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मेरा नाम अर्चना है.
मैं मुंबई की रहने वाली हूँ.
मेरी शादी इंदौर में हुई है लेकिन फ़िलहाल भोपाल में अपने पति के साथ रहती हूँ.
मेरे पति एक मल्टीनेशनल कम्पनी में मैनेजर हैं और वे महीने में 15 से 20 दिन बाहर ही रहते हैं.
मेरी उम्र 35 वर्ष है.
दोस्तो, मैं इतनी ज्यादा कामुक और सुन्दर हूँ कि हर कोई मुझे पकड़कर चोदना चाहता है.
हर इंसान मुझे बुरी तरह से जंगली बन कर चोदना चाहता है.
मैं भी अपनी पसंद के मर्द से लग जाती हूँ.
अभी तक मैं कितनी बार और कितने मर्दों से चुद चुकी हूँ, ये मुझे खुद याद नहीं है.
पर बहुत सी चुदाई मुझे अच्छे से याद हैं.
जैसा कि मैंने लिखा है कि मुझे खुद भी अलग अलग मर्दों से चुदना बहुत भाता है और मोटे व काले लंबे लंड मुझे प्रिय हैं.
उस पर भी लौड़े पर खोपरे का तेल लगा हो तो कहना ही क्या.
मैं दिखने में बिल्कुल अमृता राव की ट्रू-कापी हूँ.
मेरा सीना 34, कमर 32 और नितम्ब 38 के हैं.
स्कूल और कालेज लाइफ में लड़के मुझे अमृता राव ही बुलाते थे.
उस समय विवाह फिल्म रिलीज हुई थी, तब उस फिल्म के सभी गाने लड़के मुझे देखकर गाया करते थे.
मुझे बड़ा मजा आता था.
मैंने अपने आपको बिल्कुल फिट रखा है।
शुरू से ही मेरा मानना है कि फिट बॉडी को हर कोई सेक्सी निगाहों से देखता है.
मुझे मर्दों की कामुक नजरों से घूरा जाना बहुत अच्छा लगता है.
स्कूल में पहला अनुभव जब हुआ था, जब एक सहपाठी द्वारा मुझ पर यौन आक्रमण हुआ था.
मैं उस समय पढ़ने में सबसे तेज थी तो सभी लड़के और लड़कियां मेरे आस-पास ही मंडराते थे.
उनमें एक मेरा सहपाठी भी था, जिसका नाम संजय था.
वह पढ़ने में ठीक-ठाक ही था लेकिन था खूब मस्तीखोर.
हर समय उसे मस्ती ही सूझती थी.
दूसरी बात ये कि वह मुझे हमेशा घूरता रहता था.
उस समय मुझे इन सब चीजों की आदत नहीं थी तो मैं उससे डर गई.
मैंने उससे बात करना बंद कर दी.
उसने भी मुझे देखना बंद कर दिया, जिससे मुझे डर लगना बंद हो गया.
बात दिसंबर में क्रिसमस की छुट्टियों की है.
स्कूल से हमें एक टूर पर ले जाया जा रहा था.
यह जगह ओखला पक्षी अभ्यारण्य था, जो कि दिल्ली से 22 किलोमीटर की दूरी पर है.
पापा से अनुमति लेकर मैं भी टूर पर जाने के लिए तैयार हो गई.
वह तीन दिनों का टूर था जो मुझे एक नया अनुभव देने वाला था.
उसके बारे में मुझे आज तक कुछ भी पता नहीं था.
हम सभी लोग सुबह स्कूल में इकट्ठा होकर सुबह 7 बजे बस से निकले.
दिन भर हमने पक्षियों और अन्य जीवों की जानकारी हासिल की.
शाम को रुकने की व्यवस्था डाक बंगले पर रखी गई थी.
यहीं पर वह समय प्रारम्भ हो गया, जिसने मुझे नया अनुभव दिलाया.
डाक बंगले पर कमरों की कमी थी तो अल्फाबेटिकली 10-10 का ग्रुप बनाकर हम कमरों में शिफ्ट हो गए.
उस समय लड़के लड़कियां सब एक साथ ही रहते थे और सेक्स जैसी कोई भी बात किसी के दिमाग में नहीं आई.
मुझे सबसे आखिर में कोने में कमरे के गलियारे में जगह मिली.
मेरे पीछे संजय था.
उस गलियारे में हम दोनों के अलावा बाकी 8 स्टूडेंट कमरे में थे.
रात में लगभग सभी सो गए थे.
ठण्ड का मौसम था तो सब दुबके हुए सो रहे थे.
मैं भी सो गई थी.
परन्तु संजय नहीं सोया था.
रात में करीब सवा बारह बजे संजय मेरे बिस्तर में आकर सो गया.
जगह कम होने से मैं कसमसाई लेकिन ठण्ड के कारण उठी नहीं.
फिर जल्द ही नींद के आगोश में चली गई.
यही वह रात थी जब मुझे खोपरे के तेल से प्यार हो गया था.
हालांकि इस बात का पता बहुत बाद में चला, जब मैं कॉलेज में आ गई थी.
उस समय मेरी जबरदस्त चुदाई हुई थी.
संजय मुझसे पीछे से बिल्कुल सट कर सो रहा था.
उसने धीरे से मेरी मिड्डी ऊपर कर दी और मेरी चड्डी को खोल दिया.
तब तक भी मेरी नींद नहीं खुली थी.
उसने खोपरे के तेल में अपनी उंगली भिगो कर मेरी गांड के छेद पर लगाना शुरू कर दिया.
धीरे धीरे उसने पूरी उंगली मेरी गांड में डाल दी.
चिकनाहट के कारण और गहरी नींद में सोई रहने के कारण मुझे कुछ अहसास ही नहीं हुआ.
वह तो जब उस कमीने ने उंगली से अन्दर हरकत करना शुरू की, तब जाकर मेरी नींद खुली.
मुझे लगा कि कोई कीड़ा मेरी गांड में घुस गया है.
मैं जोर से चिल्ला दी.
मेरे कमरे के सर उठ कर आए और उन्होंने मुझसे पूछा- क्या हुआ?
मैंने अपने मुँह से कोई आवाज नहीं निकाली.
मैंने कहा- कुछ नहीं सर, मैं नींद में डर गई थी.
सर फिर सोने चले गए.
मैंने सर से इसलिए नहीं कहा क्योंकि संजय मेरे चिल्लाने पर अपने बिस्तर पर चला गया और हाथ जोड़कर माफ़ी मांगने लगा था.
तो मैंने भी रात में कोई बखेड़ा खड़ा करना उचित नहीं समझा और फिर हम सभी सो गए.
अगले दिन मैं दिन भर उस बारे में सोचती रही कि रात में गुदगुदी हुई तो कैसा लगा था.
फिर मैंने बड़ी कक्षा की सहेलियों से पूछना उचित समझा.
उधर संजय मेरी कक्षा में एक बार फेल हो चुका था तथा बड़ी कक्षा की लड़कियां उसकी दोस्त थीं तो वह उनसे बातें कर रहा था.
मुझे आती देखकर वह दूसरी ओर चला गया.
फिर मैं उन सीनियर लड़कियों के पास गई और रात में जो गुदगुदी हो रही थी, उन्हें उसके बारे में बताया.
वे सभी हंसने लगीं.
उनको पता चल गया था कि मैं अभी इन सब बातों से अनजान हूँ.
उन्होंने कहा- ये सब इस उम्र में होता है … फिर अगर कोई ऐसी गुदगुदी करे, तो उसका मजा लो. इस बात की किसी से शिकायत मत करो.
मैं समझ गई कि संजय ने मुझसे पहले ही उनको सब बता दिया है.
खैर … फिर रात हुई तो मुझे थोड़ा डर सा लगने लगा.
तब हमारे सर ने उनके पास सोने का बोला तो मैंने ही मना कर दिया.
मैं फिर से उसी गलियारे में संजय के पास आकर सो गई.
उधर संजय की आंखों में शरारत के भाव थे और नींद तो नाम की नहीं थी.
जबकि मुझे डर के मारे नींद नहीं आ रही थी.
जैसे ही आधी रात हुई, संजय के हाथ हरकत करने लगे और उसने खोपरा के तेल से लबालब अपनी उंगली मेरी गांड में डाल दी.
मैं एकदम चिहुंक उठी तो संजय बोला- आज चिल्लाई नहीं?
मैंने गुस्से में उसे देखकर उंगली निकालने को कहा.
तो उसने अपने एक हाथ को मेरे गले में डालकर मेरे दूध को दबा दिया, फिर दो उंगलियों से मेरे चूचुक को मींजने लगा.
साथ ही वह अपनी उंगली को मेरी गांड में अन्दर बाहर करने लगा.
मुझे जो गुदगुदी उस समय हो रही थी, उसका मजा अलग ही था.
मैंने भी ज्यादा विरोध नहीं किया.
जिससे संजय का हौसला बढ़ता ही गया और वह उंगली को तेजी से अन्दर बाहर डालने लगा.
अब रजाई के अन्दर पटपट सट सट की आवाज आने लगी थी.
अचानक उसने अपनी उंगली निकाल ली.
मैंने समझा कि वह फिर से तेल लगाकर पेलेगा.
मैं यही सोचकर आंख बंद करके ऐसे ही नंगी ही लेटी रही.
उधर संजय ने एक हाथ से ही अपने छह इंच के लंड पर तेल लगाकर उसे लबालब कर लिया था.
उसका दूसरा हाथ मेरे गले में लिपटा हुआ मेरे दूध सहला रहा था.
फिर वह धीरे से मेरे पीछे आया और अपना पतला लम्बा लेकिन कड़क लंड मेरी गांड में डाल दिया.
थोड़े से दर्द के साथ मुझे बहुत अच्छा लगने लगा और वह भी मेरी गांड को फचफच फच फच करके चोदने लगा.
जल्दी ही उसने अपना वीर्य मेरी गांड में छोड़ दिया लेकिन मुझे अधूरी छोड़ दिया.
अभी मेरी चूत से पानी तो निकला ही नहीं था जिसके बारे में मुझे कोई खास जानकारी भी नहीं थी.
गांड में उसका लिसलिसा पानी मुझे अजीब सा लग रहा था.
बड़ी मुश्किल से मुझे नींद आई.
सुबह मेरी गांड में जबरदस्त खुजली मची, तो मुझे खूब मजा आया.
मैंने सोच लिया था कि आज गांड मरवाने की आखिरी रात है.
यही सोचकर मैं रात का इंतजार करने लगी.
आखिर रात हुई तो मैंने सर से कहा- मैं और संजय कमरे के बाहर वाले गलियारे में आखिरी में सो जाएं क्या? क्योंकि यहां जगह नहीं है और खिड़की से ठंडी हवा भी आती है.
उस गलियारे के आखिरी में तीनों ओर से दीवारें थीं तो वह हिस्सा पैक था और सामने से कोई भी आता, तो दिख जाता.
लेकिन सर ने मना कर दिया- नहीं, ऐसे नहीं सोने दे सकता हूँ.
फिर खाने के बाद सर फिर रिक्वेस्ट की और उनको वह जगह बताई, तो सर मान गए.
मैंने तुरंत संजय से बोला तो संजय को विश्वास नहीं हुआ और वह बोला- आज फिर से खेलेंगे क्या?
मैंने कहा- हां पूरी रात मस्ती से खेलेंगे.
फिर आधी रात को हम दोनों एक दूसरे के पास सट कर सो गए.
पर आज उसने उंगली नहीं डाली, सीधे अपना लंड बिना तेल के डाल दिया.
मैं दर्द से चिल्लाऊं, इतने में उसने मेरा मुँह दबा दिया.
दर्द से मैं रोने लगी और उसके हाथ को काट लिया.

उसने कहा- आज तेल ख़त्म हो गया है.
मैंने भी गांड मरवाने से मना कर दिया.
वह उठा … और पता नहीं कहां चला गया.
लगभग दस मिनट बाद उसके हाथ में खोपरे का तेल था और वह जल्दी जल्दी आ रहा था.
नजदीक आकर उसने पहले मेरी गांड में तेल लगाया और फिर अपने लंड पर.
तेल लगाने के बाद उसने मुझे उल्टा लेटने को कहा तो मैं लेट गई.
मुझे नहीं पता था कि आज मेरी गांड की बैंड बजने वाली है.
वह मेरे ऊपर चढ़ गया और धीरे से अपना लंड मेरी गांड पर सैट करके रख दिया.
फिर धीरे से धक्का दिया.
तेल लगा लंड लहराता हुआ मेरी गांड में घुस गया.
मुझे आज तेल लगाने के बाद भी बहुत दर्द हो रहा था.
मैं रोने लगी तो अब संजय ने कुछ भी रहम नहीं दिखाया और जोर जोर से मेरी गांड को पेलने में लग गया.
गलियारे में रात के सन्नाटे में फचफच फचफच फच सटासट सटासट की आवाज आने लगी.
मुझे भी अब मजा आने लगा था.
आज मेरी चूत में अजीब सी खुजली मच रही थी.
मैं अपने हाथ से खुजली मिटाने के लिए चूत को जोर जोर से मसल ही रही थी कि अचानक मेरी चूत से चिकना सफ़ेद पानी निकलने लगा.
मुझे बहुत मजा आने लगा था.
उधर संजय भी फचफच फचफच करते हुए गांड में झड़ गया.
उसने अपना सारा वीर्य गांड में टपका दिया.
हम दोनों ने चुदाई के बाद अपने अपने कपड़े पहने और उसी चिकनाहट के साथ सो गए.
आज मुझे बिल्कुल भी अजीब नहीं लग रहा था और मन बिल्कुल शांत था.
मैं पूरी तरह संतुष्ट भी थी.
दोस्तो, मेरा पहला अनुभव गांड चुदाई से शुरू हुआ था.
शादी के बाद सुषमा अपनी Antarvasna ससुराल आई। उसके ससुराल में उसकी 45 साल की सास 50 साल का ससुर थे। उसका पति दब्बू किस्म का आदमी है, उम्र उसकी 22 साल और कद काठी से ठीक-ठाक था मगर लोग उसके पति को मीठा कह के पुकारते थे जबकि उसका नाम सुरेश है। उसकी एक ही ननद है जो शादी कर के ससुराल चली गई। गाँव में सुषमा का छोटा सा घर है और ज़मीन नहीं है। उसके सास ससुर गाँव के ज़मींदार के खेत पर काम करते हैं जबकि उसका पति एक दूध वाले की गायों की देख रेख करता है। शुरू-शुरू में वो घर के सारे काम करती और घर के पिछवाड़े बंधी अपनी तीन गायों की देखभाल करती और उनका दूध निकालती। घर वाले तडके घर से निकलते, फ़िर शाम को ही लौटते हैं।
एक दिन सुषमा ने सोचा कि वो अपने पति सुरेश को दोपहर में खाना दे आये। खाना बांधकर वो निकली तो पता चला कि सुरेश गायों को चराने के लिए गाँव से बाहर गया है। वो भी पूछते-पूछते उसी दिशा में चल पड़ी।
कोई दो कोस चलने के बाद उसे गाएँ दिखाई दी और एक झाड़ी के पास सुरेश के चप्पल और धोती दिखाई दी। उसने झाड़ी के पीछे देखा तो दंग रह गई। उसे समझ में नहीं आया कि यह क्या हो रहा है। सुरेश नंगा था और घोड़ी बना हुआ था, एक 17-18 साल का लड़का घुटनों के बल बैठ कर उसकी गांड मार रहा था। सुरेश की आवाज़ उसको साफ़ सुनाई दे रही थी- चोद मुझे जोर से यासीन ! चोद राजा, फाड़ दे मेरी गांड अपने मूसल जैसे लण्ड से ! और वो ऊह्ह आह करता जा रहा था।
सुषमा ने देखा कि वो लड़का कुत्ते की तरह उसके पति की गांड मार रहा था, उसका मोटा काला लण्ड बार-बार उसके पति की गांड से बाहर आकर अंदर जा रहा था। उसने देखा कि नीचे सुरेश की छोटी सी लुल्ली लटक रही थी जिसके पीछे चिपके हुए मूंगफली जैसे छोटे आंड थे। जबकि उसके पति को चोद रहे उस लड़के के अंडकोष किसी साण्ड के जैसे भरी भरकम थे। सुषमा के मुँह से चीख निकल पड़ी और उसको सुनते ही दोनों मुड़ गए, लड़के ने अपना लण्ड सुरेश की गांड से बाहर निकाला और सुरेश ने अपने हाथों से अपने गुप्तांग को ढक लिया।
क्या कर रहे थे आप ये ? सुषमा ने पूछा।
कुछ नहीं रानी, यह यासीन है मेरा दोस्त ! घबराया हुआ सुरेश बोला।
उधर सुषमा की नज़र उस लड़के के चिकने लण्ड से हट ही नहीं रही थी और यह देख कर उस लड़के को लगा कि मौका अच्छा है और उसने तुरंत आगे बढ़ कर सुषमा को दबोच लिया। सुषमा कुछ समझती, उससे पहले तो उसने उसको मसलना शुरू कर दिया और उसके होंठ खुद के होंठों में दबा लिए। एक झटके में उस लड़के ने सुषमा की सारी ऊपर कर दी। चड्डी तो वो पहनती नहीं थी और
उसकी चूत में ऊँगली करने लगा।
सुषमा के होश उड़ गए। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। सुषमा उस लड़के से अपने को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी। तब तक सुरेश ने अपने कपड़े वापस पहन लिए थे और उसके सामने वो झुक कर उस लड़के का लण्ड चूस रहा था।
एक झटके में उस लड़के ने सुषमा को नीचे जमीन पर गिरा दिया, उसकी सारी ऊपर की और अपने लण्ड को उसकी चूत के मुँह पर अड़ा दिया। सुषमा की बालों वाली चूत के मुँह पर उसका मोटा काला कटा हुआ लण्ड दस्तक दे रहा था और सुरेश उसे पकड़ कर अपनी बीवी की चूत में घुसा रहा था।
घबराई हुई सुषमा एक झटके में उस लड़के की गिरफ्त से छूटी और भाग खड़ी हुई। सरपट दौड़ती हुई पाँच मिनट में हांफ़ती हुई घर पहुँच गई। सुषमा इतनी परेशान थी कि उसे कुछ समझ में नहीं आया कि यह क्या हुआ !
रात के आठ बजे तक उसका पति लौट कर घर नहीं आया। सुषमा से रहा नहीं गया, उसने घबराते हुए सास को चुपचाप सारी बात बताई।
बेटा, एक दिन तो तुझे यह सब पता चलना ही था ! सुषमा की सास रुक्मणि बोली।
रुक्मणि ने कहा- चिन्ता की कोई बात नहीं, सुरेश घर आ जायेगा।
रुक्मणि सुषमा को छत पर ले गई और बोली- बेटा अब मैं तुझे सारी कहानी बता देती हूँ।
रुक्मणि ने सुषमा को बताया- सुरेश उसके ससुर से पैदा नहीं हुआ बल्कि ज़मींदार के भाई का बच्चा है। शादी के बाद में ज़मींदार के घर का काम करने जाती तो ज़मींदारन मुझे रोज़ अपने कमरे में बुला कर अपनी चूत चटवाती और उसमे केला कद्दू वगेरह डलवाती। बाद में ज़मींदार के छोटे भाई की पत्नी रानी भी मुझसे यही सब करवाने लगी। ज़मींदार के छोटे भाई विकलांग थे और व्हील-चेयर पर बैठे रहते थे। मुझे बाद में उन लोगों ने छोटे मालिक की ज़िम्मेदारी दे दी। मैं उनको नहलाती, उनके कपड़े बदलती और उनका पाखाना, मूत वगेरह साफ़ करती। गरीबी में और कोई चारा भी नहीं था।
रुक्मणि कहने लगी- छोटे मालिक धीरे धीरे उसके स्तन दबाने लगते और उसको चूमने लगे। उनका शरीर कमर से ऊपर स्वस्थ था और वे मुझे बिस्तर के कोने पर लिटा कर मेरी चूत चाट कर मुझे मज़ा देते। धीरे-धीरे छोटे मालिक को नहलाते समय वो उनके सुस्त और नरम लण्ड की भी मालिश करती। एक बार एक वैद्य उनके लिए एक दवाई लाया और मुझे कहा गया कि मैं उसको छोटे मालिक के लण्ड पर दिन में तीन बार लगाऊँ।
रुक्मणि कहती रही- एक दिन मैं मालिश कर रही थी कि छोटे मालिक के निर्जीव लण्ड में हल्का सा तनाव आया और वो मुझे जोर जोर से उसको हिलाने को कहने लगे। मैंने उसको हिलाया तो दो चार बूंदें निकली मगर उनको बड़ा मज़ा आया। धीरे धीरे छोटे मालिक के लण्ड में तनाव आने लगा और मैं उनकी मुठ मारती रही। एक दिन उन्होंने मुझे नीचे लिटा कर ऊपर चढ़ कर लण्ड को अंदर डालने की कोशिश की मगर पूरी ताकत नहीं होने से वो डाल नहीं पाए। उनको बहुत गुस्सा आया। उन्होंने अपनी पत्नी और तेरे ससुर को बुलाया।
सुषमा अवाक् सी सब सुन रही थी, उसकी सास ने बताया – उसके बाद सुषमा के ससुर यानि लल्लू लाल जी रुक्मणि की चूत चाट कर गीली करते और छोटे मालिक की पत्नी छोटे मालिक का लण्ड चूस-चूस कर बड़ा करती, फिर लल्लू लाल रुक्मणि की टांगें चौड़ी करता और छोटी मालकिन अपने पति का लण्ड पकड़ कर अंदर डालती। ऐसे वो मुझे रोज़ चोदते रहे।
रुक्मणि बोली- छोटे मालिक ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि जब तक मुझे गर्भ नहीं ठहर जाये, तब तक मेरा पति मुझे नहीं चोदेगा। कोई तीन महीने की इस चुदाई के बाद मुझे बच्चा ठहर गया, तब कहीं जाकर छोटे मालिक खुश हुए। बदले में उन्होंने मेरे पति यानि तेरे ससुर को छोटी मालकिन को चोदने की इजाज़त दी, लेकिन मेरा बच्चा गिर न जाये इसलिए वो मुझे छू भी नहीं सकते थे।
सुषमा सांस रोके ये सब सुन रही थी- इसका मतलब हमारे पति सुरेश ससुरजी के वीर्य से नहीं पैदा हुए ? उसने पूछा।
नहीं बेटी, सुरेश तो छोटे मालिक की ही औलाद है, रुक्मणि ने बताया।
रुक्मणि आगे का हाल बताने लगी- रात होते ही कमरे में में तेरे ससुर, छोटे मालिक और छोटी मालकिन कमरे में आ जाते फिर वो तेरे ससुर से भी अपनी गाण्ड मरवाते उससे पहले छोटी मालकिन तेल लगा कर उनकी गाण्ड के छेद को चिकना कर देती।
रुक्मणि बोली- तेरे ससुर जैसा लण्ड गाँव में शायद ही किसी का होगा बहू ! पूरा 9 इंच का मोटा और काला ! और एक बार किसी पर चढ़ जाएँ तो उसको आधे घंटे चोदे बिना नीचे नहीं उतरते और उनके आण्ड तो किसी साण्ड से कम नहीं ! एक बार वीर्य किसी चूत में डाल दें तो गर्भ तो ठहरा हुआ समझो बेटी !
यह सुन कर सुषमा की आँखों एक चमक आ गई।
रुक्मणि कहने लगी- तेरे ससुर लल्लू लाल की चुदाई से छोटी मालकिन को भी गर्भ ठहर गया और उनका बच्चा जो अब 18 साल का है। इसका नाम राहुल है, असल में तुम्हारे ससुर का बेटा है। रुक्मणि आगे बताने लगी- बड़े मलिक यानी ज़मींदार गाण्ड मरवाने के शौकीन थे और सुरेश के पिता उनकी गाण्ड मारा करते थे, बदले में वो भी उनसे अपनी पत्नी को चुदवाते थे। मालकिन को एक लड़का और एक लड़की हुए, वो दोनों भी तुम्हारे ससुर के वीर्य से ही पैदा हुए बेटी !
लेकिन सुरेश का लण्ड इतना छोटा कैसे?” सुषमा ने पूछा।
बेटी इसकी बड़ी दुखद कहानी है- एक दिन जब सुरेश 6 साल का था तो छोटी मालकिन उसे नहलाने के बहाने उसके छोटे लण्ड से खेलने लगी और छोटे मालिक ने देख लिया। वो गुस्से में आग-बबूला हो गये और कपड़े धोने की लकड़ी लाकर सुरेश के लण्ड पर ज़ोर से मारी और वो बेहोश हो गया। सुरेश बच तो गया मगर डॉक्टर ने कह दिया अब वो कभी बाप नहीं बन पाएगा। उसके आँड का कचूमर बन गया था।
सुषमा रोने लगी बोली- मेरा जीवन नरक क्यूँ बनाया? मेरी शादी नपुंसक से क्यूँ की?
रुक्मणि ने उसे गले लगाया और बोली- चिंता मत कर बेटी ! मैं हूँ ना ! तेरे ससुर मुझे बच्चा नहीं दे पाए तो क्या ! अपनी बहू को तो दे सकेंगे ! एक साथ वो बाप भी बनेंगे और दादा भी ! और घर की बात घर में रह जाएगी।
सुषमा को कुछ समझ नहीं आया, वो बोली- ऐसा कैसे हो सकता है? मैं .. ?
चिंता मत कर बेटी ! मैं हूँ ना ! और सुरेश की चिंता मत कर ! वो इस काम में सहयोग करेगा !
सुषमा चौंकी- सहयोग वो कैसे?
अब तुझसे क्या छुपाना बेटा ! सुरेश गाण्ड मरवाने का इतना आदि हो गया है कि उसने तुम्हारे ससुर का लण्ड भी नहीं छोड़ा। एक बार लिए बगैर रात में सोता तक नहीं वो ! रुक्मणि बोली।
क्या सच में? सुषमा ने पूछा।
हाँ बेटा, मेरे सामने ही तो होता है हर रोज़ ! रुक्मणि बोली- सुरेश मेरी चूत भी चाट लेता है कई बार ! तुम्हारे ससुर का लण्ड चूस कर मेरे लिए खड़ा करता है फिर मेरी चूत में भी डालता है और जब तुम्हारे ससुर मुझे चोदते हैं तो उनकी गाण्ड और आण्ड चाटता है। फिर उनके झड़ने के बाद मेरी चूत का सारा वीर्य चाट कर साफ कर देता है।
सुषमा को अब कुछ कुछ समझ आने लगा था।
आज रात तू नहा धो कर तैयार रहना ! तेरी सुहागरात आज तेरे ससुर के साथ ! रुक्मणि आँख मार कर बोली।
रात को खाना-वाना ख़ाने के बाद सुषमा ने नई साड़ी पहनी, परफ़्यूम लगाया और तैयार हो गई।
दस बजे उसकी सास उसके कमरे में आई और बोली- चल बेटी, घबराना मत ! मैं तेरे पास हूँ !
यह कह कर वो उसे ले गई। सुषमा अंदर गई तो देखा कि उसके ससुर बिस्तर पर नंगे लेटे हैं और सुरेश भी नंगा होकर उनकी तेल मालिश कर रहा है। सुषमा ने आँखें इधर फ़ेर ली।
रुक्मणि ने सुषमा को बिस्तर पर लिटाया और धीरे धीरे उसके सारे कपड़े उतार दिए और खुद भी नंगी हो गई। सुषमा आँखें मूंदे लेटी रही। थोड़ी देर में उसने देखा कि सुरेश उसकी तेल मालिश कर रहा है और बाद में वो उसकी चूत चाटने लगा। चूत एक दम गीली होने के बाद सुरेश ने उसमें खूब सारा तेल लगाया। सुषमा ने देखा कि नीचे चटाई पर रुक्मणि लल्लू का लण्ड चूस रही है और उस पर तेल लगा रही है। सुषमा की आँखें अपने ससुर के हथियार को देख कर फ़टी की फ़टी रह गई। सास सच कह रही थी कि यह लण्ड नहीं हथोड़ा है।
थोड़ी देर में रिक्मणि उसके पास आई और बोली- बेटी, तैयार हो जा !
लल्लू लाल भी बिस्तर पर आ गए और सुषमा के बड़े-बड़े, गोल-गोल स्तन सहलाने और दबाने लगे। उधर रुक्मणि ने सुषमा की टांगें चौड़ी कर दी। सुरेश उसकी चूत में पूरी जीभ डाल कर उसको कुत्तों की तरह चाट रहा था।
सुषमा आँखें बंद कर लेटी हुई थी, तभी उसको लगा उसके ससुर उसके ऊपर आ गये हैं। उसके होंट ससुर के होंटों से मिले और वो उसको पागलों की तरह चूमने लगे और अपने मज़बूत हाथों से सुषमा के बड़े बड़े स्तन दबाने और मसलने लगे। सुषमा के स्तन पहली बार कोई मर्द इस तरह दबा रहा था। उसकी चूत धीरे-धीरे गीली हो चुकी थी। ससुर को शायद इस बात का एहसास था, उन्होने अपने मोटे लण्ड को सुषमा की चूत के मुँह पर रखा और उस दिन की तरह सुरेश उसको पकड़ कर उसकी चूत में घुसाने लगा।
सुषमा की चूत के दरवाज़े पर जैसे ही लल्लू लाल का मोटा तगड़ा लण्ड पहुँचा, उसको दर्द महसूस हुआ मगर उसकी सास उसकी दोनों टाँगे पकड़े हुए थी और दर्द से बचना नामुमकिन था। उधर तेल की वजह से लल्लू का लण्ड भीतर सरकने लगा और सुषमा के होंट भिंचने लगे।
बेटा चिंता मत करो, सहयोग करो, एक दो बार का ही दर्द है, फिर मज़ा आएगा ! ससुर जी बोले।
रुक्मणि ने थोड़ी टाँगें और चौड़ी कर दी और ससुरजी से बोली- आप तो एक झटके में पूरा लण्ड पेल दो ! फिर कुछ नही होगा !
मगर ससुरजी धीरे धीरे लण्ड सरकाते रहे। सुषमा की चूत दर्द से फट रही थी, टाँगें दुखने लगी थी मगर लल्लू लाल अनाड़ी नहीं थे, चूमते रहे और धीरे-धीरे लण्ड सरकाते रहे, सुषमा चिल्लाती रही- ससुर जी रहम कीजिए ! फिर कर लीजिएगा ! मेरी चूत फट जाएगी !
मगर लल्लू लाल कहाँ रुकने वाले थे, 5 मिनट बाद उन्होंने अपने पूरा चिकना लण्ड बहू की चूत में पेल ही दिया, अब सिर्फ़ आँड बाहर रह गये। जैसे ही सुषमा का दर्द थोड़ा कम हुआ और वो सामान्य हुई, उन्होने लण्ड को अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। लल्लू लाल बहू की चूत के खून से रंगा लण्ड अंदर-बाहर करते रहे, सुषमा की चीखे सुनाई देती रहीं।
बेटा तू बापू की गाण्ड चाट ! मैं आँड चाटती हूँ, नहीं तो ये बहू को चोद चोद कर मार डालेंगे ! रुक्मणि बोली।
सुषमा ने देखा कि उसका पति उसके ससुर की गाण्ड चाट रहा था और सास ससुर के मोटे काले अंडकोष चाट रही थी। लल्लू लाल जी उत्तेजना के शिखर पर थे- बहू, भर दूँ तुम्हारी कुँवारी चूत अपने ताक़तवर वीर्य से? उन्होने पूछा।
सुषमा ने कुछ बोलना चाहा ही था कि वो गर्र-गर्र करते हुए झड़ गये।
ओह ! आपने तो कोई आधा कप पानी बहू की चूत में छोड़ दिया है, बच्चा होकर रहेगा ! रुक्मणि बोली।
शेष अगले भाग में Antarvasna
ठको, यह मेरी पहली कहानी है, जो मैं Antarvasna Sex Stories अपनी सहेलियों की मदद से लिख रही हूँ … इसमें कुछ तो वास्तविक है … और कुछ कहानी को दिलचस्प बनाने के लिये अलग से अंश जोड़े गये हैं।
सर्वविदित है कि जवानी बड़ी जालिम होती है। ये जाने लड़कों और लड़कियों से क्या क्या करवा बैठती है। मुझे भी अपने कॉलेज के समय में एक लड़के से दोस्ती हो गई थी। उसका नाम सुधीर था। हम लोग मिलने के लिये अक्सर एक झील के किनारे आते जाते थे। यूं तो वहा कितने ही जोड़े आते थे। पर वो सभी अपने आप में व्यस्त रहते थे। हम लोग वहां बस चाट और ठण्ड़ा ही लेते थे और बस यूँ ही बतिया कर चले आते थे।
पर हां, मेरे दिल में अब कुछ कुछ होने लगा था। मैं आज से चार साल पहले चुदाई का लुफ़्त उठा चुकी थी, पर फिर मै डर गई थी कि यदि मुझे गर्भ रह जाता तो क्या होता? पर नहीं हुआ। फिर कुछ दिन और चुदाया पर सावधानी रखी। आज फिर दिल में कुछ ऐसा ही हो रहा था। पर आजकल मैं भी औरों की तरह पिल्स के बारे में जानती थी, और साथ में रखती थी।
एक दिन एक अच्छी अंग्रेजी पिक्चर देखने का सुधीर ने प्रोग्राम बनाया । कहता था कि मस्त मूवी है … मजा आ जायेगा। कॉमेडी मूवी थी। मैं उसका मतलब खूब समझ रही थी। वो हॉल में मुझसे खेलना चाहता था। जैसे ही मुझे ये लगा, मेरी चूत में पानी उतर आया। मैं मजे लने के लिये तैयार थी। मेरी चूंचिया मसलवाने के लिये तड़प उठी। मेरी चूत में कोई अंगुली करे … हाय ये सोच कर मेरा शरीर वासना से भर उठा।
हम दोनों हाल में गये और एक कोने में बैठ गये … कम ही लोग थे। सुधीर बहुत ही उत्तेजित लग रहा था। बार बार मूवी की तारीफ़ कर रहा था। मुझे भी लगा कि जरूर मूवी अच्छी ही होगी। मूवी चालू हो चुकी थी। मुझे अंग्रेजी कम ही आती थी सो चुपचाप बैठी रही। सो सब कुछ सर के ऊपर से निकल रहा था। जब सब हंसते तो मै भी हंस देती थी। जोश में सुधीर मुझे हंसते हुये कभी पीठ पर मार देता था कभी कंधे पर। पर अब तो उसने मेरा हाथ भी पकड़ लिया था। मुझे झुरझुरी आने लग गई थी। मैं अपने आप को हर प्रकार से तैयार कर चुकी थी। मुझे लगा कि वो जल्दी से मेरी चूंचियाँ दबा दे … हाय राम … मेरी चूत में अंगुली घुसा कर मस्त कर दे … पर मैंने कुछ कहा नहीं, उसका हाथ और मेरा हाथ आपस में मिले हुये थे। वो कभी कभी मेरा हाथ दबा देता था।
अब धीरे से उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रख लिया। मुझे दिल में गुदगुदी सी हुई। मुझे लगा कि कुछ ही देर में वो मेरी चूंचियो पर आ ही जायेगा। पर्दे पर चूमने का दृष्य चल रहा था। उसने भी मुझे गले से खींच कर अपने पास कर लिया और चुम्मा ले लिया। मै जान कर के उससे चिपक सी गई। हमारे सामने वाला जोड़ा जो साईड में सामने बैठा था, बिना किसी हिचकिचाहट के लड़की के बोबे मसल रहा था और उसे चूम रहा था। मैं तो उन्हीं को देख देख कर उत्तेजित हो रही थी।
अचानक मुझे अब अपनी चूंचियो पर दबाव मह्सूस हुआ। सुधीर का हाथ मेरे स्तन को सहलाने लगा। हाय रे मजा आ गया … मैं झुक कर दोहरी हो गई।
“ना करो, सुधीर … हाय हाथ हटा लो … ” मैंने भी शरीफ़ लड़की की तरह नखरे दिखाये।
“रजनी, कितने कठोर है तुम्हारे बोबे … मस्त है यार … ” सुधीर वासना भरे स्वर में बोला।
“आह … बस करो … ” मेरी सिसकी निकल पड़ी। पर सुधीर कहा मानने वाला था। उसका वो हाथ ऊपर से मेरी ब्रा में घुस गया और मेरी नरम नरम सी चूंचियां मसलने लगा।
उसने दूसरे हाथ से मेरा चेहरा ऊपर कर लिया और अपने होंठ मेरे होंठो से चिपका दिये। अब मेरा हाथ भी उसकी जांघो पर रेंगने लगा था। मेरे निपल कड़े हो गये थे और वो उसकी अंगुलियों के बीच में घुमा घुमा कर मसले जा रहे थे।
मेरा शरीर भी वासना से भर उठा। मैंने अपना सीना थोड़ा सा और उभार लिया ताकि वो मेरी चूंचियाँ भली प्रकार से दबा सके। उसका कड़क … मेरे हाथों में आ चुका था। मैंने कोशिश करके उसकी ज़िप खोल दी।
पर अन्दर चड्डी के रूप में एक बाधा और थी। जल्दी ही ये बाधा भी मैंने पार कर ली और उसका मूसल जैसा लण्ड पकड़ ही लिया। गरम गरम कड़ा डण्डा, थोड़ा जोर लगाया तो वो पेण्ट से बाहर आ गया।
“हाय रे … ये तो बहुत मोटा है … देखो तो कैसा हो रहा है … ” मैंने सिसकते हुये कहा।
उसके सुपाड़े के सिरे पर चिकनापन लग रहा था, शायद उत्तेजना में उसमें से चिकनाई बाहर आ गई थी। उसने भी अपना हाथ मेरी छातियों पर से हटा कर मेरी चूत पर रख दिया था। मेरी सलवार के अन्दर हाथ घुसा कर मेरी गीली चूत को रगड़ दिया।
“मैं मर जाऊंगी रे … धीरे से करना … ! ” उसका हाथ जैसे ही मैंने अपनी चूत पर मह्सूस किया, उसे धीरे से समझा दिया। मेरी गीली चूत में उसकी अंगुली उतरी जा रही थी, मैंने भी अपनी चूत को थोड़ा सा ऊपर उठा कर उसे अंगुली घुसाने में सहायता की। मेरा जिस्म अब मीठी मीठी गुदगुदी से भर चुका था।
“रजनी, चुदोगी क्या … मेरे लण्ड की हालत खराब हो रही है … ” उसकी सांस फ़ूली सी लगी। उसने मेरे मन की बात कह दी। चूत फ़ड़क उठी।
“हां सुधीर … चुदने के चूत बेताब हो रही है … पर कैसे … ” सिसकती हुई सी बोली।
“मेरे घर चलें क्या ? वहाँ कोई नहीं है … मस्ती से चुदना … “
“हां हां … जल्दी चलो … ” और हम दोनों ने खड़े हो कर अपने आप को ठीक किया और हॉल के बाहर आ गये। सुधीर वहां से सीधे अपने घर ले गया … मैंने चेहरे पर कपड़ा बांध लिया था कि कोई पहचाने ना … । सुधीर ने ताला खोला और हम जल्दी से अन्दर आ गये।
मुझे भी अब लग रहा था कि बस एक बार तबियत से चुद जाऊं तो मेरा जी हल्का हो जायेगा।
उसने मुझे चाय के लिये पूछा पर यहाँ चाय की नहीं चुदाने की लगी हुई थी।
“चाय छोड़ो ना सुधीर, चलो बिस्तर पर चलते हैं … “
“रजनी … लगता है तुम्हारा बुरा हाल है … मेरे लण्ड को तो देखो , साला पेण्ट ही फ़ाड़ कर बाहर आ जायेगा।”
मुझे एकदम से हंसी आ गई। उसने पेन्ट की ज़िप खोल कर अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। पहली बार इतने बड़े लण्ड के दर्शन हुये। मैं जैसे ही आगे बढ़ी, उसने मुझे रोक दिया।
“पहले रजनी तुम अपने कपड़े उतारो … तुम्हारी फ़ुद्दी देखनी है … ” सुधीर ने फ़रमाईश कर दी। मैं शरमा गई।
“धत्त … शरम नहीं आयेगी … ? ” मैंने नारी का धर्म अदा किया।
“शरम नहीं रे … नशा आयेगा तुम्हे नंगी देख कर … लण्ड फ़ड़फ़ड़ायेगा … कड़का कड़क हो जायेगा … “
“हाय रे … ऐसा मत बोलो … तुम्हारा लण्ड देख कर ही मेरी फ़ुद्दी तो वैसे ही लप लप कर रही है … “
“तो प्लीज उतारो ना … ” उसने अपना लण्ड मुझे दिखाते हुये मसला। मुझे हालांकि बड़ी शरम आ रही थी पर इस दिल का क्या करूँ, सो झिझकते हुये मैंने कपड़े उतार ही दिये। पंखे की हवा मेरे नंगे बदन को सहलाने लगी। मैं शरम के मारे नीचे बैठ गई। पर नीचे बैठते ही मेरे चूतड़ उभर कर खिल उठे। दोनों तरबूज सी फ़ांके अलग अलग हो गई। सुधीर भी नंगा हो चुका था। उसका लण्ड मेरी गाण्ड देख कर फ़ूल उठा। उसका तनतनाता हुआ बलिष्ठ लण्ड जैसे मेरी चूत को न्योता दे रहा था।
“रजनी तुम्हारा बदन तराशा हुआ है … जरा दोनो टांगे चौड़ी करो … अपनी फ़ूल जैसी चूत तो दिखा दो … यूँ सिकुड़ कर मत बैठो।”
“हाय … नहीं जी … ऐसे तो सब दिख जायेगा ना … ” फिर भी मैंने हिम्मत करके टांगे चौड़ी करके अपनी गीली चूत खोल दी। सुधीर मचल सा पड़ा।
“रजनी, लड़कियां मुठ कैसे मारती है … मार कर बताओ ना … चूत में अंगुली करती हो ना …? “
“चलो हटो जी … मुझे क्या बेशर्म समझ रखा है … अच्छा तुम मुठ मार कर बताओ … “
सुधीर ने अपने मोटे से लण्ड की सुपाडे पर से चमड़ी ऊपर हटाई और लण्ड को अपनी मुठ्ठी में भर लिया और उसे पकड़ कर हाथ ऊपर नीचे चलाने लगा। उसका सुपाड़ा लाल होने लगा और फ़ूलने लगा। मेरे दिल पर छुरियाँ चलने लगी … हाय चूत की जगह मुठ में उसका लण्ड मसला जा रहा था। उसके सुपाड़े पर चिकनाई की दो बूंदें तक उभर आई थी। मेरा हाथ अपने आप ही चूत की तरफ़ बढ़ गया और दाने पर आ गया। उसे मैं हल्के हल्के सहलाने लगी। मेरे मुँह से सिसकियाँ निकलने लगी। मेरी अंगुली भी चूत में घुसने लगी।
“हां … हां … रजनी, और करो … आपकी चूत कैसी लपलपा रही है … ” उसकी आवाज में वासना भरी हुई थी।
मेरे बाल बिखर गये थे, लटें माथे पर लहराने लगी थी। मेरी दोनों टांगें कांपने लगी थी। चूत में अंगुली सटासट अन्दर बाहर जा रही थी। उधर मेरी नजरें सुधीर पर पड़ी, वो जोर जोर से लण्ड पर हाथ चला रहा था। उसका सुपाड़ा लाल हो गया था, फ़ूल कर मोटा हो चुका था। उसकी आंखे नशे में बंद सी हो गई थी। हम दोनों एक दूसरे को देख कर मुठ मारे जा रहे थे।
“हाय, सुधीर और जोर से मुठ चलाओ, क्या लण्ड है राम … चला हाथ जोर से … आह्ह्ह्ह्ह”
मैं ज्यों ही उठ कर उसके पास पहुंची,
” रजनी, ऐसे ही मजा आ रहा है … तुम वहीं जाओ … तुम उधर मुठ मारो ! मैं इधर मारता हूँ … चल घुसा दे फिर से अपनी अंगुली … ” उसकी सांस फूल उठी थी।
वो मना करता रहा पर मैंने जाकर उसके लण्ड को अपने दोनों हाथो से पकड़ लिया और उसके लाल लाल फ़ूले हुये सुपाड़े पर अंगुलियाँ फ़िराने लगी। उसके सुपाड़े को मलने से उसमें से चिकनाई की दो बूंदें और निकल आई। आनन्द में वो डूब रहा था। मुझे ऐसा करते देख उसने मेरी चूंचियों को पकड़ लिया और उसे दबाने लगा और निपल को अंगुलियों से हल्के हल्के दबाने और घुमाने लगा। मेरी मस्ती और वासना, मर्द के हाथों से मसले जाने से और बढ़ती गई।
अब वो मेरे निपल जोर जोर से मलने लगा था। मैं नशे में उसके लण्ड को जोर जोर से मुठ मारने लगी थी। मेरे हाथ बहुत ही तेजी से उसके लण्ड पर ऊपर नीचे हो रहे थे। उसकी सिसकियाँ बढ़ती जा रही थी।
अचानक उसने मेरी फ़ुद्दी में अपनी दो अंगुलियाँ डाल दी और अन्दर बाहर करने लगा। इस से मेरी उत्तेजना तेजी से बढ़ने लगी, लगा कि चुद रही हूँ। मुख से आह की आवाजें निकलने लगी। शायद सुधीर को अहसास हुआ कि यदि ऐसे ही उसका लण्ड मेरे हाथों में फ़िसलता रहा तो उसका वीर्य निकल जायेगा। उसने मुझे नीचे दबा लिया और मुझसे लिपट पड़ा। हमारे नंगे शरीर बिस्तर में आपस में रगड़ खाने लगे।
उसका लण्ड मेरी चूत को ठोकर मारने लगा। मेरा मन सिहर उठा, लौड़ा लेने को आतुर हो उठा। मेरी चूत उसके लण्ड को लपकने की कोशिश कर रही थी, और अन्त में सफ़ल हो ही गई। उसका लण्ड चूत में समाता चला गया। मेरे मुख से खुशी की सीत्कार निकल पड़ी। सुधीर भी तड़प उठा। ऊपर से उसने अपने शरीर का बोझ मेरे पर डालना आरम्भ कर दिया। मैं दबती गई। आनन्द मेरे जिस्म में भरता गया।
सुधीर ने अब अपने चूतड़ ऊपर खींच कर फिर से मेरी चूत पर पटक दिए … उसका लण्ड मेरी चूत में जड़ तक चीरता हुआ घुस गया। मुझे थोड़ा सा दर्द हुआ पर कसक भरी मिठास का अहसास अधिक हुआ।
“और जोर से चोद दे मेरे राजा … हाय … लण्ड़ पूरा घुसेड़ दे रे … मेरी मांऽऽऽऽऽऽ … ” मैं आनन्द से सिसकने लगी।
“ले … मेरी रजनी … मेरा पूरा लण्ड ले ले … तू तो मजे की खान है रे … ” वो मुझे भींच भींच के चोदने लगा। मेरी चूंचियों की हालत खींच खींच कर खराब कर दी थी। मैं नीचे से जोर से अपने चूतड़ उछल कर लण्ड ले रही थी। साला क्या चूत में गुदगुदी मचा रहा था। उसका मोटा लण्ड मेरी चूत की दीवारों से रगड़ता हुआ चोद रहा था। अचानक मेरे शरीर में ऐठन सी हुई और मुझे लगा कि मैं तो गई … ।
तेज मीठी सी आग भड़की और फिर जैसे पानी के ठण्डे छींटे पड़े … मेरा रज छूट पड़ा। मेरी चूत पानी से भरने लगी। मेरी चूत लहरा लहरा कर जोर लगा कर पानी छोड़ रही थी। पर उसका लण्ड था कि मेरी चूत को रोंदे जा रहा था।
मेरे मुख से अब मस्ती की सिसकियां की जगह दर्द की कराह निकल रही थी। इतनी कस कर चुदाई मेरी आज तक नहीं हुई थी। पर आह्ह्ह रे … मेरी चूत में उसके लण्ड ने ठण्डक कर दी। मुझसे लिपटते हुये उसने अपना वीर्य मेरी चूत में निकाल दिया। मैंने अपने दोनों हाथ फ़ैला दिये और बिस्तर पर पसर गई। उसका लण्ड मेरी चिकनी चूत में से फ़िसल कर बाहर आने लगा। उसके सिकुड़ कर निकलने से मेरी चूत में गुदगुदी सी हुई और लण्ड बाहर आ गया। चुदने के कारण मैं मस्ती में बस आंखे बंद करके यूँ ही पड़ी थी। सुधीर मेरे ऊपर से हट गया और मेरी चूत पर लगे वीर्य और चिकनाहट को चाटने लगा। उसके चाटने से मुझे चूत में फिर से गुदगुदी उठने लगी … कुछ ही देर में मुझे फिर से तरावट आने लगी। मैंने सुधीर को हटा दिया और उसके लण्ड पर लगे वीर्य का थोड़ा सा रस चाटने के लिये उसका लण्ड मुख में घुसा लिया और उसे चूसने लगी। कुछ ही देर में उसका लण्ड फिर से टनटना उठा। मैंने मुठ मारते हुये उसे और उत्तेजित किया। फिर सीधे खड़ी हो गई।
“बस सुधीर अब चलें … देखो शाम होने को है … “
“अच्छा … बस एक किस … फिर तुम्हें छोड़ आता हूँ।”
पर सुधीर के मन की इच्छा कुछ और ही थी। मैं जैसे ही पलटी, वो मेरी पीठ से चिपक गया। उसका लण्ड मेरी गाण्ड में घुसने के लिये जोर लगाने लगा।
“अरे नहीं करो सुधीर … मुझे लग जायेगी … “
“नही रजनी , तुम्हारी गाण्ड गजब की है … बिना मारे मुझे तो चैन नहीं आयेगा !”
मेरी गाण्ड के छेद में लण्ड का घर्षण होने लग गया था। मैंने नाटक करते हुये अपनी दोनों टांगे चौड़ी कर दी। मुझे वास्तव में आनन्द आने लगा था। अभी मेरा गाण्ड का छेद तो प्यासा था ही …
“अरे यार फ़ट जायेगी ना तुम्हारे मोटे लण्ड से … हाय रे धीरे से करो …
आआईईईई … मर गई रे … “
उसका सुपाड़ा छेद में दाखिल हो चुका था। मुझे बड़ा सुहाना सा लगा। मैंने मुस्करा कर पीछे सुधीर को देखा, वो भी खुश था कि उसे एक कॉलेज गर्ल की ताजी गाण्ड मारने को मिल रही थी … हम दोनों ही मस्त हो रहे थे …
पीछे से मेरी गाण्ड चुदी जा रही थी … हम दोनों खुशी में किलकारियां मार रहे थे … अपने चूतड़ों को हिला हिला कर चुदाई का मजा ले रहे थे … मस्ती में डूबे जा रहे थे … Antarvasna Sex Stories
यह घटना इसी होली Antarvasna की है। 6 साल के बाद मैं होली में अपने घर पर था। मेरी उम्र 19 साल की है। मैं अपने शहर से बहुत दूर एक कॉलेज में तकनीकी की पढ़ाई कर रहा हूँ। हड़ताल होने के कारण कॉलेज एक महीने के लिए बन्द हो गया था।
सारे त्योहारों में मुझे यह होली का उत्सव बिल्कुल पसन्द नहीं है। मैंने पहले कभी भी होली नहीं खेली। पिछले 6 साल मैंने होस्टल में ही बिताया। मेरे अलावा घर में मेरे बाबूजी और माँ है। मेरी छोटी बहन का विवाह पिछले साल हो गया था। कुछ कारण बस मेरी बहन रेनू होली में घर नहीं आ पाई। लेकिन उसके जगह पर हमांरे दादाजी होली से कुछ दिन पहले हमांरे पास हमसे मिलने आ गये थे। दादाजी की उम्र करीब 61-62 साल है, लेकिन इस उम्र में भी वे खूब हट्टे कट्टे दिखते हैं। उनके बाल सफेद होने लगे थे लेकिन सर पर पूरे घने बाल थे। दादाजी चश्मा भी नहीं पहनते थे। मेरे बाबूजी की उम्र करीब 40-41 साल की होगी और माँ की उम्र 34-35 साल की। माँ कहती है कि उसकी शादी 14 वे साल में ही हो गई थी और साल बीतते बीतते मैं पैदा हो गया था। मेरे जन्म के 2 साल बाद रेनू पैदा हुई।
अब जरा माँ के बारे में बताउँ। वो गाँव में पैदा हुई और पली बढ़ी। पांच भाई बहनों में वो सबसे छोटी थी। खूब गोरा दमकता हुआ रंग, 5’5″ लम्बी, चौडे कन्धे, खूब उभरी हुई छाती, उठे हुए स्तन और मस्त, गोल गोल भरे हुए नितम्ब। जब मैं 14 साल का हुआ और मर्द और औरत के रिश्ते के बारे में समझने लगा तो जिसके बारे में सोचते ही मेरा लौड़ा खड़ा हो जाता था, वो मेरी माँ मालती ही है। मैंने कई बार मालती के बारे में सोच सोच कर हत्तु मारा होगा लेकिन ना तो कभी मालती का चुची दबाने का मौका मिला, ना ही कभी उसको अपना लौड़ा ही दिखा पाया। इस डर से क़ि अगर घर में रहा तो जरुर एक दिन मुझसे पाप हो जायेगा, 8वीं क्लास के बाद मैं जिद कर होस्टल में चला गया।
माँ को पता नहीं चल पाया कि उसके इकलौते बेटे का लौड़ा माँ की बुर के लिए तड़पता है। छुट्टियों में आता था तो चोरी छिपे मालती की जवानी का मज़ा लेता था और करीब करीब रोज रात को हत्तु मारता था। मैं हमेशा यह ध्यान रखता था कि माँ को कभी भी मेरे ऊपर शक ना हो। और माँ को शक नहीं हुआ। वो कभी कभी प्यार से गालों पर थपकी लगाती थी तो बहुत अच्छा लगता था। मुझे याद नहीं कि पिछले 4-5 सालों में उसने कभी मुझे गले लगाया हो।
अब इस होली कि बात करें। माँ सुबह से नाश्ता, खाना बनाने में व्यस्त थी। करीब 9 बजे हम सब यानि मैं, बाबूजी और दादाजी ने नाश्ता किया और फिर माँ ने भी हम लोगों के साथ चाय पी। 10 – 10.30 बजे बाबूजी के दोस्तो का ग्रुप आया। मैं छत के ऊपर चला गया। मैंने देखा कि कुछ लोगों ने माँ को भी रंग लगाया। दो लोगों ने तो माँ की चूतड़ों को दबाया, कुछ देर तो माँ ने मजा लिया और फिर माँ छिटक कर वहाँ से हट गई। सब लोग बाबूजी को लेकर बाहर चले गये । दादाजी अपने कमरे में जाकर बैठ गये।
फिर आधे घंटे के बाद औरतों का हुजूम आया। करीब 30 औरतें थी, हर उम्र की। सभी एक दूसरे के साथ खूब जमकर होली खेलने लगे। मुझे बहुत अच्छा लगा। जब मैंने देखा कि औरतें एक दूसरे की चुची मसल मसल कर मजा ले रही हैं, कुछ औरतें तो साया उठा उठा कर रंग लगा रही थी। एक ने तो हद ही कर दी। उसने अपना हाथ दूसरी औरत के साया के अन्दर डाल कर बुर को मसला। कुछ औरतों ने मेरी माँ मालती को भी खूब मसला और उनकी चुची दबाई। फिर सब कुछ खा पीकर बाहर चली गई। उन औरतो ने माँ को भी अपने साथ बाहर ले जाना चाहा लेकिन माँ उनके साथ नहीं गई।
उनके जाने के बाद माँ ने दरवाजा बन्द किया। वो पूरी तरह से भीग गई थी। माँ ने बाहर खड़े खड़े ही अपना साड़ी उतार दी। गीला होने के कारण साया और ब्लाऊज दोनों माँ के बदन से चिपक गए थे। कसी कसी जांघें, खूब उभरी हुई छाती और गोरे रंग पर लाल और हरा रंग माँ को बहुत ही मस्त बना रहा था। ऐसी मस्तानी हालत में माँ को देख कर मेरा लौड़ा टाइट हो गया। मैंने सोचा, आज अच्छा मौका है। होली के बहाने आज माँ को बाहों में लेकर मसलने का। मैंने सोचा कि रंग लगाते लगाते आज चुची भी मसल दूंगा। यही सोचते सोचते मैं नीचे आने लगा। जब मैं आधी सीढी तक आया तो मुझे आवाज सुनाई पड़ी!
दादाजी माँ से पूछ रहे थे,” विनोद कहाँ गया?”
“मालूम नहीं, लगता है अपने बाबूजी के साथ बाहर चला गया है।” माँ ने जवाब दिया।
माँ को नहीं मालूम था कि मैं छत पर हूँ और अब उनकी बातें सुन भी रहा हूँ और देख भी रहा हूँ। मैंने देखा मालती अपने ससुर के सामने गरदन झुकाये खड़ी है। दादाजी माँ के बदन को घूर रहे थे।
तभी दादाजी ने माँ के गालो को सहलाते हुये कहा,”मेरे साथ होली नहीं खेलोगी?”
मैं तो ये सुन कर दंग रह गया। एक ससुर अपनी बहू से होली खेलने को बेताब था। मैंने सोचा, माँ ददाजी को धक्का देकर वहाँ से हट जायेगी लेकिन साली ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और मुस्कुरा कर कहा,” मैंने कब मना किया है, और अभी तो घर में कोई है भी नहीं!”
कहकर माँ वहां से हट गई। दादाजी भी कमरे के अन्दर गये और फिर दोनों अपने अपने हाथों में रंग लेकर वापस वहीं पर आ गये। दादाजी ने पहले दोनों हाथों से माँ की दोनों गालों पर खूब मसल मसल कर रंग लगाया और उसी समय माँ भी उनके गालों और छाती पर रंग रगड़ने लगी। दादाजी ने दुबारा हाथ में रंग लिया और इस बार माँ की गोल गोल बड़ी बड़ी चुचियों पर रंग लगाते हुए चुचियों को दबाने लगे। माँ भी सिसकारती मारती हुई दादाजी के शरीर पर रंग लगा रही थी।
कुछ देर तक चुचियों को मसलने के बाद दादाजी ने माँ को अपनी बाहों में कस लिया और चूमने लगे। मुझे लगा कि माँ गुस्सा करेगी और दादाजी को डांटेगी। लेकिन मैंने देखा क़ि माँ भी दादाजी के पांव पर पांव चढ़ा कर चूमने में मदद कर रही है। चुम्मा लेते लेते दादाजी का हाथ माँ की पीठ को सहला रहा था और हाथ धीरे धीरे माँ के सुडौल नितम्बों की ओर बढ़ रहा था । वे दोनों एक दूसरे को जम कर चूम रहे थे जैसे पति-पत्नि हों।
अब दादाजी माँ के चूतड़ों को दोनों हाथों से खूब कस कस कर मसल रहे थे और यह देख कर मेर लौड़ा पैंट से बाहर आने को तड़प रहा था। क़हां तो मैं यह सोच कर नीचे आ रहा था कि मैं माँ के मस्त गुदाज बदन का मजा लूंगा और कहां मुझसे पहले इस हरामी दादाजी ने रंडी का मजा लेना शुरु कर दिया।
मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था। मन तो कर रहा था कि मैं दोनों के सामने जाकर खड़ा हो जाऊँ। लेकिन तभी मुझे दादाजी कि आवाज सुनाई पड़ी,” रानी, पिचकारी से रंग डालूँ?”
दादाजी ने माँ को अपने से चिपका लिया था। माँ का पिछवाड़ा दादाजी से सटा था और मुझे माँ का सामने का माल दिख रहा था। दादाजी का एक हाथ चुची को मसल रहा था और दूसरा हाथ माँ के पेड़ू को सहला रहा था।
“अब भी कुछ पूछने की जरूरत है क्या?”
माँ का इतना कहना था कि दादाजी ने एक झटके में साया के नाड़े को खोल डाला और हाथ से धकेल कर साया को नीचे जांघो से नीचे गिरा दिया। मैं अवाक था माँ की बुर को देखकर। माँ ने पैरों से ठेल कर साया को अलग कर दिया और दादाजी का हाथ लेकर अपनी बुर पर सहलाने लगी। बुर पर बाल थे जो बुर को ढक रखा था। दादाजी की अंगुली बुर को कुरेद रही थी और माँ अपनी हाथो से ब्लाउज का बटन खोल रही थी। दादाजी ने माँ के हाथ को अलग हटाया और फटा फट सारे बटन खोल दिए और ब्लाउज को निकाल दिया।
अब माँ पूरी तरह से नंगी थी। मैंने जैसा सोचा था, चूची उससे भी बड़ी बड़ी और सुडौल थी। दादाजी आराम से नंगी जवानी का मजा ले रहे थे। माँ ने 2-3 मिनट दादाजी को चुची और चूत मसलने दिया फिर वो अलग हुई और वहीं फर्श पर मेरी तरफ पाँव रखकर लेट गई। मेरा मन कर रहा था कि जाकर चूत में लौड़ा पेल दूँ। तभी दादाजी ने अपना धोती और कुर्ता उतारा और माँ के चेहरे के पास बैठ गये। माँ ने लन्ड को हाथ में लेकर मसला और कहा,”पिचकारी तो अच्छा दिखता है लेकिन देखें इसमें रंग कितना है! अब देर मत करो, वे आ जायेंगे तो फिर रंग नहीं डाल पाओगे।”
और फिर, दादाजी ने माँ पाँव के बीच बैठ कर लन्ड को चूत पर दबाया और तीसरे धक्के में पूरा लौड़ा बुर के अन्दर चला गया। क़रीब 10 मिनटों तक माँ को खूब जोर जोर से धक्का लगा कद चोदा। उस रन्डी को भी चुदाई का खूब मजा आ रहा था, तभी तो साली जोर जोर से सिसकारी मार मार कर और चूतड़ उछाल उछाल कर दादाजी के लंड के धक्के का बराबर जबाब दे रही थी। उन दोनों की चुदाई देखकर मुझे विश्वास हो गया था कि माँ और दादाजी पहले भी कई बार चुदाई कर चुके हैं.
“क्या राजा, इस बहू का बुर कैसा है? मजा आया या नहीं?” माँ ने कमर उछालते हुये पूछा।
“मेरी प्यारी बहू! बहुत प्यारी चूत है और चूची तो बस, इतनी मस्त चुची पहले कभी नहीं दबाई।”दादाजी ने चुची को मसलते हुये पेलना जारी रखा और कहा।
“रानी, तुम नहीं जानती, तुम जबसे घर में दुल्हन बन कर आई, मैं हजारों बार तुम्हारे चूत और चुची का सोच सोच कर लंड को हिला हिला कर तुम्हारा नाम ले ले कर पानी गिराता हूँ।”
दादाजी ने चोदना रोक कर माँ की चुची को मसला और रस से भरे ओंठों को कुछ देर तक चूसा। फिर चुदाई शुरू की और कहा,”मुझे नहीं मालूम था कि एक बार बोलने पर ही तुम अपनी चूत दे दोगी, नहीं तो मैं तुम्हें पहले ही सैकडों बार चोद चुका होता!”
मुझे विश्वास नहीं हुआ कि माँ दादाजी से पहली बार चुद रही है। दादाजी ने एक बार कहा और हरामजादी बिना कोई नखरा किये चुदाने के लिये नंगी हो गई और दादाजी कह रहे है कि आज पहली बार ही माँ को चोद रहे हैं।
लेकिन तब माँ ने जो कहा वो सुनकर मुझे विश्वास हो गया कि माँ पहली बार ही दादाजी से मरवा रही है।
माँ ने कहा,” राजा, मैं कोई रंडी नहीं हूँ। आज होली है, तुमने मुझे रंग लगाना चाहा, मैंने लगाने दिया, तुमने चुची और चूत मसला, मैंने मना नहीं किया, तुमने मुझे चूमा और मैंने भी तुमको चूमा और तुम चोदना चाह्ते थे, पिचकारी डालना चाहते थे तो मेरी चूत ने पिचकारी अन्दर ले ली। तुम्हारी जगह कोई और भी ये चाहता तो मैं उस से भी चुदवाती। चाहे वो राजा हो या नौकर! होली के दिन मेरा माल, मेरी चूत, मेरी जवानी सब के लिये खुली है…!”
माँ ने दादाजी को अपनी बांहों और जांघों में कस कर बांधा और फिर कहा,”आज जितना चोदना है, चोद लो, फिर अगली होली का इंतजार करना पड़ेगा मेरी नंगी जवानी का दर्शन करने के लिये!”
माँ की बात सुनकर मैं आश्चर्य-चकित था कि होली के दिन कोई भी उसे चोद सकता था.
लेकिन यह जान कर मैं भी खुश हो गया। कोई भी में तो मैं भी आता हूँ। आज जैसे भी हो, माँ को चोदूँगा ही। यह सोच कर मैं खुश था और उधर दादाजी ने माँ की चूत में पिचकारी मार दी। बुर से मलाई जैसा गाढ़ा दादाजी का रस बाहर निकल रहा था और दादाजी खूब प्यार से माँ को चूम रहे थे।
क़ुछ देर बाद दोनों उठ गये।
“कैसी रही होली?” माँ ने पूछा,” आप पहले होली पर हमारे साथ क्यों नहीं रहे। मैंने 12 साल पहले होली के दिन सबके लिये अपना खजाना खोल दिया था।”
माँ ने दादाजी के लौड़ा को सहलाया और कहा,” अभी भी लौड़े में बहुत दम है, किसी कुमारी छोकरी की भी चूत एक धक्के में फाड़ सकता है।”
माँ ने झुक कर लौड़े को चूमा और फिर कहा,”अब आप बाहर जाईये और एक घंटे के बाद आईयेगा। मैं नहीं चाहती कि विनोद या उसके बाप को पता चले कि मैंने आप से चुदाई है।”
माँ वहीं नंगी खड़ी रही और दादाजी को कपडे पहनते देखती रही। धोती और कुर्ता पहनने के बाद दादाजी ने फिर माँ को बांहो में कसकर दबाया और गालों और होंठों को चूमा। कुछ चुम्मा चाटी के बाद माँ ने दादाजी को अलग किया और कहा,”अभी बाहर जाओ, बाद में मौका मिलेगा तो फिर से चोद लेना लेकिन आज ही, कल से मैं आपकी वही पुरानी बहू रहूंगी।”
दादाजी ने चुची दबाते हुये माँ को दुबारा चूमा और बाहर चले गये।
मैं सोचने लगा कि क्या करूँ?
मैं छत पर चला गया और वहाँ से देखा- दादाजी घर से दूर जा रहे थे और आस पास मेरे पिताजी का कोई नामो निशान नहीं था। मैंने लौड़े को पैंट के अन्दर किया और धीरे धीरे नीचे आया। माँ बरामदे में नहीं थी। मैं बिना कोई आवाज किये अपने कमरे में चला गया और वहाँ से झांका। इधर उधर देखने के बाद मुझे लगा कि माँ किचन में हैं। मैंने हाथ में रंग लिया और चुपके से किचन में घुसा। माँ को देखकर दिल बाग बाग हो गया। वो अभी भी नंग धड़ंग खड़ी थी। वो मेरी तरफ पीठ करके पुआ बेल रही थी। माँ के सुडौल और भरे भरे मांसल चूतड़ों को देख कर मेरा लौड़ा पैंट फाड़ कर बाहर निकलना चाहता था।
कोई मौका दिये बिना मैंने दोनों हाथों को माँ की बांहो से नीचे आगे बढ़ा कर उनके गालों पर खूब जोर जोर से रंग लगाते हुये कहा,”माँ, होली है!”
और फिर दोनों हाथों को एक साथ नीचे लाकर माँ की गुदाज और बड़ी बड़ी चुचियों को मसलने लगा।
“ओह … तू कब आया? दरवाजा तो बन्द है! छोड़ ना बेटा … क्या कर रहा है? माँ के साथ ऐसे होली नहीं खेलते … ओह्ह्ह्ह … इतना जोर जोर से मत मसल … अह्ह्ह्ह्ह … छोड़ दे! … अब हो गया…!”
लेकिन मैं ऐसा मौका कहां छोड़ने वाला था। मैं माँ के चूतड़ों को अपने पेरु से खूब दबा कर और चूची को मसलता रहा। माँ बार बार मुझे हटने के लिये बोल रही थी और बीच बीच में सिसकारी भी भर रही थी.. खास कर जब मैं घुंडी को जोर से मसलता था। मेरा लंड बहुत टाइट हो गया था। मैं लंड को पैंट से बाहर निकालना चाहता था। मैं कस कर एक हाथ से चुची को दबाये रखा और दूसरा हाथ पीछे लाकर पैंट का बटन खोला और नीचे गिरा दिया। मेरा लौड़ा पूरा टन टना गया था। मैंने एक हाथ से लंड को माँ के चूतड़ों के बीच दबाया और दूसरा हाथ बढ़ा कर चूत को मसलने लगा।
“नहीं बेटा, बुर को मत छुओ … यह पाप है!”
लौड़े को चूतड़ों के बीच में दबाये रखा और आगे से बुर में बीच वाली अंगुली घुसेड़ दी। करीब 15-20 मिनट पहले दादाजी चोद कर गये थे और चूत गीली थी। मेरा मन झनझना गया था, माँ की नंगी जवानी को छू कर। मुझे लगा कि इसी तरह अगर मैं माँ को रगड़ता रहा तो बिना चोदे ही झड जाउंगा और फिर माँ मुझे कभी चोदने नहीं देगी। यही सोच कर मैंने चूत से अंगुली बाहर निकाली और पीछे से ही कमर से पकड़ कर माँ को उठा लिया।
“ओह … क्या मस्त माल है … चल रंडी, अब तुझे जम कर चोदूंगा … बहुत मजा आयेगा मेरी रानी तुझे चोदने में!”
ये कहते हुये मैंने माँ को दोनों हाथों से उठा कर बेड पर पटक दिया और उसकी दोनों पैरों को फैला कर मैंने लौड़ा बुर के छेद पर रखा और खूब जोर से धक्का मारा।
“आउच..जरा धीरे! ” माँ ने हौले से कहा।
मैंने जोर का धक्का लगाया और कहा,”ओह्ह्ह्ह … माँ, तू नहीं जानती, आज मैं कितना खुश हूँ!” मैं धक्का लगाता रहा और खूब प्यार से माँ के रस से भरे होंठों को चूमा।
“मां, जब से मेरा लौड़ा खड़ा होना शुरु हुआ, चार साल पहले, तो तबसे बस सिर्फ तुम्हें ही चोदने का मन करता है। हजारों बार तेरी चूत और चुची का ध्यान कर मैंने लौड़ा हिलाया है और पानी गिराया है.. हर रात सपने में तुम्हें चोदता हूँ। ले रानी आज पूरा मजा मारने दे!”
मैंने माँ की चुचियों को दोनों हाथों में कस कर दबा कर रखा और दना दन चुदाई करने लगा। माँ आंख़ बन्द कर चुदाई का मजा ले रही थी। वो कमर और चूतड़ हिला हिला कर लंड को चुदाई में मदद दे रही थी।
“साली, आंख खोल और देख, तेरा बेटा कैसा चुदाई कर रहा है … रंडी, खोलना आंख!”
माँ ने आंखें खोली। उसकी आंखो में कोई ‘भाव’ नहीं था। ऐसा भी नहीं लग रहा था कि वो मुझसे नाराज है…ना ही यह पता चल रहा था कि वो बेटे के लंड का मजा ले रही है.. लेकिन मैं पूरा मजा लेकर चोद रहा था…
“साली, तू नहीं जानती … तेरे बुर के चक्कर में मैं रन्डियों के पास जाने लगा और ऐसी ऐसी रंडी की तलाश करता था जो तुम्हारी जैसी लगती हो… लेकिन अब तक जितनी भी बुर चोदी सब की सब ढीली ढाली थी … लेकिन आज मस्त, कसी हुई बुर चोदने को मिली है … ले रंडी तू भी मजा ले!”
और उसके बाद बिना कोई बात किये मैं माँ को चोदता रहा और वो भी कमर उछाल उछाल कर चुदवाती रही। कुछ देर के बाद माँ ने सिसकारी मारनी शुरु की और मुझे उसकी सिसकारी सुनकर और भी मजा आने लगा। मैंने धक्के की स्पीड और दम बढ़ा दिया और खूब दम लगा कर चोदने लगा.
माँ जोर जोर से सिसकारी मारने लगी।
“रंडी, कुतिया जैसे क्यों चिल्ला रही है, कोई सुन लेगा तो?”
“तो सुनने दो…लोगों को पता तो चले कि एक कुतिया कैसे अपने बेटे से मरवाती है…मार दे , फाड़ दे इस बुर को…मादरचोद , माँ की बुर इतनी ही प्यारी है तो हरामी पहले क्यों नहीं पटक कर चोद डाला… अगर तू हर पिछली होली में यहाँ रहता और मुझे चोदने के लिये बोलता तो मैं ऐसे ही बुर चिरवा कर तेरा लौड़ा अन्दर ले लेती…चोद बेटा ..चोद ले…लेकिन देख तेरा बाप और दादाजी कभी भी आ सकते हैं..! जल्दी से बुर में पानी भर दे!”
“ले मां, तू भी क्या याद रखेगी कि किसी रन्डीबाज ने तुझे चोदा था… ले कुतिया, बन्द कर ले मेरा लौड़ा अपनी बुर में!” मैं अब चुची को मसल मसल कर, कभी माँ की मस्त जांघों को सहला सहला कर धक्के पर धक्का लगाये जा रहा था।
“आह्ह्ह्ह्ह … बेटा, ओह्ह्ह्ह्ह … बेटा… अह्ह्ह्ह्ह … मार राजा … चोद … चोद!”
और माँ ने दोनों पाँव उपर उठाए और मुझे जोर से अपनी ओर दबाया और माँ पस्त हो गई और हांफने लगी।
“बस बेटा, हो गया … निकाल ले … तूने खुश कर दिया!”
“माँ बोलती रही और मैं कुछ देर और धक्का लगाता रहा और फिर मैं भी झर गया। मैंने दोनों हाथों से चुची को मसलते हुये बहुत देर तक माँ के गालों और ओंठो को चूमता रहा। माँ भी मेरे बदन को सहलाती रही और मेरे चुम्बन का पूरा जबाब दिया। फिर उसने मुझे अपने बदन से उतारा और कहा,”बेटा, कपड़े पहन ले … सब आने बाले होंगे!”
“फिर कब चोदने दोगी?” मैंने चूत को मसलते हुये पूछा।
“अगले साल, अगर होली पर घर में मेरे साथ रहोगे!” माँ ने हंस कर जवाब दिया.
मैंने चूत को जोर से मसलते हुये कहा,”चुप रंडी, नखरे मत कर, मैं तो रोज तुझे चोदूँगा!”
“ये रंडी चालू माल नहीं है… तू कालेज जा कर उन चालू रंडियों को चोदना…” माँ कहते कहते नंगी ही किचन में चली गई।
मैंने पीछे से पकड़ कर चूतड़ों को मसला और कहा,”मां, तू बहुत मस्त माल है … तुझे लोग बहुत रुपया देंगे, चल तुझे भी कोठे पर बैठा कर धंधा करवाऊँगा।” मैंने माँ की गांड में अंगुली पेली और वो चिहुंक गई.
मैंने कहा,”रंडी बाद में बनना, चल साली अभी तो कपड़े पहन ले.”
“कमरे से ला दे … जो तेरा मन करे!” वो बोली और पुआ तलने लगी।
मैंने तुरंत कमरे से एक साया और ब्लाउज लाकर माँ को पहनाया।
“साड़ी नहीं पहनाओगे?” माँ ने मेरे गालों को चूमते हुये कहा।
“नहीं रानी, आज से घर में तुम ऐसी ही रहोगी, बिना साड़ी के…”
“तेरे दादाजी के सामने भी?” उसने पूछा।
“ठीक है सिर्फ आज भर … कल से फिर साड़ी भी पहनूंगी।”
माँ खाना बनाती रही और मैं उसके साथ मस्ती करता रहा। Antarvasna
अन्तर्वासना के सभी Antarvasna Stories पाठकों को खास कर लडकियों और भाभियों को रोहण के लन्ड का आदर भरा प्रणाम…
मैंने अन्तर्वासना पर लगभग सभी कहानियाँ पढ़ी हैं। आपको मैं अपनी सच्ची कहानी बताने जा रहा हूँ। आपकी जानकारी के लिए : मैं मुम्बई का रहने वाला हूँ, कद 5’10” रंग गेहुंआ, उम्र 32 साल !
एक बार मैं बस से जा रहा था। सीट ना मिलने से खड़े खड़े सफ़र कर रहा था। मेरी सामने वाली सीट पर एक औरत और लड़का बैठे थे। लड़का खिड़की की तरफ़ बैठा था। उस औरत ने लाल रंग की साड़ी और लो-नेक ब्लाउस पहना था… बड़े और गोरे स्तन नज़र आ रहे थे। जिसका भरपूर आनन्द मैं ले रहा था और सोच रहा था कि काश ऐसी भाभी मिल जाए चोदने के लिए।
तभी एक स्टॉप पर बस रुकी और काफ़ी लोग बस में चढ़े … भीड बढ़ गई। मेरा लन्ड उसके कन्धे से टकराया, उस औरत ने मेरी तरफ़ देखा और सीधी हो कर बैठ गई। जिससे मेरा लन्ड उसके कन्धे से सट गया। मैंने थोड़ा पीछे हटने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहा और अपना लन्ड सटा दिया। उसके बदन का स्पर्श पाते ही मेरे लन्ड ने अंगडाई ली और अब मेरे लन्ड को वो महसूस कर रही थी। मैंने लन्ड का दबाव बढ़ाया तो वो मेरी तरफ़ देख कर हल्के से मुस्कुरा दी। और साड़ी ठीक करने के बहाने उसने एक दो बार मेरे लन्ड को छू भी लिया। मेरी भी हिम्मत बढ़ी और एक बार उसके स्तनों को छू लिया।
थोड़ी देर बाद उसके बगल में बैठा हुआ लड़का उतरने के लिए उठा तो मै उस औरत के बगल में उससे सट कर बैठ गया और जानबूझ कर अपनी कोहनी उसके वक्ष पर सटा दी। अब वो भी मेरा साथ देने लगी और मेरा हाथ पकड़ कर अपने वक्ष पर दबाने लगी। मैंने जानपहचान बढ़ाने लिये उससे पूछा,”आप कहाँ जा रही है?”
तो उसने बताया कि वो घर जा रही थी और अगले स्टॉप पर उतरने वाली है।
ज़ब वो उठी तो मैं भी उसके साथ उठा और हम दोनों अगले स्टॉप पर उतर गए। उसने अपना नाम सारिका बताया और पूछा,”क्या तुम्हारा स्टॉप भी आ गया?”
मैंने कहा,”नहीं सारिका, मैं तो तुम्हारे लिए उतर पड़ा !”
वो बोली,”क्या इरादा है आप का?”
मैंने कहा,”इरादा तो नेक है, बाकी आप जैसा चाहो !”
वो बोली,”तो घर चलिए !”
हम दोनों उसके घर पहुँचे। मुझे बैठा कर वो किचन से पानी लेकर आई। तब तक मैंने भांप लिया कि घर में कोई नहीं है। पानी का ग्लास देकर मेरे सामने वाले सोफ़े पर बैठ गई और मेरे बारे में पूछने लगी। मैं ग्लास देने बहाने उठा और उसकी बगल में बैठ गया और अपना हाथ उसके कन्धे पर रख दिया तो वो बोली,”बस में भी शरारत कर रहे थे और यहां भी?”
तो मैंने कहा,”बस में तो लोगों के डर से थोड़ा कंट्रोल करना पड़ा पर यहाँ तो हमारे सिवा कौन है?”
धत्त्त्त्त्… उसने कहा और शरमा गई।
कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने अपना एक हाथ उसकी टांग पर रखा और बोला- बड़ी सेक्सी लग रही हो सारिका !
और फिर मैंने उसकी जाँघ को प्यार से सहलाया। उसकी जाँघें काफी बड़ी और मुलायम थी। मेरा लंड खड़ा होने लगा था। और वह भी सेक्सी मूड में थी। उसने मुझे नहीं रोका। मेरी हिम्मत बढ़ी और मैंने साड़ी के ऊपर से ही उसकी चूची को प्यार से सहलाया, दबाया। जैसे ही मैंने दबाया, उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। उसकी साड़ी का पल्लू गिर गया और मैंने देखा कि उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ ब्लाऊज़ से बाहर आने के लिए बेताब़ हो रहीं हैं। मेरी आँखों की तृप्ति मिल रही थी और मैं उसकी चूचियों को भूखी नज़रों से देख रहा था।
इस दौरान पता ही नही चला कब हमारे होंठ जुड़ गये… एक तरफ़ चूचियों को दबा रहा था और उसके रसीले होंठों को पी रहा था।
मैं अब थोड़ा नीचे की ओर बढ़ा… मैंने उन नरम चूचियों को दबाना शुरू किया और साथ ही मैं अपनी जीभ उसकी गर्दन पर फिरा रहा था। उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और हल्की आहें भरने लगी। फिर मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी दाईं चूची को दबाने लगा, और बाईं चूची को चूसने लगा। फिर मैंने बारी-बारी से बाईं और दाईं चूचियाँ बदल-बदल कर दबाईं और चूसीं।
सारिका आहें भर रही थी, “हम्म्म्म्म…. ऊम्म्म्म्म। रोअओहहहन और जोर से रोहन आआआअहहह माँमम्म… ” वह अपना हाथ मेरे लंड पर रखकर उसकी कठोरता का आभास कर रही थी और तब मैंने उसकी चूत को ऊपर से ही सहला दिया। इस दौरान हमने एक-दूसरे को बिलकुल निवस्त्र कर दिया। उसकी गोरी और साफ़सुथरी चूत को देख मेरे मुँह में पानी आ गया और चूत पर उंगली फ़ेरने लगा। तब वो उत्तेजना में सिसकारियाँ लेते हुए बोली,”उईईईईईई, माँ… और दबाओ ना मेरे चूचे … रगड़ो मेरी चूत…।”
मैंने अपनी ऊंगली उसकी चूत में फिरानी शुरू की। मैं ज्यों ही ऐसा कर रहा था, वह अपनी चूतड़ सेक्सी तरीके से ऊपर उठाकर मुझे और भी बढ़ावा दे रही थी। थोड़ी देर ऊंगली करने के बाद मैंने उसकी जाँघें फैलाईं और उसकी शानदार चूत में अपना मुँह लगा दिया। इस दौरान उसने मेरे लन्ड पर पूरी तरह कब्जा कर लिया था और वो मेरे लन्ड को सहला रही थी।
मैंने उसकी चूत को चाटना शुरू किया। उसकी चूत टाईट तरीके से बन्द थी। सामान्यतः एक नियमित रूप से चुदने वाली चूत के फ़लक खुले रहते हैं और ये थोड़ा बाहर की ओर निकले होते हैं। पर सारिका के साथ ऐसा नहीं था, शादीशुदा होने के बावजूद उसकी चूत एक अनछुई लड़की की तरह थी… बाद में पता चला कि उसका पति बिसनेस के चक्कर में बाहर घूमता रहता है और सारिका प्यासी रह जाती है।
मैंने उसकी चूत के होंठ फैलाए और उसकी गुलाबी झलक ली। फिर मैंने अपनी जीभ अन्दर घुसेड़ दी और अच्छी तरह चलाते हुए चाटने लगा। मैं उससे निकले रस को भी चाटता जा रहा था। वह मादक आहें भर रही थी… हमम्म्म्म्मम… मैंने उसकी चूत को फैलाया और छेद में जीभ घुसेड़ कर चूसने लगा।
मैंने इधर अपनी जीभ उसकी चूत में घुसाई, और साथ ही उधर अपनी एक उँगली उसकी गाँड में घुसेड़ दी… सारिका ने मेरा सिर उसकी चूत पर दबा दिया, और मैं उसकी चूत में समाता चला गया।
थोड़ी देर बाद हम 69 पोज़िशन में आ गये… मैं उसकी चूत का रसपान कर रहा था और वो मेरे लन्ड को चूस रही थी…मुझे तो लगा कि मैं ज़न्नत में आ गया हूँ। फिर उसने धीरे से मेरे लंड के आगे की चमड़ी हटाकर गुलाबी सुपाड़े चाटना शुरु किया और मेरी आहें निकलने लगीं,”ओह यस….”
उसके नर्म-नर्म हाथों का लन्ड को मसलना और गर्म-गर्म जीभ का अहसास मेरे लंड के सुपाड़े पर बड़ा आनन्ददायक प्रतीत हो रहा था। मेरे लंड से हल्का सा वीर्य निकला, जिसे उसने चाट लिया। फिर उसने मेरे लंड को चाटना शुरू कर दिया, और साथ में वह मेरे अंडकोषों को भी सहला, चूस रही थी। करीब आधे घंटे बाद वो मिन्नतें करने लगी,”रोहन, अब चोद डालो मुझे ! और ना तड़पा मुझे… उईईईईईई, माँ… और दबा ना मेरे बूब्स…!”
मैंने कहा,”हाँ मेरी जान ! मेरा लन्ड भी बेताब है तेरी चूत पाने के लिये।”
इस दौरान वो एक बार झड़ चुकी थी…
उसकी ड़ांगें फ़ैला कर बीच में बैठ गया और लन्ड के सुपाड़े को उसकी गीली चूत पर रख दिया। गर्म सुपाड़े का स्पर्श पाते ही उसके चूतड़ उठने लगे और लन्ड को चूत में लेने की कोशिश करने लगे। मैंने अपने सख्त लन्ड का दबाव उसकी चूत पर बढ़ाया और फ़च्च से लन्ड का सुपाड़ा उसकी गीली चूत में समा गया और सारिका कराह उठी- …उईईईईईई, माँ…
चूत टाइट थी…
फ़िर एक जोरदार धक्का दिया तो लन्ड चूत की दीवार को चीरता हुआ जड़ तक समा गया …
आआह्ह्ह्ह्ह्ह् … … … … आह्ह्ह … … मार डालोगे क्या … … ! उसकी चीख निकल गई।
पूरा लन्ड बाहर खींचा और फ़िर पूरी ताकत से फ़िर से पेल दिया।
कुछ देर हम वैसे ही पड़े रहे… दर्द कम होते ही उसने अपनी गांड उठानी शुरु कर दी और बोलने लगी- चोदो मेरे राजा… रुकना नहीं… मेरी चूत बहुत दिनों से प्यासी है… चोदो… जोर से चोदो आअह्ह्ह्ह…
“ये लो मेरी जान्… और लो… ये लो… आआह्ह्ह्ह्ह्ह्… क्या चूत पाई है तूने…” और मैंने उसे दनादन चोदना शुरू कर दिया। वोआह्ह आह्ह करती रही और मै उसे चोदता रहा।
मैं अब अपना सारा ६ इंच का लंड उसकी चूत में अन्दर-बाहर करने लगा। सारिका के मुंह से स्स्स्स्स्स्स्स आह आह्ह्ह उस्सुसुसू जैसी मादक आवाजें निकाल रही थी। 10 मिनट इसी तरह चोदने के बाद मैंने अब सारिका की चूत में से अपना लंड निकाल कर उसको घोड़ी स्टाईल में खड़ा कर उसकी चूत में लंड घुसा दिया और धक्के मारने लगा। उसको और मज़ा आने लगा। उसके चूतड़ मुझे बहुत ही आनंद दे रहे थे। दो मिनट में ही वो अपने चूतड़ उठा-उठा कर मेरे हर धक्के का जवाब देने लगी। मैंने अपनी स्पीड और बढ़ा दी।
सारिका बोली,”मुझे कुछ हो रहा है। लगता है मेरी चूत से पानी निकलने वाला है। खूब ज़ोर-ज़ोर से धक्का लगाओ।”
सारिका भी अब अपने चूतड़ उठा-उठा कर चुदाने लगी… दस मिनट बाद वो चिल्लाने लगी,”ओ रोहन मै आ रही हू आआह्ह्ह्ह्ह्ह् … … … … आह्ह्ह … ..”
मैं समझ गया कि वो झड़ने वाली है। मैंने बहुत ही तेज़ी के साथ उसकी चुदाई शुरू कर दी।
वो बोली,”आआआ!!! मैंऽऽऽ आआआऽऽऽ रहीऽऽऽ हूँऽऽऽ और तेज़ ऽऽऽ और तेज़ ऽऽऽ”
उसकी चूत से पानी निकलने लगा और मेरा सारा लंड भीग गया। मैं भी बिना रुके उसे आँधी की तरह चोदता रहा। लगभग २० मिनट तक चोदने के बाद मैं उसकी चूत में ही झड़ गया और हम कुछ देर ऐसे ही पड़े रहे…।
इस दौरान वो भी तीन बार झड़ चुकी थी। लंड का पूरा पानी उसकी चूत में निकल जाने के बाद मैं हट गया।
उस दिन के बाद जब भी मौका मिलता सारिका मुझे बुला लेती है और हम जम कर चुदाई करते हैं !
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