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लकी प्रोजेक्ट गाइड ‘ मेरी Sex Stories ज़िन्दगी का वो रूहानी अनुभव है जिसे मैं ताज़िन्दगी नहीं भूल पाऊंगा… उसे शब्दों में बयाँ कर पाना बहुत मुश्किल है। मैंने सोचा नहीं था कि कहानी इतनी लंबी हो जायेगी कि उसे दो-तीन किश्तों में लिखना पड़ेगा… इसीलिये मैंने उसे सिर्फ़ “लकी प्रोजेक्ट गाइड” नाम दिया था.. पर अब तो उसे “लकी प्रोजेक्ट गाइड-१” ही कहना पड़ेगा…
खैर.. “लकी प्रोजेक्ट गाइड” में आपने पढ़ा कि हम दोनों ऑर्गाज़्म पर पहुँच चुके थे… पसीने से तर-बतर हो चुके थे.. मेरा लंड शशि की चूत द्वारा निचोड़ा जा चुका था…. मैंने उसकी कमर के खम को पकड़ा और एक झटके से पूरे लंड को बाहर निकाल दिया…शशि के योनिपटों पे घिसटता हुआ लंड जैसे ही बाहर निकाला.. उसके नितंब थरथराये और उसके मुंह से एक संतुष्ट और मादक आवाज़ निकली…”आऽऽऽऽऽऽह…..”
हम दोनों फ़र्श पर ही लेट गये…निर्वस्त्र…उनींदी आँखों से छत को ताकते हुये…
जाने कब मेरी आँख लग गई थी पता ही नहीं चला….
अचानक खुली तो देखा कि शशि मेरे सुकड़े हुये लंड का फ़ोरस्किन खिसका रही थी…और सुपाड़े के सुराख को (जहाँ से वीर्य निकलता है) बड़े प्यार से निहार रही थी….
और धीरे-धीरे अपने जीभ के अग्रभाग को नुकीला सा करके उसमें मानो घुसेड़ने की कोशिश कर रही थी…
नसों में फ़िर से संचार शुरू हो गया…. और इतनी तेज़ हुआ कि कुछ ही पलों में मेरा लंड अपनी पूरी लम्बाई में आ गया…
उसने फ़ोरस्किन को पूरा नीचे खींच दिया…. सुपाड़ा बड़ा ही भयावह लग रहा था… लाल… खूब फ़ूला हुआ…
उसने अपना थ्री-मेगापिक्सेल कैमरे वाला मोबाइल उठाया… क्लिक… क्लिक… क्लिक… अलग-अलग कोणों से तकरीबन दस फ़ोटो लिये…. कैमरा एक तरफ़ रखा…. अपनी दोनों टाँगों को मेरे पूरी अदा से इठलाते हुये मेरे कमर के आजू-बाजू रखा….. अपना मुँह मेरी तरफ़ झुकाया… अपने सुडौल स्तन मेरी छाती पे दबाए…. चुम्बन लिया… इस तरह उसके नितम्ब थोड़ा ऊपर हुये…. मेरा लंड अपने हाथ से पकड़ा…. और सुपाड़े को योनिद्वार पर रगड़ने लगी….
जितनी सिसकारियाँ उसके मुँह से निकल रही थीं उससे ज़्यादा मेरे मुँह से निकल रही थीं…. रहा नहीं जा रहा था… हाय ये भूख…. जितना खाओ उतनी ही बढ़ती है…. हाय ये प्यास… कभी ना खत्म होने वाली प्यास…
आधे घंटे पहले लग रहा था कि बस आज के लिये काफ़ी हो गया.. और अब… देर करने का मन नहीं हो रहा था…. मैं बेसाख़्ता उसके होठों को चूसने लगा… उसकी गर्दन चाटते हुये मेरी जीभ उस दरार में पेवस्त होने लगी जिसे वो ऑफ़िस में छलकाती दिखाती थी…. मेरी नाक भी दोनों स्तन के बीच आ गई थी….और मैं उस खुश्बू से मदहोश होता जा रहा था….दोनों हाथों से उसके स्तन अगल-बगल से इस तरह भींचा..कि मेरी नाक…मेरा मुँह….मेरी जीभ…और मेरा पूरा वज़ूद उसके अमृत कलशों के बीच समा गया…मुझे लगा…स्वर्ग अगर कहीं है….तो यहीं है…यहीं है…बस यहीं है….
अचानक मुझे लंड पे कुछ नमी का अहसास हुआ….
“आय एम ड्रिपिंग”…. उसने वही शोख…. वही मादक… वही सरसराती सी आवाज़ में मेरे कान में कहा…..
और आहिस्ता-आहिस्ता मेरा सुपाड़ा उसकी गहराइयाँ नापने लगा…. अंदर काफ़ी लसलसापन था.. गर्माहट थी….
उसने कुछ सेकंड के लिये अपने चूतड़ों को वैसे ही हवा में रखा…. फ़िर धीरे धीरे इस तरह ऊपर-नीचे हिलाने लगी कि लंड का सिर्फ़ तीन-चार इंच अंदर-बाहर हो रहा था…..
करीब उसके बीस बार ऐसा करने के बाद मैं इतना उत्तेजित हो गया कि अपने कूल्हे की सारी मांस्पेशियों की ताकत इकट्ठा करके एक जोरदार झटका ऊपर की ओर दिया..
कि पूरा का पूरा लंड सरसराता हुआ अंदर हो गया….
“ओ माय गॉड”…वो चीखी…
और भरभराते हुये मेरे लंड को चूत में निगलते हुये बैठ गई….
लंड को अंदर लिये-लिये ही अपने चूतड़ों को आगे-पीछे और गोल-गोल घुमाने लगी…..
उसकी झाँटें मेरी झाँटों को रगड़ते हुये अजीब उत्तेजना पैदा कर रही थी….. पन्द्रह-बीस मिनट तक यही चलता रहा। कभी मैं उसके दोनों स्तनों को पकड़ता… उन्हें चूसता… चाटता…. और कभी उसके चूतड़ों में चपत लगाता… उन्हें मसल देता फिर नीचे को ओर(अपनी ओर) धक्का देता..।
अब मैं भी अपनी गांड़ का छेद सिकोड़कर अपनी चूतड़ों को ऊपर नीचे कर रहा था… वो और जोर सी चीखने लगी… चीखते-चीखते उसका पूरा शरीर मेरे ऊपर गिर सा पड़ा…. धड़कनें और साँसें धौंकनी की मानिन्द चल रही थीं….वो अभी भी चूतड़ों को धीरे-धीरे हिला रही थी….उसकी चूत से निकला कामरस मेरी झाँटों और अंडों को भिगोता हुआ अनवरत बहता जा रहा था ….
कुछ देर में वो निश्चेष्ट सी मेरे ऊपर पड़ी थी, अचानक मैंने अपने चूतड़ उछालने की स्पीड बढ़ा दी….करीब पच्चीस धक्कों के बाद मैं इतने जोर से स्खलित हुआ कि एक तेज़ धार उसके चूत के अंदर के दीवारों पर पड़ी और वो चिहुँक उठी….मैं धीरे-धीरे हिलाता हुया शांत हो गया…..पुरसुकून शांत…संतुष्ट और तृप्त…!!
शशि….अगर तुम कहीं यह पढ़ रही हो… तो शुक्रिया… मुझे वह शाम देने के लिये… वो यादगार लम्हा देने के लिये… ( और अपनी दो और सहेलियाँ देने के लिये..)
काफ़ी देर तक वैसे ही पड़े रहने के बाद हम दोनों उठे… चाय बना के पी … और मैं उसे एक और शाम का वादा करके उसके कज़िन के घर छोड़ आया… मेरे लंड की फ़ोटो उसके पास रह गई थीं… उसके चूत की यादें मेरे साथ आ गईं थीं।
समय अपनी गति से चलता रहा… प्रोजेक्ट अपनी गति से चलता रहा….
उस दिन मैं शाम को ऑफ़िस से लेट लौट रहा था…. ट्रैफ़िक बहुत ज़्यादा थी… मेरी बाइक बस स्टॉप के ठीक सामने थी… अचानक पीछे से आवाज़ आई.. “सर”
मैंने ध्यान नहीं दिया… एक हाथ ने मेरे कंधे को छुआ… वो स्मिता थी… साँवली… बड़ी-बड़ी आँखों वाली… ढीला-ढाला सा सलवार कुर्ता पहने हुये… दुपट्टा पूरे वक्षस्थल को ऐसे ढके हुये कि जिसमें देखकर लगता था कि अंदर खाली है।…कुर्ता इतना ढीला और बड़ा था कि नितम्भ का आकार भी नहीं दिखता था। कुल मिला कर उसमें कोई सेक्स-अपील नहीं नज़र नहीं आती थी।
“स्मिता?… हियर?… व्हाट हैप्पेंड?… मिस्ड योर बस?”
“यस सर…वुड यू प्लीज़ ड्रॉप मी टू नेक्स्ट स्टॉप?”
“ओह श्योर?” ऊपर से उत्साहित और अंदर से खीझा हुआ मैं बोला।
स्मिता पीछे क्रॉस-लेग (टाँगों को दोनों तरफ़ करके) बैठी, जैसे ही ट्रैफ़िक कम हुआ, मैंने बाइक बढ़ा दी। मैं उसको जल्दी से पहुँचा देना चाहता था पर अफ़सोस कि अगले स्टॉप में भी कोई बस नहीं थी। रिमझिम बारिश शुरू हो गई थी।
“अब क्या करें?” मैंने कहा।
“सर… मैं अपना मोबाइल भूल गई… आपके मोबाइल से एक कॉल कर लूँ?”
“श्योर..”
तब तक बारिश कुछ तेज हो गई थी, हम दोनों भीगने से बचने की नाकाम कोशिश करते रहे।
बादल छाये रहने के कारण शायद मोबाइल में नेटवर्क नहीं था, आसपास कोई बूथ भी नज़र नहीं आ रहा था।
“अर्जेंट है?” मैंने पूछा।
“हाँ…” उसने कहा।
मेरा घर वहाँ से सौ कदम पे था।
मैंने बेमन से कहा,”चलो मेरे घर.. लैंडलाइन से कर लेना !”
सुनते ही उसकी आँखों में अजीब सी चमक आई…
खैर हम लोग घर पहुँचे…. काफ़ी भीग चुके थे… उसने फ़ोन लगाया और जाने क्या-क्या बातें करती रही… मैं भीतर जाकर कपड़े बदल कर आ चुका था, वो तब भी फ़ोन पे लगी हुई थी… बात करते-करते अनजाने में (यह मुझे तब लगा था… बात में पता चला कि वह हरकत जान-बूझकर की गई थी) उसने भीगा दुपट्टा निकालकर एक तरफ़ रख दिया और मेरे पूरे शरीर में एकबारगी झुरझुरी सी हो गई…. सामने का नज़ारा ही कुछ ऐसा था…
उसने लो-कट (गहरे गले वाला) कुर्ते के अन्दर एक महीन सा शमीज़ पहन रखी थी जो कि पानी में उसके बदन से चिपक गई थी और उसके ठंड से नुकीले हो चुके काले-काले निप्प्ल साफ़ नज़र आ रहे थे ! पॉपिन्स के साइज़ का ऐरोला भी दिखाई दे रहा था और झटका खाने वाली बात यह थी कि उसके स्तन एकदम तने हुये बहुत बड़े-बड़े थे, इतने बड़े जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी, जिनको वो ढीले-ढाले कुर्ते और दुपट्टे के नीचे ढकी रहती थी। स्तनों का आकार साफ़ दिखाई दे रहा था और मेरी हालत वैसी ही हो रही थी जैसे उपवास के दिन मिठाइयों को देखकर होती है…
उसने फ़ोन रखा और अचानक अपना सर ऊपर उठाया और मेरी चोरी पकड़ी गई (तब तक तो मैं उसे चोरी ही समझ रहा था…. मुझे थोड़ी पता था कि जाल बिछा हुआ था… मैं दाना चुग रहा था… और सैयाद की आँखों में चमक थी… शिकार को दाना चुगते देखने की चमक….. या खुदा…. इन लड़कियों के लिये कितना आसान होता है लड़कों को पटाना…)
कातिल मुस्कुराहट के साथ उसने पूछा,”सर आपके पास आयरन बॉक्स है?”
“य.य..यस….है !” मेरी तंद्रा भंग हुई…
“मैं ये कुर्ता आयरन कर लेती हूँ…थोड़ा सूख जायेगा… तब तक इफ़ यू डोंट माइन्ड… आपका कोई शर्ट पहन लूंगी !”
“नो प्रॉब्लम…”
मैं आगे-आगे बेडरूम की तरफ़ चला… वो पीछे-पीछे आई… मैं एक शर्ट निकालने लगा… वो मेरी तरफ़ पीठ करके कुर्ता उतारने लगी… मैंने शर्ट उसको दिया..
“प्लीज़ बाहर जाइये ना !”
तब तक भी मैं उसे शर्मीली सी लड़की समझ रहा था।
मैं हॉल में चला गया… अंदर एक तूफ़ान सा उठा हुआ था… स्मिता के निप्पल.. ऐरोला.. पुष्ट स्तन… मेरी आँखों के सामने घूम रहे थे और मन ही मन आत्मग्लानि भी हो रही थी कि मैं इतनी सीधी-साधी लड़की के बारे में इस तरह से सोच रहा था। अचानक स्मिता आ गई… मेरी शर्ट पहने हुये…. चुस्त… इतना चुस्त कि दूसरे नम्बर का बटन जैसे खुला जा रहा था… वक्ष बाहर छलक रहे थे… थोड़ी सी झिर्री से स्तन की अंदर की मादक दरार और गोलाइयाँ झाँक रहे थे… और मेरी नज़र हट नहीं रही थी…. हालांकि स्मिता साँवली सी थी पर उसके स्तनों का रंग गोरा-गोरा था…
शर्ट चूँकि शॉर्ट-शर्ट थी…. उसकी कमर तक ही आ रही थी और कमर के नीचे का हिस्सा सिर्फ़ भीगे हुई सी सलवार में ढका था…… उस जगह मुझे चूत का त्रिकोण साफ़ दिखाई दे रहा था…उस त्रिकोण का रंग थोड़ा गहरा था, शायद उसकी झाँटें भी भीगकर कपड़े से चिपक गई थीं… त्रिकोण…. जादुई त्रिकोण..!! मेरी नीयत डोल चुकी थी…. अगर स्मिता सीधे मेरी आँखों में देखती तो लाल डोरे मेरी चुगली कर देते।
“इसको कहाँ लटका दूँ?” उसने अपना कुर्ता हवा में लहराया…
“उस कमरे में…! चलो…!” मैंने दूसरे कमरे की तरफ़ इशारा किया…
वो आगे-आगे चली…और मानो कयामत ही आ गई…उसके पुष्ट नितम्बों के आगे शशि के नितम्ब कुछ भी नहीं थे… मस्त उभरे हुये… गोल-गोल आकार के… जैसे साँचे में ढले हुये… कसे हुये… एक लय में ऊपर नीचे होते हुये… तीव्र इच्छा हुई कि इन्हें छू लूँ.. सहला लूँ… भींच लूँ…… उस दरार को महसूस कर लूँ जो इन मदभरी घाटियों के बीच है…
मैं कितना ग़लत था…. स्मिता में सेक्स अपील था… और गज़ब का सेक्स अपील था…. बस छुपा हुआ था…. अनछुआ था… आवृत था… और यहाँ मैं बेचैन था… उसे छूने उघाड़ने के लिये… छूने के लिये… अनावृत करने के लिये…
“यहाँ?”….उसने पूछा…एक रस्सी बांध रखी थी मैंने…कपड़े सुखाने के लिये…
“यस !”
उसके हाथ ऊपर उठाये….स्तन और भी तन गए…अब मैं जायजा लेने और भी करीब पहुँच गया… वह रस्सी तक नहीं पहुँच पा रही थी… पास पड़ा स्टूल खिसकाया.. उसपे चढ़ के सुखाने लगी…. मैं उसके सामने खड़ा था…उसके मधुघटद्वय के ठीक नीचे… उसने दोनों हाथ उठाये और सन्तुलन खोने के कारण भरभरा के मेरे ऊपर आई… मैं इस अप्रत्याशित घटना के लिये तैयार नहीं था.. प्रतिक्रिया में मैंने अपने दोनों हाथ उठाये.. ठीक वैसे ही जैसे कोई चीज़ सिर पे गिरने वाली हो और आप बचना चाहते हों….
स्टूल एक तरफ़ लुढ़का… वो मेरे ऊपर गिरी… उसके दोनों सुरा-कलश मेरे हाथों में आ गये… मैं उन्हें पकड़े-पकड़े नीचे गिर पड़ा…. उसके लम्बे-घने-खुशबूदार बाल मेरे चेहरे पर आ गये… उसके गाल मेरे गाल से सट गये… उसके होंठ मेरे कनपट्टी के नीचे… और मैं उसकी तेज़-तेज़ चलती साँसों को महसूस कर रहा था।
उसने अपने स्तनों को छुड़ाने की चेष्टा नहीं की.. मैंने खुद ही अपने हाथ हटा लिये… उसके स्तन मेरे सीने से चिपट गये और मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने धीरे से मेरे गर्दन में चूमा हो..
मेरे पूरे शरीर में करंट दौड़ गया… लंड की नसों और रगों में गरम खून उफ़नने लगा…. मेरा लोवर पतले वूलकॉट का होने के कारण लंड का कठोरता का अहसास स्मिता को हो चुका था और मुझे उसकी चूत के उभार का… उसने अपने चूत को लंड के ठीक ऊपर लाकर थोड़ा सा दबाव बढ़ाया… दिल की धड़कन… लंड की फ़ड़कन और चूत का स्पंदन… तीनों तेज हो गये थे…
अब मैं समझ चुका था कि स्मिता चाहती क्या है….
मैंने उसके मांसल नितम्बों को पकड़कर अपने लंड पे और दबाव बढ़ाया… उसने मुझे इतनी जोर से भींचा कि उसके स्तन पिघलने से लगे… और उसकी गर्मी से मैं पिघलने लगा…
उसने अपने सुलगते हुये होंठ मेरे होंठों पे रख दिये और मैं बेसाख्ता उन्हें चूसने लगा…
उसने अपने चूतड़ हिलाना शुरू कर दिया… उसने अपने हाथ फ़र्श पर टिकाये और चेहरा और कंधा ऊपर उठाया…मैंने उसके शर्ट के ऊपर के दोनों बटन खोल दिये और दोनों गोलाइयों को अपने हाथ में ले लिया… थोड़ा सहलाया… चुचूक पे चुटकी काटी और मुँह में लेकर चूसने लगा…
स्मिता सिसकारी भरते हुये अपने चूतड़ों को ऊपर नीचे करने लगी।
उसने मेरे लोवर के अंदर हाथ डाल कर मेरा लंड पकड़ लिया… अपनी तर्जनी से सुपाड़े के सुराख का जायजा लिया जिसमें लसलसा प्रि-कम निकल रहा था….
अचानक वो नीचे की तरफ़ सरकी, मेरा लोवर पूरा उतार दिया और मेरे तन्नाये हुये लंड को चूमने-चाटने लगी…
मैं बेकाबू होता जा रहा था… लंड चूसते-चूसते उसने अपनी गांड घुमा के मेरे मुँह के सामने कर दिया.. मैं इशारा समझ गया… उसकी सलवार का नाड़ा खोला और उसकी पैंटी सरका दी..
एक मदहोश कर देने वाली सुगंध से मेरे नथुने भर गये… उसकी टाँगों को चौड़ा करके मैंने अपनी जीभ उसकी योनि की पंखुड़ियों के बीच धंसा दी… बीच-बीच में अपनी उंगली उसकी चूत में घुसेड़कर उसके जी-स्पॉट को छेड़ देता था और फ़िर जीभ की नोक से उसके क्लाइटोरिस को चाटने लगा….
स्मिता अपने चूतड़ों को ऊपर नीचे हिलाने लगी… दस मिनट के बाद हम वुमन-ऑन-टॉप पोज़िशन पे आ गये… स्मिता जैसे ही सीधी होकर मेरे ऊपर आई मैंने उसने चूचकों को अपने मुँह के हवाले कर दिया। वो अपने चूतड़ उठाकर मेरे लंड के सुपाड़े को चूत के फ़ाँकों में रगड़ने लगी। जब चूत पूरी तरह गीली हो गई तो उसने धीरे से सुपाड़ा चूत के अंदर ले लिया…
थोड़ी देर तक ऐसे ही पूरे तरह फ़ूले हुये सुपाड़े का साइज़ नापने के बाद और हाथ से पकड़ कर लंड की लम्बाई का अंदाजा लगाने के बाद, पूरी तरह इस बात से आश्वस्त होने के बाद कि वो इस लम्बाई को झेल लेगी, वो धीरे से नीचे बैठी और मेरा लंड करीब चार इंच अंदर धंस गया।
“आआआह” वो थोड़ा सा तड़पी… और उतना ही अंदर डाले-डाले करीब दो मिनट तक ऊपर-नीचे हिलती रही, फ़िर एक झटके के साथ पूरा नीचे बैठ गई और उसकी चूत ने मेरा पूरा साढ़े आठ इंच का लंड निगल लिया… पूरा साढ़े आठ इंच…. चूत की लीला अपम्पार है!
एक चीख सी निकली स्मिता के कंठ से और शरीर ऐंठने सा लगा… चुपचाप बैठकर… लंड को निगले हुये वो दर्द पीती रही… जब दर्द का अहसास कम हुआ तो फ़िर से चूतड़ हिला-हिलाकर मुझे चोदने लगी… जिन आंखों में चंद लम्हों पहले असीम दर्द था… अब उनमें चमक थी… मस्ती थी… नशा था… उन्माद था…
जिस चूत में सुपाड़ा भी बमुश्किल जा रहा था उसमें मेरा पूरा लंड बल्कि मेरा पूरा वज़ूद समाया हुआ था…!
कॉलेज में किसी ने ये लाइनें सुनाई थीं:
पहले तो न जाती थी कील चूत में
और अब तो बन गई है झील चूत में
एक दिन घुस गई चील चूत में
वहाँ उसको मिल गया वकील चूत में
वकील ने ठोक दी अपील चूत में
कि मैंने तो लगाई थी सील चूत में
फ़िर किसने बना दी झील चूत में
इतना कोमल होती है यह चूत कि एक इंच का कड़ा सुपाड़ा भी उसके लिये कष्टप्रद होता है…और इतनी लचकदार होती है यह चूत कि चार इंच से लेकर आठ-नौ इंच के लंड को निगल सकती है….!
हे चूत…तुझे नमन है…प्रचंड लंड का नमन…!!!
फ़िलोसॉफ़ी बहुत हुई… बहरहाल… जब उसके दर्द का अहसास कम हुआ तो फ़िर से चूतड़ हिला-हिलाकर मुझे चोदने लगी..
और मैं भी नीचे से पिल पड़ा… कभी उसके चूतड़ों को भींचकर… कभी उसके स्तनों को भींचकर…
चालीस मिनट के जद्दोज़हद के बाद आखिर हमें मंज़िल मिल ही गई… स्मिता निढाल होकर मेरे ऊपर लेट गई… ना वो मेरी प्रोजेक्ट स्टूडेंट रही… ना मैं उसका गाइड रहा… सब बराबर हो गया था… कोई अंतर नहीं था…
करीब दस मिनट बाद मैंने उसका चेहरा उठाया और चूम लिया… और उसने मुझे बांहों में कस लिया…
बाहर बारिश भी थम चुकी थी…
हम दोनों उठे… उसके कपड़े सूख चुके थे… उसने कपड़े पहने….
अपना पर्स उठाया.. मुझे किस किया और शोखी से मुस्कुराये हुये कहा,”अगर मैं आपको एक राज़ की बात बताऊँ तो आप नाराज़ तो नहीं होंगे?”
“नहीं…बोलो !”
उसने अपना पर्स खोला और अपना मोबाइल निकालकर दिखाया..
मैं भौंचक..”तो तुमने झूठ कहा था कि तुम अपना मोबाइल भूल गई थी ?”
“सर आपने वादा किया था… आप नाराज़ नहीं होंगे… जबसे शशि ने मुझे आपके किंग साइज़ प्राइवेट पार्ट्स के फ़ोटो दिखाये थे तबसे मैंने ठान लिया था.. कि अगर मेरी जवानी किसी के लिये बेनकाब होगी, बेपर्दा होगी..तो इसी के लिये होगी”
“तो वो तुम्हारा बस छूटना…”
“सब प्लानिंग थी सर… मैं तो अपनी स्कूटी लेकर आती हूँ…” उसने खिलखिलाते हुये राज खोला।
मैं उल्लू की तरह उसे देख रहा था… फ़िर मैंने पूछ ही लिया,”तुमने तो इतना खूबसूरत शरीर पाया है… आज अगर तुम यहाँ नहीं आती तो मुझे पता भी नहीं चलता.. लेकिन तुम ये सब इतना छुपा-छुपा के क्यों रखती हो…?”
“मेरा परिवार थोड़ा दकियानूसी ख़यालों वाला है.. और हमें अपने आपको अच्छा दिखाने का अधिकार नहीं है !”
“बट यू आर फ़ैबुलस.. !”
“थैंक्स फ़ॉर द कॉम्प्लिमेंट… और आप भी सर.. कितने अच्छे हैं.. .कितने पैशनेट और पावरफ़ुल लव्हर हैं…. आपकी बीवी कितनी खुशकिस्मत होगी !”
हम दोनों ने एक दूसरे को बांहों में भरा… उसने फ़ुसफ़ुसाते हुये मेरे कानो में कहा,”आपके फोटोग्राफ़्स नेहा ने भी देखे हैं… और वो जल जायेगी जब मैं उसको आज की बात बताऊँगी… बाय सर !”
“टेक केयर !”…मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया…
फ़िर नेहा का मासूम चेहरा मेरी आंखों के सामने घूम गया… और मेरे होठों पे एक भेदभरी मुस्कान ना चाहते हुये भी आ ही गई !
शब्दार्थ :
मधुघटद्वय- मधु यानि शहद, घट यानि घड़ा, द्वय यानि जोड़ा !
शहद भरे घड़ों का जोड़ा ! Sex Stories
दोस्तो, अन्तर्वासना कहानी हिंदी में इंडियन सेक्स स्टोरीज में आपने अब तक पढ़ा था कि पण्डित जी रीना की जवानी को भोगने के चक्कर में उसको पूजा करवाने के लिए फंसा चुके थे. वे दोनों पूजा करने के लिए चौकड़ी मार कर बैठे थे.
अब आगे..
पण्डित- पुत्री.. ये नारियल अपनी झोली में रख लो.. इसे तुम परसाद समझो.. तुम दोनों हाथ सिर के ऊपर से जोड़ कर शिव का ध्यान करो.
रीना सिर के ऊपर से हाथ जोड़ के बैठी थी.. पण्डित उसकी झोली में फ़ल डालता रहा.
रीना की इस पोजीशन में उसके चूचे और नंगा पेट पण्डित के लंड को सख्त कर रहे थे. रीना की नाभि भी पण्डित को साफ़ दिख रही थी.
पण्डित- रीना पुत्री.. ये मौलि (धागा) तुम्हें अपने पेट पर बांधनी है.. वेदों के अनुसार इसे पण्डित को बांधना चाहिए.. लेकिन यदि तुम्हें इसमें लज्जा की वजह से कोई आपत्ति हो तो तुम खुद बांध लो.. परन्तु विधि तो यही है कि इसे पण्डित बांधे.. क्योंकि पण्डित के हाथ शुद्ध होते हैं.. आगे जैसे तुम्हारी इच्छा.
रीना- पण्डित जी.. वेदों का पालन करना मेरा धर्म है.. जैसा वेदों में लिखा है आप वैसा ही कीजिये.
पण्डित- मौलि बांधने से पहले गंगाजल से वो जगह साफ़ करनी होती है.
पण्डित ने रीना के पेट पे गंगाजल छिड़का.. और उसका नंगा पेट गंगाजल से धोने लगा. रीना के पेट की स्किन अन्य औरतों के बनिस्बत बहुत कोमल थी. पण्डित उसके पेट को रगड़ रहा था. फिर उसने तौलिए से रीना का पेट पोंछ कर सुखाया.
रीना के हाथ सिर के ऊपर थे.. पण्डित रीना के सामने बैठ कर उसके पेट पे मौलि बांधने लगा.. पहली बार पण्डित ने रीना के नंगे पेट को छुआ.
गाँठ बांधते समय पण्डित ने अपनी उंगली रीना की नाभि पर रखी.
अब पण्डित ने उंगली पे लाल रंग की रोली लेकर रीना के पेट टीका जैसा लगाया.
पण्डित- रीना.. शिव को पार्वती की देह (बॉडी) पर चित्रकारी करने में आनन्द आता है.
ये कह कर पण्डित रीना के पेट पर गोल टीका बढ़ा करते हुए लगाने लगा. फिर उसने रीना के पेट पर त्रिशूल बनाया.
रीना की नाभि पर आ कर पण्डित रुक गया. अब पण्डित अपनी उंगली रीना की नाभि में घुमाने लगा. वो रीना की नाभि में टीका लगा रहा था. रीना के दोनों हाथ ऊपर थे. वह भोली थी.. और इन सब चीजों को धर्म समझ रही थी. लेकिन ये सब उसे भी कुछ कुछ अच्छा लग रहा था.
फिर पण्डित घूम कर रीना के पीछे आया.. उसने रीना की पीठ पर गंगाजल छिड़का और हाथ से उसकी पीठ पर गंगाजल लगाने लगा.
पण्डित- गंगाजल से तुम्हारी देह और शुद्ध हो जाएगी, क्योंकि गंगा शिव की जटाओं से निकल रही है इसलिए गंगाजल लगाने से शिव प्रसन्न होते हैं.
रीना के ब्लाउज के हुक्स नहीं थे.. पण्डित ने खुले हुए ब्लाउज को और साइड में कर दिया.. रीना की आलमोस्ट सारी पीठ नंगी हो गई. पण्डित उसकी नंगी पीठ पर गंगाजल डाल कर रगड़ रहा था. वो उसकी नंगी पीठ अपने हाथों से धो रहा था. रीना की नंगी पीठ को छूकर पण्डित का लंड एकदम टाईट हो गया था.
पण्डित- तुम्हारी राशी क्या है?
रीना- कुम्भ.
पण्डित- मैं टीके से तुम्हारी पीठ पर तुम्हारी राशी लिख रहा हूँ.. गंगाजल से शुद्ध हुई तुम्हारी पीठ पर तुम्हारी राशी लिखने से तुम्हारे ग्रहों की दशा लाभदायक हो जाएगी.
पण्डित ने रीना की नंगी पीठ पर टीके से कुम्भ की जगह लंड लिखा..
फिर पण्डित रीना के पैरों के पास आया.
पण्डित- अब अपने चरण सामने करो.
रीना ने पैर सामने कर दिये.. पण्डित ने उसका पेटीकोट थोड़ा ऊपर चढ़ाया.. उसकी टांगों पर गंगाजल छिड़का.. और उसकी टांगें अपने हाथों से रगड़ने लगा.
पण्डित- हमारे चरण बहुत सी अपवित्र जगहों पर पड़ते हैं.. गंगाजल से धोने के पश्चात अपवित्र जगहों का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.. तुम शिव का ध्यान करती रहो.
रीना- जी पण्डित जी..
पण्डित- रीना.. यदि तुम्हें ये सब करने में लज्जा आ रही हो तो ये तुम खुद कर लो.. परन्तु वेदों के अनुसार ये कार्य पण्डित को ही करना चाहिये.
रीना- नहीं पण्डित जी.. यदि हम वेदों के अनुसार नहीं चले तो शिव कभी प्रसन्न नहीं होंगे.. और भगवान के कार्य में लज्जा कैसी.
रीना अंधविश्वासी थी.
पण्डित ने रीना का पेटीकोट घुटनों के ऊपर चढ़ा दिया.. अब रीना की टांगें जांघों तक नंगी थीं.
पण्डित ने उसकी जांघों पर गंगाजल लगाया और उसकी जांघें हाथों से धोने लगा. रीना ने शर्म से अपनी टांगें जोड़ रखी थीं तो पण्डित ने कहा.
पण्डित- रीना.. अपनी टांगें खोलो.
रीना ने धीरे धीरे अपनी टांगें खोल दीं. अब रीना पण्डित के सामने टांगें खोल कर बैठी थी. उसकी ब्लैक कच्छी पण्डित को साफ़ दिख रही थी. पण्डित ने रीना की जांघों को अन्दर तक छुआ.. और उन्हें गंगाजल से रगड़ने लगा.
इस वक्त पण्डित के हाथ रीना की चूत के नज़दीक थे.. कुछ देर रीना की पूरी जांघों को धोने के बाद अब वो उस जगह तौलिए से रगड़ कर सुखाने लगा.
फिर उसने उंगली में टीका लगाने के लिए रोली ली और रीना की जांघों के अन्दर तक चुत के नजदीक पे लगाने लगा.
रीना शरमाते हुए बोली- पण्डित जी.. यहाँ भी टीका लगाना होता है?
वो जरा असहज महसूस कर रही थी.
पण्डित- हाँ.. यहाँ देवलिंग बनाना होता है.
रीना टांगें खोल कर बैठी थी और पण्डित उसकी अंदरूनी जाँघों पर उंगलियों से देवलिंग बना रहा था.
पण्डित- रीना.. लज्जा ना करना..
रीना- नहीं पण्डित जी..
जैसे उंगली से माथे (फ़ोरेहेड) पर टीका लगाते हैं, पण्डित कच्छी के ऊपर से ही रीना की चूत पे भी टीका लगाने लगा. रीना शर्म से लाल हो रही थी.. लेकिन गरम भी हो रही थी. पण्डित टीका लगाने के बहाने 5-6 सेकंड्स तक कच्छी के ऊपर से रीना की चूत रगड़ता रहा.
चूत से हाथ हटाने के बाद पण्डित बोला.
पण्डित- विधि के अनुसार मुझे भी गंगाजल लगाना होगा.. अब तुम इस गंगाजल को मेरी छाती पर लगाओ.
पण्डित लेट गया.
रीना- जी पण्डित जी.
पण्डित ने छाती शेव कर रखी थी.. और पेट भी.. उसकी छाती और पेट बिल्कुल सफाचट चिकने और कोमल थे.
रीना गंगाजल से पण्डित की छाती और पेट रगड़ने लगी. रीना को अन्दर ही अन्दर पण्डित का बदन आकर्षित कर रहा था.. उसकी चुत पर पंडित की उंगली की रगड़न का अहसास अभी तक हो रहा था. उसके मन में आया कि पण्डित का बदन कितना कोमल और चिकना है.
ऐसे ख्याल रीना के मन में पहले कभी नहीं आये थे.
पण्डित- अब तुम मेरी छाती पर टीके से गणेश बना दो.. गणेश इस प्रकार बनना चाहिये कि मेरे ये दोनों निप्पलों गणेश के ऊपर के दोनों आँखों के बिंदु हों.
निप्पलों का नाम सुन कर रीना शरमा गई.
रीना ने गणेश बनाया.. लेकिन उसने टीके से सिर्फ गणेश के नीचे के दो खानों की बिन्दुएँ ही बनाईं.
पण्डित- रीना.. गणेश में चार बिंदु डालते हैं.
रीना- पण्डित जी.. लेकिन ऊपर की दो बिंदु तो पहले से ही बनी हुई हैं?
पण्डित- परन्तु टीका उन पर भी लगेगा.
रीना पण्डित के निप्पलों पर टीका लगाने लगी.
पण्डित- मानव की नाभि उसकी ऊर्जा का स्त्रोत होती है.. अतः यहाँ नाभि पर भी टीका लगाओ.
रीना- जो आज्ञा पण्डित जी.
रीना ने उंगली में टीका लगाया.. पण्डित की नाभि में उंगली डाली.. और टीका लगाने लगी. पण्डित ने रीना को आकर्षित करने के लिए अपना पेट और छाती शेव करने के साथ साथ अपनी नाभि में थोड़ी क्रीम भी लगाई थी.. इसलिए उसकी नाभि चिकनी हो गई थी.
रीना सोच रही थी कि इतनी चिकनी नाभि तो उसकी खुद की भी नहीं है. रीना पण्डित के बदन की तरफ़ खिंची चली जा रही थी. ऐसे विचार उसके मन में पहले कभी नहीं आये थे.
रीना ने पण्डित की नाभि में से अपनी उंगली निकाली.. पण्डित ने अपने थैले से एक लंड के आकार की लकड़ी निकाली लकड़ी बिल्कुल चिकनी थी.. करीब 5 इंच लम्बी और एक इंच मोटी थी.
लकड़ी के अंत में एक छेद था.. पण्डित ने उस छेद में डाल कर मौलि बाँधी.
पण्डित- ये लो.. ये देवलिंग है.
रीना ने देवलिंग को प्रणाम किया.
पण्डित- इस देवलिंग को अपनी कमर में बांध लो.. ये हमेशा तुम्हारे सामने तुम्हारे पेट के नीचे आना चाहिये.
रीना- पण्डित जी.. इससे क्या होगा..?
पण्डित- इससे शिव तुम्हारे साथ रहेगा.. यदि किसी और ने इसे देख लिया तो शिव कुपित हो जाएगा. अतः ये किसी को दिखाना या बताना नहीं है.. और तुम्हें हर समय ये बांधे रखना है.. सोते समय भी.
रीना- जैसा आप कहें पण्डित जी.
पण्डित- लाओ.. मैं बांध दूँ.
दोनों खड़े हो गए.. पण्डित ने वो देवलिंग रीना की कमर में डाला और उसके पीछे आकर मौलि की गाँठ बांधने लगा. इस वक्त उसके हाथ रीना की नंगी कमर को छू रहे थे.
गाँठ लगाने के बाद पण्डित बोला.
पण्डित- अब इस देवलिंग को अन्दर डाल लो.
रीना ने देवलिंग को अपने पेटीकोट के अन्दर कर लिया.. देवलिंग रीना की टांगों के बीच में आ रहा था.
पण्डित- बस.. अब तुम वस्त्र बदल कर घर जा सकती हो.. जो टीका मैंने लगाया है उसे ना हटाना.. चाहे तो घर जा कर साड़ी उतार कर सलवार कमीज़ पहन लेना.. जिससे की तुम्हारी देह पर लगा टीका किसी को दिखे ना..
रीना- परन्तु स्नान करते समय तो टीका हट जायेगा?
पण्डित- उसकी कोई बात नहीं.
रीना कपड़े बदल कर अपने घर आ गई.. उसने टांगों के बीच देवलिंग पहन रखा था.. पूरे दिन वह टांगों के बीच देवलिंग लेकर चलती फिरती रही. देवलिंग उसकी टांगों के बीच हिलता रहा. उसकी चुत के पास की स्किन को टच करता रहा.
रात को सोते वक्त रीना कच्छी नहीं पहनती थी. जब रात को रीना सोने के लिए लेटी हुई थी तो देवलिंग रीना की चूत के सीधे सम्पर्क में था. रीना देवलिंग को दोनों टांगें टाईटली जोड़ कर दबाने लगी.. ऐसा करने से उसे अच्छा लग रहा था. उसे इस वक्त अपने पति के लिंग (पेनिस) की भी याद आ रही थी. उसने सलवार का नाड़ा खोला.. देवलिंग को हाथ में लिया और देवलिंग को हल्के हल्के से अपनी चूत पर दबाने लगी. फिर देवलिंग को अपनी चूत पे रगड़ने लगी.. वह गरम हो रही थी.. तभी उसे ख्याल आया कि रीना, ये तू क्या कर रही है.. देवलिंग के साथ ऐसा करना बहुत पाप है. ये सोच कर रीना ने देवलिंग से हाथ हटा लिया.. सलवार का नाड़ा बाँधा और सोने की कोशिश करने लगी.
तकरीबन आधी रात को रीना की आँख खुली.. उसे अपनी हिप्स के बीच में कुछ चुभ रहा था.. उसने सलवार का नाड़ा खोला.. हाथ हिप्स के बीच में ले गई.. तो पाया कि देवलिंग उसकी हिप्स के बीच में फंसा हुआ था. देवलिंग का मुँह रीना की गांड के छेद से चिपका हुआ था. रीना को पीछे से ये चुभन अच्छी लग रही थी.. उसने देवलिंग को अपनी गांड पर और दबाया, उसे मज़ा आया. अब उसने और दबाया.. तो और मज़ा आया. उसकी गांड में आग सी लगी हुई थी. उसका दिल चाह रहा था कि पूरा देवलिंग गांड के छेद में दबा दे. तभी उसे फिर ख्याल आया कि देवलिंग के साथ ऐसा करना पाप है.. उसने ये भी सोचा कि क्या भगवान शिव मेरे साथ ऐसा करना चाहते हैं. डर के कारण उसने देवलिंग को टांगों के बीच में कर लिया.. नाड़ा बाँधा.. और सो गई.
अगले दिन रीना उसी पिछले रास्ते से पण्डित के पास सलवार कमीज़ पहन कर गई.
पण्डित- आओ रीना.. जाओ दूध से स्नान कर आओ.. और वस्त्र बदल लो..
रीना दूध से नहा कर कपड़े पहन रही थी तो उसने देखा कि आज जोगिया ब्लाउज और पेटीकोट के साथ जोगिया रंग की कच्छी भी पड़ी थी. उसने अपनी कच्छी उतार कर जोगिया कच्छी पहन ली.. और नहा कर बाहर आ गई.
पण्डित अग्नि जला कर बैठा मन्त्र पढ़ रहा था. रीना भी उसके पास आ कर बैठ गई.
पण्डित- रीना.. आज तो तुम्हारे सारे वस्त्र शुद्ध हैं ना..?
रीना थोड़ा शरमा गई..
रीना- जी पण्डित जी..
वह जानती थी कि पण्डित का मतलब कच्छी से है.
पण्डित- तुम चाहो तो वो देवलिंग फिलहाल निकाल सकती हो.
रीना खड़ी होकर देवलिंग की मौलि खोलने लगी.. लेकिन गाँठ काफी टाईट लगी थी.. पण्डित ने ये देखा.
पण्डित- लाओ मैं खोल दूँ.
पण्डित भी खड़ा हुआ.. रीना के पीछे आ कर वो मौलि खोलने लगा.
पण्डित- देवलिंग ने तुम्हें परेशान तो नहीं किया.. खास कर रात में सोने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई..?
रीना कैसे कहती कि रात को देवलिंग ने उसकी गांड के छेद के साथ क्या किया है.
रीना- नहीं पण्डित जी.. कोई परेशानी नहीं हुई.
पण्डित ने मौलि खोली.. रीना ने देवलिंग पेटीकोट से निकाला तो पाया कि मौलि उसके पेटीकोट के नाड़े में उलझ गई थी. रीना कुछ देर कोशिश करती रही लेकिन मौलि नाड़े से नहीं निकली.
पण्डित- रीना.. पूजा में विलम्ब हो रहा है.. लाओ मैं निकाल दूँ.
पण्डित रीना के सामने आया और उसके पेटीकोट के नाड़े से मौलि निकालने लगा.
पण्डित- ये ऐसे नहीं निकलेगा.. तुम ज़रा लेट जाओ.
रीना लेट गई.. पण्डित उसके नाड़े पे लगा हुआ था.
पण्डित- रीना.. नाड़े की गाँठ खोलनी पढ़ेगी.. पूजा में विलम्ब हो रहा है.
रीना- जी.
पण्डित ने पेटीकोट के नाड़े की गाँठ खोल दी.. गाँठ खोलने से पेटीकोट लूज हो गया और रीना की कच्छी से थोड़ा नीचे आ गया.
रीना शर्म से लाल हो रही थी.. पण्डित ने रीना का पेटीकोट थोड़ा नीचे सरका दिया. रीना पण्डित के सामने लेटी हुई थी.. उसका पेटीकोट उसकी कच्छी से नीचे था. मौलि निकालते वक्त पण्डित की कोहनी रीना की चूत के पास लग रही थी. कुछ देर बाद मौलि नाड़े से अलग हो गई.
पण्डित- ये लो.. निकल गई..
पण्डित ने मौलि निकाल कर रीना के पेटीकोट का नाड़ा बांधने लगा.. उसने नाड़े की गाँठ बहुत टाईट बाँधी.. जिससे रीना को दिक्कत हुई.
रीना- अह.. पण्डित जी.. बहुत टाईट है..
पण्डित ने फिर नाड़ा खोला.. और इस बार गाँठ लूज बाँधी.
फिर दोनों चौकड़ी मार के बैठ गए.
पण्डित- अब तुम ये मन्त्र 200 बार पढो.. और उसके बाद शिव की आरती करना है.
जब रीना की मन्त्र और आरती खत्म हो गई तो पण्डित ने कहा.
पण्डित- मैंने कल वेद फिर से पढ़े तो उसमें लिखा था कि स्त्री जितनी आकर्षक दिखे, शिव उतनी ही जल्दी प्रसन्न होते हैं. इसके लिए स्त्री जितना चाहे श्रृंगार कर सकती है.. लेकिन सच कहूँ..
रीना- हाँ कहिये पण्डित जी..
पण्डित- तुम पहले से ही इतनी आकर्षक दिखती हो कि शायद तुम्हें श्रृंगार की आवश्यकता ही ना पढ़े.
रीना अपनी तारीफ़ सुन कर शरमाने लगी.
पण्डित- मैं सोचता हूँ कि तुम बिना श्रृंगार के इतनी सुन्दर लगती हो.. तो श्रृंगार के पश्चात तो तुम बिल्कुल अप्सरा लगोगी.
रीना- कैसी बातें करते हैं पण्डित जी.. मैं इतनी सुन्दर कहाँ हूँ.
पण्डित- तुम नहीं जानती तुम कितनी सुन्दर हो.. तुम्हारा व्यवहार भी बहुत चंचल है.. तुम्हारी चाल भी आकर्षित करती है.
रीना ये सब सुन कर शरमा रही थी.. मुस्कुरा रही थी.. उसे अच्छा लग रहा था.
आगे की अन्तर्वासना कहानी भाग 3 में पढें
साथियो हिंदी में इंडियन सेक्स स्टोरीज का मजा लेते रहें!
दोस्तों ! सबसे पहले मैं Antarvasna Sex Stories आप सभी का धन्यवाद करना चाहूँगा कि आपने मेरी पिछली कहानी “इब तो बाड़ दे” का पहला भाग बहुत पसंद किया । मैंने उस कहानी में आपको बताया था कि कैसे मैंने अपने साथ ट्यूशन पढ़ने वाली मोना को चोदा था। उसकी चुदाई करने के बाद जब हम घर से बाहर निकले थे तो हमें ट्यूशन पढ़ाने वाली मास्टरनी अनीता सांगवान सामने से आती मिली थी। जिस तरह से वो हमें घूर रही थी मुझे लगा उसे पूरा शक हो गया है कि हमने उस मौके का भरपूर फायदा उठाया है।
मैंने मोना को मज़ाक में कह तो दिया था कि साली मास्टरनी को भी पटक कर रगड़ दूंगा पर वास्तव में मैं अन्दर से बहुत डरा हुआ था। सच पूछो तो मेरी गांड तो इस डर से फटी जा रही थी कि अगर मास्टरनी ने वो गीली चद्दर देख ली तो मैं तो मारा ही जाऊँगा। अब तो बस गोपी किशन का ही सहारा बचा था। अगले 2 दिन मैं ट्यूशन पर ही नहीं गया।
तीसरे दिन जब मैं शाम को उसके घर गया तो मास्टरनी ड्राइंग रूम में ही बैठी जैसे हमारा इंतज़ार कर रही थी। काँता आंटी भी पास बैठी थी। जिस तरीके से वो दोनों खुसर फुसर करती मुझे घूर रही थी मुझे लगा जैसे उनकी नज़रें नहीं कोई एक्स-रे मशीन से मेरी स्क्रीनिंग कर रही हैं। काँता आंटी उठ खड़ी हुई और मेरी और रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराते हुए अपने घर चली गई। अब मास्टरनी मेरी ओर मुखातिब हुई।
“हम्म … तुम कल नहीं आये जीत ?”
“वो … वो …” मेरे गले से तो कोई आवाज ही नहीं निकल रही थी।
“हम्म …?”
“वो … दरअसल मेरी तबियत खराब थी “
“क्यों तुम्हें क्या हुआ था ?”
“ब…. ब … बुखार था ?”
“वाइरल तो नहीं था ?”
“हाँ हाँ वही था !”
“तो एक दिन में ठीक कैसे हो गया ?”
“वो…. वो …” मैं क्या बोलता। मैंने अपनी मुंडी नीचे कर ली।
“उस छोरी न के हुआ ?”
“कौन … ?”
“हाय मैं मर जावां ? मैं उस छमक छल्लो मोना की बात कर रही हूँ ?”
“ओह … वो… वो … ओह … मुझे क्या पता ?” मैंने सर झुकाए ही कहा। मैं सोच रहा था अगर मैंने नज़रें मिलाई तो मास्टरनी पहचान लेगी।
“तन्नै ते नी कुछ कर दीया था उसतै ?”
“न … नहीं … नहीं मैंने कुछ नहीं किया !”
मुझे लगा मेरा गला सूख गया है। मेरे चेहरे से तो हवाइयां ही उड़ रही थी। लगता है हमारी चुदाई की पोल खुल गई है।
“तन्नै किस बात का डर मार रया फ़ेर ? (तो तुम इतना डर क्यों रहे हो ?)” मास्टरनी ने फिर पूछा।
“न… नहीं तो … मैं भला क… क्यों … डरूंगा… ?” मैंने थोड़ी हिम्मत करके जवाब दिया। मैंने देखा मास्टरनी मेरी पतली हालत देख कर मंद मंद मुस्कुरा रही है।
“एक बात बता तू मन्नै !”
“क्या ?”
“यो चद्दर गील्ली कीकर होई ?”
“वो… वो …?”
अब शक की गुन्जाइश नहीं रह गई थी। मास्टरनी को पता चल गया है। मैं मुंडी नीचे किये खड़ा रहा।
“कहीं पानी का गिलास तो नहीं गिरा दिया था ?”
मैं चुप रहा। थोड़ी देर बाद मास्टरनी ने फिर पूछा “पानी ढंग से पिया या केवल चद्दर पर ही गिराया ?”
“वो … वो … ?
“केवल तुमने ही पिया था या उस कमेड़ी ने भी पिया था ?”
“हाँ उसने भी पिया था “
“हम्म… उसको भी पानी अच्छा लगा ?”
पता नहीं मास्टरनी क्या पूछे जा रही थी। मुझे लगाने लगा कि मैं थोड़ा बच सकता हूँ। मेरी जान छूट सकती है। एक बार अगर बच गया तो हे गोपी किशन फिर कभी उस कमेड़ी की ओर देखूंगा ही नहीं पक्की बात है। मैं अपने खयालों में खोया हुआ था।
मास्टरनी ने फिर बोली “या छोरी तो घनी चुदक्कड़ निकली रै? ….. इसके तो बड़े पर निकल आये साली अभी से लण्ड खाने लगी है आगे जाकर पता नहीं क्या गुल खिलाएगी ?”
मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि मास्टरनी इस तरह के शब्द प्रयोग कर रही है। वो अपनी चूत को पाजामे के ऊपर से मसल और खुजला रही थी। आज उसने पतला सा कुरता और पाजामा डाल रखा था। उसकी साँसें तेज हो रही थी और आँखों में लाल डोरे से तैर रहे थे।
“उस कमेड़ी को ठीक से रगड़ा या नहीं ?” वह मेरी और देख कर हंसने लगी फिर बोली “मैं जानती थी जिस तरीके से वो अपनी गांड मटका कर चलती थी जरुर लण्डखोर बनेगी”
अब मेरी जान में जान आई। इतना तो पक्का है की मास्टरनी यह सब घर वालों को तो कम से कम नहीं बताएगी। मैं चुप उसे देखता ही रहा।
उसने फिर पूछा “उसे खून निकला या नहीं ?””वो … वो … हाँ आया था चद्दर पर भी लग गया था इसीलिए … वो… गीली …”
“हम्म … तेरे तो मज़े हो गए रे जीत … मैं तो तने बड़ा भोला समझ रई थी तू तो गज़ब का गोला निकला रे ?”
“वो दरअसल मैं आपका ही तो चेला हूँ ना ?” मैंने कह दिया।
“रै बावले चेला इस तरह थोड़े ही बना जावे सै?”
“तो कैसे बना जावे है ?”
“पहले गुरुदक्षिणा देनी पड़ी सै ?’
“आप जो मांगो दे दूंगा ?”
“हम … लागे सै इब तू बावली बूच नई रिया बड़ा सयाना हो गया ?”
मेरा दिल तो जोर जोर से धड़कने लगा था। लगता है मास्टरनी के मन में भी जरुर कुछ चल रहा है। हे गोपी किशन अगर मास्टरनी पट जाए तो बस मज़ा ही आ जाए। फिर तो बस दोनों हाथों में लड्डू क्या पूरी कन्हैया लाल हलवाई की दूकान ही हाथों में होगी।
उसने इशारे से मुझे अपनी और बुलाया। मैं उसके पास सोफे पर बैठ गया। उसने मेरी जांघ पर हाथ रख दिया और बोली “अच्छा चल सारी बात शुरू से बता कुछ छुपाने की जरुरत ना है। कैसे उस कमेड़ी के साथ खाट-कब्बडी खेली ? मैंने तो तुम्हें पूरे ढाई तीन घंटे दिए थे मज़े करने को ?” और कहते हुए उसने मेरी और आँख मार दी। मेरा राम लाल तो उछलने ही लगा था। और उसका उभार पैन्ट के अन्दर साफ़ दिखने लगा था। मास्टरनी ने अपनी जांघें आपस में कस रखी थी और एक हाथ से अपनी चूत को जोर जोर से मसल रही थी।
मैंने पूरी बात बता दी। इस दौरान मास्टरनी ने मेरा लण्ड पैन्ट के ऊपर से ही मसलने लगी। मेरा लण्ड तो खूंटे की तरह हो चला था अब। मास्टरनी की साँसें तेज होने लगी थी और मेरा शेर तो जैसे पैन्ट फाड़ने को तैयार था। अचानक मास्टरनी ने मेरी पैन्ट की जिप खोल दी और नीचे फर्श पर उकड़ू होकर बैठ गई। मुझे बड़ी शर्म भी आ रही थी और मेरी उत्तेजना भी बढती जा रही थी। मास्टरनी ने फिर पैन्ट के अन्दर हाथ डाल कर मेरे खूंटे जैसे खड़े लण्ड को बाहर निकाल लिया। उसकी तो आँखें फटी की फटी रह गई। मेरा लण्ड 7’ लम्बा मोटा ताज़ा लण्ड देख कर वो तो मस्त ही हो गई। आप तो जानते ही हैं कि मेरे लण्ड में एक ख़ास बात है उसका टोपा (क्राउन) बहुत बड़ा है। बिलकुल मशरूम की तरह है। मेरी भी उतेजना बढती जा रही थी और राम लाल तो मास्टरनी के हाथों में ऐसे उछल रहा था जैसे कोई चूहा किसी बिल्ली के पंजों में फसा अपनी जान बचाने को तड़फ रहा हो।
“वाह जीत तेरा राम लाल तो बहुत बड़ा और शानदार है ?” इतना कहकर मास्टरनी ने उसका एक चुम्मा ले लिए। राम लाल ने एक ठुमका लगाया। मास्टरनी ने उसे कस कर अपनी मुट्ठी में जकड़े रखा। “साली वो कबूतरी कैसे झेल गई इस मर्दाने लण्ड को ?”
एक बार फिर से उसने उस पर पुच्च किया और फिर उसे गप से मुँह में ले लिया। मैं तो जैसे सातवें आसमान पर ही था। जिस तरीके से मास्टरनी उसे चूस और चूम रही थी मुझे लगता है ये मास्टरनी भी एक नंबर की चुदक्कड़ है। चलो मेरी तो पौ बारह है। मैंने अपनी पैन्ट को ढीला कर दिया और अपने कूल्हे थोड़े से उठा कर पैन्ट नीचे कर दी। इससे मास्टरनी को सुविधा हो गई। और वो जोर जोर से मेरा लण्ड चूसने लगी। कभी मेरे अण्डों को मसलती कभी उन्हें भींचती कभी पूरा लण्ड मुँह में ले लेती और कभी उसे मुँह से बाहर निकल कर ऊपर से नीचे तक चाटती। उसकी गर्म साँसें मेरे पेट और पेडू पर पड़ती तो मैं रोमांचित हो जाता और मेरा शेर ठुमके पर ठुमके लगाने लगता। मास्टरनी तो बिना रुके उसे चूसे ही जा रही थी पता नहीं कितने दिनों की भूखी थी।
“य़ा … ….” मेरी सीत्कार निकलने लगी और राम लाल झटके पर झटके खाने लगा। मुझे लगा कि मेरा तो मोम पिंघल ही जाएगा। मास्टरनी मेरी इस हालत को जानती थी। उसने मेरा लण्ड पूरा का पूरा मुँह में भर कर मेरे कूल्हे पकड़ लिए। मेरा तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था। मैंने कस कर उसका सर पकड़ लिया। मेरी बंद आँखों में तो सतरंगी तारे से जगमगाने लगे थे और फिर मेरी पिचकारी छूट गई। गर्म लावे से उसका मुँह भर गया। मास्टरनी गटागट उसे पीती चली गई। उसने तो जैसे मुझे पूरा का पूरा निचोड़ लेने की कसम खा रखी थी। उसने एक भी बूँद इधर उधर नहीं गिरने दी।
लण्ड अब सिकुड़ने लगा था। मास्टरनी ने एक आखिरी चुस्की लगाई और अपने होंठों पर जीभ फिराती हुई बोली,”वाह जीत, आज तो मज़ा ही आ गया एक कुंवारे लण्ड की गाढ़ी और ताज़ी मलाई तो बड़ी ही मजेदार थी। वाह … जियो मेरे सांड …?” कहकर मास्टरनी ने मुझे चूम लिया।
मुझे बड़ी हैरानी हुई कि इस नाम से तो मुझे मोना डार्लिंग पुकारा करती है इसे कैसे पता ?
“मैडम आपने तो मज़ा ले लिया पर मैं तो सूखा ही रह गया ना ?” मैंने उलाहना दिया।
“रे बावली बूच क्यूं चिंता कर रिया सै… अभी बड़ा टेम बाकी सै ? चिंता ना कर !” कहते हुए मास्टरनी बाथरूम में चली गई। मैंने अपनी पैन्ट पहन ली और उसका इंतज़ार करने लगा।
मास्टरनी कोई दस मिनट के बाद बाथरूम से बाहर आई। उफ़ … उसके बाल खुले थे। उसने अपने वक्ष पर लाल रंग का तौलिया लपेट रखा था जो उसकी चिकनी मोटी मोटी संग-ए-मरमर जैसी जाँघों और अमृत कलशों के अनमोल खजाने को छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। बस अगर तौलिया एक दो इंच छोटा होता तो उसकी रस भरी (चूत) का नज़ारा साफ़ दिख जाता। उसने तौलिये को नीचे से कस कर पकड़ रखा था। धीरे धीरे अपने नितम्बों को मटकाती और अपने दांतों में निचला होंठ दबाये मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसके होंठ काटने की कातिलाना अदा और चूतड़ों की थिरकन से तो मेरे राम लाल को जैसे फिर से जीवनदान मिल गया । वो तो फिर से सर उठाने लगा था। मैं तो उसके इस अंदाज़ को बस मुँह बाए देखते ही रह गया। उसका गदराया शरीर तो ऐसे लग रहा था जैसे कोई सांचे में ढली मूर्ति हो। वैसे तो मैं उसे रोज़ ही देखता था पर इस रूप में तो आज ही देखा था। उसके शरीर की गर्मी मैं अच्छी तरह महसूस कर रहा था। मुझे लगा जैसे मैं किसी आग की भट्टी के सामने खड़ा हूँ। मेरी तो जैसे साँसें ही जम गई मुझे लगा मेरा पप्पू फिर से घुड़सवारी के लिए तैयार होने लगा है।
“ओह … तन्नै फ़ेर या पैन्ट सी पऽऽन ली ? इब इसका के काम सै ? तार दे इसने !”
“आपने भी तो तौलिया लपेट रखा है ?”
“ओह …. रै मेरी बात और सै चल … सैड़ देसी अपणी पैन्ट और कमीज नै तार दे !”
मैंने थोड़ा शर्माते हुए पैन्ट कमीज उतार दी पर अपने राम लाल के ऊपर हाथ रख लिया। मैंने बनियान और कच्छा तो पहना ही नहीं था। मास्टरनी बोली “तुमने कभी सहस्त्रधारा का जल पिया है?”
सच पूछो तो मेरे कुछ समझ नहीं आया। मैंने गंगाजल और ब्रह्म सरोवर का जल तो सुना था पर यह नया जल पहली बार सुना था। जब कुछ समझ नहीं आया तो मैंने अपनी मुंडी ना में हिला दी।
मुझे लगा मास्टरनी मुझे फिर से मोटी बुद्धि का कहेगी या फिर ताऊ तो जरुर ही कहेगी पर मास्टरनी हंस पड़ी। मोती जैसे चमकते दांत और उसकी कातिलाना मुस्कान और होंठो को काटने की अदा ने तो मुझे अन्दर तक रोमांच से भिगो दिया था। मेरा मन कर रहा था कि उसे कस के अपनी बाहों में भर लूं और पटक कर अपना किल्ला गच्च से उसकी रसीली चूत में ठोक दूं पर मैं रुका रहा।
“हाय मैं मर जावां … मेरे बुद्धू बालम …” कह कर मास्टरनी ने मेरी और अपनी बाहें फैला दी। ऐसा करने से उसके चूंचियों पर अटका तौलिया खुल कर नीचे गिर गया और उसके मोटे मोटे कसे हुए गोल गोल चूचे अनावृत्त हो गए। उसकी घुन्डियाँ मूंगफली के दाने जितनी गुलाबी रंग की थी और एरोला कोई दो इंच का गहरे लाल रंग का। गोल गोल चूचे थोड़े से नीचे लटके से थे वर्ना तो वो मोना को भी पानी भरवा देती।
मैंने झट से उसे बाहों में भर लिया। उसकी साँसें तेज हो रही थी। उसने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ लिया और मेरे होठों से अपने होंठ लगा दिए। मैं तो उन गुलाब की पंखुड़ियों को चूसने में मस्त ही हो गया। मेरा एक हाथ उसकी पीठ पर था और एक हाथ से उसके नितम्ब सहला रहा था।
वो तो बेसाख्ता मेरे होंठों को चूसे ही जा रही थी। मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी तो वो उसे कुल्फी की तरह चूसने लगी। यह तो अनोखा आनंद था। कभी वो अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल देती कभी मैं अपनी जीभ उसके मुँह में डाल देता।
मैं तो इस चूसा-चुसाई में इतना खो गया था कि मेरा ध्यान उसकी चूत की ओर गया ही नहीं। यह तो भला हो मेरे राम लाल का कि वो अपनी तंद्रा से जग कर उसे सलाम बजाने लगा था। अब मैंने अपना एक हाथ उसके चूत पर फिराया। छोटे छोटे बालों से ढकी उसकी चूत पूरी गीली हो चुकी थी। मैंने जैसे ही उसकी चूत में अपनी एक अंगुली डालने की कोशिश की वो थोड़ा सा चिहुंकी।
“ऊईइ … मां …”
“क्या हुआ ?”
“ओह…. ऐसे नहीं चलो, उस पलंग पर चलो !”
“ओह…. हाँ …”
मुझे फिर अपनी बुद्धि पर तरस आने लगा। हम दोनों अब पलंग पर आ गए। पलंग पर नई चद्दर बिछी थी। मास्टरनी पलंग पर लेट गई। पर पता नहीं क्यों उसने अपनी चूत पर दोनों हाथ रख लिए और अपनी जांघें कस कर बंद कर ली। मुझे बड़ा अटपटा लगा कि अब शर्माने की कहाँ गुन्जाइश रह गई है। पर सयाने ठीक कहते हैं औरत कितनी भी काम के वशीभूत हो अपनी स्त्री सुलभ लज्जा नहीं छोड़ती।
खैर अब उसे चुदना तो हर हाल में ही था, थोड़ी देर या नखरे और सही। मेरा राम लाल तो हिलोरें ही मारने लगा था। मैं उसकी बगल में लेट गया और उसके चूचों पर हाथ फिराने लगा। मैंने एक चूची के अग्र-भाग पर अपनी जीभ फिराई तो उसकी हल्की सीत्कार ही निकालने लगी। अब मैंने उसे चूसना चालू कर दिया। एक हाथ से उसकी एक चूची को दबाता और दूसरे को जोर जोर से चूसता।
वो तो मस्त ही हो गई। आंखें बंद किये सीत्कार पर सीत्कार करने लगी। मैंने एक एक करके दोनों आमों को चूसना चालू रखा। फिर मैंने धीरे से अपना एक हाथ उसकी चूत की तरफ बढ़ाया। मोटी मोटी फांकें सूजी हुई सी लग रही थी। मैंने थोड़ा नीचे खिसकते हुए अब अपनी जीभ उसके उरोजों की घाटियों से लेकर नीचे पेट और नाभि तक चाटना चालू कर दिया।
जैसे ही मेरी जीभ ने उसकी चूत को छुआ तो उसकी एक किलकारी ही निकल गई। उसकी बंद जांघें स्वतः ही खुलने लगी और रस भरी दो पंखुड़ियां मेरी आँखों के सामने फ़ैल गई। उसके अन्दर वाली पत्तियाँ जरुर काली सी थी पर बाहरी फांकें गोरी गोरी थी जिन्हें छोटे छोटे काले घने झांटों ने ढक रखा था। मैंने एक चुम्मा उस पर ले ही लिया। मेरे नथुनों में एक मादक गंध भर उठी। और मास्टरनी की एक मादक सीत्कार निकल गई।
मास्टरनी आँखें बंद किये लेटी आह उन्ह… करने लगी। अब मैंने दोनों हाथों से उसकी चूत की फांकों को चौड़ा किया। अन्दर से चूत एक दम गुलाबी रंग की थी और उसके अन्दर का गीलापन तो ऐसे लग रहा था जैसे इसमें से पानी की सैंकड़ों धाराएं निकल रही हों। ओह … अब मेरी मोटी बुद्धि में सहस्त्रधारा का अर्थ समझ आया था।
मैंने अपने जलते होंठ उसकी फांकों के बीच लगा दिए। आह … नमकीन और कसैला सा स्वाद तो ठीक वैसा ही था जैसा मोना की चूत का था बस थोड़ी सी गंध अलग थी। मैंने अपनी जीभ को नुकीला बनाया और उसकी चूत की दरार पर ऊपर से नीचे तक फिराया। उसका दाना तो चेरी की तरह बिलकुल लाल था। मैंने अपनी जीभ उस पर फिराई और फिर उसे हल्का सा दांतों से दबाया तो मास्टरनी की उत्तेजना में एक चींख सी निकलते निकलते बची।
“रे ताऊ … ओह … जीत … चूस….. और जोर से चूस….. आह … य़ाआअ ईईईईईईईईई………………”
मैंने झट से उसकी चूत को मुँह में भर लिया और जोर जोर से चूसने लगा। मास्टरनी रोमांच में कांपने लगी थी। कभी वो अपने पैर उठाती और कभी नीचे पटकती। उसने मेरा सर कस कर अपने हाथों में पकड़ा था। और जोर जोर से अपनी चूत की ओर दबाने लगी। वह तो सीत्कार पर सीत्कार किये जा रही थी।
उसका शरीर एक बार थोड़ा सा अकड़ा और उसने मेरा सर इतने जोर से अपनी चूत पर दबाया कि मेरी तो साँसें ही कुछ क्षणों के लिए रुक सी गई। इसके साथ ही उसकी चूत ने 3-4 चम्मच गाढ़ा सा तरल द्रव्य छोड़ दिया। मैं तो उस सहस्त्रधारा के जल को पीकर निहाल ही हो गया।
मास्टरनी पता नहीं नशे जैसी हालत मन क्या क्या बड़बड़ा रही थी। पता नहीं उसे अचानक क्या सूझा वो मुझे परे धकेल कर उठ खड़ी हुई और इस से पहले कि मैं कुछ समझूं उसने मुझे धकेलते हुए चित लेटा कर अपने दोनों पैरों को मेरे कूल्हों के दोनों तरफ कर के एक हाथ में मेरा तना हुआ लण्ड पकड़ लिया और अपनी चूत पर घिसने लगी।
जैसे ही मेरे लण्ड का सुपड़ा उसकी चूत के छेद से टकराया मास्टरनी ने बिना देरी किये एक झटका सा लगाया और गच्च से मेरे लण्ड के ऊपर बैठ गई। पूरा का पूरा लण्ड जड़ तक एक ही झटके में उसकी चूत में समां गया। मास्टरनी की एक चीत्कार सी निकल गई।
“आईईईईईईईईईईईईईईई…………………………………………”
मास्टरनी ने लण्ड पूरा का पूरा अन्दर तो ले लिया पर मुझे लगा वो ज्यादा जोश में गलती कर बैठी है। उसे थोड़ा सा दर्द भी जरुर हुआ होगा पर वो मेरे सामने कमजोर नहीं पड़ना चाहती थी। उसने अपनी आँखें बंद कर ली और चुपचाप ऊपर ही बैठी रही। कुछ समय बाद जब वो थोड़ी सामान्य हुई तब उसने नीचे झुक कर मेरे होंठों को चूमा और बोली,”रे जीत … तू तो पूरा सांड सै मेरी तो जान ही काड़ दी तन्नै !”
“क्यों … मास्टरजी का इतना बड़ा नहीं है क्या ?”
“अरै छोड़ …. वो तो पूरा नन्दलाल ही है। किसी काम का नहीं है। मैं तो इस चूत में अंगुली कर कर के कमली ही हो गई हूँ और वो देहरादून के जंगलों में फोरेस्ट अफसर बना अपनी गांड मरवा रहा है साला चूतिया कहीं का !”
मास्टरनी को ज्यादा जोश आ गया और फिर उसने जोर जोर से ठुमके लगाने शुरू कर दिए। उसके गोल गोल कसे हुए चूतड़ तो उसके झटकों के साथ थिरकने ही लगे थे। मैंने उसकी चूचियों को पकड़ कर मसलना चालू कर दिया तो वो थोड़ा सा नीचे हो गई और अपने उरोज मेरे मुँह पर लगाने लगी। मैं इतना भी मोटी बुद्धि का नहीं था मैंने झट से उसे मुँह में ले लिया और चूसने लगा। मास्टरनी की फिर से सीत्कार निकालने लगी।
“आह … आज कितने दिनों बाद एक मस्त लण्ड मिला है … या … जीवो मेरे सांड तूने तो मुझे निहाल ही कर दिया उम्म्म्म …” और एक बार फिर मास्टरनी ने मेरा सर पकड़ कर होंठों को चूम लिया।
ऐसा नहीं था कि सिर्फ वो ही धक्के लगा रही थी। मैं भी नीचे से अपने चूतड़ उठा उठा कर उसके धक्कों के साथ ताल मिलाने की कोशिश कर रहा था। मैंने अपने हाथ उसके नितम्बों पर फिराने चालू कर दिए। मास्टरनी कभी ऊपर उठती कभी झटके के साथ नीचे आ जाती। कभी थोड़ी देर के लिए मेरे ऊपर लेट सी जाती। तब मुझे उसके नितम्ब सहलाने का मौका मिल जाता।
मेरी बड़ी इच्छा हो रही थी कि एक बार अगर मुझे ऊपर आ जाने दे तो मैं इसके इन नितम्बों और कमर को पकड़ कर ऐसे झटके मारूं कि इसकी तो बस टैं ही बोल जाए। अचानक मेरी एक अंगुली उसकी गांड के छेद से टकरा गई। मैंने मस्तराम और अन्तर्वासना की कई कहानियों में गांड मारने के बारे में भी पढ़ा था। मैंने मन में सोचा मास्टरनी अगर एक बार मुझे भी गांड मार लेने दे तो हे गोपी किशन मैं तो बस सीधा बैकुंठ ही पहुँच जाऊं।
पर मास्टरनी तो अपनी ही धुन में अपनी चूत को मेरे लण्ड पर घिसे जा रही थी। पता नहीं उसे मेरे हलके हलके नुकीले झांटों से अपनी फांकों को रगड़ने में क्या मज़ा आ रहा था। मैंने उसकी गांड में अपनी तर्जनी अंगुली डाल दी। शायद उसकी चूत का रस फ़ैल कर उसकी गांड को भी गीला कर चुका था। अंगुली गच्च से अन्दर चली गई और मास्टरनी की हलकी चीत्कार निकल गई,”रे… ओह….. रे ताऊ यो के कर रिया सै …?
“क्यों क्या हुआ ?” मैंने पूछा।
“न … ना इस छेद को इबी ना छेड़ … इसका नंबर बाद मैं ? तू चिंता ना कर मैं दोनों छेदों में एक साथ भी डलवाऊँगी?”
चलो ठीक है। मुझे तसल्ली हुई कि बाद में ही सही मौका तो जरुर मिलेगा। मास्टरनी ने अब जोर जोर से धक्के लगाने चालू कर दिए। वो अपनी चूत को इस तरह से सिकोड़ रही थी जैसे अन्दर से चूस रही हो। मैंने सेक्स स्टोरीज में पढ़ा था कि बहुत ही अनुभवी और चुद्दकड़ औरतें ऐसा करती है। इससे उनको और अपने साथी को दुगना आनंद आता है और ढीला लण्ड भी अन्दर ठुमके लगाने लगता है। और मास्टरनी तो पूरी उस्ताद थी इस मामले में।
हमें कोई 20-25 मिनट तो जरुर हो ही गए थे। मुझे लग रहा था अब मैं खलास होने वाला हूँ। मैं ऊपर आने की सोच रहा था पर मास्टरनी ने मुझे नीचे दबोच रखा था। अब मास्टरनी ने जोर जोर से सीत्कार करना चालू कर दिया था और मुझे लगा मेरा लण्ड उसकी चूत ने इतनी जोर से अन्दर भींच लिया है जैसे गन्ना पेरने वाली मशीन गन्ने का रस निचोड़ लेती है। उसने एक किलकारी मारी और मेरे ऊपर ढेर हो गई।
मैंने उसकी कमर पकड़ ली और एक पलटी मारी तो मास्टरनी नीचे और मैं ऊपर हो गया। अब मुझे थोड़ा सांस आया। मैंने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ कर दनादन धक्के लगाने चालू कर दिए। मास्टरनी आँखें बंद किये लेटी रही। मैं भी अंतिम पड़ाव पर था कितनी देर रुकता। मेरा भी ज्वालामुखी फट पड़ा और वीर्य की फुहारें अन्दर निकलती चली गई। मास्टरनी की ठंडी आहें निकलने लगी और उसकी अकड़न मंद पड़ने लगी। पर उसने अपनी बाहों की जकड़न ढीली नहीं होने दी।
कोई 10 मिनट हम इसी अवस्था में पड़े रहे। अब मेरा लण्ड सिकुड़ गया था और बाहर फिसल आया। उसकी चूत से वीर्य और कामरज बाहर निकल कर चद्दर को भिगोने लगा था। मास्टरनी ने मुझे उठ जाने का इशारा किया तो मैं उठ बैठा। मेरे लण्ड के चारों और भी वीर्य और उसकी चूत से निकला कामरज लगा था। मैं उसे धोने बाथरूम में चला गया।
जब मैं अपने लण्ड को साफ़ करके और उस पर थोडा सा सरसों का तेल लगा कर वापस आया तब भी मास्टरनी उसी मुद्रा में लेटी थी। वो अपनी चूत धोने बाथरूम में नहीं गई। मैंने उसे बाथरूम जाने को पूछा तो उसने मना कर दिया और बोली,”एक बार और मज़ा लेना है अभी !”
मेरा राम लाल तो दो बार निचुड़ चुका था। पर मेरा भी मन अभी नहीं भरा था। सच पूछो तो मास्टरनी ने मुझे चोदा था। मज़े तो उसने लिए थे। मैं एक बार उसे घोड़ी या डॉगी स्टाइल में चोदना चाहता था। मैं उसके नजदीक जाकर पलंग पर बैठ गया तो वो सरक कर मेरी जाँघों पर सर रख कर लेट गई और मेरे राम लाल को हाथ में पकड़ कर एक चुम्मा ले लिया। राम लाल तो अलसाया सा था। मुझे डर लगाने लगा था कि यह दो बार निचुड़ चुका है कहीं धोखा ही ना दे जाए।
पर कहते हैं औरत के हाथ में जादू होता है। जो लण्ड तीन इंच का होता है खूबसूरत औरत के हाथों में आते उम्मीद से दुगना हो जाता है भला मेरा क्यों ना होता। मास्टरनी ने उसे मसलना चालू कर दिया और फिर से अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। राम लाल धीरे धीरे अपने रंग में आने लगा।
मेरे सारे शरीर में सनसनी सी होने लगी और लण्ड तनकर अपनी औकात में आ गया। मास्टरनी ने उसे मुँह से निकाल कर आज़ाद करते हुए कहा,”रे जीत, ले तेरा घोड़ा तो फेर तैयार हो गया सवारी करने को ?”
मुझे डर लगाने लगा कहीं मास्टरनी फिर से मुझे ना दबोच कर अपने नीचे ले ले। मैंने कहा,”तो आप घोड़ी बन जाओ ना मैं सवारी करता हूँ ?”
उसने मेरी और टेढ़ी आँखों से इस तरह देखा जैसे मैं मोटी बुद्धि का ना रह कर कालिदास बन गया हूँ। मास्टरनी झट से अपने घुटनों के बल हो गई और अपने गांड हवा में ऊपर उठा दी। उसने अपना सर तकिये पर रख लिया। अब मैं उसके पीछे आ गया। गोरी गोरी मुलायम जाँघों के बीच उसकी चूत की फांकें सूज कर मोटी मोटी हो गई थी। गांड का सुनहरा सा छेद कभी खुल और कभी बंद हो रहा था। उसकी दर दराई सिलवटें तो मुझे उसी में अपना लण्ड डाल देने का आमंत्रण दे रही थी।
मैंने अपने लण्ड को उसकी फांकों के बीच लगाया और उसकी कमर पकड़ कर जोर से एक धक्का लगा दिया। चूत पहले से ही गीली थी पूरा का पूरा लण्ड बिना किसी रुकावट के अन्दर चला गया।
मास्टरनी की चींख सी निकल गई। वो बोली “रे ताऊ थोड़ा सबर कर धीरे … के जल्दी सै ?”
मैं अब कहाँ रुकने वाला था। मैंने धक्के लगाने शुरू कर दिए। धक्कों के साथ उसके भारी चूतड़ हिलते तो मेरा उत्साह दुगना हो जाता। मैंने उन पर जोर जोर से थप्पड़ लगाने चालू कर दिए। मास्टरनी तो सीत्कार पर सीत्कार करने लगी। मैं कहीं पढ़ा था कि जब कोई औरत उम्र में थोड़ी बड़ी हो तो उसे चोदते समय अगर उसके चूतड़ों पर हलकी चपत लगाई जाए या उसके होंठ या चूत की फांकों को दांतों से काटा जाए तो उसे दर्द के स्थान पर मीठी कसक के साथ और भी मज़ा आता है।
मैंने अपनी घुड़सवारी और एड लगानी चालू रखी। हर धक्के के साथ मेरा लण्ड उसकी बच्चे दानी तक चला जाता और मास्टरनी की आह … उन्ह … निकलने लगती।
“या … आह … उइईई ……मा … और जोर से … आज सारे कस बल निकाल दे इस चूत के … आह … बहोत तंग किया है इसने मुझे … आह …”
मेरा शेर तो इस समय खूंखार बना था। मैंने धक्कों की गति बढ़ा दी। 10-15 मिनट की इस दूसरी चुदाई में ही मास्टरनी के पसीने निकलने लगे। मेरा भी यही हाल था। पर राम लाल तो उसी तरह खड़ा था। सच कहूं तो चुदाई का असली मज़ा तो मुझे आज ही मिला था। उस कमेड़ी की चुदाई के समय तो हम दोनों ही डरे हुए थे और वो भी बस सारी चुदाई में आह…. उईइ…. हाई…. करती कसमसाती रही थी।
मास्टरनी की आँखें बंद थी। मास्टरनी जब निढाल हो गई तो उसने अपना जानामाना फ़ॉर्मूला आजमाया और अपनी चूत का संकोचन करने लगी। आप तो अनुभवी हैं जानते ही हैं कि जब चुदाई के दौरान औरत ऐसा करती है तो आदमी बहुत जल्दी अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है। हमें 15-20 मिनट तो इस बार भी हो ही गए थे। मैं मास्टरनी की हालत जानता था इसलिए अब मैंने भी जोर जोर से धक्के लगा कर अपना तनाव ख़तम करने का सोच लिया।
उसके चूतड़ों की खाई और गांड के छेद को देख कर मुझ से रुका नहीं गया और मैंने अपनी एक अंगुली उसकी गांड में डालने की फिर से कोशिश की तो मास्टरनी बोली,”रे ताऊ, इब खिलवाड़ बंद कर … बस निकाल दे अपना माल मैं तो गई … उईईईइ…… म़ा …?”
मुझे लगा मास्टरनी झड़ गई है। अब तो उसकी चूत बिलकुल ढीली पड़ गई थी। मैंने 4-5 धक्के बिना रुके लगा दिए और उसके साथ ही मेरे लण्ड ने भी मुक्ति की राह पकड़ ली। मास्टरनी धीरे धीरे नीचे होती गई और मैं उसके ऊपर ही पसर गया। हम दोनों ने ही ध्यान रखा कि लण्ड बाहर ना निकले। मैंने अपने हाथ नीचे करके उसके चुचों को पकड़ लिया और अपनी टांगें उसके चूतड़ों के गिर्द कस ली।
पता नहीं कितनी देर हम इसी तरह लेटे रहे। मेरा लण्ड धीरे धीरे बाहर निकल आया। उसकी चूत से वीर्य और कामरज का मिलाजुला मिश्रण बाहर निकल कर चद्दर पर फ़ैल गया। हम दोनों ही अब उठ खड़े हुए। हमने देखा 8-10 इंच के गोल घेरे में चद्दर पर वो मिश्रण फैला है।
मास्टरनी ने मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोली,”रे हरियाने के सांड ! देख तूने चद्दर को फिर से खराब कर दिया। जा इब इसे बाथरूम में गेर दे !” “वो क्यों ?””रे ताऊ ! वो हरामजादी कान्ता कभी भी आ सकती है पूरे दो घंटे हो गए हैं ?””ओह … ?” मेरी भी हंसी निकल गई।
“वो कल का क्या प्रोग्राम है ?” मैंने पूछा।
“कल की कल देखेंगे !”
मास्टरनी चद्दर उठा कर बाथरूम में चली गई और मैं अपने कपड़े पहन कर घर की ओर भागा। मैं सोच रहा था कि मास्टरनी की दोनों छेदों में एक साथ लण्ड डलवाने वाली बात का क्या मतलब था ?
मै एक गाना एक गाना गुनगुनाता हुआ अपनी मस्ती और ख़ुशी में जा रहा था कि
आज मैं ऊपर आसमान नीचे
जल्दी से घर पहुंचा और नहाया और खाना खा कर पलंग पर लेट कर सोचने लगा आज जो हुआ और कल क्या होगा उसका इन्तजार करने लगा।
अगले दिन जब मैं मास्टरनी के घर पहुंचा तो किसी के बात करने की आवाज आ रही थी मास्टरनी किसी से बात कर रही थी मैं जब अन्दर पहुंचा तो वहां का नजारा देख कर तो मेरे पाँव के नीचे से जमीन ही निकल गई….
कहानी अभी बाकी है दोस्तो ! मैंने मास्टरनी के घर ऐसा क्या देखा यह आपको अगली कहानी मैं लिखूंगा. लेकिन तब जब आप लोग मुझे मेल करेंगे. लेकिन इतना बता देता हूँ कि जो भी देखा वो कम से कम मेरे लिए किसी 1000 वाट के कर्रेंट से कम नहीं था।
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मेरा नाम सोहन है, मैं 27 साल का हूँ, मेरी फिजिक काफी अच्छी है।
यह मेरी पहली कहानी है और मेरा ये पर्सनल एक्सपीरियन्स है।
बात उस समय की है जब मैं 24 साल का था। मैं अपनी मौसी के लड़के की शादी में गया था वहाँ पर मेरे दूर के रिश्ते की मौसी आयी हुई थी बहुत ही खूबसूरत थी वो। उनके बूब्स काफ़ी बड़े थे। वो मुझे बहुत अच्छी लग रही थी। काले रंग के ब्लाउज़ से उनकी चूची बाहर आ रही थी। मैं उनके भरे हुए शरीर से खेलना चाहता था।
उनके हाव भाव से लग रहा था कि वो भी मेरी तरफ़ अकार्षित हो रहीं थी।
खैर आप लोगों को ज्यादा बोर नहीं करूंगा और मैं आगे कहानी बताता हूं। बारात में सभी लोग अपने अपने काम में व्यस्त थे। सरदी की रात थी सभी लोग एक साथ लेटे हुए थे, ज्यादा खाट न होने के कारण सभी लोग जमीन पर लेटे हुए थे मैं भी एक उचित स्थान देखकेर लेट गया मेरे बगल में वहीं दूर के रिश्ते की मौसी लेटी हुई थीं.
मैंने उस समय तो ध्यान नहीं दिया पर रात में जब मैं पेशाब के लिये उठा तो उनकी साड़ी और पेटीकोट उनके घुटनों के ऊपर चढ़ गया था उनकी चिकनी जांघें शीशे की तरह चमक रही थी।
मुझसे रहा नहीं गया मैंने धीरे से उनकी जांघों पर हाथ रखा उन्होंने कुछ नहीं कहा मेरी हिम्मत और बढ़ी मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट ऊपर खिसका दिया चूंकि कमरे में अंधेरा था इसलिये मेरी इस हरकत का किसी को पता नहीं चल पा रहा था।
मुझे ऐसा लग रहा था कि वो भी मेरी इस हरकत का मजा ले रही हैं। मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट उनकी कमर तक खिसका दिया। ओह माई गोड उनकी होंठों तक फूली हुई बुर मेरे हाथों में थी उनकी बुर से थोड़ा थोड़ा पानी निकल रहा था मैंने उनकी शेव्ड बुर पर हाथ फेरना चालू कर दिया.
उन्होंने कुछ नहीं कहा बल्कि वो सीधी लेट गई जिससे उनकी बुर पूरी तरह से खुल कर मेरे सामने आ गई मैंने उनकी जांघों को चूमते हुए उनकी गर्म बुर पर अपने होंठ लगा दिये, वो अब तड़प उठीं, उन्होंने धीरे धीरे आवाज़ निकालना चालु कर दिया था. वो मेरे सर को सहला रही थी.
मैंने जी भरकर उनको बुर को चाटा और अपनी जीभ से चोदा, वो भी अपनी गांड उठा उठा कर मेरा सहयोग कर रही थी।
मौसी की चूत से नमकीन पानी निकल रहा था वो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था मैंने करीब आधे घंटे उनकी चूत को चाटा.
दूसरे दिन जैसे कि पहली रात में हम दोनो (मैं और मेरी दूर के रिश्ते की मौसी) एक साथ लेटे थे उसी तरह से दूसरे दिन भी भीड़ होने के कारण हम दोनो कमरे के एक कोने में लेट गये चूंकि मौसी तो पहले दिन से ही तैयार थी इसलिये उस दिन उन्होंने मैक्सी पहनी हुई थी।
हम दोनो अब एक ही रजाई में लेटे हुए थे मुझे कंट्रोल नहीं हो रहा था मैंने झट से उनकी मैक्सी पर से जांघों पर हाथ रख दिया।
उन्होंने कहा थोड़ा सब्र करो आज पूरी रात मैं तुम्हारी ही हूं।
खैर रात काफ़ी हो गयी सभी लोग सो चुके थे पर हम दोनो को नींद कहां थी मैंने उनके बूब्स पर हाथ रखा तो वो बोली पहले कपड़े तो उतार दो।
इतना इशारा मिलते ही मैंने उनकी मैक्सी ऊपर कर दी उन्होंने मैक्सी के नीचे कुछ भी नहीं पहना था, मैक्सी उतरते ही वो पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी।
उनके भरे हुये बदन को देखकर मुझे नशा छा रहा था।
अब उन्होंने मेरे कपड़े उतारने चालु कर दिये, थोड़ी ही देर में मैं भी उनकी तरह से ही नंगा हो गया, मेरा 8 इंच का लंड रोड की तरह गर्म हो रहा था, वो इतना कड़ा था कि छूने पर लोहे का लग रहा था।
उन्होंने बड़े प्यार से मेरे लंड को सहलाया फिर धीरे -2 नीचे खिसक गयी और मेरे लंड को मुँह मेँ लेकर चूसने लगी।
ज्यों ज्यों उनकी जीभ मेरे लंड पर घूम रही थी मेरे लंड का तनाव बढ़ता ही जा रहा था।
मैंने उनके खुले हुए बाल पकड़ लिये और वो तेजी से अपना सर ऊपर नीचे करने लगीं।
फिर मैंने उनसे कहा कि मौसी अब आप लेट जाओ वो लेट गयीं और मैं उनके ऊपर आकर अपने लंड को उनकी फ़ूली हुई बुर मैं डालने लगा धीरे-2 मैंने उनकी बुर में अपना लंड डाल दिया।
अब मैंने चुदाई करनी शुरु कर दी दोनो को ही बड़ा मजा आ रहा था उनकी सिसकी भी निकल रही थी। इस्सस इस्स ओहह वव्वव्वूऊऊ नाआआ धह्हहीईई
इस तरह की आवाजें उनके मुँह से निकल रही थीं।
मैंने करीबन 25 मिनट उनकी चुदाई की वो मेरे गठीले और बालों से भरी हुई छाती हो सहला रहीं थीं और चूम रही थी अचानक उन्होंने बड़ी तेजी से मुझे जकड़ कर पकड़ लिया मैं समझ गया कि वो अब झड़ गयीं हैं।
मैंने भी थोड़ी देर बाद उनकी बुर में ढेर सारा माल डाल दिया।
इस तरह उस रात हमने तीन बार मजे लिये मौसी मेरी चुदाई की कायल हो चुकी थी।
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