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Antarvasna

हैलो, दोस्तो ये मेरी पहली कहानी है Antarvasna जो मैं आप को बताने जा रहा हूं। मेरा नाम राज है। मैं जब स्कूल में था तो काफ़ी शर्मीला हुआ करता था लेकिन जब मैं कोलेज पहुंचा तो वहां पर जो दोस्त मिले उनके साथ मैने एक चालू औरत के साथ उसके घर पर उसके पियक्कड पति के सामने चुदाई की और तब से यह सिलसिला आज तक चल रहा है।

वैसे तो मैंने अपनी ज़िंदगी में कई लड़कियों, कई आंटियों और भाभियों को चोदा है लेकिन आज जो घटना मैं आप लोगों को बताने जा रहा हूं वो मेरी ज़िंदगी में बिल्कुल अचानक घटी थी जब मैंने अपनी आंटी को ही चोद डाला।

पहले तो मैं आप लोगों को अपनी आंटी के बारे में बता दूं। वो 30 साल की, गोरा रंग, टाइट बोडी, बड़ी बड़ी चूचियां, ऐसा की जो भी देखे देखता ही रह जाये। वो दिल्ली में रहती है। उसके 2 बच्चे हैं। एक 10 और दूसरा 7 साल के

पिछले दिसम्बर में उनके घर गया था ओफ़िस के काम से, मैं मुम्बई में जोब करता हूं। और मेरा काम ऐसा है कि पूरा हिंदुस्तान घूमना पड़ता है।

दिल्ली में दिसम्बर के महीने में काफ़ी ठंड होती है। अंकल नाइट शिफ़्ट की ड्युटी करने गये था। घर छोटा होने के कारण हम एक ही रूम में सोये था। मैं बेड पर सोया था और आंटी बच्चों के साथ नीचे लेटी थी। ठंड काफ़ी थी इसलिये बेड पर सोते ही मुझे नींद आ गयी।
रात के 2 बजे पेशाब करने के लिये अचानक मेरी नींद खुली तो मैंने देखा आंटी एक पतली सी चादर ओढ़ी हुई है और बुरी तरह से कांप रही थी और बच्चे एक कम्बल में सो रहे थे। शायद घर में दो ही कम्बल थे, एक उन्होंने मुझे दिया था और दूसरा बच्चों को उढ़ाया था।
मैंने लाइट जलाई तो आंटी उठ कर बैठ गयी लेकिन वो बुरी तरह से कांप रही थी। मैंने कहा आप ऊपर बेड में चली जायें मैं नीचे सो जाता हूं, तो उन्होंने कहा ठंड बहुत है तुम्हें ठंड लग जायेगी। मैंने कहा आप तो बुरी तरह से कांप रही है ठीक से बोल भी नहीं पा रही हैं आप ऊपर बेड पे सो जाओ।

और इतना कह कर मैंने उनका हाथ पकड़ कर ऊपर बेड पे बैठा कर पेशाब करने चला गया। वापस आ कर देखा तब भी वो कम्बल के अन्दर बुरी तरह से कांप रही थी। तभी उन्होंने कांपते हुए कहा राज लाइट बंद करके तुम भी बेड पर सो जाओ।

मैंने लाइट बंद की और उनके पास आ कर सो गया। बेड छोटा होने के कारण हम एक दूसरे से बिल्कुल सटे हुए थे। तभी उनका हाथ मैंने छुआ तो वो काफ़ी ठंडा था और वो अब भी कांप रही थी ठंड से।

फिर आंटी ने मुझसे कहा- राज मुझे ज़ोर से पकड़ो मुझे बहुत ठंड लग रही है।
मैंने उनको कहा कि आप घूम कर सो जाओ!
और उनके सर को मैंने अपने एक हाथ के नीचे रखा और दूसरा उनके पेट पर रखा।अब हम दोनो की पोजिशन कुछ इस तरह थी कि उनकी गांड मेरे लंड पे पूरी तरह से चिपकी हुई थी और मैं पूरी तरह से उसे दोनो हाथों से पकड़े हुआ था।
मेरा लंड आंटी की गांड की दरार के बीच में घुस कर टाइट होने लगा था।
मैं अपनी कमर को पीछे ले जाने लगा और अपनी पकड़ को भी ढीला करने लगा। लेकिन आंटी बहुत बुरी तरह से कांप रही थी और मेरे हाथ को अपने हाथ से ज़ोर से पकड़े हुई थी। मैं आंटी के साथ कुछ गलत सोच भी नहीं सकता था लेकिन मेरा लंड मेरी बस में नहीं था। मेरा लंड अब बेकाबू हो रहा था और वो पूरी तरह से आंटी की चूत में घुसने को तैयार था।

तभी आंटी ने मेरे हाथ को अपनी कमीज़ के नीचे घुसा कर अपने पेट पर रख दिया उनका पेट बर्फ़ की तरह ठंडा हो रहा था। मेरा गर्म हाथ रखने से उनको काफ़ी अच्छा लग रहा था आंटी मेरे हाथ को पकड़ कर अपने पेट पेर और ज़ोर से रगड़ने लगी। मैं धीरे धीरे उसके पेट को सहलाने लगा। सहलाने के कारण कई बार मेरा हाथ उनकी चूचियों से टकराया लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

मैंने हिम्मत करके उसके एक दूध को पकड़ कर सहलाने लगा। उसकी दूध का निप्पल बिल्कुल टाइट हो कर बाहर निकल गया था। मैं उनके निप्पल को उंगलियों के बीच रख कर धीरे धीरे घुमाने लगा। अब उसके मुंह से सिसकियाँनिकलनी शुरू हो गयी थी।

फिर मैंने उनकी कमीज़ पीछे से पूरी उठा कर उसके गर्दन तक कर दिया और उसकी ब्रा के हुक भी खोल दिये फिर मैंने भी अपना बनियान उतार कर अपने पेट और सीने को उसकी नंगी पीठ पर सटा कर पुरी तरह से चिपक गया।

उसे मेरे जिस्म की गर्मी अच्छी लग रही थी वो भी मुझसे पूरी तरह से चिपक गयी थी। अब मेरे लंड को और रोक पाना मेरे लिये मुश्किल हो रहा था। मैं उसके पायजामे को धीरे धीरे नीचे करने लगा तो वो थोड़ी थोड़ी कमर उठाने लगी। मैं समझ गया कि आंटी को अब लंड की गर्मी की ज़रूरत है वो अब पूरी तरह से तैयार थी।

मैंने अब उसे पायजामे को पूरा उतार दिया और अपनी लुंगी को भी उतार दिया। फिर मैंने अपने लंड को उसकी चूत पे रख कर धीरे से एक धक्का मारा और लंड पूरा का पूरा चूत में घुस गया। मैं अब उसकी चूचियों को अपने हातों से ज़ोर ज़ोर से दबा रहा था। थोड़ी देर के बाद वो मेरी तरफ़ घूम गयी। मैं अब उसके दोनो पैरों को खोल कर बीच में बैठ गया और उसकी चूचियों को मुंह से चूसने लगा। तभी उसने मेरे लंड को पकड़ कर अपनी चूत की तरफ़ खीचने लगी। मैं समझ गया कि उसकी चूत चुदवाने के लिये बेताब हो रही है।

मैंने अपने लंड को उसकी चूत के छेद पर रख कर एक जोर का झटका मारा और पूरा का पूरा लंड उसकी बुर में घुस गया। वो पूरी मस्ती में आ चुकी थी। उसके मुंह से ऊह आह की आवाज़ निकल रही थी।
मैं पूरी स्पीड में अपने लंड को पूरा बाहर कर के अंदर डाल रहा था। लंड और बुर के टकराने से थप थप की आवाज़ आ रही थी। आंटी भी अपनी कमर को उठा उठा कर पूरा साथ दे रही थी।

फिर अचानक वो मेरे कमर को पकड़ का ज़ोर ज़ोर से खीचने लगी मैं भी ज़ोर ज़ोर से उसे चोदने लगा और फिर अचानक मेरे लंड ने 8-10 झटके में पिचकारी की तरह पूरी गर्मी आंटी के बुर में भर दिया। आंटी भी पूरी ताकत से मेरे सीने से चिपक गयी। हम दोनो आधे घंटे तक वैसे ही पड़े रहे। आधे घंटे के बाद मेरे लंड में फिर से जोश आने लगा।

मैंने आंटी को उल्टा लिटा दिया और पीछे से उसके बुर को चोदने लगा। पीछे से चोदने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी कुंवारी लड़की की चुदाई कर रहा था। उसकी गोल गोल गांड मेरे लंड के दोनो तरफ़ इस तरह से फ़िट हो रही थी मानो मेरे लिये ही वो गांड बनी हो। मैं फ़ुल स्पीड में उसकी चुदाई करने लगा और इस बार भी लंड ने सब गर्मी बाहर निकाली तो उसकी बुर मेरे वीर्य से भर गयी। अब वो पूरी तरह से नोर्मल हो चुकी थी।

फिर हम सो गये। सुबह वो मुझे जगाई तो मैं उनसे नज़र नहीं मिला पा रहा था। लेकिन वो मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी।
बच्चे भी स्कूल जा चुके थे।

तभी अचानक दरवाजे पर किसी ने खटखटाया, मैं समझा अंकल आ गये।
दरवाज़ा खुला तो एक खूबसूरत लड़की, बिल्कुल टाइट जीन्स और टी-शर्ट में अन्दर आयी और आंटी से कहा की अंकल ने फोन किया था अभी और कहा है कि वो ओवरटाइम पर हैं।
मैं खुश हो गया। फिर वो लड़की चली गयी।
मैंने आंटी से पूछा कि ये लड़की कौन है?
तो उन्होंने कहा कि मकान मालिक की बेटी है।
मैं आंटी को मुस्कुराते हुए देखा और कहा- आंटी, मुझे इसे चोदना है। तुम कुछ करो न प्लीज़।

आंटी बोली- नहीं नहीं, मैं कुछ नहीं कर सकती।

इतना सुनते ही मैंने आंटी को बेड पर पटक दिया और उसकी चूचियों को ब्रा से निकाल कर चूसने लगा और कहा बोलो- अब उसे मुझसे चुदवाने के लिये तैयार करोगी या नहीं।
आंटी हंसते हुए बोली- अच्छा बाबा मैं उसे तुम्हारे लिये तैयार करती हूं।
मैंने कहा ये हुई न बात!
और फिर आंटी के सारे कपड़े उतार कर फिर से उसकी चुदाई करने के लिये उसे गर्म करने लगा।
दिन के उजाले मैं उसकी खूबसूरती बिल्कुल साफ़ साफ़ दिख रही थी। उसकी नंगे जिस्म को देकते ही मेरा लंड लुंगी से बाहर आने को बेताब होने लगा। मैंने अपनी लुंगी निकाली और आंटी की ऐसी चुदाई की कि वो मेरी दिवानी बन गयी। Antarvasna

एक बार 2 दिन की छुट्टी हुई तो मैं घर गया.
घर पर मौसी भी आई थी.

हम सबसे मिले उसके बाद खेत में काम करने चले गए.
जब शाम हुई तो सब लोगों ने खाना खा लिया.

उसके बाद मैं खेत में बने कमरे में सोने चला गया.

कुछ देर बाद पापा भी आए सोने के लिए, मेरे पास लेट गए.

उनको लगा होगा कि मैं सो रहा हूं तो वे मुझसे कुछ नहीं बोले.

उसके आधा घंटा बाद छोटी मौसी आई पानी लेकर!
तो पापा बोले- तुम क्या करने आ गई यहां पर?
मौसी बोली- पानी लेकर आई हूं आपके पास!

तो पापा बोले- पानी पिलाओगी या कुछ और भी पिलाओगी?
तब मौसी बोली- और क्या पिएंगे? साथ में बेटा लेटा हुआ है!
तो पापा बोले- यह तो सो गया.

तब पापा ने मुझे आवाज दी, मैं कुछ नहीं बोला.
तो उनको लगा कि मैं सो गया हूं.

उसके बाद मौसी पानी रख कर चल दी.
तो पापा भी उसके पीछे पीछे गए.

तो मैंने सोचा कि पता नहीं ये दोनों कहां जा रहे हैं.
थोड़ी दूर तक तो मैंने देखा, वे ज्यादा दूर निकल गये, अंधेरा होने कारण मैं कुछ देख नहीं पाया.

उसके बाद पापा कब आये पता नहीं … मैं सो चुका था.
बीच्ग रात मेरी नींद खुली तो पापा मेरे पास थे, मौसी नहीं थी, मेरे ख्याल से मौसी घर चली गई थी सोने उसके बाद!

सुबह हुई तो मेरे दिमाग में वही बात घूम रही थी.
मुझे लगा कि पापा ने मौसी को रात में जरूर चोदा होगा.
लेकिन मुझे पक्का तो पता था नहीं!

उसके बाद शाम तक मैं निकल आया वाराणसी फिर पढ़ाई करने के लिए!

तो मेरे मन में मौसी और पापा की चुदाई देखने का मन हुआ.
परंतु कैसे … यह तो संभव नहीं था क्योंकि क्योंकि मैं वाराणसी में था.
मैं सोच रहा था कि कैसे करूं … क्या करूं!
तो कुछ समझ में नहीं आया.

2 दिन बाद पापा का फोन आया.
पापा बोले- तुम्हारे मौसा घर बनवा रहे हैं तो उसमें उनको कुछ हेल्प चाहिए; उनका फोन आया था.
तो मैं बोला- अच्छा!
उन्होंने बोला- घर में काम है इसलिए हम लोग जा नहीं पाएंगे.
तो मैंने बोला- ठीक है, मैं कोशिश करता हूं.

दूसरे दिन मैं तैयार हुआ और मौसी के घर पहुंचा.
सब लोग घर पर थे.

मैं बड़ी मौसी से मिला, उनके पैर छुइ.
उसके बाद मौसा मिल गए, उनके पैर छुइ.
फिर छोटी मौसी रीतिका मिल गई.
उसके पैर छूने का मेरा मन नहीं कर रहा था क्योंकि उसके लिए मेरे दिमाग में बहुत गलत विचार बन गया था.

फिर खाना पीना हुआ शाम को!
खाने के बाद सोने की व्यवस्था कम थी तो मौसा जी वहां चले गए सोने जहां पर मकान बन रहा था.

और अब बड़ी मौसी अपनी बेटी को लेकर बाहर सो रही थी.
उसके बाद छोटी मौसी और उनका लड़का कमरे में चले गए सोने!

तभी छोटी मौसी ने बोला- कमरे में दो बैड हैं, वही तुम भी सो जाओ!
मैंने कहा- ठीक है!
तो मेरे मन में तो खुशी के लड्डू फूटे.

मैं गया.
गर्मी का मौसम था तो लेट गया.
कुछ देर बाद देखा तो मौसी की साड़ी ऊपर उठी हुई थी, उसकी जांघें दिख रही थी और दूध भी आधे आधे दिख रहे थे.

मेरा लन्ड खड़ा हो गया तुरंत!
पर मेरे मन में डर था.

कुछ देर बाद जब मौसी गहरी नींद में सो गई तो मैंने उनकी साड़ी उठाकर देखी.
पेंटी नहीं पहनी थी मौसी ने!
मुझे कुछ शक हुआ.
पर उसके बाद मैं सो गया.

सुबह हुई तो हम सब नाश्ता कर रहे थे.
मैंने देखा कि रीतिका मौसी नहा कर आ रही थी.
जब वह कपड़े रस्सी पर डालने गई तो उनमें पेंटी भी थी.

मैंने सोचा कि रात में तो पेंटी नहीं थी, अभी कैसे आ गई?
पर मैंने ज्यादा कुछ नहीं सोचा.

हम लोग काम पर लग गए.

फिर रात हुई तो फिर सोने गए.
तो जब मौसी सो गई तो मैंने उसकी साड़ी के अंदर अपना पैर डाल दिया और हॉट मौसी की सेक्सी चूत को हल्के से सहलाया.
मुझे लगा कि मौसी सो गई हैं.

तो फिर मैंने और जोर से सहलाया तो मौसी ने हल्के से आह आह की.
उसके बाद मेरी गांड फटी तो मैंने अपना पैर अपने बेड पर कर लिया.

लेकिन मौसी अब गर्म हो चुकी थी क्योंकि मेरे मौसा चोदते नहीं है क्योंकि वो अब बुड्ढे हो चुके हैं लेकिन मौसी तो अभी जवान है.

थोड़ी देर बाद जब मौसी को लगा कि मैं डर गया हूँ और अब कोई हरकत नहीं करूंगा तो मौसी ने खुद कहा- बेटा, तू मेरे पास आ जा, मुझे तुमसे बातें करनी हैं.

मैं मौसी के पास गया तो मौसी और मैं इधर उधर यहाँ वहाँ की बात करने लगे.

मौसी का हाथ मेरे लंड के एकदम पास था. मैं कुछ नहीं कर रहा था.

तभी मौसी का हाथ मेरे लंड से टकरा गया और वे हल्के हलके मेरे लंड को सहलाने लगी.

इतने से ही मेरा लंड में खड़ा होना शुरू हो गया था.

मैं अभी भी दारा हुआ था तो मैं पीछे हटने लगा.

पर तभी सेक्सी मौसी ने मेरा लंड अपने हाथ में पकड़ लिया और बोली- प्रशांत बेटा, मेरी एक बात मानेगा क्या तू?
इस पर मैंने कहा- मौसी, आप बोलिए, मैं जरूर मानूँगा!

‘तो बेटा, तू मेरी प्यास बुझा दे बेटा … अपनी मौसी को इस्ल्न्द से चोद दे … तेरा लंड बहुत लम्बा है. तेरा लंड बहुत मजा देगा मुझे!

तभी मौसी ने मेरे लंड को हाथ से जोर से दबाया.
मैंने हटना चाहा तो मौसी मुझ से लिपटकर मेरे लबों को चूमने लगी.

मौसी के स्तन मेरी छाती पर रगड़ रहे थे.
मुझे इसमें बहुत अच्छा लग रहा था.

तब मैं अपना हाथ मौसी की गांड पर ले गया और मौसी के चूतड़ दबाने लगा.
उसके मुख से कामुक सीत्कारें निकलने लगी.

तब मैंने मौसी से पूछा- मौसी, ज़रा बताओ कि मेरा लंड आपने कब देखा? जो बोल रही हो तुम्हारा लंड बहुत बढ़िया है?
मौसी- जब तुम्हारे घर गई थी और तुम खेत में सोये थे, तब!

मैं हैरान हो गया कि उस समय मुझको तो पता ही नहीं चला.
मौसी बोली- पहले प्यास बुझाओ, बाद में सब बताऊंगी.
मैं बोला- ओके!

फिर मैंने मौसी के चूचे दबाना शुरू किया, वे काफी बड़े थे.

मैंने मौसी की साड़ी निकाली और उसके ऊपर लेट गया.
तो मौसी ने कहा- बेटा, मेरे चूचों को चूस ले. बहुत समय से किसी ने इनको नहीं चूसा है बस एक मर्द को छोड़कर! वे भी जब मौका मिलता है तो सिर्फ चोद लेते हैं. क्योंकि उनके पास इतना टाइम नहीं होता!
मैं- किस मर्द को छोड़कर?
मौसी- तेरा बाप!

मैं चकित नहीं हुआ क्योंकि शक तो मुझे पहले ही था.
तो मैं बोला- बताओ कैसे तुम चुदी पापा से?
मौसी- बाद में बताऊंगी.

मैं मौसी के चूचे ज़ोर ज़ोर से चूसने लगा.
मौसी के चूचे और फूलने लगे थे.

फिर मैंने मौसी का साया उतार कर उसकी चूत को ज़ोर से मसल दिया.
तब मौसी ने चड्डी नहीं पहनी हुई थी.

मौसी बोलेन लगी- आआह ऊह ऊओ … और ज़ोर से मसल … फाड़ दे इसको!
तब मैंने अपनी मध्यमा उंगली उसकी चूत में घुसा दी.
तो उसके मुंह से गर्म सीत्कारें निकलने लगी.

मौसी ने कहा- बेटा जल्दी कर … चोद दे मुझे!
तो मैं बोला- अरे मौसी जल्दी क्यों करती हो, पूरी रात है हमारे पास!
मौसी ने हाथ में मेरा लंड पकड़ लिया.

मैंने कहा- यार मौसी, इसे अपने मुंह में लेकर चूस ना!
मौसी मेरा लंड चाटने लगी.

इससे मैं बहुत गरम हो गया तो मैंने अपना लंड सीधे मौसी की चूत में घुसा दिया.

तब मौसी के मुख से चीख की आवाज़ निकली- आआ ईई ईई उम्म्हां … अह … हांह… ओ!

मैं मौसी के उरोज मसलने लगा और थोड़ी देर बाद मौसी सामान्य हो गई.

मैं अविरत छोटी मौसी की चुदाई में लगा था.
और मैं झाड़ें लगा तो मुझसे रुका नहीं गया, मैंने अपना सारा रस मौसी की गर्म फुद्दी में डाल दिया.
मौसी बोली- यार प्रशांत, तू तो बड़ा चोदू निकला रे … मेरी जवानी की आग एक बार में ही ठण्डी कर दी.

लेकिन मौसी नहीं जानती थी कि यह मेरा प्रथम यौन सम्बन्ध अनुभव है.

उसके बाद मैंने कहा- पहले बताओ तुम पापा कब और कैसे चुदी? और मेरा लन्ड कब देखा? उसके बाद मैं तुम्हारी गान्ड मारूंगा.

मौसी- जब मैं तुम्हारे घर गई थी, तब तुम खेत में सो रहे थे. मैंने तुम्हारी चड्डी उतार कर तुम्हारा लंड देखा था.
मैं बोला- जब मैं और पापा सो रहे थे तब?
मौसी- हाँ!

मैं बोला- मैं जान नहीं पाया था.
मौसी- मैं पानी लेकर आई थी. तब मैं तुम्हारे पापा के साथ वहां से दूर दूसरे खेत में चुदवाने गयी थी.

मैं- अच्छा मतलब तुम उसी दिन पापा से चुदाई करवाने गई थी.
मौसी- तुम जानते हो क्या?
मैं- मैं जग रहा था जब तुम आई थी.
मौसी- अच्छा!

मैं- मुझे पता चला होता तो उसी दिन मैं आपको चोद लेता!
मौसी- तेरे पापा से चुदवा कर भी मेरी प्यास नहीं बुझी थी क्योंकि तुम्हारे पापा भी बुड्ढे हो रहे हैं. उस वक्त मैंने तुम्हारे पापा के सामने तुम्हारा लंड देखा था. फिर तुम्हारे पापा बोले थे कि इसे भी लेने का इरादा है क्या?
मैं- अच्छा?
मौसी ने कहा- तो मैंने तुम्हारे पापा को तुम्हारे लंड से चुदाई की इच्छा बताई थी.

इस तरह से मौसी ने ये सब कहानी मुझे बताई.

फिर मैं बोला- मुझे पापा और आपकी चुदाई देखनी है.
मौसी- चलो, अब जब तुम्हारे घर आऊंगी तो तुम्हें फोन कर दूंगी. तुम भी घर आ जाना. फिर हम साथ में चुदाई करेंगे.
मैं बोला- साथ में कैसे?
मौसी- वो मैं सब जुगाड़ कर लूंगी.

उसके बाद मैं 3 दिन मौसी के यहां रुका और उसकी खूब चुदाई की.
अगले दिन तो मैंने मौसी की गांड भी मारी.
लेकिन वो बोल रही थी- मैंने आज तक गान्ड नहीं मराई थी.

Antarvasna

हाय ! मैं दीपक, आपने मेरी Antarvasna कहानी स्कूल में मस्ती का पहला भाग पढ़ा और मुझे मेल भेजे!

शुक्रिया !

अब अगला भाग :-

मै फ़िर से निधि को चोदने का अवसर ढूंढने लगा. स्कूल में नए साल की पार्टी थी.

कार्यक्रम ७.३० शाम को था. सभी लड़के, लड़कियां ७ बजे से आने शुरू हो गए थे.

मैं बेसब्री से निधि का इंतजार कर रहा था. वो ८ बजे अपनी सहेली के साथ आई, उसने नीले रंग की जींस और लाल रंग की टी शर्ट पहन रखी थी, जिसमें वो बहुत ही सुंदर और सेक्सी लग रही थी.

मैं देखता ही रह गया. उसकी तनी हुई चूचियां देख मेरा लंड पैंट के अंदर ही नाग की तरह फुफकारने लगा.

पार्टी देर तक चलने वाली थी तो मैं बाहर जाकर ड्रिंक कर आया. आते ही निधि को ढूंढने लगा. वो अपनी सहेलियों के साथ डांस कर रही थी.

मैंने इशारे से उसे अपने पास बुलाया. थोडी देर में वो मेरे पास आई तो मैंने उसे कहा कि आज मैं तुम्हे फ़िर चोदूंगा.

वो बोली- सर यहाँ इतने लोग हैं, कैसे हो पाएगा?

मैंने उसे बताया कि बस इंतजाम कर दिया है, तुम स्कूल के पीछे वाले टॉयलेट में पहुँचो.

मैं सीधा वहां गया, वहां दिन में भी कम लोग आते थे, रात को तो किसी के आने का सवाल ही नहीं था. निधि आई तो मैं उसे लेकर अन्दर घुस गया और दरवाज़ा बंद कर लिया.

फ़िर मैंने निधि को बाहों में भर लिया और उसके होंठ चूसने लगा. शराब की गंध उसके नाक में चढ़ गई.

उसने कहा- सर आपने शराब पी रखी है.

मैंने कहा- जानेमन ! पीकर चोदने में जितना मज़ा आता है उतना कभी नहीं आता, आज देखना मैं तुम्हे कितना मज़ा देता हूँ.

इतना कह कर मैंने उसकी टी-शर्ट खोल दी और ब्रा के ऊपर से ही चूचियां दबाने लगा.

निधि ने मेरी जिप खोल कर मेरा लंड बाहर निकाल लिया और सहलाने लगी.

मैंने उसकी जींस खोल कर जाँघों से नीचे सरका दी और पैंटी में हाथ डाल कर चूत सहलाने लगा.

बीच बीच में एक ऊँगली अंदर बाहर करने लगा. वो जोर जोर से सिस्कारियां भरने लगी.

फ़िर मैंने निधि को लंड चूसने को कहा. वो मेरा लंड मुंह में लेकर चूसने लगी.

मैं उसके सर को पकड़ कर उसके मुंह में अंदर बाहर करके चोदने लगा.

फ़िर मैं उसको फर्श पर लिटा कर उसकी चूत चाटने लगा. वो जोर जोर से आहें भरने लगी.

फ़िर मैंने उसकी टाँगें उठा के अपना लंड उसकी चूत से भिड़ा दिया और एक जोरदार धक्के से उसको निधि की चूत में घुसा दिया. उसकी आह निकल गई.

वो भी अपनी कमर उठा उठा कर धक्कों में मेरा साथ देने लगी और बड़बड़ाने लगी- ओ यस और जोर से सररर फाड़ दो मेरीई ई ई चुत्त्त जोर से सररर !

मैंने रफ्तार बढ़ा दी.

निधि भी नीचे से मेरे धक्कों का जवाब दे रही थी. थोडी देर में उसने पानी छोड़ दिया पर मेरा काम नहीं हुआ था क्योंकि मैंने शराब पी रखी थी.

इसलिए मैं धक्के मारता रहा.

निधि गिडगिडाने लगी- सर निकाल लीजिए अपना लंड चूत से मुझे बुरा लग रहा है, दर्द हो रहा है.

मैंने कहा मेरा काम अभी नहीं हुआ है और मैं अपना मज़ा अधूरा नहीं छोड़ सकता.

प्लीज़ सर ! आप कुछ भी कर लीजिए पर लंड चूत से निकाल लीजिए, अब मैं सहन नहीं कर सकती.

मुझे यही चाहिए था क्योंकि मै उसकी गांड मारना चाहता था. मैंने थोड़ा सोचने का नाटक किया और कहा – तुम सब करने को तैयार हो जो मै चाहूँ?

तो उसने कहा – हाँ सर आप जो कहेंगे मैं करने को तैयार हूँ, लेकिन आप पहले लंड बाहर निकालो.

मैंने लंड बाहर खींच लिया और निधि को घुटनों के बल कर दिया और उसकी गाण्ड पर थूक लगा कर एक उंगली अंदर बाहर करने लगा.

मेरा ऐसा करने पर निधि बोली- सर ! आप यह क्या कर रहे हैं?

मैंने कहा – अब मै तेरी गांड मारूंगा.

तो वो कुछ नहीं बोली. शायद उसे पता नहीं था कि गाण्ड मरवाने से उसका क्या हाल होगा।

फ़िर मैंने अपने लंड का अग्र भाग उसकी गाण्ड के छेद पर रखा और जोर से धकेलने लगा.

जैसे ही मेरे लंड का सुपारा उसकी गांड में घुसा, वो जोर जोर से चीखने लगी. वो रोने लगी थी और छोड़ देने को कह रही थी, पर मैंने अपना काम जारी रखा और उसे समझाया कि बस थोड़ा और दर्द होगा जैसे पहली बार चूत की चुदाई में हुआ था, फ़िर बहुत मज़ा आएगा।

बाहर संगीत की आवाज़ तेज़ होने के कारण उसकी आवाज़ किसी ने नहीं सुनी. मैं और जोर लगा कर उसकी गांड में लंड घुसाने लगा.

जैसे जैसे मेरा लंड निधि की गांड में जा रहा था वैसे वैसे उसकी चीखें तेज़ होने लगी, लेकिन मैं पूरा लंड घुसा कर ही रुका.

फ़िर मैं लंड को धीरे धीरे आगे पीछे करने लगा. अब निधि की चीखें कुछ कम हो गई और वो भी धक्कों में मेरा साथ देने लगी.

१५-२० मिनट चोदने के बाद अपना पानी उसकी गांड में छोड़ मै उसके ऊपर ही ढह गया.

फ़िर मैंने अपना लंड निकाल लिया और उठ कर कपडे पहन लिए.

मैंने उसे भी कपड़े पहनने के लिए कहा. उसने उठने की कोशिश की पर उसकी गांड में काफी दर्द होने के कारण उससे उठा नहीं गया.

मैंने उसे सहारा दे कर उठाया और कपड़े पहनाए.

निधि को चलने में परेशानी हो रही थी, उसे इस हालत में पार्टी में ले जाना उचित ना होता, इसलिए मैं उसे चुपके से गाड़ी में बिठा कर उसके घर के पास छोड़ आया.

इसके बाद जब भी मुझे मौका मिलता मै निधि को चोदता. Antarvasna

मेरा नाम हर्ष है। उम्र 23 साल, कद 5 फुट 11 इंच, पतला-छरहरा जिस्म पर ऊर्जा सी भरी हुई। मैं सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा हूँ। मेरा औज़ार 7 इंच लंबा और 2.5 इंच मोटा है — यह सोचकर ही मैं मुस्कुरा देता हूँ। मेरी इंग्लिश कमज़ोर थी, इसलिए मैंने एक ट्यूशन टीचर रखी। नाम है नेहा मैडम। उम्र 31 साल। पति एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हैं और 20 दिन बाहर रहते हैं। पहली मुलाकात में ही मेरी नज़रें उन पर टिक गईं। उन्होंने सफेद कॉटन साड़ी पहनी थी, गीले बाल थे। जब वह झुककर किताब खोलने लगीं तो पल्लू फिसल गया। मैंने उसे वापस रखने की कोशिश में उनकी त्वचा को छू लिया। "थैंक यू," उन्होंने कहा, मेरी आँखों में देखकर। "मैडम जी, आप बहुत खूबसूरत हैं," मैंने मुस्कुराते हुए कहा। उनके गालों पर लाली छा गई। "चुप रहो, पढ़ने दो।" लेकिन मैं उन्हें घूरता रहा। उनकी गर्दन लंबी थी, और जब वह झुकतीं तो ब्लाउज की गहराई से मेरी नज़रें नहीं हटतीं थीं। अगली बार जब मैं गया तो जानबूझकर थोड़ा लेट पहुँचा। शाम के 6 बजे, बारिश में भीगा हुआ। मेरी टी-शर्ट चिपक गई थी मेरे जिस्म पर। "अरे, तुम तो पूरे भीग गए!" वह चौंकीं। "आपकी याद आ रही थी पूरे दिन," मैंने कपड़े ठीक करते हुए कहा। उनकी नज़रें मेरे सीने पर टिकीं। "जाओ, ऊपर बाथरूम में तौलिया ले लो।" जब मैं नीचे आया तो उन्होंने चाय दी। मैंने जानबूझकर उनके पास बैठते समय अपना पैर उनके पैर से छुआ दिया। "सॉरी मैडम जी," मैंने कहा। "कोई बात नहीं," वह पल्लू ठीक करने लगीं। मैंने अपना हाथ ड्राइंग टेबल पर रखा, जहाँ उनका हाथ पहले से था। "मैडम जी, आपके हाथ बहुत नरम हैं।" "हर्ष..." वह घबराईं, "यह ठीक नहीं है।" "क्यों? मैं तो बस सच बोल रहा हूँ," मैंने उनकी उँगलियों को छुआ। वह हाथ हटाने लगीं, लेकिन मैंने हल्के से दबाव बनाए रखा। उनकी साँसें तेज़ हो गईं। मैंने उनका हाथ अपने होंठों के पास लाया और हल्का सा चूम लिया। "हर्ष! यह क्या कर रहे हो!" वह उठ खड़ी हुईं। "मैडम जी, मैं जानता हूँ आप भी यही महसूस करती हैं," मैंने कहा। "चुप! पढ़ाई करो," वह सख्त होने की कोशिश की, लेकिन उनकी आँखें कुछ और ही कह रही थीं। कुछ दिन बाद फिर मिलना हुआ। इस बार मैंने दरवाज़ा बंद करते समय जानबूझकर चाबी लगा दी। वह नीले रंग की साड़ी में थीं। "आज क्या पढ़ाना है मैडम जी?" मैंने पास बैठते हुए पूछा। जब वह झुकीं, तो मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी पीठ पर रख दिया। "हर्ष!" वह चौंकीं। "क्या हुआ? मैं तो बस देख रहा था कि आप ठीक तो हैं," मैंने उनके कंधे पर हाथ फेरा। वह मुड़ीं। मैं उनके बहुत करीब था। "यह गलत है... मैं तुमसे 8 साल बड़ी हूँ... और शादीशुदा भी..." "तो क्या हुआ? दिल तो उम्र नहीं देखता," मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में भर लिया। "प्लीज़..." वह धीमी आवाज़ में बोलीं, "अगर किसी को पता चल गया तो..." "किसी को पता नहीं चलेगा," मैंने उनकी गर्दन पर होंठ रख दिए। वह सिहर उठीं। मैंने उनकी गर्दन को चूमना शुरू किया, हल्के-हल्के चुंबन देते हुए ऊपर की ओर बढ़ा। जब मैंने उनके कान के पास होंठ रखे तो वह काँपने लगीं। "कैसा लग रहा है मैडम जी?" मैंने फुसफुसाते हुए कहा। "अच्छा... मतलब... नहीं... रुको..." वह उलझन में थीं। मैंने उनका चेहरा उठाया और उनके होंठों पर चुंबन कर दिया। वह पहले तो हिचकिचाईं, फिर धीरे से जवाब देने लगीं। हमारी जुबानें मिलीं। वह मीठी लग रही थीं, चाय की तरह गरम। मैंने अपने हाथ उनकी कमर पर ले गया और उन्हें अपनी ओर खींचा। "हर्ष... हमें रुकना चाहिए..." वह मेरे होंठों के बीच बोलीं। "क्यों?" मैंने उनके होंठ चूमते हुए कहा। "क्योंकि यह... यह बहुत आगे बढ़ रहा है..." मैंने उनकी साड़ी का पल्लू खींचा। "मैं आगे बढ़ना चाहता हूँ।" "मैं डर रही हूँ..." उनकी आँखें नम थीं। मैंने उन्हें सीने से लगाया। "मैं हूँ ना।" मेरे हाथ उनकी पीठ पर घूम रहे थे, फिर धीरे से नीचे की ओर सरक गए। जब मैंने उनकी साड़ी के ऊपर से ही कमर को सहलाया, तो वह काँप उठीं। "आपकी कमर बहुत नरम है," मैंने फुसफुसाते हुए कहा। "हर्ष... प्लीज़... आज के लिए बस इतना ही..." मैंने रुककर उनका चेहरा देखा। "कल?" वह शरमा गईं और नीचे देखने लगीं। "कल... देखेंगे..." हफ्ता बीतता गया और हमारी मुलाकातें जारी रहीं। हर बार हम थोड़ा और करीब आते। एक शाम, जब बारिश तेज़ हो रही थी, मैं फिर से भीगा हुआ पहुँचा। वह गुलाबी रंग की साड़ी में थीं। "आ गए?" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। उनकी आँखों में अजीब सी चमक थी। मैंने उनका हाथ पकड़ा। "आपकी याद आ रही थी पूरी रात।" वह कुछ नहीं बोलीं। बस मेरी ओर देखती रहीं। मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में भरा और होंठों पर चुंबन कर दिया। इस बार वह पूरी तरह से जवाब देने लगीं, कोई हिचकिचाहट नहीं थी। मैंने उन्हें सोफे पर लिटाया और उनके ऊपर झुक गया। मेरे होंठ उनके होंठों से होते हुए गर्दन पर आए, फिर कंधे पर, फिर उनकी बाहों पर। "आपके जिस्म की खुशबू बहुत अच्छी है," मैंने कहा। मैंने उनकी साड़ी का पल्लू पूरी तरह खींच लिया। अब उनके कंधे और ब्लाउज का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था। "हर्ष... हम..." वह रुक गईं। "हाँ?" मैंने उनके ब्लाउज के ऊपर से ही उनके स्तनों को छुआ। "हम... आगे बढ़ सकते हैं... लेकिन धीरे-धीरे..." मैंने उनकी आँखों में देखा। "मैं आपकी रफ़्तार से चलूँगा।" मैंने उनके ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए। एक... दो... तीन... ब्लाउज खुल गया। अंदर क्रीम रंग की ब्रा थी। मैंने ब्रा को ऊपर किया। उनके गोल स्तन बाहर आ गए। निप्पल गहरे भूरे रंग के, खड़े हुए थे। "आप बहुत खूबसूरत हैं," मैंने कहा और एक निप्पल को मुँह में ले लिया। "ओह... हर्ष... वहाँ..." वह सिसक उठीं। मैंने चूसना शुरू किया, हल्के-हल्के दांतों से काटा, फिर जीभ से सहलाया। दूसरे हाथ से दूसरे स्तन को दबा रहा था। "बहुत अच्छा लग रहा है..." वह आँखें बंद करके बड़बड़ा रही थीं। मैंने नीचे की ओर चुंबन देना शुरू किया। उनके सीने के बीच से होता हुआ, पेट पर आया। उनके पेट पर हल्की सी चर्बी थी, मैंने उसे चूमा। "यहाँ भी बहुत प्यारा है," मैंने कहा। मैंने उनकी साड़ी का नाड़ा खोला। साड़ी फैल गई। फिर पेटीकोट की डोरी खोली। "हर्ष... मैं शर्मा रही हूँ..." वह अपने हाथों से चेहरा ढकने लगीं। "मत देखिए मुझे... बस महसूस कीजिए," मैंने उनके हाथ हटाए। मैंने उनकी पेटीकोट नीचे खींची। अब वह सिर्फ ब्रा और पैंटी में थीं। मैंने उनके पैरों के बीच में आकर उनकी जाँघों पर चुंबन दिए। "आपके पैर बहुत सुंदर हैं," मैंने कहा। जाँघों के ऊपरी हिस्से पर चुंबन देते हुए, मैं धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ा। उनकी त्वचा काँप रही थी। "हर्ष... वहाँ मत... बहुत पास हो रहे हो..." वह शरमा रही थीं। "मैं वहीं जाना चाहता हूँ जहाँ आपकी सबसे ज़्यादा खुशी है," मैंने उनकी पैंटी के ऊपर से चूमा। वह उछल पड़ीं। "ओह गॉड... प्लीज़..." "मैडम जी... अब मैं आपको पूरा महसूस करना चाहता हूँ... अंदर..." मैंने धीरे से कहा। वह मेरे सीने पर सिर रखते हुए बोलीं, "हर्ष... अभी नहीं... हमें थोड़ा वक्त देना चाहिए... यह सब बहुत जल्दी हो रहा है..." "लेकिन मैं तो..." मैंने उनके चेहरे को उठाया। "मैं जानती हूँ तुम क्या चाहते हो... और मैं भी चाहती हूँ... लेकिन अगले हफ्ते... जब मैं पूरी तरह तैयार हो जाऊँ... आज यहीं रुकते हैं..." मैंने उनके होंठों पर चुंबन किया। "ठीक है... जैसी आपकी मर्जी... लेकिन मैं कल भी आऊँगा।" "कल नहीं... परसों... और तब भी सिर्फ़ इतना ही... जब तक मैं खुद न कहूँ..." मैंने उनके बालों को सहलाया। "मैं इंतज़ार करूँगा... लेकिन याद रखिए... मैं आपको पूरा अपना बनाना चाहता हूँ... हर तरह से..." वह शरमा गईं और मेरे सीने में मुँह छुपा लिया। "मैं भी... बस थोड़ा वक्त दो..." वह रात हम दोनों के लिए नई शुरुआत थी। हमने वादा किया कि पहले हफ्ते में सिर्फ़ ऐसे ही एक-दूसरे को छूएँगे, लेकिन असली मिलन अगले हफ्ते होगा... जब नेहा मैडम पूरी तरह तैयार होंगी। पूरा हफ्ता मैंने कुछ नहीं सोचा सिवाय नेहा मैडम के। मेरे शरीर में आग लगी रहती थी। हर रात मैं उन्हें याद करके अपना हाथ अपने औज़ार पर फेरता, लेकिन वो मज़ा नहीं आता था जो उनके मुँह में था। ठीक एक हफ्ते बाद मैं उनके दरवाज़े पर खड़ा था। शाम के पाँच बजे, लेकिन मेरे दिल की धड़कन ऐसे चल रही थी जैसे मैं पहली बार मिलने आ रहा हूँ। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। नेहा मैडम ने दरवाज़ा खोला। मेरी साँसें थम गईं। उन्होंने गहरे लाल रंग की साड़ी पहनी थी — बनारसी सिल्क। उनके बाल खुले थे, गीले भी थोड़े, इतर की खुशबू आ रही थी। उनकी आँखों में वो चमक थी जो पहले नहीं थी। "आ गए?" उन्होंने पूछा, आवाज़ में हल्की सी कँपकँपी थी। "जी मैडम जी... आप... आप आज बहुत खूबसूरत लग रही हैं," मैंने अंदर आते हुए कहा। इस बार उन्होंने दरवाज़ा बंद किया और चाबी भी लगा दी। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। "हफ्ता कैसा रहा?" उन्होंने पूछा, पीठ मेरे सीने से लगाते हुए। "बहुत लंबा... बहुत कठिन..." मैंने उनकी कमर पकड़ ली। वह मुड़ीं। उनके होंठ मेरे होंठों से इंच भर दूर थे। "मैंने भी बहुत सोचा... रोज़ सोचा... तुम्हें..." "क्या सोचा मैडम जी?" मैंने उनकी गर्दन पर होंठ रख दिए। "ये सोचा कि मैं... मैं तैयार हूँ... पूरी तरह..." मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में भरा। "पक्का? कोई जल्दबाज़ी नहीं है..." "नहीं... अब और इंतज़ार नहीं होता... मैंने पूरे हफ्ते अपने आपको तैयार किया... मैं चाहती हूँ तुम्हें... पूरा..." मैंने उन्हें गोद में उठाया। वह हल्की सी चीखीं, फिर मेरे गले से लिपट गईं। मैं उन्हें बेडरूम में ले गया। वहाँ पर सफ़ेद चादरें बिछी थीं, कमरे में इतर की खुशबू थी। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। वह पीठ के बल लेटी थीं, साँसें तेज़ चल रही थीं। मैं उनके ऊपर झुका और होंठों पर चुंबन किया — गहरा, प्यार भरा चुंबन। "आज मैं आपको पूरी तरह अपना बनाऊँगा," मैंने फुसफुसाते हुए कहा। "हाँ... प्लीज़... धीरे से... मैं थोड़ी घबरा रही हूँ... इतने बड़े औज़ार से..." "डरो मत... मैं आपको दर्द नहीं दूँगा... सिर्फ़ खुशी..." मैंने उनकी साड़ी का पल्लू खींचा। बनारसी सिल्क फिसलती हुई उतर गई। फिर मैंने नाड़ा खोला और साड़ी पूरी उतार दी। वह पेटीकोट और ब्लाउज में थीं। मैंने उनके पैरों पर चुंबन किया — पहले टखनों पर, फिर घुटनों पर, फिर जाँघों पर। वह काँप रही थीं। "हर्ष... प्लीज़... जल्दी करो... मैं रुक नहीं पा रही..." "सब्र रखो मैडम जी... आज रात लंबी है..." मैंने उनकी पेटीकोट उतारी। अंदर गोल्डन रंग की पैंटी थी। मैंने उसे भी नीचे खींचा। वह पूरी तरह नंगी नीचे से थीं, ऊपर ब्लाउज और ब्रा में। मैंने उनकी जाँघों के बीच में जगह देखी। काले बाल, गीली योनि — पिछले हफ्ते की तरह ही, लेकिन आज और भी ज़्यादा गीली। मैंने जीभ लगाई। वह उछल पड़ीं। "ओह गॉड... हाँ... वहीं..." मैंने उन्हें चाटना शुरू किया — क्लाइटोरिस को चूसा, जीभ से छेद में डाली, फिर ऊपर-नीचे किया। उनकी कमर उठने लगी। "मैं झड़ने वाली हूँ... प्लीज़ रुको मत..." मैंने और तेज़ किया। कुछ ही देर में वह झड़ गईं — उनकी योनि ने मेरी जीभ को कसकर पकड़ा और फुरफुराने लगी। वह चीखीं, मेरे सिर को अपनी योनि पर दबाए रखा। जब वह शांत हुईं, मैंने अपने कपड़े उतारे। मेरा औज़र पूरी तरह खड़ा था — 7 इंच लंबा, 2.5 इंच मोटा, नसों से भरा हुआ। नेहा मैडम ने उसे देखा और निगल लीं। "यह... यह सच में बहुत बड़ा है..." मैंने उनके पास लेटा और उनके हाथ को अपने औज़ार पर रखा। "छुओ इसे... महसूस करो... यह आपके लिए तैयार है।" उन्होंने हाथ से सहलाया, फिर मुँह में लेने लगीं। कुछ देर चूसने के बाद मैंने उन्हें रोका। "अब नहीं... अब मैं आपके अंदर जाना चाहता हूँ..." वह पीठ के बल लेट गईं। मैंने उनके पैर फैलाए। उनकी योनि गीली और थोड़ी खुली हुई थी, लेकिन फिर भी मेरे मोटे औज़ार के लिए तंग थी। मैंने औज़र का सिरा उनके छेद पर रखा। "तैयार हो?" "हाँ... धीरे से... प्लीज़..." मैंने धीरे से धक्का दिया। सिरा अंदर गया। वह कराह उठीं। "दर्द हो रहा है?" "थोड़ा... और अंदर करो... धीरे-धीरे..." मैंने थोड़ा और अंदर किया — आधा औज़र। वह साँसें फूलने लगीं, हाथों से चादर पकड़ ली। "बहुत मोटा है... लग रहा है फट जाऊँगी..." "नहीं फटोगी... आप बहुत गीली हो... अब आराम से लूँगा..." मैंने रुका और उनके स्तनों को चूमने लगा। जब वह थोड़ी ढीली हुईं, मैंने एक ज़ोरदार धक्का दिया और पूरा 7 इंच अंदर कर दिया। "आह्ह्ह... ओह गॉड... हर्ष... यह बहुत अंदर चला गया..." वह रोने लगीं, खुशी और दर्द से। मैंने उनके होंठों पर चुंबन किया और धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। पहले धीरे-धीरे, फिर गति बढ़ाता गया। "कैसा लग रहा है मैडम जी? अब दर्द कम है?" "दर्द... दर्द बदल गया है... अब बस मज़ा आ रहा है... और तेज़ करो... प्लीज़..." मैंने गति बढ़ा दी। बिस्तर की चरपराहट और हमारी साँसें मिलकर एक अजीब सा संगीत बना रही थीं। मैं उनकी गर्दन पर चुंबन कर रहा था, कानों में फुसफुसा रहा था — "आप बहुत अच्छी हो... मैं आपसे प्यार करने लगा हूँ..." "मैं भी... ओह हाँ... वहीं... बस वहीं..." मैंने उनके पैर अपने कंधों पर रखे और और गहरा धक्का लगाया। मेरा औज़र उनके गर्भाशय के मुँह से टकरा रहा था। "मैं फिर से झड़ने वाली हूँ... इस बार बहुत ज़ोर से... तुम भी... मेरे साथ... प्लीज़..." "हाँ... मैं भी... तैयार हो जाओ..." मैंने और तेज़ धक्के लगाने शुरू किए। उनकी योनि ने मेरे औज़र को कसकर पकड़ लिया — वह झड़ गईं, शरीर तन कर सिकुड़ा, पैरों ने मेरी कमर कसकर पकड़ी। और मैं भी उनके अंदर ही झड़ गया। मेरा वीर्य उनकी योनि में भर गया, गर्म-गर्म। हम दोनों एक साथ काँपते रहे, एक-दूसरे से लिपटे हुए। जब हम शांत हुए, मैंने अपना औज़र बाहर निकाला। उनकी योनि से मेरा वीर्य और उनका रस बह रहा था। बिस्तर पर एक गीला धब्बा बन गया। नेहा मैडम ने मुझे सीने से लगाया। "शुक्रिया... मैंने कभी सोचा नहीं था कि... यह इतना खूबसूरत हो सकता है..." "यह तो सिर्फ़ शुरुआत है," मैंने उनके बालों को सहलाते हुए कहा। "आज रात अभी बाकी है... और पूरी ज़िंदगी..." हम उलझे हुए थे एक-दूसरे में, जैसे समय थम गया हो। लगभग एक घंटे बाद, जब हमारी साँसें थोड़ी शांत हुईं, तो नेहा उठीं और मेरा हाथ पकड़कर मुझे बाथरूम की ओर ले गईं। शायद आधी रात हो गई थी, कमरे में सिर्फ बाहर से आती सड़क की रोशनी थी। "नहा लो," उन्होंने कहा और शावर चालू किया। गर्म पानी की बौछार में हम फिर से एक-दूसरे को छूने लगे। मैंने उनकी पीठ पर साबुन लगाया, धीरे-धीरे उनकी कमर से होते हुए उनकी जाँघों तक गया। वह कांप गईं जब मेरे हाथ उनके अंदरूनी हिस्सों को छुए। "हर्ष, मुझे लगता है मैं फिर से... तुम्हें चाहती हूँ," वह शरमा कर मेरे कान में फुसफुसाईं। "अभी?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा। "कहीं भी... बस तुम चाहिए," वहने मेरे औज़र को पकड़ लिया जो फिर से खड़ा हो रहा था। इस बार हमने खड़े होकर किया। मैंने उनका एक पैर उठाया और बाथरूम के दरवाज़े पर टिका दिया। पीछे से मैं उनके अंदर घुसा। गीले शरीर, भाप और पानी की बौछार में हम फिर से एक हो गए। उनकी पीठ मेरे सीने से सटी थी, और मैं उनके स्तनों को सहला रहा था। "यहाँ... बहुत गहरा है... तुम मुझे पूरा भर रहे हो," वह दीवार से सटकर कराह रही थीं। पानी की आवाज़ में हमारी साँसें मिल रही थीं। मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए, हर बार जब मैं अंदर जाता तो वह सिसक उठतीं। हम लगभग पंद्रह मिनट तक इसी तरह एक-दूसरे में खोए रहे, फिर जब वह झड़ने लगीं तो मैंने उन्हें कसकर पकड़ लिया और खुद भी उनके साथ छोड़ दिया। हम दोनों की गर्मी पानी में मिलकर बह गई। नहाने के बाद हम वापस बिस्तर पर आए। इस बार कोई कपड़े नहीं थे, कोई बाधा नहीं थी। हम एक-दूसरे के बिना कपड़ों के शरीरों को महसूस करते रहे। वह मेरे सीने पर सिर रखे लेटी थीं, मेरी उँगलियाँ उनके बालों में फंसी हुई थीं। "कभी सोचा नहीं था कि रात इतनी लंबी हो सकती है," नेहा ने धीमी आवाज़ में कहा। "तुम्हारे साथ तो वक़्त रुक जाता है," मैंने उनके माथे पर चूमा। कुछ देर बाद, जब बाहर का अंधेरा हल्का पड़ने लगा और सड़क पर सुबह की पहली गाड़ियों की आवाज़ आने लगी, तो नेहा की आँखें खुलीं। वह मुझे देख रही थीं, जैसे पहली बार देख रही हों। "सुबह हो गई," उन्होंने कहा, उनकी उँगलियाँ अभी भी मेरे सीने पर चल रही थीं। "तो?" मैंने उन्हें कसकर पकड़ लिया। "तो तुम्हें जाना चाहिए... पड़ोसी जाग जाते हैं," उन्होंने चिंता से कहा, लेकिन उनका शरीर मुझे छोड़ने को तैयार नहीं था। "मैं नहीं जाना चाहता," मैंने उनके होंठ चूमे। "प्लीज़... अगले हफ्ते फिर आना... लेकिन अब जाओ..." मैंने धीरे से अपने कपड़े उठाए। वह चादर में लिपटी खड़ी रहीं, मुझे देखती रहीं। उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी थी। दरवाज़े पर, मैंने मुड़कर देखा। वह हाथ हिला रही थीं। "मैं तुमसे प्यार करती हूँ हर्ष," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। "मैं भी... हमेशा," मैंने जवाब दिया। और मैं उनके घर से निकला, जानते हुए कि यह शुरुआत थी... एक ऐसे रिश्ते की जो हमें पूरी तरह बदल देगा। बाहर सुबह की हवा में ओस की खुशबू थी, और मेरे शरीर में अभी भी उनकी गर्मी बची हुई थी।

मित्रो.. नमस्कार.. मैं अंकित .. हरियाणा से हूँ.. मेरी उम्र 24 वर्ष..
यह मेरी पहली कहानी है जो मैं अन्तर्वासना पर लिख रहा हूँ। ये दरअसल मेरी जिन्दगी की एक सत्य घटना पर आधारित कहानी है।

इस घटना में मेरे साथ स्नेहा जोकि 32 साल की है.. जो उसने बताई थी, इस कहानी में नाम बदले हुए हैं।

यह 28 मई 2013 की बात है.. मैं शाम को चैटिंग कर रहा था.. तो एक औरत ऑनलाइन मिली.. उसके साथ चैटिंग शुरू हो गई। उसने अपना नाम स्नेहा बताया साथ ही उसने मुझे वेबकैम चालू करने को कहा.. मैंने अपना कैम ओपन किया और उससे भी कहा तो उसने भी अपना कैम ओपन कर दिया।

जब मैं उसे देखा.. मैं खिल उठा.. क्या मस्त माल थी.. सुपर हॉट.. एकदम बोल्ड.. बड़े-बड़े और एकदम गोरे मम्मे.. खुद दबा रही थी.. उसने सूट पहना हुआ था।

मैंने कहा- खोलो तो..

उसने मुझसे बोला- तुम भी अपना ‘टूल’ दिखाओ।

मैंने कहा- अभी तो मैं परिवार के बीच हूँ रात में सब दिखा दूँगा।

वो बोली- थोड़ी झलक तो दिखा..

मैं कमरे में अकेला था.. मैंने दरवाजा बंद किया और 2 मिनट तक अपना सामान दिखाया।

इतने में वो बोली- क्या तुम लुधियाना आ सकते हो??

मैंने कहा- अगर आप बुलाओगी.. तो क्यों नहीं..

बोली- ठीक है.. कल आ जाओ..

मैंने कहा- इतनी जल्दी ? मैं कल तो नहीं आ सकता..।

उसने कहा- मैं यहाँ पर कल तक ही हूँ.. उसके बाद दो महीने तक बाहर हूँ.. फिर बाद में ही मिल सकेंगे..

मैंने सोचा साला कोई लड़का होगा मुझे वेबकैम पर कोई ट्रिक करके पागल बना रहा होगा..

मैंने मोबाइल नंबर माँगा तो कहती हैं कल आ जाओ.. फिर वहीं देती हूँ।

मैंने कहा- ये भी कोई बात हुई?

फिर उसने कहा- तुम अपना नम्बर दो.. मैं फोन करती हूँ.. और तुम मुझे फोन मत करना..

मैंने कहा- ठीक है..

उसका फोन आया तो.. ओह.. क्या सुरीली स्वीट आवाज थी उसकी- हाय.. कैसे हो अंकित ?

मैंने कहा- वाह.. आपकी आवाज तो बड़ी प्यारी है.. मैं ठीक हूँ.. आप बताओ..

बोली- बस.. तुम कल आ जाओ..

मैंने कहा- यार कुछ समय तो दो मुझे..

अगले दिन ऑफिस में जरूरी काम था।

मैंने कहा- रात में मिलते हैं फिर बात करेंगे और आने के लिए कुछ करता हूँ।

इस तरह फोन पर कुल 2 से 3 मिनट बात हुई.. फिर चैटिंग पर आ गए।

वो बार-बार यही कहती रही- मुझे जाना है.. रात में 10 बजे मिलते हैं।

फिर मैं ऑफिस की प्लानिंग करने लगा.. रात 9 बजे तक फोन करता रहा.. तब जा कर बड़ी मुश्किल से कहीं बात बनी।
फिर रात में मैं ऑनलाइन आ गया और इन्तजार करने लगा। दस मिनट में वो भी आ गई।

फिर मैंने उसके बारे में मालूम किया.. वो शादीशुदा थी.. मैंने पति और बच्चों के बारे में पूछा तो बोली- नो पर्सनल..
मैं चुप हो गया। फिर वेबकैम चालू हो गए.. धीरे-धीरे हम नंगे होते चले गए.. बात चलती रही। उसने अपनी चूत और मम्मे साफ-साफ़ दिखाए।

मैंने भी कैपरी और चड्डी उतार दी। उस हसीन जवानी को देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया.. मेरा 7 इंच लंबा और 3 इंच मोटा लवड़ा पूरा टाइट हो गया था।

वो भी बोली- हाय.. बहुत मोटा है आपका..

अब मिलने का प्लान चलता रहा.. उसने बोला- कल बस स्टैंड पर 11 बजे तक मिल जाना.. मैं 1-2 घंटे के लिए ही मिलूँगी।

फिर प्लान तय हुआ कि होटल में मिलेंगे।

उसने कहा- तुम मुझे फोन मत करना.. मैं तुम्हें 9 बजे खुद फोन करूँगी..

अब उसके साथ 1 से 1.30 घंटे चैटिंग के बाद 12 के करीब मैं सो गया। सुबह 7 बजे घर से निकला और बस पकड़ कर अम्बाला पहुँचा.. उधर से शान-ए-पंजाब ट्रेन पकड़ी।

उसका लुधियाना में मिलने का 12 बजे का टाइम था.. इतने में उसका फोन का इन्तजार करते हुए कॉल भी आ गया।

“कहाँ हो.. कैसे हो… ये मेरा नंबर चालू रहेगा… इस पर फोन कर लेना।

फिर 40-45 मिनट पहले ही फोन चालू हो गए- कहाँ पहुँचे.. कब तक आ रहे हो..

मैं 12.15 पर पहुँच गया.. मैंने फोन किया- आप कहाँ हो?

बोली- मुझे स्टेशन दूर पड़ेगा.. आप बस स्टैंड आ जाओ.. वहाँ एक ढाबा है.. बहुत बड़ा बोर्ड लगा हुआ है..

उसने पता बताया और मैं पहुँच गया.. फोन किया तो बोली- इधर ये गली है.. वहाँ आ जाओ।

मुझे गली नहीं मिली.. आगे रोड पर गया तो एक गाड़ी पास आकर रुकी.. वो पीछे गॉगल्स लगा कर बैठी हुई थी.. क्या कयामत लग रही थी यार.. पूछो मत..
उसने गाड़ी का दरवाजा खोला.. मैं अन्दर बैठ गया।

हैलो.. हाउ आर यू.. चलता रहा.. आगे गाड़ी को ड्राइवर चला रहा था।

उसकी जवानी की क्या तारीफ करूँ.. 34-30-36 का फिगर.. दूध सी गोरी जवानी.. चुस्त जीन्स और गुलाबी रंग का टॉप पहना हुआ था।

मेरी आँखों में चमक और मुँह में पानी आ गया.. मैंने मुश्किल से सब्र किया.. ड्राईवर जो साथ था।

फिर बात शुरू हुई तो बोली- कहाँ चलना है?

मैंने कहा- होटल..

तो बोली- मैं इस तरह होटल कभी नहीं गई।

मैंने भी यही कहा.. फिर मैं एक होटल में गया। उधर पूछा एसी रूम का क्या लेते हैं तो मालूम हुआ 1500 का है।
अभी बात कर ही रहा था कि इतने में उसका फोन आ गया, बोली- कमरा बुक मत करना.. यूँ ही पूछ लो बस..

फिर मैं आ गया.. वो बोली- और कहीं चलते हैं..

मैंने कहा- हाँ.. सिटी के बाहर ही ठीक रहेगा।

तो गाड़ी आगे ले ली.. फिर उससे बात होने लगी।

‘पहले कभी किया है आपने?’

मैंने धीरे से कहा- हाँ..

फिर वो बोली- ये ड्राइवर नहीं.. मेरे पति हैं..

मैं एकदम से सकते में आ गया.. मैंने कहा- झूठ??

तो बोली- कसम से..

मैं अवाक था।

फिर आगे चल कर उसके पति ने ही एक होटल बुक किया।

उसने कहा- पति के साथ एडजस्ट कर लोगे ना.. वो भी कमरे में ही रहेंगे?

मैंने कहा- ओके..

हम लोग कमरे में गए। उसका पति बोला- मैं बाथरूम में जाता हूँ.. आप लोग कर लो..

मैंने पीने का पानी मँगवाया.. गर्मी बहुत थी.. मैंने पानी पिया.. उसने मना कर दिया।

मैं मूड में आ गया वो बिस्तर पर बैठी थी मैंने कपड़े उतारे.. बस चड्डी नहीं उतारी। फिर उसे अपनी बाँहों में ले लिया- आ जाओ जान..

उसे बिस्तर पर गिरा दिया.. उसके रसभरे होंठों को ज़ोर से चूसने लगा।

वो भी मेरे होंठों को जी भर के चूस रही थी।

फिर मैंने उसका टॉप उतारा.. और मैं चूंकि लेटा हुआ था.. सो पीछे से ब्रा का हुक खोल दिया.. फिर उसको बाँहों में ले लिया।

मैं उसे ज़ोरों से चूमता-चूसता रहा.. उसके मम्मे यम्मी थे.. स्वीट सेक्सी निप्पल चूसे.. बोली- दर्द होता है..

फिर हम दोनों एक-दूजे के जिस्मों से खेलते रहे और पति बाथरूम से आकर पलंग के दूसरी ओर मुँह करके बैठ गया था।

फिर मैंने कहा- जान.. जीन्स तो उतारो..

उसने कहा- लो खोल लो।

मैंने उसकी जीन्स उतारी… क्या नरम-नरम कमर और टाँगें थीं.. नीचे उसकी पैन्टी वो भी गजब की थी.. भूरे रंग की.. फिर मैं उसके होंठ.. गला.. मम्मे.. नाभि… पेट चूसते-चूसते चूत पर आया तो उसकी हसीन मखमली चूत को चुम्बन किया.. उसको खूब चूमा-चाटा.. वो भी मस्ती से मचलने लगी।

फिर तो जितना चूमता था उतनी और प्यास लगने लगती थी। बड़ी ही मीठी महक थी.. नरम साफ चिकनी खूबसूरत चूत थी.. चूसने का और ज़ोर का मन हुआ और ज़ोर से चूसता गया।

वो ‘अहहा.. आहह.. आहह..’ की सिसकारियां लेती रही। फिर उसने एकदम से मेरे बाल पकड़ कर मेरा सर चूत के ऊपर दबा दिया और बोली- और ज़ोर से चूस… ज़ोर से चूस… अहहह..

उसकी चूत का स्वाद इतना मस्त.. जिंदगी भर ना भूलूँ.. हल्का सा नमकीन.. मस्त गीली चूत.. गर्म इतनी जितना जलता हुआ कोयला.. बस मैं भी चूसता जा रहा था। इस बीच मैंने चड्डी उतारी और लंड निकाल कर उसके मुँह में लगा दिया.. वो कामातुर होकर चूसने लगी…
उसे चूसने नहीं आता था.. फिर मैंने ही उसका मुँह पकड़ कर धक्के लगाए। इतने में मैं उसके मुँह में लंड डाले हुए ही उसके पेट के ऊपर से चूत पर पहुँच गया और चूत चूसने लगा।

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उसका पति भी नंगा हो गया और मेरे कान में कहने लगा- मैं मर्द नहीं हूँ.. तुम आज इसकी चूत चोद डालो..

मैंने कहा- ठीक है..

फिर वो अपनी बीवी से कहने लगा- आज जी भर कर चुदवा ले..

हम लंड-चूत चूसते रहे चूचियों से खेलते रहे.. इस हसीन जन्नत में बहुत मजा आ रहा था। फिर मैं उसे स्मूच करने लगा.. तो बोली- तुम्हें नहीं आता.. मैं सिखाती हूँ..

फिर तो वो मेरे ऊपर आ गई और मेरी बाजू पकड़ लीं.. मेरी दोनों टांगों में अपनी दोनों टांगों कर जोरों से बाँध लीं।

उसने मुझे इस कदर जकड़ लिया था कि मैं हिल भी नहीं सकता था।

फिर वो मेरे होंठों के किनारों पर धीरे-धीरे अपनी जीभ फिराती हुई चूम रही थी.. मैं अपने मुँह से उसकी जीभ पकड़ने की कोशिश करता तो सर ऊपर कर लेती।
मुझे बहुत सनसनी हो रही थी.. ऐसा लग रहा था.. जैसे वो मेरा देह शोषण कर रही हो। इस चुदाई के सबसे हसीन पल यही लगे थे मुझे।

इसके बाद वो मेरा लंड पकड़ कर मुझे चोदने लगी। फिर पोज़ बदल कर मैंने उसे लिटा कर उसकी गीली चूत चूसने लगा और उसके पति ने अपना नामर्द लंड उसके मुँह में डाल दिया।

फिर मैंने अपना लंड पकड़ कर उसकी गरम चूत में डाल दिया और ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने लगा।

बोलती है- और ज़ोर से चोद.. और ज़ोर के धक्के मार.. अहहा.. उउहह..

उसे पकड़ कर चोदने में बहुत मज़ा आ रहा था। दस मिनट तक चोदने के बाद वो अकड़ गई और झड़ गई उसके पानी की गर्मी से मेरा भी निकलने का था।

फिर मैंने लंड निकाल कर उसके मुँह पर पर पिचकारी मारी.. उसने मुँह साइड में किया तो उसके मम्मों पर माल की पिचकारी दे मारी।

फिर पूछा- चूसोगी?

उसने सिर हिला कर मना कर दिया- नहीं..

इतने में वो मुस्करा रही थी.. क्या क्यूट लग रही थी.. और माल उसके मम्मों पर और चेहरे पर खूबसूरती बढ़ा रहा था।
इसके बाद उसके पति ने चोदा.. वो तो 2 से 3 मिनट में धक्के मार कर गिर गया। फिर हमें होटल में डर भी लग रहा था.. इस दौरान 2 घंटे तक हमने चुदाई के खूब मजे किए।

उसके बाद मैंने पूछा- मज़ा आया?

तो बोली- हाँ बहुत ज़्यादा.. तुम चूसते बहुत मस्त हो।

हम सबने कपड़े पहने और निकल गए।

उसने मुझे 2000 दिए.. बोली- रख लो कोई बात नहीं।

मैंने मना किया.. पर उसके प्यार के आगे मना नहीं कर सका।

बोली- अपने लिए कोई गिफ्ट खरीद लेना।

वो पैसे मैंने आज भी संभाल कर रखे हुए हैं।

फिर बोली- आज रात को वेबकैम पर ज़रूर मिलना..

मैंने इन्तजार किया.. पर वो नहीं मिली। मैंने एक-दो बार फोन भी किया तो अटेंड नहीं किया और मैसेज से जबाव दिया- मैं कॉल करूँगी।

उसका आज तक कोई फोन नहीं आया! मुझसे कहा था कि वो 6 से 7 हफ्ते के लिये वो बाहर जा रही है और मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं जानता। पता नहीं शायद मेरे नसीब में उससे मिलना था।
उस दिन को कभी नहीं भुला सकता.. उसी हफ्ते मुझे एक कपल से मिलने दिल्ली जाना था.. पर मैं नहीं गया। एक सच्चे प्यार का सा एहसास था वो.. मैं उसे बहुत याद करता हूँ।

मुझे इसके बाद कई कपल और औरत तो मिलीं.. पर उसके जैसी आज तक नहीं मिली।

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