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पिंकी का घर हमारे घर के बगल में ही है, हमारे घर की व पिंकी के घर की छत आपस में मिली हुई है, दोनों छतों के बीच में बस कमर तक ऊँचाई की एक पतली सी दीवार ही है इसलिए हम छत से भी एक दूसरे के घर चले जाते थे और पड़ोसी होने के नाते हमारा व पिंकी के घर काफी आना जाना था, जो अब भी वैसा ही है.

मगर उस समय मेरी व पिंकी की कभी नहीं बनती थी। बचपन से ही हम दोनों झगड़ते रहते थे। बचपन में मेरी नाक बहती थी इसलिये वो मुझे बहँगा कहती थी, और पिंकी को मैं छिपकली कहता था क्योंकि दुबले-पतले शरीर व बिल्कुल सफेद गोरे रँग के साथ साथ उसकी हरकतें छिपकली के जैसी ही थी जब भी उसे गुस्सा आता तो वो छिपकली की तरह चिपक जाती व नाखूनों और दाँतों से काट खाती थी।

बड़ा होने पर मेरी नाक तो बहनी बन्द हो गई मगर पिंकी की हरकतें बाद में भी बिल्कुल वैसी ही रही, झगड़ा होने पर वो अब भी नाखूनों व दाँतों से काट खाती थी।
हम दोनों में अब भी नहीं बनती थी, अभी तक हम दोनों एक दूसरे को बचपन के नाम से ही चिढ़ाते रहते थे। हम दोनों में से किसी को भी अगर चिढ़ाने का कोई मौका मिल जाये तो हम बाज नहीं आते थे।

जब भी पिंकी मुझे बोलती तो वो मुझे बहँगा ही कहकर बुलाती और मैं भी उसे छिपकली कहकर पुकारता था। पिंकी भी मेरे ही समान कक्षा में पढ़ती थी मगर वो लड़कियों के स्कूल में पढ़ती थी और मैं लड़कों के स्कूल में पढ़ता था।
पिंकी भी पढ़ने में काफी होशियार थी। हम दोनों में अब यह होड़ लगी रहती थी की परीक्षा में किसके नम्बर अधिक आयें।

पहले तो मैं भी पढ़ने में काफी अच्छा था मगर फिर बाद में तो आपको पता ही है भाभी के साथ सम्बन्ध बनने के बाद मैं पढ़ाई से काफी दूर हो गया था।
चलो अब कहानी पर आता हूँ.

सुमन के चले जाने के बाद मैं फिर से रेखा भाभी के साथ सोने लगा सब कुछ अच्छा ही चल रहा था कि एक दिन भाभी कपड़े सुखाना भूल गई, जब उन्हें याद आया तब तक शाम हो गई थी। उस समय भाभी खाना बनाने में व्यस्त थी इसलिए भाभी के कहने पर मैं ऊपर छत पर कपड़े सुखाने चला गया, मैं कपड़े सुखाकर छत पर से वापस आ ही रहा था कि तभी मेरी नजर सामने पिंकी के घर की तरफ चली गई, उनके घर में एक कमरा व लैटरीन बाथरुम ऊपर छत पर भी बना हुआ है.

कमरे की लाईट जल रही थी और खिड़की में से बेहद ही गोरी नंगी पीठ दिखाई दे रही थी, खिड़की से बस उसकी कमर के ऊपर का ही हिस्सा ही दिखाई दे रहा था मगर फिर भी दुबले पतले बदन से और बेहद ही गोरे रंग से मुझे पहचानने में देर नहीं लगी कि वो पिंकी है, वो नीचे झुकी और फिर हाथों में कुछ पकड़ कर सीधी हो गई. शायद उसने नीचे पायजामा (लोवर) पहना होगा, फिर उसने शमीज (लड़कियों के पहनने का अन्तः वस्त्र) पहना और फिर ऊपर से उसने गुलाबी रंग की टी-शर्ट डाल ली।

यह नजारा देखते ही मेरा लिंग उत्तेजित हो गया, फिर तभी उस कमरे की लाईट बन्द हो गई। शायद वो बाहर आने वाली थी इसलिये मैं भी चुपचाप नीचे आ गया मगर उस नजारे को देखकर मेरे तन बदन में आग सी लग गई। मैं चुपचाप भाभी के कमरे में आकर ऐसे ही लेट गया और पिंकी के बारे में सोचने लगा.

मैंने पिंकी को कभी भी इस नजर से नहीं देखा था, और देखता भी कैसे?
वो किसी भी तरीके से लड़की नहीं लगती थी…
क्योंकि उसके दुबले पतले शरीर पर कही भी मांस नहीं दिखाई देता था, बस सीने पर हल्के से उभार ही दिखाई देते थे, जो छोटे निम्बू के समान ही होंगे। उसके शरीर के साथ साथ वो रहती भी लड़कों की तरह ही थी, लड़कों की तरह बाल कटवाना, लड़कों की तरह ही कपड़े पहनना, और तो और स्कूल की वर्दी भी उसने पेंट-शर्ट की ही बनवा रखी थी। उसके स्कूल में सब लड़कियाँ शलवार कमीज पहनी थी मगर वो स्कूल में भी पेंट-शर्ट पहनती थी। घर में वो हमेशा लोवर और टी-शर्ट पहने रहती, और जब कभी बाहर जाती तो पैंट-शर्ट या जीन्स के साथ टी-शर्ट पहन कर बाहर निकलती थी।

मैंने कभी भी उसे लड़कियों के कपड़े पहने हुए नहीं देखा था, मगर आज मैंने उसकी सफेद कोरे कागज जैसी नंगी पीठ को देखा था मेरे तन बदन में आग सी लग गई थी। मैं उसके बेहद ही सफेद दूधिया गोरे रंग का कायल सा हो गया था, मैं सोच रहा था कि अगर उसका बदन ही इतना गोरा है तो उसके नन्हे उरोज व उसकी प्यारी सी योनि कैसी होगी?
यह बात मेरे दिमाग में आते मैं रोमांच से भर गया और मेरा लिंग अपने चर्म उत्थान पर पहुँच गया।

मैं पिंकी के ख्यालों में इतना खोया हुआ था कि पता ही नहीं चला कब भाभी कमरे में आ गई। मेरी तन्द्रा तो तब टूटी जब भाभी ने मुझे टोकते हुए पूछा- कहाँ खोये हुए हो?
भाभी के बात करने पर भी मैं बस हा ना में ही उनकी बात का जवाब दे रहा था।
मेरे व्यवहार से भाभी समझ गई कि कुछ ना कुछ बात है इसलिये भाभी ने फिर से मुझे पूछा- क्या बात है आज तबीयत खराब है क्या?
मगर मैं सोच रहा था कि भाभी को पिंकी के बारे में कहूँ या ना कहूँ?
तभी बाहर से ‘भाभी… भाभी… पायल भाभी…’ पुकारते हुए पिंकी की आवाज सुनाई दी और भाभी उसका जवाब देती उससे पहले ही पिंकी हाथ में किताबे पकड़े कमरे में आ गई, उसने वो ही गुलाबी टी-शर्ट पहन रखी थी जिसे अभी अभी छत पर मैं पिंकी को पहनते हुए देखकर आ रहा था।
पिंकी ने आते ही ‘ओय… बहंगे पैर हटा…’ कह कर एक हाथ से मेरे पैरों को उठा कर पीछे पटक दिया और भाभी की बगल में बैठ गई।

दरअसल पिंकी, मेरी भाभी से सवाल का हल निकलवाने के लिये आई थी। पिंकी व उसके घर वालों को पता था कि मेरी भाभी ने बी.एस.सी. तक पढ़ाई की हुई है इसलिये वो बहुत सी बार भाभी के पास पढ़ने के लिये आती रहती थी। पिंकी और उसके घरवाले तो चाहते थे कि मेरी भाभी उसे ट्यूशन पढ़ा दे मगर भाभी घर के कामों में ही व्यस्त रहती थी इसलिये उन्होंने मना कर दिया था।

मैंने पिंकी को कुछ नहीं कहा, बस अपने पैर पीछे खींच लिये, पिंकी भी भाभी को अपनी किताबे देकर सवाल समझने लगी और मैं बस उसे देखे जा रहा था।
पिंकी का इस तरह से बोलना आज मुझे बुरा नहीं लगा था, नहीं तो अभी तक मैं भी उसे दो-चार सुना चुका होता। पता नहीं क्यों पिंकी मुझे आज बहुत अच्छी व खूबसूरत लग रही थी इसलिये मैं बस उसे देखे ही जा रहा था.

गोल व मुस्कराता चेहरा जिसे देखते ही हर किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाये, लड़कों की तरह कटिंग किये हुए काले बाल जिन्होंने उसके आधे से ज्यादा माथे को ढक रखा था, नीली व बड़ी बड़ी आँखें, लम्बी पतली सी नाक, बिल्कुल सुर्ख गुलाबी व पतले पतले होंठ उसके दूधिया गोरे चेहरे पर अलग ही छटा सी बिखेर रहे थे और मुस्कुराते होंठों के बीच बिल्कुल सफेद दाँत जो मोतियों से दमक रहे थे, लम्बा कद और सबसे बड़ी बात उसका बिल्कुल सफेद दूधिया गोरा रंग अगर हल्का सा उसके बदन को कोई जोर से छू भी ले तो अलग ही निशान बन जाये।
भगवान ने पिंकी पर नैन-नक्श और रंग-रूप की दौलत तो दिल खोल कर लुटाई थी मगर बस एक ही जगह पर कंजूसी कर दी थी कि उसका शरीर बिल्कुल भी भरा नहीं था। सच कहूँ तो अगर पिंकी का शरीर थोड़ा सा भी भर जाये और वो अपने बाल बढ़ा ले तो स्वर्ग की अप्सरा से कहीं ज्यादा ही खूबसूरत लगेगी।

पिंकी का सारा ध्यान भाभी से सवाल समझने में था मगर मैं अब भी बस उसे ही देखे जा रहा था… तभी मेरे दिमाग में एक योजना ने जन्म ले लिया, मैं सोच रहा था क्यों ना पिंकी को पढ़ने के लिये रोजाना हमारे घर बुला लिया जाये और वैसे भी पिंकी और उसके घर वाले तो चाहते भी यही हैं कि मेरी भाभी पिंकी को ट्यूशन पढ़ा दे…
मगर मेरी यह योजना तभी कामयाब हो सकती थी जब भाभी मेरा साथ दे!

भाभी से सवाल का हल निकलवा कर पिंकी अपने घर चली गई मगर मैं उसी के ख्यालों में ही खोया रहा। पिंकी के जाने के बाद भाभी फिर मुझसे पूछने लगी- आज इतने गुमसुम सा क्यों हो?
मैंने जो योजना बनाई थी उसमें भाभी को शामिल किये बिना मैं कामयाब नहीं हो सकता था इसलिये मैंने भाभी को सारी बात बता दी.

एक बार तो मेरी बात सुनकर भाभी भड़क गई और कहने लगी- रोजाना तुम्हें नई-नई कहाँ से मिलेगी?
मगर मेरे बार बार विनती करने पर भाभी मान गई और मेरा साथ देने की लिये तैयार हो गई।

मेरे कहे अनुसार भाभी ने बातों बातों में पिंकी को रोजाना पढ़ने आने का इशारा सा कर दिया।
पिंकी और उसके घरवाले तो यही चाहते थे कि मेरी भाभी पिंकी को पढ़ा दिया करे इसलिये पिंकी रोजाना भाभी के पास पढ़ने के लिये आने लगी।

सुबह शाम भाभी को घर के काम करने होते थे इसलिये भाभी ने पिंकी को पढ़ाने के लिये दोपहर का समय चुना। भाभी पिंकी‌ को अपने कमरे में ही पढ़ाती थी।

वैसे तो मैं कभी भी पढ़ सकता था मगर मेरी योजना के अनुसार मैं भी पिंकी के साथ साथ पढ़ने के लिये बैठने लगा ताकि अधिक से अधिक पिंकी के पास रह सकूँ। मेरी भाभी भी इसमे मेरा साथ देती थी वो हमें किताब से थोड़ा बहुत पढ़ा देती और बाकी हमें खुद ही पढ़ने का बोलकर कमरे से बाहर चली जाती।
इसी तरह गणित विषय के भी एक तो सवाल समजा देती और बाकी का हमें हल करने का बता देती, जब कभी हमें कुछ समझ में नहीं आता तो हम भाभी से पूछ लेते थे।

भाभी के कमरे से जाने के बाद मैं और पिंकी अकेले ही होते थे जिसका फायदा पिंकी मुझे चिढ़ा कर या छेड़ कर उठाती और मैं उसका सामिप्य पाकर उठाता था।
पिंकी को जब भी मुझे चिढ़ाने का मौका मिलता वो मुझे चिढ़ाने से बाज नहीं आती थी मगर मुझे उसका चिढ़ाना व छेड़ना अब अच्छा लगता था। पिंकी के चिढ़ाने पर मैं उसे कुछ भी नहीं कहता बस किसी ना किसी बहाने से उसके कोमल बदन को छूने की कोशिश करता रहता था। मेरी कोशिश रहती कि मैं अधिक से अधिक पिंकी के कोमल बदन को स्पर्श कर सकूँ।

मैं और पिंकी बैड पर साथ साथ ही बैठकर पढ़ाई करते थे और मैं जानबूझ कर पिंकी के बिल्कुल पास होकर बैठता ताकि पिंकी के कोमल बदन को छुता रहूँ!
मैं जानबूझ कर पिंकी के कोमल हाथों को छू लेता तो कभी उसकी मखमली बदन से अपने शरीर का स्पर्श करवा देता मगर पिंकी इस पर कोई ध्यान नहीं देती थी, उसके लिये तो ये सब कुछ हँसी मजाक ही था।

इसी तरह करीब दो हफ्ते गुजर गये मगर पिंकी ने मुझ पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।
मुझसे भी अब सब्र नहीं हो रहा था इसलिये एक दिन पढ़ाई करने के बाद पिंकी जब घर जाने लगी तो मैंने उसके गाल को चूम लिया और उसे कह दिया- मैं तुमसे प्यार करता हूँ…!
मेरी इस हरकत से पिंकी बुरी तरह से गुस्सा हो गई और अपने घर में मेरी शिकायत करगी, ऐसा बोलकर जल्दी से अपने घर चली गई।

शिकायत की बात सुनकर मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई और मैं बुरी तरह घबरा गया। मैंने जब ये सारी बात भाभी को बताई तो भाभी भी मुझ पर गुस्सा हो गई और कहने लगी- तुम मुझे भी फंसवा दोगे, तुम्हें इतनी जल्दी ये सब करने की क्या जरूरत थी।
मेरे साथ साथ भाभी को भी डर था कि इसके लिये कहीं उनका नाम ना आ जाये।
डर के मारे मेरी हालत अब तो और भी खराब हो गई।

इसके बाद भाभी तो घर के काम में व्यस्त हो गई मगर मैं कमरे में ही बैठा रहा और भगवान से दुआ करने लगा कि भगवान बस आज बचा ले, आज के बाद कभी भी ऐसा कुछ नहीं करुँगा,
और शायद भगवान ने मेरी सुन भी ली…!
क्योंकि रात होने तक पिंकी के घर से मेरी कोई शिकायत नहीं आई।

अगले दिन सुबह भी सब कुछ सामन्य ही रहा मगर दोपहर को पिंकी पढ़ने के लिये हमारे घर नहीं आई। पिंकी का पढ़ने के लिये नहीं आने से मेरे दिल में अब भी डर बना रहा, इसी तरह दो दिन गुजर गये मगर पिंकी के घर से ना तो मेरी कोई शिकायत आई, और ना ही पिंकी हमारे घर पढ़ने के लिये आई।
पिंकी के घर जाने की तो मुझ में हिम्मत नहीं थी मगर मैं उसके घर के बाहर से ही उसे देखने की कोशिश करता रहता था मगर मुझे पिंकी कहीं भी दिखाई नहीं देती थी, पिछले दो दिन से शायद वो स्कूल भी नहीं जा रही थी।

मेरे दिल में अब भी डर बना हुआ था मगर फिर तीसरे दिन मैं भाभी के कमरे में बैठकर पढ़ाई कर रहा था, पढ़ाई तो क्या कर रहा था बस ऐसे ही बैठकर भाभी से बातें कर रहा था कि तभी हाथों में किताब पकड़े पिंकी आ गई, अचानक से पिंकी को देखकर मैं घबरा सा गया और चुपचाप पढ़ाई करने लगा।
पिंकी भी नजर झुकाकर चुपचाप पढ़ने के लिये मेरे पास बैड पर बैठ गई।

भाभी के पूछने पर पिंकी ने बताया कि वो रिश्तेदार के यहाँ गई हुई थी इसलिये दो दिन तक पढ़ने के लिये नहीं आ सकी थी।
पिंकी की बात सुनकर ‌मेरी जान में जान आ गई।

पिंकी अब फिर से रोजाना पढ़ने के लिये आने लगी मगर पिंकी से दोबारा बात करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी। पिंकी ने भी मुझसे बात करना बन्द कर दिया था, भाभी के सामने तो फिर भी जरूरत होने पर वो कभी कभी बात कर लेती मगर अकेले में हमारी कोई बात नहीं होती थी।

इसी तरह हफ्ता भर गुजर गया, मेरी पिंकी से बात करने की हिम्मत तो नहीं हुई मगर इस हफ्ते भर में मैंने देखा कि पिंकी के व्यवहार में काफी बदलाव आ गया था। पहले तो वो बात बात पर मुझसे झगड़ा करती रहती थी मगर अब जब कभी हमारा सामना होता तो वो नजर झुका लेती थी, उसने मुझे चिढ़ाना भी बन्द कर दिया था और जब कभी मेरा हाथ या पैर गलती से पिंकी को छू जाता था तो वो मुझसे दूर हट जाती थी मगर मुझे कुछ कहती नहीं थी।

मुझे पिंकी से डर तो लगता था मगर फिर भी मेरे दिल में उसके लिये नये नये ख्याल आते रहते थे।
एक दिन बातों बातों में ऐसे मैंने यह बात जब भाभी को बताई तो वो हंसने लगी और कहा- लगता है अब तेरा काम बन जायेगा।
मैंने उत्सुकता से पूछा- कैसे…?
तो भाभी‌ कहने लगी- बुद्धू… पिंकी को तेरी शिकायत ही करनी होती तो कब की कर देती…!

भाभी की बात सुनकर मुझ में फिर से एक नई जान सी‌ आ गई, मगर इस बार मैं जल्बाजी में कोई गलती नहीं करना चाहता था, इसलिये मुझे धीरे धीरे आगे बढ़ना ही सही लगा, और इसके लिये सबसे पहले तो मैं पिंकी से फिर से बाते करने की कोशिश करने लगा। मैं जानबूझ कर पढ़ाई के बारे में या किसी और के बारे में पिंकी से कुछ ना कुछ पूछने की कोशिश करता रहता, पहले पहल तो पिंकी मेरी बातों पर कम ही ध्यान देती थी और मेरी बातों का बहुत कम जवाब देती थी मगर फिर धीरे धीरे वो भी मेरी बातों का जवाब देने लगी।

मैं भी पिंकी से कुछ ना कुछ पूछता ही रहता और जानबूझ कर उससे बातें करने की कोशिश करता रहता था, पिंकी को भी पता चल गया था कि मैं जानबूझ कर उससे बात करने की कोशिश करता हूँ इसलिये जवाब देते समय उसके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान आ जाती थी, इससे मेरी हिम्मत बढ़ने लगी।

इसी तरह हफ्ता भर गुजर गया, पिंकी अब मेरी बातों का जवाब तो दे देती थी मगर वो खुद पहल करके मुझसे कभी बात नहीं करती थी।

धीरे धीरे मैं अब फिर से पिंकी के पास होकर बैठने लगा और कभी कभी जानबूझ कर उसके हाथ पैरों को छू देता जिससे पिंकी शर्मा कर हल्का सा मुस्कुरा देती और अपने हाथ पैरों को मुझसे दूर कर लेती।

पहले तो एक दूसरे को छूना पिंकी के लिये हंसी मजाक ही था मगर उस दिन के बाद से पिंकी भी समझ गई थी कि मेरे दिल में उसके लिये क्या है इसलिये मेरे छूने पर पिंकी अब शर्माने लगी थी। पिंकी की जो भावनाएँ सोई हुई थी, जिसके बारे में उसने शायद कभी सोचा भी नहीं था, उनको मैंने जगा दिया था।

इससे मेरी हिम्मत भी बढ़ती जा रही थी इसलिये कभी कभी तो मैं अब बातों बातों में जानबूझ कर पिंकी का हाथ भी पकड़ लेता जिससे‌ पिंकी बुरी तरह घबरा सी जाती और अपना हाथ मुझसे छुड़वाकर शर्म से सिकुड़ जाती, मगर मुझे कुछ कहती नहीं थी।

इसी तरह एक हफ्ता और बीत गया और मेरी हिम्मत बढ़ती गई…

फिर एक दिन पढ़ाई के बाद पिंकी जब अपने घर जाने लगी‌ तो मौका देखकर मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे फिर से कह दिया- मैं तुमसे प्यार करता हूँ।
अचानक से मेरे ऐसा करने पर पिंकी बुरी तरह घबरा गई, घबराहट के कारण वो कुछ बोल तो नहीं पा रही थी मगर मुझसे अपना हाथ छुड़ाने के लिये हाथ पैर चलाने लगी जिससे उसके हाथ से किताबें भी छुट कर फर्श पर गिर गई।

इससे पहले कि पिंकी मुझसे छुड़ाकर भाग जाये, मैंने पिंकी को पकड़कर अपनी बांहों में भर लिया और धीरे धीरे उसके मखमली बदन को सहलाते हुए उसके नर्म मुलायम गोरे गालों को चूमना शुरू कर दिया, अब तो डर व घबराहट से पिंकी का पूरा बदन कंपकपाने लगा, वो ऐसे ही हाथ पैर चला रही थी मगर तब तक पिंकी के बदन को‌ सहलाते हुए मैंने उसे दीवार से सटा लिया‌ और धीरे धीरे पिंकी के गाल को चूमते हुए उसके गुलाब की पंखुड़ियों की तरह सुर्ख लाल व कोमल होंठों की तरफ बढ़ने लगा.

पिंकी के दिल की धड़कन अब तेज हो गई थी और साँस भी तेजी से चल रही थी… डर व घबराहट के मारे पिंकी ठीक से कुछ बोल तो नहीं पा रही‌ थी, बस धीमी आवाज में कराह‌ सी रही थी
‘इश्श… च.छ.ओ.ड़..अ… च.छ.ओ.ड़..अ… म…उ..झ…ऐ…’
मगर फिर तभी बाहर किसी की आहट सुनाई दी, शायद मेरी भाभी होगी, इससे मेरा भी ध्यान बँट गया और तभी पिंकी ने अपनी पूरी ताकत से मुझे धकेलकर अलग कर दिया।
मैंने भी पिंकी को दोबारा पकड़ने की कोशिश नहीं की, बस चुपचाप उसे देखता रहा।

पिंकी बहुत ज्यादा घबरा गई थी वो जल्दी से नीचे बैठकर अपनी किताबें समेटने लगी, किताबें समेटते हुए वो अभी तक अपनी उफनती साँसों को काबू करने की कोशिश कर रही थी।
किताबें उठाने के बाद पिंकी जब कुछ सामान्य हुई‌ तो मुझ पर गुस्सा करने लगी और आज फिर से मेरी शिकायत करने की कहने लगी… मगर पिंकी की उखड़ती साँसें व आँखों में तैरते उत्तेजना के गुलाबी डोरे कह रहे थे कि मेरी हरकत से उसे भी मजा आ रहा था इसलिये शायद वो ऐसा कुछ नहीं करेगी, उसका गुस्सा भी मुझे झूठमूठ का ही लग रहा था।
मुझ पर गुस्सा दिखा कर पिंकी अपने घर चली गई…
और जैसा मैंने सोचा था वैसा ही हुआ पिंकी ने किसी से कुछ नहीं कहा।

अगले दिन‌ पिंकी जब पढ़ने के लिये हमारे घर आई तो उस समय भाभी कमरे में नहीं थी इसलिये मैंने भी मौका पाकर पिंकी को फिर से पकड़ लिया और उससे पूछने लगा- तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया?
मुझसे छुड़ाने का प्रयास करते हुए पिंकी कहने लगी- कौन सी बात?
मैंने बताया- जो कल कहा था, उसी का?
इस पर पिंकी का चेहरा शर्म से लाल हो गया और शर्माते हुए कहा- मुझे नहीं पता…!

तब तक मेरी भाभी कमरे में आ गई और पिंकी मुझसे छुड़वा कर बैड पर जाकर बैठ गई, पिंकी ने कोई जवाब तो नहीं दिया था मगर पिंकी की शर्म‌ हया से मुझे मेरा जवाब मिल गया था, बस अब तो धीरे धीरे उसे पटरी पर लाना था, और इसके लिये मैं पिंकी के बिल्कुल पास होकर बैठता, और जब भी मुझे मौका मिलता मैं पिंकी के गोरे गाल को‌ चूम ‌लेता, तो कभी उसके हाथ पैरों को‌ सहला देता था जिसका पिंकी बनावटी गुस्से से हल्का सा विरोध करती मगर किसी से कुछ कहती‌ नहीं थी।

मेरी हरकतों से बचने के लिये पिंकी मुझसे दूर होकर भी बैठने का प्रयास करती मगर मैं खिसकर उसके पास हो‌ जाता था। पिंकी के गालों को चूमना तो अब सामन्य सा हो गया था जिसका‌ पिंकी ने भी विरोध करना कम कर दिया था, वो बस झुठमुठ का बनावटी गुस्सा करके हंसने लगती थी।

इसी‌‌ तरह दो हफ्ते और बीत गये, मैं भी अब धीरे धीरे करके पिंकी के गुप्तांगों तक‌ पहुँच गया था, मौका मिलने पर कभी कभी मैं कपड़ों के ऊपर से ही उसके छोटे छोटे उरोजों को सहला देता था, यहाँ तक‌ कि‌ एक बार तो मैंने कपड़ों के ऊपर से पिंकी की योनि को भी‌ सहला दिया था जिस पर पिंकी बस बनावटी‌ गुस्से से कहती‌- सुधर जा… नहीं तो‌ मैं सही‌ में तेरी शिकायत कर दूँगी!
मगर मुझे पता था कि मेरी हरकतों से उसे भी मजा आता है इसलिये वो‌ किसी‌ से कुछ नहीं कहेगी।

और फिर एक दिन मुझे अच्छा सा मौका मिल ही गया, उस दिन मेरे पापा गाँव गये हुए थे और मम्मी‌ के बारे में तो आपको पता ही है जो कि बीमार होने के कारण अधिकतर अपने कमरे में ही रहती थी।
मेरी भाभी को भी उस दिन घर के काम देर हो‌ गई थी इसलिये दोपहर को पिंकी जब पढ़ने के लिये आई तो भाभी ने हमें कुछ देर तक तो पढ़ाया और बाकी की पढ़ाई अपने आप करने के लिये बोलकर कपड़े धुलाई करने के लिये चली गई।
मैंने भी‌ भाभी‌ को‌ जाते समय आँख से इशारा करके बता दिया कि वो‌ जल्दी से‌ कमरे में ना आयें!

भाभी के जाते ही मैंने पिंकी को पकड़कर अपनी बांहों में भर लिया और धीरे धीरे उसके गोरे गालों‌ को चूमने लगा जिससे पिंकी झूठमूठ का गुस्सा करते हुए ‘छोड़… छोड़ मुझे… मैं घर जा रही हूँ…मुझे नहीं पढ़ना है तेरे साथ…’ इसी तरह पिंकी ना-नुकर करते हुए मुझसे छुड़ाने का प्रयास करने लगी मगर मैंने उसे पकड़ कर बैड पर गिरा लिया.

पिंकी मुझे धकेलकर उठने की कोशिश तो कर रही थी मगर मैं उसे ऐसे ही दबाये रहा और अपना एक हाथ कपड़ों के ऊपर से ही उसके छोटे छोटे उभारों की ओर बढ़ा दिया। पिंकी के उभार बहुत ही छोटे थे जो मुश्किल से नीम्बू के समान ही होंगे। पिंकी के उभारों को कस के रगड़ने मसलने के बजाय मैंने उसके ज़वानी के दोनों छोटे छोटे फूलों को हल्के से सहलाना शुरू कर दिया जैसे कोई भौंरा कभी एक फूल पे बैठे तो कभी दूसरे पर…

मेरे हाथ भी यही कर रहे थे, साथ ही मैं पिंकी की गर्दन व गालों को भी चूम रहा था जिसका पिंकी अपने सर इधर उधर हिलाकर मेरे चुम्बन से बचने का प्रयास कर रही थी।
पिंकी एक किशोरी थी जो पहली बार यौवन सुख का स्वाद चख रही थी इसलिये उसका शर्माना, झिझकना जायज ही था मगर मेरा भी काम उसे पटाना, तैयार करना और वो लाख ना ना करे उसे कच्ची कली से फूल बनाना था।
पिंकी के गालों को चूमते हुए धीरे धीरे मैं उसके गुलाबी रसीले होंठों पर आ गया और हल्के बहुत ही हल्के से उसके रसीले होंठ चूसने लगा।

पिंकी की साँसें भी अब गहरी होने लगी थी और उसका‌‌ विरोध भी‌ कुछ हल्का पड़ने लगा था।

मैंने अपनी जीभ पिंकी के मुँह में डाल दी जिसका पहले तो वो अपनी गर्दन को इधर उधर हिलाकर बचने का प्रयास करती रही मगर मैंने भी एक हाथ से उसके सर को कस के पकड़ लिया और उसके मुंह में अपनी जीभ को ठेले रखा.
और फिर कुछ देर की ना नुकुर के बाद ..पिंकी की जीभ ने भी हरकत करना शुरू कर दिया, वो अब हल्के से मेरे जीभ के साथ खिलवाड़ करने लगी। उसके रसीले होंठ भी अब मेरे होंठों को धीरे धीरे कभी कभी चूमने लगे थे.

मगर मैं ऐसे छोड़ने वाला थोड़े ही था, मैं आज पहले से कुछ आगे बढ़ना चाहता था इसलिये मेरा हाथ जो अब तक उसके छोटे छोटे उभारों से खेल रहा था वो पिंकी के बदन पर से रेंगता हुआ उसकी दोनों जाँघों के बीच आ गया मगर तभी पिंकी ने मेरे हाथ को पकड़ लिया और साथ ही मेरे होंठों पर से अपना मुँह हटा कर ‘ नहीं नहीं… छोड़… ना…’ कहने लगी लेकिन मैंने उसको छोड़ा नहीं बल्कि हल्के हल्के उसके गाल पर फिर से चूमने लगा, साथ ही मेरा हाथ पकड़े जाने के बावजूद भी थोड़ी सी‌ जबरदस्ती करके मैं धीरे धीरे उसकी योनि को‌ भी सहलाने लगा।
‘अआआ…ह्ह्हह… बस्स्स… अ..ओओ..य.. हो.. गय..आ… अआआ…ह्ह्हह… ..प्लीज..अअआ… ह्ह्हहहहह.’
वो बुदबुदा रही थी।
पिंकी की आवाज में घबराहट और डर तो था लेकिन साथ ही कही ना कही उसकी भी थोड़ी बहुत इच्छा हो रही थी।

मैंने उसके गालों को छोड़ा नहीं बल्की हल्के से उसी जगह पे एक हल्का सा चुम्बन किया और…
और फिर एक झटके से मैंने अपना हाथ छुड़वाकर पिंकी के लोवर व पेंटी में डाल‌ दिया जिससे पिंकी ने ‘अ..अ..ओ…य… न..नहीं..इई.. इ…इईई…श्शशश.. क्क्क…क्या… कर रहा है…’
कहकर पकड़ने की कोशिश करने लगी मगर तब तक मेरा हाथ पिंकी की लोवर व पेंटी को भेद कर उसमें में उतर चुका था।

पहले तो पिंकी ने अपने घुटने मोड़ने चाहे मगर उसके दोनों पैरों को मैंने अपने पैर से दबा रखा था, फिर पिंकी ने दोनों जाँघों को भींच कर अपनी‌ योनि को छुपाने की‌ कोशिश की… मगर उसकी जांघें इतनी मांसल भरी हुई‌ नहीं थी कि उसकी योनि को‌ छुपा सके, उसकी जाँघों को बन्द करने के बाद भी दोनों जाँघों के बीच इतनी जगह रह गई कि मेरी दो उंगलियां उसकी योनि को छू गई जो योनिरस से हल्की सी गीली हो रही थी।

पिंकी की योनि बिल्कुल सपाट व चिकनी लग रही थी जिस पर ना तो कोई उभार था और ना ही कोई बाल महसूस हो रहे थे। मेरी जो दो उंगलियाँ पिंकी कि योनि को‌ जितना छू‌ रही थी उन्हीं से मैं योनि को छेड़ने लगा, साथ में ही योनि को उंगलियों से हल्के हल्के दबा भी रहा था, जिससे पिंकी शर्म से दोहरी हो‌ गई और ‘इईईई…श्शशश…नहीं..इई.. अ..ओ.ओय.. वहां से हाथ हटा…प्लीज… बात… मान.. वहां नहीं… छोड़ ना… अब बहुत हो तो गया… बस्सस…’ करके मेरे हाथ को बाहर निकालने की कोशिश करने लगी।

मगर मैं कहाँ मानने वाला था, मैं धीरे धीरे ऐसे ही पिंकी की योनि को उंगलियों से दबाता सहलाता रहा जिससे कुछ ही देर में पिंकी की योनि‌ पर असर हो गया क्योंकि मेरी‌ उंगलियाँ कामरस से भीगने लगी और पिंकी के मुँह से भी अब हल्की हल्की कराहें निकलना शुरु हो‌ गई।
पिंकी ने अब भी मेरा हाथ पकड़ रखा था मगर अब वो उसे निकालने की इतनी कोशिश नहीं कर रही थी। मेरा हाथ पकड़े हुए वो अब भी यही बुदबुदा रही‌ थी ‘अ..अ.. ओ…य… न..नहीं..इई.. ना.. इ…इईई… श्शशश… क्क्क…क्या… कर रहा है… इईईई…श्शशश… नहीं..इई.. छोड़ ना… प्लीज.. बस्सस… अब बहुत हो तो गया… बस्सस…’

पिंकी की जांघों की पकड़ भी अब कुछ हल्की होती जा रही थी और धीरे धीरे मेरी‌ उंगलियाँ पिंकी की जाँघों के बीच जगह बना‌कर नीचे की ‌तरफ बढ़ती जा‌ रही थी, तब तक‌ पिंकी की योनि‌ भी काम रस से लबालब हो गई‌। मैंने फिर से पिंकी के होंठों को मुँह में भर लिया और हल्के हल्के उन्हें चूसना शुरू कर दिया. इस दो‌ तरफा हमले को पिंकी ज्यादा देर तक सहन‌ नहीं कर सकी‌ और उसके बदन‌ ने उसका‌ साथ छोड़ दिया, पिंकी की‌ जांघें अब फैलने लगी और वो भी अब कभी कभी मेरे होंठों को हल्का हल्का दबाने लगी थी, तब तक‌ मेरी उंगलियाँ योनि के अनार दाने तक‌ पहुँच गई और मैंने उसे हल्का सा मसल दिया जिससे पिंकी जोर से ‘इईई…श्शशश… अ..अआआ…ह्ह्हहहह…’ करके चिहुंक पड़ी और जोर से मेरे हाथ को दबा लिया. मगर मैं रुका नहीं, धीरे धीरे मेरी उंगलियाँ योनि के प्रवेश द्वार तक पहुँच गई जो‌ योनिरस से भीगकर बिल्कुल तर हो गया था।

पिंकी ने भी अब अपनी जांघें फैलाकर समर्पण कर दिया जिससे मेरे हाथ का पूरी योनि पर अधिकार हो गया और मैं खुलकर पिंकी की‌ योनि‌ को ‌रगड़ने मसलने लगा… पिंकी के मुँह से भी अब सिसकारियाँ निकलनी शुरु‌ हो गई।

मैं पिंकी की योनि को रगड़ते मसलते हुए धीरे धीरे योनिद्वार पर भी हल्का‌ से अन्दर की ‌तरफ दबाने लगा, बस उंगली का एक पौरा भर ही अन्दर कर रहा था, मगर पिंकी अब खुद ही मेरे हाथ को पकड़ कर जोर से दबाते हुए ‘इईई…श्शशश… अआआ…ह्ह्ह… इईई…श्शश… अआआ…ह्ह्हहह…’ करने लगी ताकि मेरी उंगली‌ उसकी गुफा में समा जाये, लेकिन मैं उंगली को योनिद्वार में ज्यादा अन्दर तक नहीं डाल‌ रहा था क्योंकि अन्दर योनि की गुफा काफी संकरी थी।

पिंकी बहुत ज्यादा उत्तेजित हो गई थी उत्तेजना के वश वो नहीं जान पा रही थी कि वो क्या कर रही है। इसलिये मैं जितनी‌ मेरी उंगली योनि में जा रही थी उसे ही योनिद्वार के अन्दर बाहर करने लगा मगर अब मैंने थोड़ी गति‌ बढ़ा दी थी जिससे‌ पिंकी की सिसकारियाँ भी तेज हो‌ गई और वो जोर से ‘इईई… श्शशश… अआआ… ह्ह्हह… इईईई…श्शश… अआआ…ह्ह्ह…’करते हुए मेरे हाथ को अपनी‌ योनि पर दबाने लगी‌ साथ ही वो अपनी दोनों जाँघों को भी कभी खोल रही थी, तो‌ कभी जोर से भींच रही थी।

पिंकी ने मेरे होंठों को भी अब जोरो से काटना शुरू कर दिया था और फिर अचानक से पिंकी का बदन थरथरा गया उसने जोर से ‘इईईई…श्शशश… अआआ…ह्ह्हहहहह… ईई…श्शश… अआआ… ह्ह्ह…’ की किलकारी सी मारते हुए मेरे हाथ को अपनी योनि पर दबा कर जोर से दोनों जाँघों से भींच लिया और उसकी योनि ने मेरे हाथ पर उबलता हुआ सा लावा उगलना शुरू कर दिया।

पिंकी तीन-चार किश्तों में अपने योनिरस के लावे से मेरे हाथ को नहला कर बेसुध सी हो गई। मैं भी कुछ देर तक ऐसे ही बिना कोई हरकत किये खामोशी से पिंकी को देखता रहा मगर मेरा हाथ अब भी पिंकी की पेंटी में ही था।

पिंकी आँखें बन्द करके लम्बी लम्बी सांसें ले रही थी, चेहरे पर सन्तुष्टि के भाव साफ नजर आ रहे थे जैसे की‌ कोई बहुत लम्बी दौड़ को जीतने की खुशी के बाद आराम कर रही हो।

पिंकी का ज्वार तो मैंने शांत कर दिया था मगर मैं अब भी प्यासा ही था इसलिये मैंने धीरे से पिंकी के गाल को फिर से चूम‌ लिया, जिससे पिंकी चौंक‌ सी ‌गई जैसे‌ अभी अभी‌ गहरी नींद से जागी हो, पिंकी ने मेरा हाथ पकड़कर अपने पजामे से बाहर निकाल दिया और मुझे धकेल कर जल्दी से उठकर बैठ गई।

मैंने उससे पूछा- क्या हुआ?
तो पिंकी ने अपने कपड़े ठीक करते हुए हल्की सी मुस्कान के साथ बस एक बार मेरी तरफ देखा और फिर शर्माकर गर्दन नीचे झुका ली।
मैंने फिर से पूछा- क्यों… मजा नहीं आया क्या?
इस पर पिंकी ने हल्का सा मुस्कुराकर कहा- तू बहुत गन्दा है।
और शर्माकर फिर से गर्दन नीचे झुका ली।

मैं फिर से‌ पिंकी को पकड़कर‌ चूमना चाहता‌ था मगर तभी‌ बाहर से भाभी ने आवाज देकर मुझे छत पर जाकर कपड़े सुखाने को कहा!
तब तक पिंकी भी घर जाने के लिये जल्दी जल्दी अपनी किताबें समेटने लगी।

जाते समय मैंने फिर से पिंकी का हाथ पकड़ लिया और उससे कहा- आज रात को छत पर मिलेगी क्या?
इस पर पिंकी ने अपने कंधे उचकाकर हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा- क्यों… किसलिये…?
और जल्दी से अपना हाथ छुड़वा कर भाग गई.

मेरा नाम आयुष है.. मैं लखनऊ में रहता हूँ।

जब मैं 18 साल का हुआ था.. मेरा भी लण्ड मुझे परेशान कर रहा था और मैं काफ़ी सालों से मुठ मार रहा था। एक बार मेरे बाप ने मुझे मुठ मारते पकड़ लिया था.. बहुत मार पड़ी थी यार। मैं बचपन से ही बड़ा मनचला रहा हूँ।
चलो ये सब बाद में.. अब कहानी पर आते हैं।

एक बार मेरे घर पर मेरे दूर के रिश्ते के चाचा चाची आए थे, जब मैंने चाची को देखा तो मेरी तो सांस ही रुक गई।
क्या कयामत थी वो.. मेरा तो दिल किया इसको यहीं खड़े-खड़े चोद दूँ।
मैंने ऐसा किया भी.. उसको वहीं खड़े-खड़े आँखों से ही चोद दिया।

वो भी समझ गई कि मैं उसको आँखों से चोद रहा था.. पर उसने कुछ बोला नहीं।

रात को जब हम सब खाना खाकर सोने की तैयार करने लगे.. तभी ममी ने मुझे बताया कि वो दोनों मेरे ही कमरे में रहेंगे.. मुझे बड़ी खुशी हुई।
साथ में दु:ख भी था कि चाचा भी साथ में हैं।
ये तो वही बात हो गई कि हाथ में आया.. पर मुँह को ना लगा।

हम सोने चले गए।

चाचा तो कमरे में जाते ही सो गया.. पर मुझे नींद नहीं आ रही थी, फिर भी आँखों में चाची को चोदने के सपने ले सो गया।

रात को मेरी आँख खुल गई.. तो मैंने पाया कि कमरे में अंधेरा था और मेरे ऊपर से एक हाथ बार-बार आ-जा रहा था। मैंने महसूस किया कि वो हाथ चाचा का था.. जो बार-बार चाची को छू रहा था। चाची बार-बार उसको हटाने की कोशिश रही थीं। काफ़ी देर तक कोशिश करने पर भी जब चाचा को लगा कि दाल नहीं गलने वाली.. तो वो सो गए।

अब तक मेरी नींद तो उड़ गई थी। मैं काफ़ी देर तक अपने आपको रोकता रहा.. पर नहीं रोक पाया और मेरा हाथ चाची के ऊपर चला गया। मैं चाची की छाती दबाने लगा.. आह्ह.. चाची के क्या ठोस मम्मे थे।

मैं काफ़ी देर तक चाची के मम्मों को दबाता रहा।

फिर मेरा हाथ धीरे-धीरे नीचे की तरफ जाने लगा.. जब मेरा हाथ उनके पेट पर गया.. तो देखा उस पर एक ग्राम भी एक्सट्रा चर्बी नहीं थी.. बिलकुल सपाट और मुलायम था।
मैं और नीचे गया तो उनकी सलवार का नाड़ा मेरे हाथ में आ गया.. मैंने बड़ी सफाई से उसको खोल दिया और अपना हाथ उनकी सलवार में डाल दिया।

उनकी चूत पर थोड़े-थोड़े बाल थे.. ज़िनको छूकर मेरा तो दिल मचल गया। मैंने थोड़ी देर तक उन झांटों को सहलाया फिर नीचे की ओर जाने लगा उनकी चूत के दाने को थोड़ी देर तक बड़े प्यार से सहलाता रहा।

जब मेरा हाथ और नीचे गया.. तो मेरी एक उंगली उनकी चूत में चली गई, वहाँ गीला सा लगा, मैं अपनी उंगली को उनकी चूत में घुमाता रहा।
इस पर भी जब चाची कुछ नहीं बोलीं.. तो मेरी हिम्मत बढ़ गई।
तब तक मेरे लण्ड का बुरा हाल हो चुका था।
दोस्तो, ये डर और उत्तेजना का मिला-जुला अहसास होता है.. इसका मुकाबला तो बड़े से बड़ा चोदू भी नहीं झेल सकता.. जो मैं उस वक्त झेल रहा था।

मुझे जब पूरा विश्वास हो गया कि चाची कुछ नहीं बोलने वाली हैं.. तो मेरी हिम्मत बढ़ गई और मैंने चाची की पीछे से सलवार को इतनी नीचे कर दी कि वो मेरे लण्ड और चाची की चूत के बीच दीवार ना बन पाए।

मैंने अपना लण्ड भी अपनी पैंट की ज़िप खोलकर बाहर निकाल लिया और चाची की चूत में पीछे से ही डालने लगा।
मेरे काफ़ी देर कोशिश करने पर भी लण्ड अन्दर नहीं जा रहा था।

एक तो चोदने को पहली बार चूत मिली थी.. ऊपर से यह डर कि कहीं चाची जाग ना जाएं.. उससे भी बड़ा कि उस चूत का मालिक भी बगल में ही सोया है।
आप समझ सकते हैं कि ऐसा करने के लिए कितना बड़ा ज़िगरा चाहिए।

मेरी भी गाण्ड फटी हुई थी। इसी चक्कर में.. मैं अपना लण्ड चाची की चूत में नहीं डाल पाया और बाहर ही ढेर हो गया। मेरी तो कलेजा गले में आ गया कि ये क्या हो गया।

मैंने अपने ऊपर थोड़ा काबू किया और चाची की सलवार को ऊपर करके दूसरी तरफ मुँह करके सो गया.. क्योंकि मुझे खुद पर इतनी शरम आ रही थी कि चूत मिली.. तो चोद नहीं पाया और लण्डबाज बना फिरता हूँ। शरम के मारे बाथरूम में भी नहीं जा सका.. वहीं पड़े-पड़े कब नींद आ गई.. पता ही नहीं चला।

Sex Stories

प्रिय पाठको, मैंने Sex Stories अपनी पहली कहानी “तू तो कुछ कर” में अपनी मैडम के बारे में ज़िक्र किया था मगर मैंने यह तो बताया ही नहीं कि वो लगती कैसी थी। वो एक कमाल की औरत जिसका कद 5’6″ के आसपास है और उसकी आँखें बिलकुल नशे से भरी हुई, उसके होंठ ऐसे कि किसी ने संतरे में लाल रंग कर दिया हो और वो भी ऐसा जिसका रस कभी ख़त्म ही न हो। उसका रंग गेंहुआ, चेहरे पर कोई दाग नहीं, उसके स्तन इतने प्यारे और कोमल कि जैसे बस इन्ही का गद्दा बना कर सो जाओ, उसकी जांघों के बीच में चूत का छेद जैसे बड़ी सफ़ेद पहाड़ी में एक गुफा जो सीधा स्वर्ग में खुलती है, उसकी पसीने से भरी वो कमर जिसे देख किसी साधु का भी ईमान डगमगा जाये, उसके ब्लाऊज़ से झांकते उसके वो मम्मे जैसे कह रहे हों- हमें आज़ाद करो, हम फंस गए हैं, वो उसकी ब्रा के खुलते ही उसकी चूचियों का धड़ाम से बाहर गिरना जैसे की सालों से आज़ाद नहीं हुई हो, उसके होंठों का लंड पर ऐसा एहसास जैसे कोई मखमल के कपड़े से तुम्हारा लंड सहला रहा हो।

खैर अब मेरे मुँह पर चूत लग चुकी थी। मैं अब नई नवेली मुल्ली की तरह हो गया था, रोज़ मन करता था कि बस अपना चप्पू चलाता ही रहूँ। मगर ऐसा संभव नहीं था क्योंकि वो शादीशुदा औरत थी और एक बच्चे की माँ भी। थोड़ा सा समाज का ख्याल तो रखना ही पड़ता था। कई दिन हो गए थे मुझे उस पसीने की महक दोबारा लिए हुए।

तभी एक दिन सुबह मैडम का फ़ोन आया कि आज उनके पति दो दिन के लिए बाहर जाने वाले हैं। तो मैडम चाहती थी कि मैं उन्हीं के साथ रहूँ। मगर ऐसा नहीं हो सकता था, खैर मैंने अपने घर वालों को बोल दिया कि मैं सुबह ट्यूशन जा रहा हूँ और एक्स्ट्रा क्लास लेने के बाद अपने दोस्त के घर पढ़ाई करने चला जाऊंगा।

मैं सीधा मैडम के घर गया और साथ कुछ कंडोम भी ले गया ( इसे इस्तेमाल करने में शर्म नहीं करनी चाहिए)।

फिर क्या था, मैं जैसे ही उनके कमरे में घुसा तो देखा कि कमरा महक रहा है जैसे किसी सुहागरात में महकता है। मैडम की आँखों में चमक थी, उनकी आँखों में कई दिनों की भूख दिख रही थी। फिर उन्होंने कमरे का दरवाजा बन्द करते हुए मुझे बिस्तर पर धक्का दिया और मुझे चूमने लगी। मैंने उनके हाथों को रोक दिया और उनसे कहा- आज कुछ अलग करने का मूड है !

उन्होंने पूछा- क्या ?

तो मैंने कहा- आपकी गांड मारने का मन है !

वो बोली- पहले आगे का कार्यक्रम पूरा कर लेते हैं, तब पीछे भी जाएँगे !

मगर वो जानती है की मैं अभी छोटा हूँ, मेरा स्टेमिना कम है और वो मुझे आगे ही इतना थका देंगी कि मैं पीछे जा ही नहीं पाउँगा। मैंने जिद करके उन्हें मना ही लिया और मैंने उन्हें घोड़ी की अवस्था में बिस्तर पर टिका दिया और खुद उनके पीछे आ गया और मैं यह जान चुका था कि जब तक औरत के शरीर पर कुछ कपड़े बाकी हैं तो उसकी लेने में बड़ा मज़ा आएगा, मगर अगर तुमने उसे पूरा नंगा कर दिया तो वो मज़ा नहीं आ पाता।

इसीलिए मैंने मैडम के शरीर पर उनकी ब्रा और पैंटी छोड़ दी ताकि थोड़ा फील आ सके। उसके बाद मैंने जैसे ही अपना लंड उनकी गांड पर टिकाया तो वो उनके छेद के ऊपर ही अटक गया, और मैं समझ गया कि यह ऐसे अन्दर नहीं जाएगा। मैंने कहीं से वैसलिन ढूँढी और उनकी गांड के छेद पर और अपने लंड पर लगाई, एक हाथ से मैडम का मम्मा पकड़ा और एक हाथ उनके कंधे पर रखा और झट से उनके अन्दर तक बाड़ दिया।

वो तड़प उठी और उनकी उस तड़प को देख कर मैं और उत्तेजक हो गया, मैंने उनकी गांड में 8-10 धक्के मारे और उनके बगल में ही लेट गया और उनसे लिपट के उन्हें प्यार करने लगा। मगर वो एक खेली-खाई औरत थी, वो कहाँ थकने वाली थी। तो उन्होंने मेरे लण्ड को जगाने के लिए चूसना चालू किया। फिर वो मेरे ऊपर चढ़ गई और बोली- अब मेरी बारी !

और उन्होंने मुझसे धक्के लगवाने चालू किये। उनके वो उछलते हुए दो बम और उनकी आँखों में छलकती हुई हैवानगी मुझे पागल कर रही थी। मगर साथ ही मैं थकता भी जा रहा था। फिर आखिर मैंने उन्हें अपने से लिपटा लिया और सोचा कि वो मान जाएगी मगर वो कहाँ मेरे कहे में आने वाली थी।

हम पसीने-2 हो रहे थे, वो मेरे में हिम्मत नहीं रही थी। जब मैं बहुत थक गया तो मुझे उनसे मिन्नत करनी पड़ी- आज बस इतना ही !

उनमें ऐसी हैवानियत मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। खैर हम बहुत देर तक एक दूसरे से प्यार करते रहे। उन्होंने मुझे बाद में मुझे खुली छूट दी कि मैं कुछ भी कर लूँ उनके साथ !

मगर मेरी तो फटी पड़ी थी !

फिर वो नहाने चली गई, मैं बिस्तर पर ही पड़ा रहा और थक कर सो गया।

फिर हम पूरे दिन नंगे ही रहे।

जब मैं थक कर सोया हुआ था तब कुछ घंटे बाद मैंने महसूस किया कि कुछ मुलायम सी चीज़ मेरे मुँह को छू रही है, तो मैंने पाया कि मैडम जी मेरे मुँह में अपने मम्मे देने की कोशिश कर रही थी। मुझे तो जैसे यह एक सपना लग रहा था कि सोकर उठते ही एक मम्मा मेरे मुँह में !

आऽऽहाऽऽ ! क्या एहसास था वो !

फिर मैंने मैडम के मम्मे बहुत देर तक चूसे। मेरी क्या आदत है कि जब मैं कोई चीज़ चूसता हूँ तो पूरा मज़ा लेता हूँ उसका। मैंने बहुत देर तक उन थनों को चूसा और मदहोश होता चला गया। फिर उसके बाद मैडम बोली- हम एक काम करते हैं ! एक खेल खेलते हैं।

खेल यह था कि वो मेरी आँखों पर पट्टी बांधेंगी और फिर मेरे मुँह में एक एक करके अपने जिस्म का एक एक हिस्सा छुएंगी और मुझे पहचानना होगा कि वो कौन सा हिस्सा है।

मुझे ठीक लगा और उन्होंने मेरी आँखों पर एक पट्टी बांध दी। फिर उन्होंने पहले अपना कन्धा मेरे मुँह से छुआ, फिर अपनी कोहनी, फिर अपने रसीले होंठ, फिर अपना मम्मा, और फिर आखिर में अपनी चूत मेरे मुँह पर लगाई और फिर मैंने उनकी चूत को बहुत देर चूसा, जो कि गीली थी।

फिर हमने सोचा कि अगर खेलना ही है तो टाइम बाँट लेते है- जैसे हर आधे घंटे कुछ खास करेंगे, जैसे एक बार सिर्फ चूमा-चाटी, एक बार सिर्फ गांड मारना, एक बार सिर्फ चुदाई, एक बार सिर्फ चूचे चोदना, एक बार फ्री स्टाइल बिना चुदाई के !

जो नियम तोड़ेगा उसे दूसरे से अपने मुँह पे मुतवाना पड़ेगा।

चुम्बन वाले वक़्त में तो हमने बस माँ बहन ही कर दी कि अगर कोई हमें देख लेता तो बस उसकी फट ही जाती, जैसे हमने सारी जान उसमें ही लगा दी।

अब आई गांड की बारी तो मैंने उसे घोड़ी बनाया और गांड मारनी चालू की तो वो इसका आनन्द लेने लगी और उसके मुँह से सिसकियाँ निकलने लगी। उसकी सिसकियाँ सुनकर मेरे अन्दर को चोदुमल बाहर आता जा रहा था और मेरी स्पीड तेज़ हो गई जिससे उसकी सिसकी चीख में बदलने लगी और वो बोलने लगी- बस राज निकाल ले, वरना सिलाई उधड़ ही जाएगी मेरी गाण्ड की !

उसकी बात सुनकर मुझे उसकी गांड के छेद पर तरस आ गया जोकि काफ़ी खुल चुका था। मगर कसम से ! क्या गांड थी वो ! जो एक बार देख ले बस सीधा मारने का मन करे !

तो इसी के साथ ही मैं उससे शर्त जीत गया था क्योंकि वो वक़्त से पहले ही हार मान चुकी थी। फिर मैंने उसका मुँह अपने लंड के पास किया और एक तेज़ धार उसके मुह पर मार दी।

फिर आई चुदाई की बारी : मैं थकता जा रहा था और वो चुदक्कड़ औरत मुझ पर चढ़ गई और उसने मेरा लंड अपनी चूत के अन्दर डलवा लिया जोकि किसी भट्टी की तरह गरम थी और बस फिर बस धक्के पे धक्के ! सबसे ख़ास बात उसमें यह थी कि वो मेरे सारे धक्के झेल गई और साथ ही मुझे ब्रेक भी दे रही थी। मगर मैं नया था और थक कर हट गया। जिसका मतलब मैं हार गया था, तो उसने मेरा मुँह अपनी चूत के पास किया और फिर एक मोटी सी धार मेरे मुँह पर मार दी। उस बार ऐसा लगा कि जैसे मुझ पर अमृतवर्षा हो रही है।

खैर किसी तरह मैंने अपने आप को संभाला और फिर आई उसके चूचे चोदने की बारी ! यह हम पहली बार कर रहे थे। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाने के बजाये घुटनों पर बैठाना ज्यादा सही समझा। फिर उसने अपने दोनों चूचों से मेरा लंड पकडा और चुदाई चालू की। थोड़ी देर मुझे उसमें ज्यादा मज़ा नहीं आया तो मैंने उनसे सहमति लेकर अपना अगला काम चालू किया जहाँ हम आज़ाद थे कुछ भी करने को !

तो पहले तो थोड़ी देर 69 में आये और उसके बाद हम लोगों ने चूमा-चाटी चालू कर दी तो इस बार मुझे ऐसा लगा कि वो सिर्फ अपनी भूख नहीं मिटा रही थी बल्कि उनके मन में कुछ और था, जैसे वो मुझे शायद अलग नज़र से देखने लगी, उनकी आँखों में तृप्ति के साथ थोड़ा प्यार भी नज़र आया, जैसे कि वो मुझे आजमा रही थी। उनका स्पर्श बदलता जा रहा था, वो सेक्स नहीं मेरे साथ प्यार कर रही थी।

हम जो पहले बहुत उत्तेजित हो गए थे, वहीं अब हम शांति से एक दूसरे को सिर्फ प्यार कर रहे थे। वो मुझसे लिपट कर लेट गई और मुझे ऐसे ही रहने को कहा। वो बीच बीच में कभी मेरे बालों पर हाथ फिराती, कभी मेरे गालों को चूमती।

मैं ढंग से समझ नहीं पाया कि यह अचानक क्या हुआ है।

बाकी की कहानी अगले भाग में !

और अब आप मुझे अपने विचार ज़रूर भेजना कि आपको यह कहानी कैसी लगी Sex Stories

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शादी के बाद से नज़मा भाभी की चुदाई Sex Stories बहुत ही कम हुई थी। जवान तन लण्ड का प्यासा था। मुझे रोज चुदते देख कर उसका मन भी मचल उठा। वो रोज छुप छुप कर अब्दुल से मेरी चुदाई देखा करती थी। जब वो गाण्ड मारता था तो भाभी का दिल हलक में अटक जाता था। भैया को बस धंधे से मतलब था। रात को दारू पीता और थकान के मारे जल्दी सो जाता था। सात दिन पहले वो मुम्बई चला गया था।

नज़मा भाभी आज तो ठान रखी थी कि मुझसे बात करके कुछ काम तो फ़िट कर ही लेगी।

भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा,”बानो छत पर चल, एक जरूरी काम है !”

“यहीं बोल दे ना … !”

“अब तू भी गाण्ड फ़ुला कर नखरे दिखा ! … कहा ना जरूरी काम है !”

“चूतिया टाईप बातें मत कर … गाण्ड जैसा अपना मुँह खोल … बोल क्या बात है !”

“साली हारामजादी … मां चुदा ! … नहीं बताती … !”

“हाय मेरी भाभी जान … चल फिर … लगता है जरूर कोई बात है !”

भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और लगभग खींचती हुई छत की ओर छलांगें मारती हुई सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। छ्त पर पहुंचते ही वो हांफ़ने लगी। उसकी छातियाँ ऊपर नीचे होने लगी।

“सुन … एक बात कहूँ … बुरा तो नहीं मानेगी ना … ” उसने बड़ी मुश्किल से उखड़ती आवाज में कहा।

“बोल ना … दिल में इतनी बेचैनी … क्या बात है … किसी ने चोद मारा है क्या … ?”

“बात ही कुछ ऐसी है … देख नाराज मत होना … !”

मैंने उसे हैरानी से देखा … “बोल ना … ऐसा क्या है?”

“बहुत दिन हो गये, तेरे भाई जान तो यहाँ है नहीं … !” वो अटकते हुए बोली।

“हाँ तो … आ जायेंगे ना …! “

“वो तेरा दोस्त है ना, अब्दुल … उससे मेरी दोस्ती करवा दे !” भाभी ने जमीन की ओर देखते हुये कहा।

“ओह हो … मेरी भाभी की चूत चुदासी हो गई है … चुदना है क्या?”

“बानो ! … प्लीज़ देख मजाक मत कर … मेरी हालत बहुत खराब हो रही है … देख, चूत में से पानी टपक रहा है !”

“अच्छा … पहले देखूँ तो कितनी बैचेन है भाभी की चूत … ” मैंने उसकी चूत दबा दी।

सच में रसीली हो चुकी थी।

तो भोसड़ी की ! रान्ड को चुदवाना है ? मैंने कहा।

“सच रे … ये तो बहुत ही चुदासी है … साली पहले क्युँ नहीं चुदवा लिया … कब चुदवाओगी … … कब बुलाऊँ उसे …??? “

“आज रात को ही चुदवा दे ना मुझे … “भाभी ने कातर नजरो से मुझे देखा। मुझे उस पर दया आ गई …

अब्दुल तो शाम को सात बजे ही घर पर आ गया था। शाम का धुंधलका बढ़ गया था। हम दोनों छत पर आ गये। दूसरी छतों पर लोग थे।

“बानो, भाभी आये उसके पहले कुछ हो जाये … ?” अब्दुल बोला।

मुझे डर सा लगा, पर तुरन्त आईडिया आ गया। दीवार की आड़ में मस्ती कर लेते हैं।

“अच्छा तो नीचे बैठ जा और मेरी चूत खोल ले … ऊपर तो कुछ दिखेगा नहीं”

मैं दीवार पर खड़ी हो गई ताकि कमर तक दीवार आ जाये … वो नीचे बैठ गया और मेरी सफ़ेद पेन्टी नीचे उतार दी। मेरी चूत उसके सामने थी। उसने नीचे कुर्सी की गद्दी लगा ली और वो दीवार से टिक कर आराम से बैठ गया, और मेरी चूत से खेलने लगा। कभी मेरी चूत को सहलाता, तो कभी मेरे दाने को छू लेता …

फिर दोनों हाथों से मेरे चूतड़ों को पकड़ कर दबा देता और मेरे गाण्ड के छेद में अंगुली डाल देता। बड़ा मजा आ रहा था। उसका लण्ड खड़ा हो गया था। सो जिप खोल कर उसने लौड़ा बाहर निकाल लिया और मुठ मारने लगा। उसके हाथ कभी कभी मेरे टॉप के अन्दर भी घुस जाते थे। मुझे डर लगता कि कोई मादरचोद मुझे देख ना ले, सो उसका हाथ पकड़ कर वापस नीचे ले जाती।

“चूतिये … ऊपर मत कर … कोई देख लेगा तो … मेरी तो माँ चुद जायेगी !”

“बानो धीरे से नीचे बैठ जा … तब तो कोई नहीं देखेगा ना !” मैं उसकी तरकीब समझ नहीं पाई। मैने नीचे देखा और धीरे से बैठ गई और उसका लण्ड सीधा मेरी चूत में घुस गया। लण्ड चूत में घुसते ही मुझे उसकी बात पल्ले पड़ गई और हंस दी।

“भोसड़ी के … मुझे चोदेगा क्या … ? भाभी को आने दे ना … !” मैंने उसका लौड़ा बाहर निकाल दिया।

तभी छत के कमरे में से मुझे खिड़की से झांकती हुई भाभी नजर आ गई। वो वहाँ खड़ी खड़ी अपनी चूंचियाँ मसल रही थी। जाने वो कब से खड़ी हो कर हमें देख रही थी। उसने मेरे देखते ही इशारा किया। मैंने अब्दुल को दूर हटा दिया।

“सुन रे गाण्डू, कपड़े पहन ले … भाभी आने वाली है !” मैंने अब्दुल को लताड़ा।

अब्दुल ने कपड़े पहन लिये और खड़ा हो गया। मैंने भी अपने कपड़े सही कर लिए। सब कुछ सही देख कर भाभी कमरे में से बाहर छत पर आ गई।

भाभी जान के आते ही अब्दुल जैसे तैयार हो गया। मैने भाभी को इशारा किया कि क्या शुरु करें कार्यक्रम?

वो तो जैसे पहले ही गरम हो चुकी थी। उसका हाथ तो चूत पर ही था और उसे दबा रखा था … मानो पेटीकोट दबा रखा हो।

“अब्दुल, यह है नजमा भाभी … तुम्हें याद कर रही थी !”

“सलाम, भाभी जान … आप तो बड़ी खूबसूरत हैं !”

प्रत्युत्तर में भाभी मुस्कराई और बोली,”मुझे तो बानो ने बताया कि आप तो कमाल के हैं !”

“यह भोसड़ी का तो बस … चुदाई में कमाल दिखाता है … ” मैंने उन दोनों को खोलने की कोशिश की।

“चल हट री भेन की लौड़ी … वो तो सभी मर्द होते हैं !” भाभी ने खुलना ही मुनासिब समझा।

“भाभी जान … आपकी बात तो अलग लग रही है … आपके पोन्द तो कैसे मस्त हैं !” अब्दुल ने पास आते हुए कहा।

“हाय अल्लाह … आप तो पोंद पर ही आ गए … मैंने तो आपके बारे में अभी कुछ नहीं कहा ?”

अब्दुल ने सीधा आक्रमण कर दिया। भाभी के उभरे हुए मस्त पोंद दबा दिये।

“भाभी इसे यानि पोंद मरवा कर देखो … ” गाण्ड में अब्दुल ने अंगुली करते हुये कहा।

“आईईई … बानो … मेरी पोंद दबा दी इसने … !”

“अब्दुल चूंचे भी दबा दे … जल्दी कर … ” मैंने अब्दुल को इशारा किया।

अब्दुल ने उसके पीछे आ कर दोनों चूंचिया दबा दी। भाभी के मुँह से सिसकारी निकल पड़ी।

“अरे हट छोड़ मुझे, किसी ने देख लिया तो रट्टा हो जायेगा !” भाभी ने यहां वहां देखा और घबरा कर कहा … “चल वहीं बैठ जा, जहां तू बानो की चूस रहा था।”

अब्दुल तुरन्त वहीं जा कर बैठ गया और भाभी जान अब्दुल के पास गई और अपना पेटीकोट उठाया और उस पर डाल दिया।

“बानो, शुक्रिया मेरी जान … अब तो अब्दुल से मैं चुदा लूंगी … चल रे अब्दुल … शुरू हो जा … ” भाभी ने मुस्करा कर मुझे देखा और आंख मार दी और भाभी के मुख से आह निकल पड़ी। मैं समझ गई कि अब्दुल ने कुछ अन्दर किया है।

“हाय अब्बा … डाल दे अंगुली … पूरी घुसेड़ दे रे … “

भाभी ने मुझे पकड़ लिया। मैं भाभी की चूंचियाँ दबाने लगी। उसने मुझे वासना भरी नजर से देखा और सिसकारी भरने लगी। ” बानो, यह तो मस्त लड़का है रे … चूत का पानी ही निकाल देगा !”

“भाभी जान … मस्त हो जा … अब तेरे पेटीकोट में क्या हो रहा है मैं क्या जानू रे … “

“हाँ बानो … ये अन्दर की बात है … साला गजब चूत चूसता है … हाय मुझे मूत आ रहा है !” नजमा भाभी मचलती हुई बोली।

“मूत दे भाभी … मैं चूत खोलता हूँ … “अब्दुल पेटीकोट के अन्दर से बोला।

“हाय मेरी अम्मा … ” भाभी ने जरा सा जोर लगाया और मूतना चालू कर दिया। अब्दुल अन्दर ही अन्दर उसके पेशाब का आनन्द लेने लगा। अपना मुँह गीला कर लिया और अपना मुँह खोल कर पेशाब भर लिया।

“और निकाल मूत … भाभी … क्या स्वाद है … ” उसने चूत में अपना मुँह घुसा कर चाटने लगा।

“बैठ जा भाभी जान … आजा … ” भाभी धीरे से उकडू बैठ गई और मुख से एक आनन्द भरी सीत्कार निकल गई … “हाय रे … लण्ड घुस गया चूत में … ” अब्दुल ने लण्ड घुसते ही पेटीकोट अपने ऊपर से हटा लिया और भाभी को जकड़ लिया। अब्दुल का लण्ड चूत में पूरा घुस गया था। मैंने तुरन्त वहा फ़ैला हुआ पेशाब साफ़ किया और दौड़ कर दरी ले आई और भाभी के पीछे लगा दी। अब्दुल ने भाभी को कसे हुए दरी पर लेटा दिया और लण्ड को चूत में फिर से घुसेड़ दिया।

“हाय अब्दुल … तेरा लौड़ा कितना प्यारा है … पूरा ही अन्दर तक उतर गया … अह्ह्ह्ह”

अब्दुल अब ठीक से सेट हो कर उस पर लेट गया और चोदने का आनन्द लेने लगा। मैंने भी भाभी की गाण्ड में अपनी अंगुली डाल दी।

“बानो … मजा आ गया … एक अंगुली और डाल दे …! “

मैंने भाभी की गाण्ड में दो अंगुलियां डाल दी और घुमाने लगी। मुझे एक शरारत और सूझी, अब्दुल की गाण्ड में भी दूसरे हाथ की अंगुली डाल दी।

“बानो, तू साली चुपचाप नहीं बैठ सकती है ना … साला युसुफ़ गाण्ड चोद जाता है वो कम है क्या ?”

“क्या, युसुफ़ भी तुम्हारा दोस्त है … ?”

“हां भाभी, और फ़िरोज भी है … ” मैने फ़िरोज का नाम और जोड़ दिया

“हाय रे, बानो … मुझे भी अपनी टोली में मिला लो ना … ” भाभी चुदते हुये बोली।

“भाभी चलो, अब हम भी तीन और ये भी तीन … नसीम को भी बताना चाहिये !”

“नसीम भी … ।” भाभी तो इतने सारे चुदाई के साथी मिल जायेंगे यकीन भी नहीं हो रहा था। भाभी चुदवा कर मदमस्त हो रही थी। उसे लण्ड क्या मिला मानो दुनिया मिल गई हो। वो बहुत ही उत्तेजित हो कर आनन्द ले रही थी। मैंने गाण्ड में अंगुली पेलना चालू रखा, दोनों ही डबल मार से बहुत उत्तेजित हो गये थे … अब्दुल सटासट लण्ड चला रहा था। अब्दुल का लौड़ा कड़कने लगा था, उसका डण्डा लोहे जैसा हो गया था। दोनों की कमर एक तालमेल के साथ तेजी से चल रही थी। चूत गीली होने से फ़च फ़च की आवाजें भी सुनाई पड़ रही थी। उत्तेजित भाभी के जिस्म में ऐंठन होने लगी थी।

मैंने भाभी और अब्दुल की गाण्ड में से अंगुली निकाल दी और भाभी की चूंचियां और निपल मसलने लगी, भाभी के मुँह से एक गहरी आह निकली और उसकी चूत ने रस छोड़ दिया। इधर अब्दुल भी लण्ड का जोर लगा कर वीर्य छोड़ने की कोशिश कर रहा था। मैं भाभी को छोड़ कर अब्दुल के चूतड़ों को दबा कर मसलने लगी। … बस अब्दुल ने अपना लौड़ा बाहर निकाला और पिचकारी छोड़ दी। मैंने तुरन्त उसका लौड़ा मुठ में भर लिया और उसे निचोड़ने लगी और मुठ मार मार कर बाकी का वीर्य बाहर निकालने लगी। भाभी नीचे पडी हांफ़ रही थी और अब अब्दुल भी ठण्डा पड़ रहा था।

“भोसड़ी के … अब ऊपर से तो हट जा भाभी के … ” मैने अब्दुल को पीछे खींचा।

अब्दुल खड़ा हो गया। भाभी भी उठ बैठी। भाभी ने पेटीकोट नीचे किया और मुझसे लिपट पड़ी।

“बानो, शुक्रिया इस शानदार चुदाई का … एक बात कहूँ ? प्लीज मना मत करना … !”

“हां बोलो … नज्जो भाभी …! “

“मुझे भी, अपने दोस्तों में शामिल कर लो … फ़िरोज, हाय कितना चिकना है … युसुफ़ का लौड़ा तो सोलिड है और अब्दुल तो कितना प्यारा है !”

“भाभी … फिर तो आप रोज चुदोगी, होशियार … भैया को भूल जाओगी …! ” मैंने भाभी को मजाक में कहा।

“हाय बानो … ये लो मैंने तो पेटीकोट अभी से ऊपर उठा दिया … चोदो … मुझे जी भर कर चोदो !”

हम तीनों ही हंस पड़े … और फिर सभी दोस्त बन गये । चुदाई सिलसिला शुरू हो गया … भला चढ़ती जवानी के जोश को कोई रोक सका है … । Sex Stories

Hindi sex stories

रमेश, दोस्तो Hindi sex stories , लड़की को उत्तेजित करके चोदने में बड़ा मज़ा आता है। बस उत्तेजित करने का तरीका ठीक होना चाहिये।

मैंने अपनी घर की नौकरानी को ऐसे ही उत्तेजित कर खूब चोदा।

अब सुनो उसकी दास्तान।

मेरा नाम है रमेश।
मैं लखनऊ यू पी का हूं, मेरे घर में ऊल-ज़ुलूल नौकरानियों के काफ़ी अरसे बाद एक बहुत ही सुंदर और सेक्सी नौकरानी काम पर लगी।
22-23 साल की उमर होगी।
सांवला सा रंग था।
मीडियम हाईट की और सुडौल बदन,
फ़ीगर उसका रहा होगा 33-26-34

शादी शुदा थी।
उसका पति कितना किस्मत वाला था, साला खूब चोदता होगा।

बूब्स यानि चूचियाँ ऐसी कि बस दबा ही डालो।
ब्लाउज़ में समाती ही नहीं थी।
कितनी भी साड़ी से वो ढकती, इधर उधर से ब्लाउज़ से उभरते हुई उसकी चूचियाँ दिख ही जाती थी।

झाड़ु लगाते हुए, जब वो झुकती, तब ब्लाउज़ के उपर से चूचियों के बीच की दरार को छुपा न सकती।

एक दिन जब मैंने उसकी इस दरार को तिरछी नज़र से देखा तो पता लगा कि उसने ब्रा तो पहना ही नहीं था।

कहां से पहनती, ब्रा पर बेकार पैसे क्यों खर्च किये जायें।

जब वो ठुमकती हुई चलती, तो उसके चूतड़ हिलते और जैसे कह रहे हों कि मुझे पकड़ो और दबाओ।

अपनी पतली सी सूती साड़ी जब वो सम्भालती हुई सामने अपने बुर पर हाथ रखती तो मन करता कि काश उसकी चूत को मैं छू सकता।

करारी, गर्म, फूली हुई और गीली गीली चूत में कितना मज़ा भरा हुआ था।

काश मैं इसे चूम सकता, इसके मम्मे दबा सकता, और चूचियों को चूस सकता।

और इसकी चूत को चूसते हुए जन्नत का मज़ा ले सकता।

और फिर मेरा तना हुआ लौड़ा इसकी बुर में डाल कर चोद सकता।

हाय! मेरा लंड ! मानता ही नहीं था।

बुर में लंड घुसने के लिये बेकरार था।

लेकिन कैसे।

यह तो मुझे देखती ही नहीं थी।
बस अपने काम से मतलब रखती और ठुमकती हुई चली जाती।

मैंने भी उसे कभी एहसास नहीं होने दिया कि मेरी नज़र उसे चोदने के लिये बेताब है।

अब चोदना तो था ही।

मैंने अब सोच लिया कि इसे उत्तेजित करना ही होगा।

धीरे धीरे उत्तेजित करना पड़ेगा वरना कहीं मचल जाये या नाराज़ हो जाये तो भांडा फूट जायेगा।

मैंने उससे थोड़ी थोड़ी बातें करनी शुरु की।

उसका नाम था नीरू।

एक दिन सुबह उसे चाय बनाने को कहा।

चाय उसके नर्म नर्म हाथों से जब लिया तो लंड उछला।

चाय पीते हुए कहा- नीरू, चाय तुम बहुत अच्छी बना लेती हो।

उसने जवाब दिया- बहुत अच्छा बाबूजी।

अब करीब करीब रोज़ मैं चाय बनवाता और बड़ाई करता।

फिर मैंने एक दिन कोलेज जाने के पहले अपनी शर्ट प्रेस करवाई।

‘नीरू, तुम प्रेस भी अच्छा ही कर लेती हो।’

‘ठीक है बाबूजी!’ उसने प्यारी सी आवाज़ में कहा।

जब कोई नहीं होता, तब मैं उससे इधर उधर कि बातें करता, जैसे- नीरू, तुम्हारा आदमी क्या करता है?

‘साहब, वो एक मिल में नौकरी करता है।’

‘कितने घंटे की ड्युटी होती है?’ मैंने पूछा।

‘साहब, 10-12 घंटे तो लग ही जाते हैं। कभी कभी रात को भी ड्युटी लग जाती है।’

‘तुम्हारे बच्चे कितने हैं?’ मैंने फिर पूछा।

शरमाते हुए उसने जवब दिया- अभी तो एक लड़की है, 2 साल की।

‘उसे क्यों घर में अकेला छोड़ कर आती हो?’ मैं पूछता रहा।

‘नहीं, मेरी बूढ़ी सास है न। वो सम्भाल लेती हैं।’

‘तुम कितने घरों में काम करती हो?’ मैंने पूछा।

‘साहब, बस आपके और एक नीचे घर में।’

मैंने फिर पूछा- तो क्या तुम दोनो का काम तो चल ही जाता होगा?

‘साहब, चलता तो है, लेकिन बड़ी मुश्किल से। मेरा आदमी शराब में बहुत पैसे बर्बाद कर देता है।’

अब मैंने एक हिंट देना उचित समझा।

मैंने सम्भलते हुए कहा- ठीक है, कोई बात नहीं, मैं तुम्हारी मदद करूंगा।

उसने मुझे अजीब सी नज़र से देखा, जैसे पूछ रही हो – क्या मतलब है आपका?

मैंने तुरंत कहा- मेरा मतलब है, तुम अपने आदमी को मेरे पास लाओ, मैं उसे समझाऊंगा।

‘ठीक है साहब!’ कहते हुए उसने ठंडी सांस भरी।

इस तरह, दोस्तो, मैंने बातों का सिलसिला काफ़ी दिनों तक जारी रखा और अपने दोनो के बीच की झिझक को मिटाया।

एक दिन मैंने शरारत से कहा- तुम्हारा आदमी पागल ही होगा। अरे उसे समझना चाहिये, इतनी सुंदर पत्नी के होते हुए, शराब की क्या ज़रूरत है।

औरत बहुत तेज़ होती है दोस्तों।
उसने कुछ कुछ समझ तो लिया था लेकिन अभी एहसास नहीं होने दिया अपनी ज़रा सी भी नाराज़गी का।

मुझे भी ज़रा सा हिंट मिला कि ये तस्वीर पर उतर जायेगी।

मौका मिले और मैं इसे दबोचूं तो चुदवा लेगी।

और आखिर एक दिन ऐसा एक मौका लगा।

कहते हैं ऊपर वाले के यहां देर है लेकिन अंधेर नहीं।

रविवार का दिन था।
पूरी फ़ैमिली एक शादी मैं गयी थी।

मैं पढ़ाई में नुकसान की वजह बताकर नहीं गया।

माँ कह कर गयी थी- नीरू आयेगी, घर का काम ठीक से करवा लेना।

मैंने कहा- ठीक है!

और मेरे दिल में लड्डू फूटने लगे और लौड़ा खड़ा होने लगा।

वो आयी, दरवाज़ा बंद किया और काम पर लग गयी।

इतने दिन की बातचीत से हम खुल गये थे और उसे मेरे ऊपर विश्वास सा हो गया था इसी लिये उसने दरवाज़ा बंद कर दिया था।

मैंने हमेशा कि तरह चाय बनवाई और पीते हुए चाय की बड़ाई की।

मन ही मन मैंने निश्चय किया कि आज तो पहल करनी ही पड़ेगी वरना गाड़ी छूट जायेगी।

कैसे पहल करें?

आखिर में ख्याल आया कि भाई सबसे बड़ा रुपैया।

मैंने उसे बुलाया और कहा- नीरू, तुम्हे पैसे की ज़रूरत हो तो मुझे ज़रूर बताना। झिझकना मत।

‘साहब, आप मेरी तनख्वाह से काट लोगे और मेरा आदमी मुझे डांटेगा।’

‘अरे पगली, मैं तनख्वाह की बात नहीं कर रहा। बस कुछ और पैसे अलग से चाहिये तो मैं दूंगा मदद के लिये। और किसी को नहीं बताऊंगा। बशर्ते तुम भी न बताओ तो।’

और मैं उसके जवाब का इन्तज़ार करने लगा।

‘मैं क्यों बताने चली। आप सच मुझे कुछ पैसे देंगे?’ उसने पूछा।

बस फिर क्या था।
कुड़ी पट गयी।

बस अब आगे बढ़ना था और मलाई खानी थी।

‘ज़रूर दूंगा नीरू… इससे तुम्हे खुशी मिलेगी न!’ मैंने कहा।

‘हां साहब, बहुत आराम हो जायेगा।’ उसने इठलाते हुए कहा।

अब मैंने हल्के से कहा- और मुझे भी खुशी मिलेगी। अगर तुम भी कुछ न कहो तो। और जैसा मैं कहूं वैसा करो तो? बोलो मंज़ूर है?

ये कहते हुए मैंने उसे 500 रुपये थमा दिये।

उसने रुपये टेबल पर रखा और मुसकुराते हुए पूछा- क्या करना होगा साहब?

‘अपनी आंखें बंद करो पहले।’ मैं कहते हुए उसकी तरफ़ थोड़ा सा बढ़ा- बस थोड़ी देर के लिये आंखें बंद करो और खड़ी रहो।

उसने अपनी आंखें बंद कर ली।

मैंने फिर कहा- जब तक मैं न कहूं, तुम आंखें बंद ही रखना, नीरू। वरना तुम शर्त हार जाओगी।

‘ठीक है, साहब!’ शरमाते हुए आंखें बंद कर वो खड़ी थी।

मैंने देखा कि उसके गाल लाल हो रहे थे और होंठ कांप रहे थे।

दोनो हाथों को उसने सामने अपनी जवान चूत के पास समेट रखा था।

मैंने हल्के से पहले उसके माथे पर एक छोटा सा चुम्बन किया।

अभी मैंने उसे छुआ नहीं था।
उसकी आंखें बंद थी।
फिर मैंने उसकी दोनो पल्कों पर बारी बारी से चुम्बन रखा।
उसकी आंखें अभी भी बंद थी।
फिर मैंने उसके गालों पर आहिस्ता से बारी बारी से चूमा।
उसकी आंखें बंद थी।
इधर मेरा लंड तन कर लोहे की तरह कड़ा और सख्त हो गया था।
फिर मैंने उसकी थुड्ठी पर चुम्बन लिया।

अब उसने आंखें खोली और सिर्फ़ पूछते हुए कहा- साहब?

मैंने कहा- नीरू, शर्त हार जायोगी। आंखें बंद।

उसने झट से आंखें बंद कर ली।

मैं समझ गया, लड़की तैयार है, बस अब मज़ा लेना है और चुदाई करनी है।

मैंने अब की बार उसके थिरकते हुए होंठों पर हल्का सा चुम्बन किया।

अभी तक मैंने छुआ नहीं था उसे।

उसने फिर आंखें खोली और मैंने हाथ के इशारे से उसकी पल्कों को फिर ढक दिया।

अब मैं आगे बढ़ा, उसके दोनो हाथों को सामने से हटा कर अपनी कमर के चारों तरफ़ घुमाया और उसे अपनी बाहों में समेटा और उसके कांपते होंठों पर अपने होंठ रख दिये और चूमता रहा।

कस कर चूमा अबकी बार।
क्या नर्म होंठ थे मानो शराब के प्याले।

होंठों को चूसना शुरु किया और उसने भी जवाब देना शुरु किया।

उसके दोनो हाथ मेरी पीठ पर घूम रहे थे और मैं उसके गुलाबी होंठों को खूब चूस चूस कर मज़ा ले रहा था।

तभी मुझे महसूस हुआ कि उसकी चूचियाँ जो कि तन गयी थी, मेरे सीने पर दब रही हैं।

बायें हाथ से मैं उसकी पीठ को अपनी तरफ़ दबा रहा था, जीभ से उसकी जीभ और होंठों को चूस रहा था, और दायें हाथ से मैंने उसकी साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया।

दायाँ हाथ फिर अपने आप उसकी दायीं चूची पर चला गया और उसे मैंने दबाया।

हाय हाय क्या चूची थी। मलाई थी बस मलाई।

अब लंड फुंकारे मार रहा था।

बायें हाथ से मैंने उसके चूतड़ को अपनी तरफ़ दबाया और उसे अपने लंड को महसूस करवाया।

शादीशुदा लड़की को चोदना आसान होता है क्योंकि उन्हे सब कुछ आता है, घबराती नहीं हैं।

ब्रा तो उसने पहनी ही नहीं थी, ब्लाउज़ के बटन पीछे थे, मैंने अपने दायें हाथ से उन्हे खोल दिया और ब्लाउज़ को उतार फेंका।
चूचियाँ जैसे कैद थी, उछल कर हाथों में आ गयी।

एकदम सख्त लेकिन मलाई की तरह प्यारी भी।

साड़ी को खोला और उतारा।

साया बस अब बचा था।

वो खड़ी नहीं हो पा रही थी।

मैं उसे हल्के हल्के खींचते हुए अपने बेडरूम में ले आया और लिटा दिया।

अब मैंने कहा- नीरू रानी, अब तुम आंखें खोल सकती हो।

‘आप बहुत पाजी हैं साहब!’ शरमाते हुए उसने आंखें खोली और फिर बंद कर ली।

मैंने झट से अपने कपड़े उतारे और नंगा हो गया।

लंड तन कर उछल रहा था।

मैंने उसका साया जल्दी से खोला और खींच कर उतारा।

उसने कोई अंडरवेअर नहीं पहना था।

मैंने बात करने के लिये कहा- ये क्या, तुम्हारी चूत तो नंगी है। चड्ढी नहीं पहनती।

‘नहीं साहब, सिर्फ़ महीना में पहनती हूं।’ और शरमाते हुए कहा- साहब, पर्दे खींच कर बंद करो न। बहुत रोशनी है।

मैंने झट से पर्दों को बंद किया जिससे थोड़ा अंधेरा हो और उसके ऊपर लेट गया।

होंठों को कस कर चूमा, हाथों से चूचियाँ दबाई और एक हाथ को उसके बुर पर फिराया।

घुंगराले बाल बहुत अच्छे लग रहे थे चूत पर।

फिर थोड़ा सा नीचे आते हुए उसकी चूची को मुंह में ले लिया।

आहा, क्या रस था। बस मज़ा बहुत आ रहा था।

अपनी एक उंगली को उसकी चूत के दरार पर फिराया और फिर उसके बुर में घुसाया।

उंगली ऐसे घुसी जैसे मक्खन में छूरी।
गर्म और गीली थी।

उसकी सिसकारियाँ मुझे और भी मस्त कर रही थी।

मैंने छेड़ते हुए कहा, नीरू रानी, अब बोलो क्या करूं?

‘साहब, मत तड़पाइये, बस अब कर दीजिये।’ उसने सिसकारियाँ लेते हुए कहा।

मैंने कहा- ऐसे नहीं, बोलना होगा, मेरी जान।

मुझे अपने करीब खींचते हुए कहा- साहब, डाल दीजिये न।

‘क्या डालूं और कहां?’ मैंने शरारत की।

दोस्तों चुदाई का मज़ा सुनने में भी बहुत है।

‘डाल दीजिये न अपना ये लौड़ा मेरे अंदर।’ उसने कहा और मेरे होंठों से अपने होंठ चिपका लिये।

इधर मेरे हाथ उसकी चूचियों को मसलते ही जा रहे थे। कभी खूब दबाते, कभी मसलते, कभी मैं चूचियों को चूसता कभी उसके होंठों को चूसता।

अब मैंने कह ही दिया- हां रानी, अब मेरा ये लंड तेरी बुर में घुसेगा… बोलो चोद दूं।

‘हां हां, चोदिये साहब, बस चोद दीजिये।’

और वो एकदम गर्म थी।

मैंने कहा- ऐसे नहीं, बोलना होगा, मेरी जान !

फिर क्या था, मैंने लंड उसके बुर पर रखा और घुसा दिया अंदर।

एकदम ऐसे घुसा जैसे बुर मेरे लंड के लिये ही बनी थी।

दोस्तों, फिर मैंने हाथों से उसकी चूचियों को दबाते हुए, होंठों से उसके गाल और होंठों को चूसते हुए, चोदना शुरु किया।

बस चोदता ही रहा।

ऐसा मन कर रहा था कि चोदता ही रहूं।

खूब कस कस कर चोदा।

बस चोदते चोदते मन ही नहीं भर रहा था।

क्या चीज़ थी यारों, बड़ी मस्त थी। उछल उछल चुदवा रही थी।

‘साहब, आप बहुत अच्छा चोद रहे हैं, चोदिये खुब चोदिये!’

चोदना बंद था, टांगे उसने मेरे चूतड़ पर घुमा रखी थी और चूतड़ से उछल रही थी।

खूब चुदवा रही थी और मैं चोद रहा था।

मैं भी कहने से रुक न सका- नीरू रानी, तेरी चूत तो चोदने के लिये ही बनी है। रानी, क्या चूत है। बहुत मज़ा आ रहा है। बोल न कैसी लग रही है ये चुदाई।

‘साहब, रुकिये मत, बस चोदते रहिये, चोदिये, चोदिये, चोदिये।’

इस तरह हम न जाने कितनी देर तक मज़ा लेते हुए खूब कस कस कर चोदते हुए झड़ गये।

क्या चीज़ थी, एकदम चोदने के लिये ही बनी थी शायद।

दोस्तों मन नहीं भरा था।

20 मिनट बाद मैंने फिर अपना लंड उसके मुंह में डाला और खूब चुसवाया।

हमने 69 पोसिशन ली और जब वो लंड चूस रही थी मैंने उसकी चूत को अपनी जीभ से चोदना शुरु किया।

खास कर दूसरि बार तो इतना मज़ा आया कि मैं बता नहीं सकता क्योंकि अब की बार लंड बहुत देर तक चोदता रहा।

लंड को झड़ने में काफ़ी समय लगा और मुझे और उसे भरपूर मज़ा देता रहा।

कपड़े पहनने के बाद मैंने कहा- नीरू रानी, बस अब चुदवाती ही रहना। वरना ये लंड तुम्हे तुम्हारे घर पर आकर चोदेगा।

‘साहब, आप ने इतनी अच्छी चुदाई की है, मैं भी अब हर मौके में आपसे चुदवाउंगी। चाहे आप पैसे न भी दो।’

कपड़े पहनने के बाद भी मेरे हाथ उसकी चूचियों को हल्के हल्के मसलते रहे। और मैं उसके गालों और होंठों को चूमता रहा।
एक हाथ उसके बुर पर चला जाता था और हल्के से उसकी चूत को दबा देता था।

‘साहब अब मुझे जाना होगा।’ कह कर वो उठी।

मैंने उसका हाथ अपने लंड पर रखा- रानी, एक बार और चोदने का मन कर रहा है। कपड़े नहीं उतारूंगा।

दोस्तों, सच में लंड खड़ा हो गया था और चोदने के लिये मैं फिर तैयार।

मैंने उसे झट से लिटाया, साड़ी उठाई, और अपना लौड़ा उसके बुर में पेल दिया।

अबकी बार खचखच चोदा और कस कर चोदा और खूब चोदा और चोदता ही रहा।

चोदते चोदते पता नहीं कब लंड झड़ गया और मैंने कस कर उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया।

चूमते हुए चूचियों को दबते हुए, मैंने अपना लंड निकाला और उसे विदा किया। Hindi sex stories

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