाद मैं और मेरा एक सीनियर जो हैड बॉय था स्कूल का राउंड लगाते थे ये देखने के लिए की किसी क्लास में कोई दिक्कत तो नहीं है या कोई अध्यापक अगर अनुपस्थित है तो किस टीचर को उस क्लास में भेजना है.
मैं सीनियर हेड गर्ल थी तो मुझे 8 वीं क्लास से लेकर 12 वीं क्लास तक का राउंड लगना होता था .. और जूनियर हेड बॉय और हेड गर्ल जो 7वीं क्लास के थे वो पहली से लेकर 7 वीं क्लास का राउंड लगाते थे.
इसी तरह हर क्लास से होते हुए मैं अंत में 12 वीं क्लास के कामर्स सेक्शन में पहुँची… अटेंडेंस चेक करने के बाद बच्चों को काउंट किया और डायरी में नोट किया उसके बाद क्लास के मॉनिटर को बुलाके क्लास की कन्डीशन के बारे में पूछा (ऐसा हम हर रोज़ करते थे क्यूंकि 12 वीं में सब सीनियर होते हैं और सेनियर स्कूल अथॉरिटी की चीजों का नुकसान भी बहुत करते हैं जैसे कि ट्यूब लाईट तोड़ना या फ़िर खिड़कियों के शीशे तोड़ना ) उसके बाद .. मैंने सभी हौसेस के कैप्टेन्स को बुलाया ये बताने के लिए कि अगले महीने एन्नुअल फंक्शन है और इस बार मॉनीटरिंग कमिटी कि मीटिंग में डिस्कशन होगा और सब लोग अपने अपने हॉउस की तैयारी करके आएंगे.
(आपको बता दूँ हमरे स्कूल में 5 हॉउस थे पृथ्वी-भूरा, अग्नि-पीला, जल-नीला, आकाश-लाल, मोक्ष-गुलाबी..जिनके अपने अपने कलर की टी -शर्ट थी .. जोकि बच्चे बुधवार और शनिवार को सफ़ेद पैन्ट/ स्कर्ट के साथ पहनते थे। हर विद्यार्थी किसी ना किसी हाऊस से जुड़ा था। वरुण्जल हाऊस का कैप्टन था और मैं मोक्ष हाऊस की। गुलाबी मेरा पसन्दीदा रंग है। )
हमें ऊपर से सभी हाऊस के कैप्टन्स से सम्पर्क करने के आदेश थे। जब सभी कैप्टन्स अपनी अपनी सूचनाएं ले कर वापिस जाने लगे तो मैंने वरुण को रोका और कहा कि रिसैस में आकर मुझसे मिले अतिरिक्त सूचना के लिए, क्योंकि बार बार उसकी कक्षा में जाने से सबके मन में शक़ पैदा होता, इसलिए मैंने उसे इस तरह बुलाया था।
वो रिसैस में मेरी कक्षा में आया। इससे पहले कि मैं उससे कुछ कहती, उसने मुझे कहा कि मुझे पता है कि तुम्हें क्या कहना है। मैंने उस से पूछा कि क्या कहना है मैं भी तो जानू?
तो उसने कहा तुम मुझे थंक्स करना चाहती हो न कि उस दिन मैंने तुम्हें बारिश में तुम्हारे घर तक ड्राप किया .. एक बार तो में सकपका गई कि जो मैं कहना चाहती थी वो भी नहीं कहने दिया और जाने क्या राग अलापे जा रहा है ..
और हडबडाहट में मैंने कहा हाँ मैं यही कहना चाहती थी. बस मेरी मुंह से ये सुन के वो चला गया… मुझे बहुत गुस्सा आया ..
अगले हफ्ते मॉनीटरिंग कमेटी कि मीटिंग थी .. एक बड़ी लम्बी मेज़ थी जिसके एक तरफ़ सभी कक्षाओ के मोनिटर्स बैठे और एक तरफ़ हाउस के कैप्टेन्स और वाइस कैप्टेन्स। एक तरफ़ मैं थी और मैं ठीक उलटी साइड पर मेरा साथी था मीटिंग में ये तय हुआ कि ऑडिटोरियम, लाईट्स, साउंड, म्युझिकल इंस्ट्रुमेंट्स का प्रबंध स्कूल की तरफ़ से होगा और परफॉर्मेंस के आधार पर अंत में ग्रुप और सोलो ईनाम बांटे जायेंगे. ईनाम में एक घड़ी दी जायेगी सोलो पेरफोरमेर्स को और ग्रुप परफॉर्मेंस के सभी प्रतिभागियों को एक एक पारकर का पेन दिया जाएगा और कोई भी ग्रुप 5 लोगों से ज्यादा का नहीं होगा।
ज्यूरी में हमारी स्कूल की प्रधानाचार्या, मुख्य अतिथि, ड्रा से नाम निकाले हुए 2 अभिभावक और 2 अध्यापक होंगे. साथ ही होस्ट और होस्टेस का नाम भी हम ही निश्चित करेंगे उनके लिए नोटिस बोर्ड पे वोलंटियर्स को आगे आने का मौका दिया जाएगा.
कुछ दिनों बाद अलग अलग परफॉर्मेंस के ऑडिशन शुरू हुए उनमें से हमने 6 ग्रुप फाइनल किए जिनमें से 4 प्ले फाइनल में जाने के लिए चुने गए.
सोलो में हमने 4 सिंगेर्स और 4 डांसर्स को चुना. 2 लड़के दो लड़कियाँइन दोनों ही भागों में. उसके बाद पिछले साल के सबसे अच्छे शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए इनाम में स्वर्ण रजत और कांस्य पदक देने पर विचार हुआ और खेल में भी इसी तरह करने की योजना तय हुई. जो कि प्रधानाचार्या और हमारे मुख्य अतिथि बच्चों को उनके माता पिता के साथ प्रदान करेंगे. उसके बाद अंत में एक जोरदार प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम रखने का प्रस्ताव आया ताकि सभी लोग मुस्कराते हुए साल को अलविदा करें. साथ ही वार्षिकोत्सव के निमंत्रण पत्र ठीक एक सप्ताह पहले सभी बच्चों के माता पिता के पहुँचा दिए जायें ताकि वो उस दिन का कोई अन्य कार्यक्रम न रखें.
होस्टेस के लिए कोई उपयुक्त लड़की न मिलने पर सभी ने सर्व सम्मति से ये मन कि होस्टेस के लिए मुझे ही आगे जन होगा. और जो प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम था वो वरुण के जिम्मे लगाया गया.
धीरे धीरे वक्त गुज़रा और वार्षिकोत्सव का दिन आ ही गया हम लोग सभागार के मंच के एक दम पीछे थे सभी बच्चों को धीरज बंधा रहे थे कि मंच पे जाके घबराएँ नहीं.
मैंने एक गुलाबी रंग का पटियाला सलवार कमीज़ पहनी थी और बाल खुले थे कानों में प्लेटिनम टोप्स और चेहरे पे सिर्फ़ काजल और लिप गार्ड थी। वरुण ने सफ़ेद कुरता और ब्लू जींस पहनी थी. परदा खुला और मैंने शुरुआत की और सभी का स्वागत करते हुए सबको शान्ति पूर्वक बैठ जाने को कहा और सरस्वती वंदना से वार्षिकोत्सव का शुभ आरंभ किया.
सभी कार्यक्रमों के मंचन के बाद वरुण की बारी थी उसके स्टेज पे आते ही पूरा सभागार ठहाकों से गूँज उठा पहले मैंने उसे नहीं देखा पर दर्शकों के हँसने की आवाज सुनते ही मैंने गर्दन घुमा के जब उसकी तरफ़ देखा तो नाक पे चेरी जैसा कुछ था आंखें लाइनर से जबरदस्ती बड़ी बना राखी थी गलों पे जोकर जैसा गुलाबी रंग था और कपड़े… लाल रंग की निकर और पीले रंग की पोल्का डोट्स की शर्ट पहनी जिस पे फ्लेयर्स लगे थे वो पूरा एन्टीक पीस लग रहा था, और ऐसे चल रहा था जैसे सच मुच के जोकर चलते हैं.
फ़िर उसने मेरी तरफ़ देखा और गिर गया जान बूझ कर और मेरे पास आ के बोला जी क्या मैं ले सकता हूँ… मैंने कहा क्या .. उस वक्त माइक ओन था. सब लोग सुनते ही हंस पड़े .. फ़िर कहने लगा जी मैं तो माइक की बात कर रहा हूँ.
उसे माइक सौंप के मैं परदे के पीछे चली गई और फ़िर जो उसने अपने चुटकुलों से समां बंधा कि मैं परदे के पीछे होते हुए भी अपनी हँसी नहीं रोक पा रही थी। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि हमारे कार्यक्रम का ये भाग इतना सफल होगा उसने कई सवाल किए जैसे कि
दुनिया मैं ऐसा कौन सा गेट है जिसमें कोई घुस नहीं सकता >> कोलगेट
ऐसी कौन सी कली है जो कभी नहीं खिलती >>> छिपकली
उसका कार्यक्रम ख़त्म होने ही वाला था कि अचानक फायर अलार्म बजने लगा. जल्दी जल्दी मैं सभी को सभागार से निकाल कर पास के ही एक मैदान मैं ले जाया गया.
मैं और मेरे साथ के समिति के सदस्य सभी को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे .. और सभी अभिभावकों को अपने बच्चे घर ले जाने की इजाज़त दे दी गई. सब घर चले गए. अगले दिन क्लास में ये अफवाह सुन ने को मिली कि सभागार की किचेन के पास जो फायर अलार्म था वो बजा था और शायद गैस के धुंए की वजह से फायर अलार्म बज उठा हो.
पर बाद में जब प्रधानाचार्य ने आके असेम्बली में खेद प्रकट किया और हमें सूचित किया कि हमारे स्कूल का हेड बॉय शौचालय में धुम्रपान कर रहा था जिस वजह से फायर अलार्म बजा चूँकि किचेन और शौचालय दोनों पास ही थे इसीलिए इस बात का पता नहीं लग पा रहा था कि वजह क्या थी.
उसके बाद CCTV से देखा गया कि अलार्म की आवाज़ आते ही हेड बॉय शौचालय से निकला उसके हाथ में अधजली सिगरेट थी उसने जमीन पे फेंकी और बुझा दी और बाहर की तरफ़ चला गया. इस मामले में हेड बॉय को 10 दिन के लिए स्कूल से निकाल दिया गया. और सबसे खुशी की बात तो ये थी हेड बॉय के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार वरुण ही था उसके बाद.
तो जाहिर सी बात है उसे हेड बॉय बना दिया गया. और हम रोज़ साथ में स्कूल के चक्कर लगते और धीरे धीरे हम दोस्त से अच्छे दोस्त बन गए. दोस्त होने के बावजूद हम में एक दम दुश्मनों की तरह लडाई होती थी.
हालांकि हम एक दूसरे के विचारों से सहमति जताते थे पर फ़िर भी हममें लड़ाई कुछ ऐसी बातों पर होती थी जिन्हें कोई सोच भी नहीं सकता था। ऐसा ही एक मुद्दा था मेरी स्कूल ड्रेस की स्कर्ट का साईज़… बढती हाईट के साथ मेरी स्कर्ट छोटी हो चुकी थी और अब वो मेरे घुटने से ऊपर आने लगी थी।
जब मैंने मां से नई स्कर्ट लाने की बात की तो उन्होंने यह कह कर टाल दिया कि अगले साल तो तुम्हारा स्कूल खत्म ही हो जाएगा तो सिर्फ़ एक साल के लिए मैं तुम्हें नई स्कर्ट लेके दूं? और मामला वहीँ दब गया.
फ़िर एक दिन मैं गेम्स पीरियड में ग्राउंड में बास्केट बाल खेल रही थी अब बास्केट में बाल डालने के लिए उछलना तो पड़ता है, तो जब बाल मेरे हाथ में आती और मैं बास्केट में डालती तो सब लड़के टक टकी लगाये मेरी जांघों को निहारने लगते ..
मुझे भी अजीब सा महसूस होता था कि बार बार मुझे ही क्यूँ मोका मिल जाता है बाल को बास्केट में डालने का .. वहीँ कुछ दूरी पर से वरुण स्टाफ रूम की तरफ़ जा रहा था उसके हाथ में नोटबुक्स थी नोटबुक्स स्टाफ रूम में रख के आने के बाद वो थोड़ी देर के लिए मेरा गेम देखने के लिए रुक गया और ये बात उसने नोटिस कर ली आख़िर लड़का है लड़कों की आदत नहीं जानेगा तो और किसकी जानेगा।
उस वक्त उसने मुझे पास बुलाके सिर्फ़ छुट्टी के समय रुकने को कहा कि उसे कोई बात करनी है। मैं आखिरी पीरियड टक यही सोचती रही कि आखिर उसे ऐसी क्या खास बात करनी है जो वो तब नहीं कर सकता था।
मैं छुट्टी के बाद गेट पे उसका वेट कर रही थी वो अपने फ्रेंड्स के साथ था .. मुझे देख उसने अपने फ़्रेन्ड्स को जाने के लिए कहा और कहा कि वो शाम को उन्हें कॉल करेगा.
मेरे पास आते ही उसने सीधे बोला ..’ मेरे पास दाल नहीं गली तो अपने क्लास के लड़कों को रिझाने मैं लगी हो ..’ मैंने उसे अजीब तरह से देखते हुए कहा,’ क्या बोल रहे हो दिमाग तो ठीक है .. पहले सोचो तोलो और फ़िर बोलो कि बोल क्या रहे हो…’
तो फ़िर कहने लगा तुमरे पास स्कर्ट लेने के पैसे नहीं है तो मेरे डैड की गारमेंट फैक्ट्री है मैं बनवा देता हूँ .. .बस ये सुनने की देर थी मेरा हाथ उस पे उठ गया पर उसने मेरा हाथ रोक लिया और मैंने कहा कि .. तब से देख रही हूँ बेसिर पैर कि बातें किए जा रहे हो .. अपनी हद मैं रहके बात किया करो .. जो कहना है साफ साफ कहो .. मुझे जलेबी कि तरह सीधी बातें समझ नहीं आती।
कहने लगा- तुम्हें नहीं लगता तुम्हारी स्कर्ट कुछ ज्यादा ही छोटी है? तो मैंने कहा इसमें लगने वाली क्या बात है वो तो छोटी ही है .. तो मुस्कुराते करते हुए कहता- तुम्हें ज़रा भी शर्म है के नहीं तुम्हारी क्लास के लड़के जाने तुम्हें कैसे देखते हैं जैसे तुम कोई नुमाइश की चीज़ हो !
तो मैंने कहा तुम्हें क्यूँ इत्ती जलन हो रही है अगर वो मुझे देखते हैं तो .. कुछ देर सोचने के बाद हडबडाते हुए बोला ‘तुम मेरी दोस्त हो तुम्हें हो न हो मुझे अपने दोस्तों की बहुत फिकर है और हाँ कल से अगर ये स्कर्ट पहन के आना हो तो प्लीज़ नीचे स्टाकिंग्स पहन के आना ..अब घर जाओ तुम्हें देर हो रही होगी और मैं रिक्शा से घर चली गई।
कुछ दिन बाद टेनिस टूर्नामेंट था जयपुर में हमारे ही स्कूल की जयपुर वाली ब्रांच में ..हमारे शहर में हमारा स्कूल टॉप पे था और इसीलिये हमें टूर्नामेंट के लिए बुलाया गया था .. वरुण का नाम सेलेक्ट हुआ था और उसके साथ कोई वंशिका नाम की लड़की थी जिसे मिक्स्ड डबल्स मैं उसके साथ खेलना था .. (ये बात वरुण ने ही मुझे बताई थी )
वंशिका !!! बेहद खूबसूरत चार्मिंग और फ़ैशनेबल लड़की थी उसके बाल करली थे और कमर से झूलते रहते थे, रंग सांवला, आँखों में मोटा मोटा काजल, नाक में सानिया मिर्जा टाइप नथ और कानों में बड़े बड़े बाले होते थे टाई हमेशा कालर से नीचे लटकती हुई शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले हुए स्कर्ट इतनी छोटी कि किसी को नीचे झुक के देखने की जरूरत न पड़े पैरो में व्हाइट स्पोर्ट्स शूज़ टखने तक की जुराबें, कलाई पर अदीदास और नाइकी के बैंड्स. इसमें कोई शक नहीं कि वंशिका पूरे स्कूल में सबसे अच्छा टेनिस खेलती है। हालांकि कई और लड़कियां, जिनमें मैं भी हूं, अच्छा टेनिस खेल लेती हैं।
मैंने उसे वरुण के साथ प्रक्टिस करते हुए देखा था कई बार शाम को वरुण और वंशिका साथ में स्कूल ग्राउंड में प्रक्टिस के लिए जाया करते थे और मैं कभी कभी अपनी ट्युशन गोल करके उसे देखने जाया करती थी कि कहीं वंशिका मेरी जान पे डोरे तो नहीं डाल रही !
वरुण किसी लड़की के हाथ में आने वालों में से नहीं था। तब तक मैं उसकी बेस्ट फ्रेंड बन चुकी थ। हम दोनों बहुत झगड़ते थे पर बात किए बगैर रह भी नहीं सकते थे. 6 नवम्बर को वरुण और वंशिका को जयपुर के लिए निकलना था प्रशांत सर के साथ. 4 नवम्बर को मुझे 7 वें पीरियड में गेम्स रूम से बुलावा आया. वहां पे प्रधानाचार्या भी थी.
सर ने मुझसे पूछा कि क्या तुम टूर्नामेंट के लिए जाना चाहती हो. मैं कुछ समझ नहीं पाई और मैंने कहा कि सर वंशिका ने बहुत प्रक्टिस की है इस टूर्नामेंट के लिए, इसीलिए प्लीज़ उसे जाने का मौका दिया जाए।
पर उन्होंने मुझे बताया कि वंशिका के पैर में कल दोपहर को खेलते समय मोच आ गई थी शाम को एक्स-रे के बाद पता चला है कि उसका पैर भागते वक्त मुड़ने कि वजह से फ्रक्चर हो गया है और सेकंड बेस्ट प्लेयर रुपाली का मैच दूसरे स्कूल के साथ है इसीलिए वो भी नहीं चल सकती .. तो बची सिर्फ़ तुम क्या चल सकती हो तुम ..पहले मैंने बहाना बनाया सर मेरी ज्यादा प्रक्टिस भी नहीं है तो सर ने मुझे यह कहकर आश्वस्त किया वरुण अच्छा खेलता है तुम्हें उसके साथ खेल के कुछ न कुछ सीखने को ही मिलेगा.
मैंने हालात सुन के हाँ कर दी मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था .. और फ़िर अपने स्कूल का नाम रोशन करने का इस से बेहतर तरीका और क्या हो सकता है और सोने पे सुहागा तो ये था कि वरुण का साथ मिलेगा पूरे तीन दिन ..!!
शायद भगवान् भी यही चाहते थे कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छे से समझें इसीलिए उन्होंने हमें आपस में घुलने मिलने का एक स्वर्णिम अवसर दिया था। सुबह 8 बजे हमने जयपुर जाने वाली बस ली। बस में काफी भीड़ थी इसीलिए बैठने कि सीट नहीं मिली। सर हमसे कुछ ही दूरी पर खड़े थ… वरुण और मैं दोनों साथ में खड़े थे मैंने पय्जामी और कमीज़ पहनी थी और उसने जींस और टी शर्ट। वो क्यूट लग रहा था। भीड़ हर स्टैंड के गुजरने के साथ बढती जा रही थी।
जैसे ही बस में ब्रेक लगती मेरा कन्धा उसके बाजू से टकराता था और में तुंरत पीछे हो जाती थी। उसे भी पीछे से धक्के लग रहे थे और मुझे भी. हम दोनों इतने करीब थे कि उसकी सांसें मेरे माथे को छूकर गुज़र रही थी। उसके सांसों की खुशबू लेते ही कुछ पल के लिए मुझे स्वर्ग में होने का एहसास होता।
फ़िर हमारे पास वाली एक सीट से एक अंकल उठे, उनका स्टाप आ गया था वरुण झट से बैठ गया (वो बहुत ही फुर्तीला है ) दो सीट आगे एक बूढी आंटी खड़ी थी, उसने उन्हें पास बुलाया और उन्हें सीट दी. ये देख कर में दंग रह गई कि उसके माँ बाप ने उसे कितने अच्छे संस्कार दिए हैं. वो जानता है कि बडो बूढों का आदर सम्मान कैसे किया जाता है। अब मेरे दिल में उसके लिए प्रेम ही नहीं इज्ज़त भी बढ़ गई थी। इसी बीच मैंने देखा कि हमारे अध्यापक को भी बैठने की जगह मिल गई थी।
जैसे कैसे कुछ स्टैंड के बाद हम दोनों को सीट मिल गई और हम बैठ गए। वो खिड़की की तरफ़ बैठा था. हवा का झोंका आते ही मैं उसके बदन की खुशबू को साफ महसूस कर सकती थ॥ मैं खिड़की से बाहर देखने के बहाने से उसे निहार रही थी कि वो कैसे हवा से गिरते अपने लंबे बालो को गालों पर से किस तरह से समेट रहा है।
फ़िर जब थोड़ी देर बाद उसे लगता कि मैं उसे देख रही हूँ तो मैं इस तरह खिड़की से बाहर देखती जैसे मैंने कुछ देखा ही न हो. फ़िर अचनक रास्ते में मौसम बेहद खुशगवार होने लगा आसमान में बदल छा गए मधुर मधुर हवा चलने लगी।
मैंने उस से कहा कि प्लीज़ मुझे बैठने दो .खिड़की पे ..
बहुत बार कहने के बाद उसने मुझे बैठने दिया. मैंने अपने बाल खोल लिए। अब मेरी लम्बी लम्बी जुल्फें हवा में लहराने लगी जो कभी उसके गालों को चूमती तो कभी उसके बदन से लिपट जाती.
वो मेरे बालों को हटाने की नाकाम कोशिश करता रहा. पर हवा काफी तेज़ थी. फ़िर मैंने आसमान से हलकी हलकी रिम झिम फुहारें गिरती देखी. और थोड़ा सा सूरज भी निकला था तब.
मुझे सिर्फ़ इन्द्रधनुष का इंतज़ार था। रेनबो तो नहीं पर एक मोर नाचता हुआ जरूर दिखा जिसे देखने की इच्छा में उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर अनजाने में रख दिया . जिसके लिए उसने मुझसे बाद में माफ़ी भी मांगी. हमारे सर जो आगे कहीं बस में खर्राटे भर रहे थे.
वरुण के साथ वक्त बहुत अच्छा गुज़र रहा था. उसने मुझे हंसा हंसा के मेरे गालो में दर्द करवा दिया. इसी बीच उसने मुझसे पूछा कि तुम्हारा कोई बॉय फ्रेंड नहीं है.
मैंने कहा- नहीं.
उसने कहा तुम बहुत प्यारी हो तुमसे कभी किसी लड़के ने उलटी सीधी कोई बात नहीं की.
मैंने कहा- कही है मेरी क्लास के लड़कों ने भी कही है और मेरे कालोनी के लड़कों ने भी. जब भी कोई ऐसी बात करता है तो मेरा एक ही सवाल उनसे होता है कि क्या वो मुझसे शादी करेंगे. अगर वो कहते हैं- हाँ तो में कहती हूँ की ये सब तो फ़िर शादी के बाद भी हो सकता है इतनी जल्दी किस बात की है. और अगर वो कहते हैं न तो मैं कहती हूँ कि जिसे ख़ुद पे ही इतना भरोसा नहीं कि वो मेरे साथ जिंदगी बिता भी पायेगा के नहीं ऐसे इन्सान को में अपना सब कुछ कैसे सोंप दूँ…!! और बात यही ख़तम हो जाती है.
मेरी बात सुनके हँसते हुए उसने कहा तुम बहुत चालू लड़की हो सही ग़लत खूब समझती हो. पर मैं तुमसे पहली और आखिरी बार कह रहा हूँ- तुम मुझे इस तरह से मत देखा करो, हम सिर्फ़ अच्छे दोस्त हैं और कुछ नहीं. अगर एक दोस्त की तरह रहोगी तो मुझमें एक सच्चा दोस्त पाओगी और अगर तुम दोस्त बन के नहीं रहना चाहती तो मुझसे दूर रहो. मुझ पे काफी जिम्मेदारियाँहै और अभी ये उमर भी नहीं है हमारी ये सब करने की, न ही ये कोई खेल है. ऐसे जल्दी में लिए फैसलों से जिंदगी बर्बाद भी हो सकती है. मुझे अब तक समझ नहीं आया कि वो मेरे मन की बात कैसे जान लेता है.
आज का अंक यही समाप्त हुआ अगला भाग आपको जल्दी ही मिल जाएगा…!!!!
मैं अपने पाठकों को अपनी कहानी के हर एक छोटे से छोटे पहलू से अवगत कराना चाहती हूं, इसलिए प्यारे पाठको! मैं जानती हूं कि आप कुछ और ही पढ़ना चाह रहे होंगे इस कहानी में, पर अभी उसमें बहुत देर है। इसलिए संयम बनाए रखें और पढ़ते रहें। Indian Sex Stories
मेरे पति को अब तीस Antarvasna पैंतीस दिन तक किसी टूर पर नहीं जाना था, उन्होंने शिल्पा वाली कहानी कई दिनों तक मुझसे बड़ी बारीकी से सुनी थी ऑर फिर हसरत जाहिर की थी कि काश इस बार शिल्पा जब घर आये तो वो भी मौजूद हों, इस बात पर अफ़सोस भी जताया था कि जब शिल्पा वाली घटना घटी तब वह वहाँ क्यों नहीं थे.
वे इस बार टूर से सिर्फ सौन्दर्य प्रसाधन नहीं लाये थे बल्कि कई इंग्लिश मैगजीन भी लाये थे, जिनका विषय एक ही था सेक्स. उन मैगजीनों में अनेक भरी सेक्स अपील वाली मोडल्स के उत्तेजक नग्न व अर्धनग्न चित्र थे, कुछ कामोत्तेजक कहानियाँ व उदाहरण आदि थे तथा दुनिया के सेक्स से संबंधित कुछ मुख्य समाचार थे.
मैं कई दिनों तक खाली समय में उन मैगजींस को देखती व पढ़ती रही थी.
दरअसल मेरी ससुराल इस शहर से चालीस किलोमीटर दूर एक कस्बे में है, जहाँ से कभी किसी काम से मेरी ससुराल के अन्य लोग आते रहते हैं, कभी मेरे वृद्ध ससुर तो कभी ननद शिल्पा, कभी मेरा एक मात्र देवर जो शिल्पा से चार वर्ष बड़ा है, अगर शहर में उनमें से किसी को शाम हो जाती है तो वे हमारे घर में ही ठहरते हैं.
एक दिन फिर मेरी ससुराल से एक शख्स आया, वह मेरा देवर था. शाम के पांच बजे वह हमारे घर आया था, मेरे पति घर पर नहीं थे, ऑफिस से साढ़े पांच या छः बजे तक ही आते थे.
मैं सोफे पर बैठी इंग्लिश मैगजीन पढ़ रही थी, तभी कॉल-बेल बजी, मैंने मैगजीन को सेंटर टेबल पर डाला ऑर यह सोचते हुए दरवाजा खोला कि शायद मेरे पति आज ऑफिस से जल्दी आ गए हैं, लेकिन दरवाजा खोला तो पाया कि मेरा देवर जतिन सामने खड़ा है, उसने कुर्ता पायजामा पहन रखा था, वह कुर्ता पायजामा में काफी जाँच रहा था.
“भाभी जी नमस्ते!” उसने कहा और अन्दर आ गया.
“कहो जतिन! आज कैसे रास्ता भूल गये? तुम तो अपनी भाभी को पसंद ही नहीं करते शायद!” मैंने दरवाजे को लॉक करके उसकी ओर मुड़ कर कहा.
“ऐसा किसने कहा आपसे?” वह सोफे पर बैठ कर बोला. वह मेज़ से उस मैगजीन को उठा चुका था जिसे मैं देख रही थी.
मेरे दिल में धड़का हुआ, मैगजीन तो कामोत्तेजक सामग्री से भरी पड़ी थी, कहीं जतिन उसे पढ़ न ले, मैंने सोचा लेकिन फिर इस विचार ने मेरे मन को ठंडक पहुंचा दी कि अगर यह मैगजीन पढ़ ले तब हो सकता है उसकी मर्दानगी का स्वाद आज मिल जाए, इसमें भी तो जोश एकदम फ्रेश होगा! मैं निश्चिंत हो गई.
“कौन कहेगा… मैं जानती हूँ! अगर मैं तुम्हें पसंद होती तो क्या तुम यहाँ छः छः महीने में आते? आज कितने दिनों बाद शक्ल दिखा रहे हो… पूरे साढ़े पांच महीने बाद आये हो, तब भी सिर्फ एक घंटे के लिए आये थे!” मैं उसके सामने सोफे पर बैठ कर बोली.
मैंने ब्रेजियर और पेंटी पहन कर सिर्फ एक सूती मैक्सी पहन रखी थी, जिसके गहरे गले के दो बटन खुले हुए भी थे, वहाँ से मेरे गोरे गोरे सीने का रंग प्रकट हो रहा था.
मैंने देखा कि जतिन ने चोर नजरों से उस स्थान को देखा था फिर नजर झुका कर कहा- यह तो बेकार की बात है… आप जानती ही हैं कि मैं कितना व्यस्त रहता हूँ. कंप्यूटर कोर्स, पढ़ाई और फिर घर का काम… चक्की सी बनी रहती है, आज थोड़ा टाइम मिला तो इधर चला आया, वो भी शिल्पा ने भेज दिया क्योंकि भाई साहब ने फोन किया था, उन्होंने शिल्पा को बुलाया था कहा था कि उसे कुछ कपड़े दिलवाने हैं, शिल्पा को तो आज अपनी एक सहेली की शादी में जाना था सो उसने मुझे भेज दिया… जतिन बोला.
मैं समझ गई कि मेरे पति ने शिल्पा को किसलिए फोन किया होगा, कपड़े दिलवाने का तो एक बहाना है, असल बात तो वही है जिसकी उन्होंने तमन्ना जाहिर की थी.
“आज ही बुलाया था तुम्हारे भैया ने शिल्पा को?” मैंने जतिन से पूछा.
“हाँ… कहा था कि आज या कल सुबह आ जाना!” जतिन बोला.
“अच्छा तुम बैठो मैं पानी-वानी लाती हूँ!” मैंने यह कहा और सोफे से उठ कर रसोई की ओर चली गई, फ्रिज में से पानी की बोतल निकाल कर एक ग्लास में पानी डाला और ग्लास अपने देवर जतिन के सम्मुख जरा झुक कर ग्लास उसकी ओर बढ़ा कर बोली- लो पानी पीयो! मैं चाय बनाती हूँ!
जतिन ने सकपका कर मैगजीन से नजर हटाई, मैंने देख लिया था- वह एक मोडल का उत्तेजक फोटो बड़ी तल्लीनता से देख रहा था, उसके चेहरे पर ऐसे भाव आ गए जैसे चोरी पकड़ी गई हो!
उसने कांपते हाथ से ग्लास ले लिया, मेरी ओर देखने पर उसकी पैनी नजर मेरे खुले सीने पर अन्दर ब्रेजरी तक होकर वापस लौट आई, वह नजर झुका कर पानी पीने लगा तो मैं मन ही मन मुस्कुराती हुई रसोई में चली गई.
मैंने चाय पांच मिनट में ही बना ली, चाय लेकर मैं वापस ड्राइंग रूम पहुंची तो देखा कि जतिन तपते चेहरे से मैगजीन को पढ़ रहा है, मेरी आहट पाते ही उसने मैगजीन मेज़ पर उलट कर रख दी,
“लो चाय… चाय का एक कप ट्रे में से उठा कर मैंने उसकी ओर बढ़ाया, उसने कंपकंपाते हाथ से कप पकड़ लिया और नजर चुरा कर कप में फूंक मारने लगा, मैंने भी एक कप उठा लिया, मैंने महसूस कर लिया कि जतिन सेक्स के प्रति अभी संकोची भी है और अज्ञानी भी, ऐसे युवक से संबंध स्थापित करने का एक अलग ही मजा होता है, मैं सोचने लगी कि जतिन से कैसे सेक्स संबंध विकसित किया जाये ताकि मेरी यौन पिपासा में शांति पड़े.
उसके गोल चेहरे और अकसर शांत रहने वाली आँखों में मैं यह देख चकी थी कि कामोत्तेजक मैगजीन ने शांत झील में पत्थर मार दिया है और अब उसके मन में काम-भावना से संबंधित भंवर बनने लगे हैं, वह खामोशी से चाय पी रहा था, मेरी ओर यदा कदा देख लेता था.
तभी फोन की घंटी बज उठी, मैंने सोफे से उठ कर फोन का रिसीवर उठाया ओर उसे कान में लगा कर बोली- हेलो! आप कौन बोल रहे हैं?
“जानेमन हम तुम्हारे पति बोल रहे हैं.” उधर से मेरे पति का स्वर आया- हम थोड़ी देर में आयेंगे… तुम परेशान मत होना… ओ.के…
इतना कह कर उन्होंने संबंध विच्छेद भी कर दिया.
“किसका फोन था?” जतिन ने प्रश्न किया.
“तुम्हारे भाई साहब का…! मेरी कुछ सुनी भी नहीं और थोड़ी देर से आयेंगे ये कह कर रिसीवर भी रख दिया.” मैंने दोबारा उसके सामने बैठते हुए कहा.
“अब तक उनकी आदत ऐसी ही है… कमाल है!” जतिन बोला.
वह चाय ख़त्म कर चुका था, खाली कप उसने मेज़ पर रख दिया, मैं भी चाय पी चुकी थी.
“चलो टी. वी देखते हैं…” मैं सोफे से उठती हुई बोली, मैंने एक शरीर-तोड़ अंगड़ाई ली, मेरी मेक्सी में से मेरा शरीर बाहर निकलने को हुआ, जतिन के होंठों पर उसकी जीभ ने गीलापन बिखेरा और आँखें अपनी कटोरियों से बाहर आने को हुई.
मैंने टेबल से मैगजीन उठा ली और बेडरूम की ओर चल दी, जतिन मेरे पीछे पीछे था.
मैंने बेडरूम में पहुँच कर टी.वी. ऑन करके केबल पर सेट किया एक अंग्रेजी चैनल लगाया ओर बेड पर अधलेटी मुद्रा में बेड की पुश्त से पीठ लगा कर बैठ गई और मैगजीन खोल कर देखने लगी, जतिन भी बेड पर बैठ गया लेकिन मुझसे फासला बना कर.
“मुझमें कांटे लगे हैं क्या?” मैंने उससे कहा.
“जी… जी… क्या मतलब?” जतिन हड़बड़ा कर बोला.
“तुम मुझसे इतनी दूर जो बैठे हो…!” मैंने मैगजीन को बंद करके पुश्त पर रख कर कहा.
“ओह्ह… लो नजदीक बैठ जाता हूँ!” कह कर वह मेरे निकट आ गया.
उसके और मेरे शरीर में मुश्किल से चार छः अंगुल का फासला रह गया.
“तबियत ठीक नहीं है तुम्हारी…? कान कैसे लाल हो रहे हैं…! मैंने उसके चेहरे को देख कर कहा ओर उसके माथे पर हाथ लगा कर बोली- ओहो… माथा तो तप रहा है… ऐसा लगता है कि तुम्हें बुखार है… दर्द-वर्द तो नहीं हो रहा सिर में…! हो रहा हो तो सिर दबा दूँ!” मैंने कहा.
“हो तो रहा है भाभी जी… दोपहर से ही सर दर्द है…! अगर दबा दोगी तो बढ़िया ही है!” जतिन बोला.
“लाओ… गोद में रख लो सिर…” मैंने उसके सिर को अपनी ओर झुकाते हुए कहा.
उसने ऐतराज नहीं किया और मेरी जाँघों के जोड़ पर सिर रख कर लेट गया, मैं उसके माथे को हल्के हल्के दबाने लगी और मेरे मस्तिस्क में काम-विषयक अनार से छूटने शुरू हो गये थे.
“भाभी… आप बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?” जतिन बोला.
“पूछो… एक क्यों दस पूछो…” मैं टीवी से नजर हटा कर उसकी बड़ी बड़ी आँखों में झांक कर बोली.
“यह जो मैगजीन है, इसे आप पढ़ती हैं या भाई साहब?” जतिन ने प्रश्न किया.
हम दोनों ही पढ़ते हैं क्यों…? मैंने कहा.
“दोनों ही…आपको क्या जरूरत है ऐसी मैगजीन पढ़ने की?” वह बोला.
“क्यों? हम दोनों क्यों नहीं पढ़ सकते… हमें जरूरत नहीं पड़नी चाहिए?” मैं बोली.
“और क्या… आप तो शादी शुदा हो… इसकी या ऐसी मैगजीन मेरे जैसे कुंवारों के लिए ठीक रहती है!” जतिन बोला.
“क्यों… जो आनन्द इस मैगजीन से कुंवारे ले सकते हैं… उस पर हमारा अधिकार नहीं है क्या? कैसी बातें करते हो तुम…” मैं उसकी कनपटियाँ सहला कर बोली.
“अरे वाह… आपको आनन्द के लिये मैगजीन की क्या जरूरत? आपके पास तो जीवित आनन्द देने वाली मशीन है… मेरे कहने का मतलब है कि आप भैया से आनन्द ले सकती हो और वे आपसे… परेशानी तो हम जैसों की है… जो अपनी आँखों की प्यास बुझाने के लिये ऐसी मैगजीनों पर आश्रित हैं.” जतिन ने बात को गंभीर मोड़ दिया.
“ओहो… तो मेरे देवर की आँखें प्यासी रहती हैं तभी ऐसी बातें कर रहे हो…” मैंने मुस्कुराते हुए कहा, फ़िर बोली- तो क्या तुमने अभी तक अपनी आँखों की प्यास नहीं बुझाई… मेरे कहने का मतलब ये है कि… क्या इन बड़ी बड़ी आँखों को देवी दर्शन नहीं हुए?
“देवी दर्शन?” वह इस शब्द पर उलझ गया.
“यानि कि किसी युवती को बिना कपड़ों के नहीं देखा?” मैंने देवी दर्शन का मतलब समझाया.
“इसे कहते हो आप देवी दर्शन… वाकई आप तो जीनियस हो भाभी जी… वैसे कह ठीक रही हो आप! अपनी किस्मत में ऐसा कोई मौका अभी तक नहीं आया है, आगे भी शायद ही आये…” वह सोचता हुआ सा बोला, फ़िर टी.वी पर आते एक दृश्य में दो मिनी स्कर्ट वाली लड़कियों को देख कर बोला- टी.वी. या किताबों में ही देख कर संतोष करना पड़ता है!
“तुम सचमुच ही बद-किस्मत हो, लेकिन एक बात बताओ! जब तुम ऐसी मैगजीन देख लेते होगे तब तो और प्यास भड़क उठती होगी और शरीर में उत्तेजना भी फ़ैल जाती होगी… उस उत्तेजना को तुम कैसे शांत करते हो फ़िर?” मैं बोली.
“क्या भाभी जी आप भी कैसी बातें करती हो? क्यों मेरे जख्म पर नमक छिड़क रही हो… कैसे शांत करता हूँ… अपना हाथ जगन्नाथ…!” वह बोला.
“यानि अपने हाथ से ही अपने को संतुष्ट कर लेते हो और अगर मैं तुम्हारी ये मुश्किल दूर कर दूँ तो?” मैंने उसके गालों को सहला कर भेद भरे स्वर में कहा, मेरी आँखें रंगीन हो चुकी थी.
“क्या? आप कैसे मेरी मुश्किल दूर कर सकती हैं?” वह जिज्ञासु होकर बोला.
“इस बात को छोड़ो… यह बताओ कि अगर मैं तुम्हें यह छूट दे दूँ कि तुम मेरे कठोर और सुन्दर स्तनों को कपड़े हटा कर देख सकते हो तो बताओ तुम क्या करोगे?” मैंने अब उससे एकदम साफ़ कहा.
“जी… जी…” वह सकपका गया, उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ और बोला- आप तो मजाक कर रही हो भाभी!
“चलो मजाक में ही सही अगर कह दूँ तो क्या… कह ही रही हूँ… जतिन देवर जी… अगर तुम चाहो तो मेरे गाउन के चारों बटन खोल कर मेरी ब्रा में कैद मेरे स्तनों को ब्रा को हटा कर देख सकते हो…” मैंने उसके कुरते के गले में हाथ डाल कर उसके मजबूत सीने को सहला कर कहा.
“लगता है आप मुझ पर मेहरबान हैं या फ़िर मजाक कर रहीं हैं…!” उसे अभी भी यकीन नहीं आया.
“ओहो… बड़े शक्की आदमी हो… चलो मैं ही तुम्हारे स्तनों को देख भी लेती हूँ और मसल भी देती हूँ…” मैंने झल्ला कर उसके सीने पर मौजूद उसके दोनों छोटे छोटे निप्पलों को मसलना शुरू कर दिया.
“उफ… यह क्या कर रही हो भाभी…मुझे परेशानी होगी…!” वह मचल कर बोला.
“अब तुम तो कुछ करने को तैयार नहीं हो… तो मुझे ही कुछ करना पड़ेगा ना…!” मैंने कहा.
अब जतिन से पीछे नहीं रहा गया, उसने अपने ऊपर मुझे लेते हुए मेरे स्तनों को मेक्सी के ऊपर से ही सहलाना शुरु कर दिया और बोला- आज तो आप मुझे कत्ल कर के ही छोड़ेंगी… ये दोनों पर्वत कब से मुझे परेशान कर रहे हैं… अब मुझे मौका मिला है इन्हें परेशान करने का…” वह मेक्सी के बटन खोलने लगा था, उसकी क्रिया में बेताबी थी, मैं उसके कुर्ते के बटन खोल कर उसके सीने को सहला रही थी.
उसने कांपते हाँथों से मेक्सी के दोनों पल्लों को स्तनों से हटा कर ब्रेजरी के कप को नीचे कर दिया और स्तब्ध निगाहों से पहले मेरे गुलाबी रंग के कठोर स्तनों को देखता रहा फ़िर मैंने ही स्तन के निप्पल को उसके होठों में देकर कहा- लो… बुझाओ प्यास… मैं जानती हूँ… जबसे तुमने मैगजीन देखी है… तब से ही तुम्हारी प्यास भड़क उठी है!
उसने निप्पल मुंह में ले लिया और उसे चूसते हुए दूसरे स्तन को भी ब्रेजरी के कप में से निकालने की कोशिश करने लगा, उसकी कोशिश देख कर मैंने हाथों को पीछे ले जा कर ब्रेजरी के हुक को खोल दिया तो उसने दूसरे स्तन को भी उसके कप से निकाल कर हाथ में ले लिया और उसके निप्पल को जोर जोर से मसलने लगा.
मैं तरंगित होती जा रही थी, मैगजीन के पन्नों ने मेरी नसों का लहू गर्म कर दिया था, जिसको शीतल करने के लिये मुझे भी एक पुरुषीय-वर्षा की जरूरत थी, मैं उसके बालों को सहला रही थी.
“चूसो जतिन! जितना चाहो चूसो… तुम्हारे भईया को भी यही पसंद है…” मैंने उत्तेजित होते हुए कहा.
“लेकिन मेरी दिलचस्पी तो दूसरी चीज में भी है, उसे भी चूसने की इजाजत मिल जाये तो मजा दोगुना हो जाये…!” जतिन ने निप्पल को मुंह से निकाल कर कहा.
“उफ… पहले इस पहली चीज से तो जी भर लो! वह दूसरी चीज भी दूर नहीं है…” मैंने उसकी क्रिया से आनन्दित होते हुए कहा.
मेरे हाथ उसके पाजामे पर पहुँच चुके थे, मैं उसके नाड़े को खोलने ही जा रही थी कि उसने जरा नीचे को सरक कर मेरे सपाट चिकने पेट और नाभि को चूमना शुरू कर दिया, वह मेरी मेक्सी से परेशान होने लगा था, मैंने मेक्सी को शरीर से अलग कर दिया और पूरी तरह चित लेट गई, मेरी यौवन संपदा को साक्षात देख कर वह पागल सा होने लगा, मेरी जाँघों को और मेरे गोरे पांव के तलवों को पागलों की तरह जोर जोर से चूमने चाटने लगा.
मैं भी पागलों सी हो गई, मेरे कंठ से कामुक सिसकारियाँ छूटने लगी, उसके होंठ और उसकी जीभ मेरे शरीर में नया सा नशा घोलने लगी, वह मेरी टांगों के जरा जरा से हिस्से को चूम रहा था और सहला रहा था, उसने मेरी कमर में हाथ डाल कर मुझे पेट के बल लिटा दिया, अब मेरी पीठ और नितंबों के चूमे जाने का नंम्बर था, वह बड़ी ही कुशलता से मेरे संवेदनशील शरीर को सहला रहा था और चूम रहा था.
“तुम तो पूरे गुरु आदमी हो उफ… कैसे मेरे… उफ… .उफ… कैसे मेरे सारे शरीर में हर अंगुल पर एक ज्वालामुखी सा रखते हो… उफ…” मैं तरंगित स्वर में बोल रही थी- उफ… कहीं से ट्रेनिंग ली है क्या?
“ऐसा ही समझो भाभी… मैं एक कम्प्यूटर आर्टिस्ट हूँ… कम्प्यूटर की कई सी.डी. ऐसी आती हैं जिनमें संभोग के गजब गजब के आसन और मुद्रायें होती हैं…” उसने मेरे नितंबों से पेंटी सरकाते हुए कहा.
वह अब मेरे नितंबों पर चुंबन धर रहा था, मैं शोला बन गई थी, मेरी उत्तेजना शिखर पर पहुँच गई थी.
अब मुझसे रुका नहीं जा रहा था लेकिन फ़िर भी जतिन द्वारा मिलते चुंबनों के आनन्द ने मुझे और प्यासा बना डाला था, मैं चाहती थी कि मेरे शरीर के पोर पोर से वह काम रस चूस ले और मुझे पागल करके छोड़ दे.
वह अपनी क्रिया में व्यस्त था, मैं पुनः पीठ के बल हो गई थी और वह मेरी जाँघों को खोल कर मेरी केश विहीन योनि को चूस रहा था, मैं उत्तेजना में अपने स्तनों को स्वयं ही मथ रही थी.
“अपनी टांगें मेरी तरफ कर लो…” मैंने उससे कहा, तो उसने मेरा कहा मान लिया, उसके पाँव मेरे सिर के भी पीछे तक चले गए, मैंने फुर्ती से उसका पाजामा व अंडरवीयर उसके उत्तेजित लिंग से हटाया और आठ नौ इंच के लिंग को मुंह में ले लिया, उसका लिंग मेरे पति से मोटा था इस कारण मुझे होंठ पूरे खोलने पड़ गये, मैं उसे चूसने लगी.
अब तड़पने और उछलने की बारी उसकी थी.
“उफ… उफ… भा… भाभी… .आप तो लगता है मुंह में निचोड़ लेंगी मुझे… उफ…!”
“यह पहला टेस्ट तो मैं मुंह से ही लूंगी… फ़िर योनि में डलवाऊँगी, तुम लगे रहो उस काम में, जिसमें लगे हो…” इतना कह कर मैं फ़िर लिंग चूसने लगी, जतिन लिंग पर मेरे होठों का घर्षण अधिक देर तक नहीं झेल पाया और वह मेरी योनि को भूल कर मेरे कंठ में ही तेजी से धक्के मार कर स्खलित हो गया, उसका सुगन्धित व खौलता वीर्य मैं पी गई, फ़िर भी मैंने लिंग को नहीं छोड़ा और उसे चूस चूस कर पुनः उत्तेजित करने लगी.
थोड़ी देर मैं वह फ़िर कठोर हो गया तो मैंने योनि में उसे डलवाया.
जतिन ने ऐसे ऐसे ढंग से योनि को लिंग से रगड़ा कि मैं चीख पड़ी, उसने अन्ततः बेड से नीचे उतर कर खड़े होकर मेरी जाँघों को खोलकर ऐसे धक्के मारे कि मैं तृप्त हो गई और चरमोत्कर्ष तक पहुंची, वह पुनः स्खलित हो कर मुझसे लिपट गया.
अब मैं और मेरे पति इतने उन्मुक्त हो गये हैं कि मेरे घर मेरा देवर आ जाये, मेरा भाई आ जाये, शिल्पा आ जाये या मेरी कोई सहेली आ जाये या मेरे पति का कोई दोस्त आ जाये हम लोग हर किसी को अपनी काम क्रीड़ा में शामिल कर लेते हैं.
मेरी कामुकता ने सारी हदें पार कर दी हैं, मुझे तो कपड़े अच्छे लगते ही नहीं है, अब उस दिन मेरे ससुर आये थे तब भी मैंने ब्रा-पेंटी पर पारदर्शी गाउन पहन रखा था और मेरे पति ने उनकी उपस्थिति में भी शर्म ना की और मेरे उभारों को चूमते रहे!
मेरे ससुर को ही ड्राइंगरूम से उठ कर अपने कमरे में जाना पड़ा था! Antarvasna
यह पत्र गीता वर्मा ने Sex Stories पूनम सक्सेना को लिखा दोनों की एक सहेली सोनू की समस्या के बारे में :
प्रिय पूनम,
मैं गीता वर्मा हूँ, सोनू की रूम-मेट, मैं उसी के कॉलेज से बीएससी बायलोजी कर रही हूँ।
आज काफ़ी सुबह से उठकर सोनू नेट पर बैठी थी, मैंने उससे पूछा कि कोई परेशानी है क्या तुझे?
तो फिर उसने सब बताया और आपके बारे में भी बताया।
सोनू गांव की सीधी सादी एक लड़की है जो इन्दौर आई है पढ़ने के लिये, वो देखने में भी काफ़ी अच्छी है। उसकी फ़िगर ३२ २४ ३४ होगा करीबन। यहां इन्टरनेट पर बैठ कर उसकी जवानी मचल उठी है, जिसकी वजह से उसे परेशानियाँ हो रही हैं।
अब जवान लड़की की चूत है, आग तो लगेगी ही उसमें, उसका तो कोई क्या कर सकता है !
मैं उसके साथ ही सोती हूँ और मैंने उसे कई बार तड़पते हुए महसूस किया है, वो यह समझती है कि मैं सो रही हूँ।
वो अकसर करवट बदल बदल कर अपनी योनि पर सलवार के ऊपर से हाथ फ़ेरती है, रज़ाई डाल लेती है ऊपर से, और कम से कम रात में ६ या ७ बार बाथ रूम जाती है।
आप समझ सकती है कि क्या करने पर उसकी बेचैनी दूर होगी पर उसे पता ही नहीं कुछ और प्यासी ही लौट आती है शायद।
ऐसे में मेरी चूत में भी खुजली होने लगती है, पर मैं कंट्रोल कर लेती हूँ। मै भी अपनी योनि में उँगली करती हूँ कभी कभी !
अकसर नहाने से पहले या सुबह पहले पेशाब करने के बाद, मेरी झिल्ली अभी फ़टी नहीं है पर मैं इतना अन्दर कर लेती हूँ कि मजा आए और शान्ति मिल जाये, पर सोनू इतना नहीं कर पाती।
ना जाने क्यूँ अब यह तो उसकी चूत देखकर ही पता चलेगा कि क्या प्रोबलम है, पर आज उसने मुझे मना कर दिया चूत दिखाने को, पता नहीं क्यूँ, वो बोली कि नहीं मैं पहले पूनम जी से बात करूंगी।
और फिर मैने डाक्टर का कहा तो उसने मना कर दिया बोली कि नहीं, मैं डाक्टर के सामने नंगी नहीं होना चाहती हूँ !
अब आप तो समझ ही सकती है कि कोई लड़की कितना भी कर ले, लण्ड का मजा तो लण्ड से ही मिलता है, और वो हमको शादी से पहले नहीं मिलेगा।
वैसे मैं तो बायो की स्टूडेन्ट होने के कारण ये बोल सकती हूँ कि जब तक चूत की झिल्ली नहीं फ़टेगी तब तक पूरा पूरा सेटिस्फ़ेक्शन कभी नहीं होगा क्यूँकि योनि में जो आग लगती है जवानी में, वो अन्दर झिल्ली के पीछे लगती है। जब तक झिल्ली के पीछे तक उंगली य लण्ड नहीं जाता तब तक चूत प्यासी ही रहती है चाहे कोई ऊपर से कितना भी फ़िन्गर कर ले।
झिल्ली यानी हायमन एक पर्दा होता है, चमड़ी या स्किन कह लो, जिसमे बहुत छोटे छोटे छेद होते हैं या एक थोड़ा बड़ा भी हो सकता है,
इन छेदों से ही मासिक-धर्म का खून और चूत का पानी आता है, पर झिल्ली इसके बीच में एक रुकावट का काम करती है।
एक बार झिल्ली फ़ट जाये तो फ़िर सब खुल कर फ़्लो होता है, नहीं तो रुक रुक कर आता है।
मैने सोनू की चूत अभी देखी तो नहीं है पर ९०% लड़कियों की झिल्ली तो वैसे ही फ़ट जाती है, कभी खेलकूद में या स्कूटी वगैरह की किक लगाने में।
सोनू की चूत देखकर ही कहा जा सकता है कि उसकी झिल्ली फ़टी है या नहीं।
क्युंकि कभी कभी झिल्ली तो खुली होती है पर बस उसे एक हल्के से झटके की जरूरत होती है रास्ता साफ़ करने के लिये।
मैंने यही सोच कर सोनू को कहा था कि अपनी योनि दिखा !
हाँ, वैसे हमारे कॉलेज में टायलेट की दिक्कत है थोड़ी,
क्यूंकि इतनी उमर की लड़कियों में शरम लगती है, और सोनू तो बहुत शर्मीली है,
वो जीन्स भी नहीं पहनती कॉलेज में टायलेट के डर से कि पीछे से खुला दिखता है पेशाब करते वक्त।
मैंने उसको कई बार समझाया कि गर्ल्स टायलेट में गर्ल्स ही आती हैं तो इसमें शर्माना क्या?
तू अपना सू सू किया कर और आ जाया कर, या तो फिर वहाँ पर मत जाया कर,
यहाँ कमरे पर आकर कर लिया कर,
पर वो कहती है कि मुझे ज्यादा बार जाने की इच्छा होती है और रोक नहीं पाती एक घन्टे से ज्यादा।
खैर लड़कियों का ब्लेडर छोटा होता है पर मैं रोक लेती हू तीन घन्टे तक।
और वैसे भी मुझे शरम नहीं आती है वहां पर, मैं तो आराम से करके आ जाती हूँ,
भले ही मेरा मासिक हो रहा हो।
सोनू को पता नहीं क्या प्रोबलम है, बोलती है कि उठने बाद भी सू सू गिरता है पेन्टी पर।
और यहां कमरे के बाथ रूम में भी पूरे कपड़े उतार के नीचे बैठती है।
वैसे ये प्रोबलम ज्यादा सेक्स की इच्छा के कारण होती है, मुझे भी कभी कभी जब सेक्स की इच्छा होती है
तो ऐसा लगता है कि बाथ रूम जा कर आऊं और थोड़ा सा पेशाब आ भी जाता है।
सोनू के साथ यही हो रहा है शायद, इसलिये १०-१५ बार जाती है पेशाब के लिये।
और ऊपर से, पहले नीचे से नंगी होती है और फिर वापस कपड़े पहनती है।
वैसे अगर हम कल डाक्टर के पास गये तो भी डाक्टर इसका यही इलाज बतायेगी कि झिल्ली फ़ाड़ लो या किसी से सेक्स करा लो।
वैसे मैं तो जाऊंगी ही, मुझे तो मासिक भी ठीक से नहीं आ रहा है।
सोनू का पता नहीं कि वो जायेगी या नहीं
आप उस से बोल दें कि वो मुझे एक बार उसकी चूत देखने दे, शायद मैं उसकी समस्या हल कर सकूं।
और अगर वो किसी से चुदवाना चाहती हो तो एक रास्ता और है मेरे पास,
एक लड़के का भी इन्तज़ाम हो जायेगा, और अगर सिर्फ़ उसकी झिल्ली फ़ाड़नी हो तो भी एक रास्ता है मेरे पास,
अब जैसा आप सही समझें मुझे बता देना कि सोनू का क्या करना है
और हां मेरे दोनों प्लान अभी आपको नहीं बताये है कि मैं कैसे लाऊंगी लड़का या कैसे उसकी झिल्ली फाड़ूंगी
पूनम आप मुझे मेल करना मैं आपको प्लान बता दूंगी पर आप उसे मत बताना
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गीता
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