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नमस्कार मेरे प्यारे पाठको ! Hindi Sex Stories

मैं एक बार फ़िर से हाज़िर हूं अपनी Hindi Sex Storiesकहानी का अगला भाग लेकर। आपने मेरी पिछली कहानियाँ
टीचर्स डे और ऐन्नुअल डे
तो पढ़ी होंगी। आप वरुण और मुझ से तो वाकिफ़ ही होंगे। यह कहानी ठीक वहीं से शुरू है जहां ‘ऐन्नुअल डे’ खत्म हुई थी।

सभी कहानियों में यह कहानी मेरे दिल के सबसे करीब है। कई बार इस कहानी को लिखते वक्त मुझे शब्दों की कमी महसूस हुई, अपने मन के भावों को शब्दों में ढालना सचमुच एक कठिन कार्य है, फ़िर भी मैंने अपनी पूरी कोशिश की है।

अगर आपका प्यार इसी तरह बना रहा तो मैं अन्तर्वासना के माध्यम से आपको अपनी कहानी के अगले भाग भी पहुंचाती रहूंगी।

उस दिन बस में वरुण के मुंह से इतनी सीरियस बातें सुनने के बाद मैं उससे अपने दिल की बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई और मैंने सोच लिया कि अपने मन की बात उसे कभी नहीं बताऊंगी, क्योंकि मैं वरुण को किसी भी रूप में खोना नहीं चाहती थी। उसके साथ के लिए अगर मुझे उसकी दोस्ती निभानी पड़ती है तो वही सही।

इसीलिए मैंने अपने दिल के अरमान अपने होठों तक कभी ना पहुंचने देने का तय किया, पर नज़रें हमेशा दिल का साथ देती हैं…दिमाग और जुबान चाहे कितनी भी कोशिश करके खुद को जताने से रोक लें… पर दिल की बात कहने के लिए सिर्फ़ एक नज़र ही काफ़ी होती है।

उस दिन शाम को हम होटल पहुंचे। जयपुर वाली ब्रांच ने दो कमरे बुक करा रखे थे, एक बिना ऐ सी डबल बेडरूम दो विद्यार्थियों के लिए और एक ऐ सी सिंगल बेडरूम हमारे अध्यापक के लिए।

सर ने वरुण से कहा- मैं बेड शिफ़्ट करवा देता हूं, तुम मेरे कमरे में मेरे साथ सो जाना और कृति वहां आराम से सो जाएगी। सर को मुझ पर और वरुण पर भरोसा नहीं था और हो भी क्यों??? कच्ची उमर में ही ऐसी गलतियाँहोती हैं, पर वरुण ने सर को भरोसा दिलाते हुए कहा,’आप जैसा सोच रहे हैं, वैसा कभी नहीं होगा, मुझे अपनी मर्यादा और समाज के बंधनों का पूरा ख्याल है, मुझे आपके साथ सोने में कोई दिक्कत नहीं है अगर आपका कमरा भी बिना ऐ सी हो तो। मुझे ऐ सी से अलर्ज़ी है, ऐ सी की हवा में मेरे सर में तेज़ दर्द हो जाता है।’

उसकी वाजिब परेशानी सुनकर सर मान गए और सर और हम अपने अपने बैग लेकर अपने कमरे में चले गए। सर के कमरे का तो पता नहीं पर हमारा कमरा काफ़ी अच्छा था। वहां कमरे के बीचों बीच दो बिस्तर लगे थे। दोनो के बीच का फ़ासला करीबन चार फ़ीट रहा होगा।

जिसपे क्रीम कलर की बेडशीट थी उसपे एक ओढ़ने के लिए कम्बल और एक चादर थी .. अटैच्ड बाथरूम था कमरे में घुसते ही सबसे पहले सामने की तरफ़ एक खिड़की थी, जिस के उस तरफ़ एक खूबसूरत बागीचा था। उस खिड़की पर जाली वाले परदे लगे थे और दरवाजा सरकाने वाला था वहीँ खिड़की के बायीं तरफ़ एक टेबल रखी थी जिस पर एक रूम सर्विस के लिए फोन, इंटर कॉम नम्बर की लिस्ट, एक पानी का जग और दो गिलास पड़े थे।
टेबल के ठीक बायीं तरफ़ कुछ दूरी पे एक टेबल और थी जिस पर टीवी रखा था (पर उसपे सिर्फ़ न्यूज़ चैनल ही आते थे ) टीवी की टेबल के निचले हिस्से में एक कपबोर्ड था, उसमें उस दिन का न्यूज़ पेपर था हिन्दी और इंग्लिश दोनों और एक स्पोर्ट्स मैगजीन थी.

टीवी से दोनों बिस्तर की दूरी एक बराबर थी. दोनों बिस्तर के बीच में एक और साइड टेबल रखी थी जिसपे एक लैंप रखा था जिसके दो स्विच कनेक्शन दोनों बिस्तर की तरफ़ थे. वरुण मेरे से आगे चल रहा था इसीलिए कमरे में भी पहले वोही घुसा था और उसने घुसने के साथ ही खिड़की के पास वाले बिस्तर पर अपना बैग पटक दिया और राक्केट पास वाली मेज़ पर रख दिया.

मेरे पास और कोई चोइस न थी इसीलिए मैंने अपना सामान दूसरे बिस्तर पर रख दिया .. और बाथ रूम देखने चली गई .. बाथ -रूम कमरे के मुकाबले बेहद सुंदर था .. व्हाइट टाईल्स, व्हाइट कमोड, व्हाइट वाश बेसिन, सुंदर सजावटी शीशा .. के साथ सभी टोंटियाँसिल्वर कलर की थी। वहाँ हस्त फव्वारा भी था और सीलिंग फव्वारा भी .. सलैब पर दो व्हाइट टोवेल्स रखे थे साथ में साबुन, शैंपू, कंघा.

खैर मैं वापिस कमरे में आई .. वरुण ने कमेन्ट किया .. अन्दर जाके सो गई थी क्या .. इत्ती देर लगा दी .. कभी किसी होटल में नहीं गई हो क्या .. ऐसे देख रही हो जैसे कभी देखा न हो…

मैंने उसे कहा .. तुम्हे देखूं तो तुम्हे दिक्कत है, होटल को देखूं तो तुम्हे दिक्कत है ..मतलब अब मुझे सब काम तुम्हारे हिसाब से करने होंगे… इसपे उसका मुंह सड़ गया ..और वो अपने बैग से चेंज करने के लिए कपड़े निकलने लगा .. कपड़े निकलने के बाद उसने बाथ रूम में जाकर कपड़े बदल लिए ..और उसके बाद मैंने भी जाकर कपड़े बदल लिए .. हम दोनों ने अपने अपने बैग अपने पलंग के नीचे घुसा दिए ..!!

वो खिड़की से बाहर का नज़ारा देखने लगा .. बगीचे में बहुत सरे पेड़ थे खूब सारे फूल और उन पर मंडराते भँवरे और तितलियाँ…पर मेरे भँवरे का मूड ऑफ़ था वो अपने फूल से नाराज़ था…!!!

मैंने टीवी के नीचे से अखबार उठाया और पलंग पे बैठ के पढ़ने लगी थोड़ी देर बाद फोन की घंटी बजी… वरुण फोन के पास था इसीलिए उसी ने फोन उठाया .. सर का फोन था वो चाए, नाश्ता लेने के लिए हमें होटल के वेटिंग एरिया में बुला रहे थे।

फोन रखते ही उसने कहा- चलो!
मैंने कहा- कहाँ?
.. तो वरुण कहने लगा अब आई हो तो सोच रहा हूँ तुम्हे थोड़ा आस पास घुमा लाऊ .. !!!
मैंने कहा सच ..!!!
कहता ..’ इतनी खुश मत होवो .. सर नीचे बुला रे हैं चलो ..’

ये वरुण की पुरानी आदत थी .. दिल में सपने जगा के तोड़ देना ..!!! पहले भी उसने ऐसा मेरे साथ कई बार किया था…

मैंने थके हुए भाव से कहा चलो .. !! और हम नीचे पहुंचे सर पहले ही तीन चाय का आर्डर दे चुके थे .. सर ने पूछा की कमरे में कोई दिकत तो नहीं है .. हम दोनों ने एक ही स्वर में कहा हाँ .. सर ने फ़िर पूछा क्या दिक्कत है .. हम दोनों ने एक दूसरे की तरफ़ इशारा करते हुए ऊँगली उसके कहा इस से ..!!

सर हँसने लगे .. कहते अभी से लड़ रहे हो साथ में खेलोगे कैसे .. हम दोनों एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे ..

और साथ साथ बोले… हम और साथ में… ना ह ..!!!!

सर फ़िर से मुस्कुरा दिए .. तब तक चाए आ गई और कुछ बढ़िया से पकोड़े भी ..मुझे पकोड़े बेहद पसंद हैं और तब मैंने जाना कि वरुण को भी पकोड़े बहुत पसंद हैं ..!!!

चाय पीने के बाद सर ने हमें बताया कि चूँकि अलग अलग शहरों से स्कूल के बच्चे आए हुए हैं इसीलिए उन सभी के डिनर का इन्तेजाम स्कूल मैंनेजमेंट ने ही किया है .. जिस से बच्चे आपस में घुल मिल सकें और एक दूसरे को जन सकें .. जिस से उनमें खेल भावना जागृत हो… हम दोनों ह्म्म्म स्वर निकला…!!!

चाय पीने के बाद सर ने मुझसे पूछा कि अगर तुम प्रक्टिस करना चाहती हो तो में तुम्हे ले चलता हूँ साथ में दोनों मिलके प्रक्टिस कर लेना .. वहां और बच्चे भी होंगे .. और तुम्हारी ट्यूनिंग भी सेट हो जायेगी .. ..!!!

मैंने सर से कहा सर अब तो आ गई हूँ… न भी चाहूँ तो भी खेलना ही पड़ेगा .. अब जो होगा देखा जाएगा .. ये तो आपको मुझे लाने से पहले सोचना चाहिए था. सर कहते तुम नहीं जाना चाहती वो दूसरी बात है… चलो तुम दोनों जा के रेस्ट करो .. थक गए होंगे लंबे सफर में ..

वरुण उठने लगा .. मैंने सर से कहा .. सर इसे समझा लो .. जब देखो मुंह सड़ाये रखता है अब यहाँ कोई और है भी तो नहीं जिस से मैं बात कर सकूँ ।

सर कहते वरुण इसका ख्याल रखो और हाँ जो कहती है सुन लिया करो .. कम से कम सिर्फ़ कहती ही है न .. बीवी की तरह बेलन थोड़े ही मारती है ..!! सर मुस्कुराते हुए बोले ..!!!

इसके जवाब मैं वरुण बोला .. सर हम तो बेलन खाने को भी तैयार हैं पर मरने वाली तो आये…!!! और हंस पड़ा…

फ़िर हम दोनों अपने कमरे की तरफ़ चले गए .. जा ही रहे थे कि सर ने पीछे से वरुण को आवाज लगाई .. ‘कोई तकलीफ हो तो .. मुझे इंटर कॉम से कॉल कर लेना ..और हाँ तुम्हे याद है ना मैंने क्या कहा था ..’

वरुण ने उन्हें आश्वस्त करते हुए हाँ मैं सर हिलाया ..!!

हमारे कमरे में आते ही वरुण भड़कते हुए बोला .. कमसे काम मोका देख के तो बोल लिया करो की क्या बोल रही हो…क्या जरूरत थी ये कहने की सर से .. ये हम दोनों के बीच की बात है ओरों को हमारे बीच मैं क्यूँ लाती हो ..

मुझे अच्छा लगा कि उसने मुझे अपने मन की डांट लगायी .. और हम दोनों के झगडे को अपनी पर्सनल बात मानी और सार्वजनिक करने से मना किया।

मैंने उस से कहा .. अगर यही बात पहले आपके होठों से फूट पड़ती तो मुझे गैरों से आपको सिले हुए होंठो को खुलवाना ना पड़ता…

बस इतना कहने की देर थी उसने कहा .. कृति यू आर टू मच .. यू आर जस्ट इम्पोस्सिब्ल ..!!!

तुम्हारे साथ रहना तो दूर , बात करना ही बेकार है…

उसके बात ख़तम होने से पहले ही मैंने उसे कहा- सो यू डू ..!!

(जाने क्यूँ हम दोनों के दिल में एक दूसरे के लिए बे-इन्तहां प्यार होते हुए भी हमारा ज्यादातर वक्त झगडों और लडाइयों में गुजरता था )

ये सब सुनने के बाद .. वो बिस्तर पर खिड़की की ओर करवट लेके सो गया… ठीक दो घंटे बाद दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी .. मैंने खोलने से पहले अंदर से पूछा .. वो सर थे…

मैंने दरवाजा खोला .. और सर अंदर आये मैंने सर को बैठने के लिए कुर्सी दी… सर वरुण की तरफ़ देख के बोले .. इसे क्या हुआ .. मैंने कहा सर .. इसे कुछ हो भी नहीं सकता .. कुम्भकरण की इस छटी पुश्त को कहाँ से उठा के लाये हो… जब से आया है सो ही रहा है…पिछले दो घंटे से देख रही हूँ .. इस मनहूस टीवी पे भी तो न्यूज़ के अलावा कुछ और नहीं आता .. और फ़िर इन्सान एक दिन की अखबार कितनी बार पढ़ लेगा।

सर ने कहा तुम इतना ही बोरे हो रही हो तो मेरे साथ चलो मैं डिनर के लिए स्कूल कम्पाउंड में जा रहा हूँ ..(मुझे सर से ज्यादा वरुण पे भरोसा था .. इसीलिए मैंने जाने से मना कर दिया) मैंने कहा- नहीं सर मुझे भूख नहीं है, शाम को पकोड़े कुछ ज्यादा ही हो गए थे, अगर पेट ख़राब हो गया तो सुबह खेलना मुश्किल हो जाएगा .. और वैसे भी मैं भी सोने की ही तैयारी कर रही थी .. सर कहते- ठीक है जैसा तुम ठीक समझो .. पर हाँ कल सुबह 8 बजे नीचे मुख्य हॉल में पहुँच जाना .. 9 बजे तुम दोनों का मैच है चंडीगढ़ के साथ ..!! सर ने मुझे गुड नाईट किया

.. और सर के जाने के बाद में अपने बिस्तर पे लैंप जला के अपना नोवेल पढ़ने लगी…पर थोड़ी थोड़ी देर बाद मुझे उसे देखने की इच्छा होती .. जाने मुझे क्या हो रहा था… वो इतना पास होते भी मुझे ख़ुद से दूर जाता हुआ महसूस हो रहा था .. पर मैं उसे चाहकर भी रोक नहीं पा रही थी ..आँखों में उसे देखने की प्यास थी की ख़तम होने का नाम नहीं ले रही थी .. रात के 11 बज चुके थे .. और मैं सोने की नाकाम कोशिश कर रही थी .. परेशां थी .. ख़ुद से या उस से पता नहीं ..!!

बिस्तर पर उठ के बैठी ..तो देखा कि .. खिड़की से आती चाँद कि चंचल चांदनी परदे से छन छन के उसके चेहरे पे पड़ रही है .. उसके रेशमी धागों से बाल उसकी आँखों पे थे .. मैंने खिड़की के पास पड़ी कुर्सी उठाई और उसके चेहरे के ठीक आगे कुर्सी लगा के बैठे बैठे उसे निहारने लगी

..कुछ भी कहो .. उसे जितना देखती थी .. उसे और देखने कि इच्छा होती थी .. मैं उसके मोह जाल मैं फंसती जा रही थी. उसकी दांई हथेली उसके दांए गाल के नीचे ऐसे लग रही थी जैसे पत्ते पर ओस की पहली बूंद होती है… इतनी सौम्य कि बस देखते रहने का मन कर रहा था और वो इतने भोलेपन से सो रहा था जैसे बच्चा अपनी मां की गोद में सिर रख के सोता है…दुनिया से बेखबर, एकदम निश्चिन्त होके।

उसका बायाँहाथ उसके दाएं हाथ के नीचे रखा था और उसकी टांगें सुकड़ी हुई थीं… उसे पंखे की हवा में भी ठण्ड लग रही थी शायद ! मैंने उसे अपनी चादर औढा दी।

उसके रेशम से बाल कभी उसके माथे को चूमते तो कभी उसकी आंखों को हल्के से सहला के चले जाते, मानो उसकी आंखों में सपने भर रहे हों !!

यूं ही देखते देखतेवक्त गुज़र गया, सुबह के चार बज गए, पता ही नहीं चला…!!! इस से पहले वो जागता, मैंने कुर्सी वापिस उसी जगह रख दी जहां पड़ी थी और खिड़की के पास जा के खड़ी हो गई क्योंकि नींद तो मुझे आने वाली थी नहीं… और फ़िर आए भी क्यूं… मैं अपनी जिन्दगी के कुछ यादगार लम्हें गुजार रही थी जिन्हें शायद ही मैं कभी भूल पाऊंगी…!!!

धीरे धीरे रात की कालिमा को भोर के उज़ियारे ने धो दिया। आसमान में चिड़ियाँगश्त लगाने लगी थी, पन्छी हर तरफ़ गाने लगे थे, मानो सभी को उठने का संदेश दे रहे हों… और सबको शुभ-प्रभात कह रहे हो ! तकरीबन साढे पांच बजे वो आंखें मलता हुआ उठा- अरे तुम तो काफ़ी जल्दी उठ गई… मुझे लगा कि अब तक तुम सो रही होगी !

तो मैंने कहा,’कुछ मूर्ख लोग होते हैं जो वक्त को इस तरह सो के बरबाद कर देते हैं पर मैं उन में से नहीं हूं…!!!

कहता- तुम सोई नहीं क्या…

मैंने आश्चर्यचकित होते हुए कहा- हैं…???
वो फ़िर बोला- तुम्हारी आंखें क्यों सूजी हुई हैं, रो रही थी क्या?!?!

मैंने कहा- आंसू पौंछने वाला अगर कोई होता तो शायद जरूर रोती… सहारा देने वाला होता तो शायद ठोकर खाकर जरूर गिरती… कोई हाथ थामने वाला होता तो शायद जरूर बहकती… पर अफ़सोस ऐसा कोई नहीं है…!!!

वो आंखें झुका के सब सुन ध्यान से रहा था.. खड़े होके मेरे पास आया..कन्धे पे हाथ रखके उसने मुझ से पूछा- क्या बात है?..सुबह सुबह शेर-ओ-शायरी ! क्या हुआ मेरी स्वीटी को…इतनी सेन्टी क्यूं हो?? किसी की याद आ गई क्या???

मैंने उसे कहा- याद उसकी आती है जो दूर हो… कोई है जो सब कुछ देखके भी आंखें बंद कर लेता है, सुन कर भी अनसुना कर देता है। वो हर वक्त मेरे पास होता है…पर मेरे साथ नहीं होता… पर पता नहीं मैं भी उसके इतने ही करीब हूँ या नहीं…

उसने मुझे दिलासा देते हुए कहा .. कोई पागल ही होगा जो तुमसे प्यार करना नहीं चाहेगा .. तुम उसे कह के तो देखो शायद कुछ हो जाए ..

मैंने कहा .. उसे कहने से कुछ फायदा नहीं उस बेदर्द में दिल ही नहीं है .. दिल होता तो शायद अब तक समझ जाता… (उसे अब तक पता नहीं चला था कि मैं उसी की बात कर रही थी .. इडियट कहीं का )

उसने कहा .. और ऐसा भी तो हो सकता है कि वो सब कुछ समझता हो, जानता हो.. वो सब कुछ तुम्हारी आँखों में पढ़ लेता हो, पर शायद तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हो .. शायद उसे लगता हो कि अगर वो कहेगा तो कहीं तुम उसे मना न कर दो .. कहीं उसे ये डर न हो कि उसकी इगो हर्ट हो जायेगी…

उसके शब्द सुन के मेरी आंखें भर आई .. क्यूंकि बस में जिसने मेरे दिल को इतनी चोट पहुंचाई .. क्या ये वरुण वही इन्सान था जो तब मुझसे इतने प्यार से बात कर रहा था…

मैं उसे तब भी कुछ नहीं कह सकी. . बस उसकी आँखों में झांकती रही और कब आखों से आंसू छलक गए पता भी नहीं चला .. उसने कंधे से हाथ हटा के मेरे आंसू पौंछे और मेरे सर पर अपना हाथ रख दिया .. उसने कहा .. थोड़े आंसू बचा लो .. तुम लड़कियों के पास एक यही तो हथियार है… उसे बर्बाद मत ।करो .. और हाँ थोड़े इसीलिए बचा के रखा करो क्यूंकि ये अनमोल हैं. और मैं तुम्हे रोते हुए नहीं देख सकता…

मुझे चुप कराने के बाद उसने कहा मैं मोर्निंग वाक् पे जा रहा हूँ, चलोगी?.. थोडी फ्रेश भी हो जोगी .. और थोड़ा वार्म अप भी कर लोगी .. लेग्स की मस्सल्स भी खुल जाएँगी .. और तुम्हे खेलते वक्त दिक्कत भी नहीं होगी ..मुझे उसकी बात ठीक लगी और मैं उसके साथ ट्रैक सुइट पहन कर मोर्निंग वाक् पे चली गई। वापिस आकर हम दोनों फ्रेश हुए अपने स्पोर्ट्स ड्रेस पहने और अपने अपने बल्ले ले के नीचे हॉल मैं चले गए .. जहाँ सर नाश्ता कर रहे थे…

हमारे पहुँचते ही सर ने कहा- अरे आ गए तुम दोनों .. वैरी गुड ! वरुण ने व्हाइट शोर्ट्स और टी -शर्ट पहनी थी .. और सर पे हेयर-बैंड था ताकि बाल खेलते वक्त उसकी आखों में ना आयें… मैंने चोटी बनाई थी .. एक व्हाइट टी -शर्ट और व्हाइट मिनी स्कर्ट पहनी थी ..हाँ इस बार वरुण ने मेरी स्कर्ट को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई .. क्यूंकि उसे मालूम था टेनिस में कभी कभी एक और से दूसरी और तेज़ और बड़े क़दमों से भागना पड़ता है .. जो कि लम्बी स्कर्ट में नहीं किया जा सकता ..

हम दोनों तैयार थे। नाश्ते में हमने एक एक ग्लास ओरंज़ जूस और कुछ फल लिए ..और पहुँच गए गेम वेन्यु पर ..9 बजे खेल शुरू होना था .. हमारी प्रतिद्वंदी टीम चंडीगढ़ के स्कूल की थी। लड़की सुंदर थी (ज्यादातर सरदारनियाँ सुंदर होती हैं ) उसके नैन नक्श एक दम टिपिकल सरदारनियों जैसे थे और लड़का सरदार था। हमारा खेल शुरू हुआ, हम दोनों को शुरू में तालमेल की वजह से कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा, पर ब्रेक में वरुण ने मुझे उसके साथ खेलने के कुछ टिप्स सिखाये और नेक्स्ट हाफ में हमने बहुत अच्छा किया और हम मैच जीत गए।

12 बजे खेल ख़तम हुआ। ये हमारा क्वाटर फाईनल था। इसके बाद हमें सेमी फाइनल में जयपुर के स्कूल की टीम के साथ खेलना था और वो मैच उसी दिन 2 बजे होना था। मुकाबला कड़ा था। खेल शुरू होने से पहले हम दोनों ने एक दूसरे को बेस्ट ऑफ़ लक कहा और कड़ी मेहनत के बाद हम वो गेम 6 -4, 5 -4, 6 -5 से जीत गए। गेम 4.30 बजे ख़तम हुआ। निकलते समय मैंने दूसरी टीम की लड़की से हाथ मिलाया और वरुण ने लड़के से .. उसके बाद वरुण ने लड़की से मिलाया और मैंने लड़के से।

सामने वाली टीम के लड़के ने मुझसे हाथ मिलते वक्त कहा कि मैं ये मैच जीत जाता अगर तुम न खेल रही होती, मेरा सारा ध्यान तो तुम्हारी टांगों पर था, सच कहूँ युअर लेग्स आर सो स्टन्निंग .. ये सुनने के बाद मैंने सीधा वरुण के चेहरे पे देखा, उसने बात सुनी थी पर उसने कुछ प्रतिक्रिया नहीं दिखाई, हाथ छुड़ाने पर मुझे अपने हाथ मैं एक पर्ची मिली, जो हाथ मिलाते वक्त उस लड़के ने मेरे हाथ पे रखी थी, उसपे लिखा था .. ‘7 बजे शाम को इसी मैदान की पार्किंग में मिलो.!!!!’

हम सर के साथ वापिस होटल आ गए। उस वक्त 5 .30 बजे थे। सर हमारी बहुत तारीफ़ कर रहे थे, पर मैं अपने मन में यही सोच रही थी कि अभी डेड़ घंटा बाकी है। हम दोनों कमरे में गए, और मैंने वो स्लिप मेज़ पे रख दी। पहले वरुण फ्रेश हो के बाहर आया, और मैं फ्रेश होने बाथ रूम में चली गई। मैं नहा ही रही थी, मुझे लगा कि कमरे का दरवाजा खुला है। मैंने वरुण को अंदर से ही आवाज़ लगाई पर कोई जवाब नहीं मिला। जल्दी जल्दी में मैंने नहाना धोना ख़तम किया और कपड़े पहन के बाहर आई। 6.45 हुए थे, मुझे पता था वरुण कहाँ गया है।

मैं भी उसके पीछे पीछे चल दी। वहां पहुँच के मैंने सिर्फ़ इतना देखा कि वरुण पार्किंग से बाहर आ रहा है, मैं छुप गई और उसके जाने के बाद मैं पार्किंग में गई। वहां वो लड़का एक गाड़ी के पीछे जख्मी पड़ा था। वरुण ने उसे बहुत मारा था, मेरे पहुँचते ही वो रो रो के सॉरी मैडम, सॉरी दीदी कहने लगा और तो और पाँव छूने लगा।

उसने मुझसे कराहती हुई आवाज़ में कहा- वो आपका भाई है क्या?
मैंने कहा- नहीं! उसने फ़िर से पूछा- प्रेमी???

मैंने कहा नहीं ! हम दोनों का रिश्ता इन सब रिश्तों से ऊपर है .. वो तुम नहीं समझोगे .. आज जो तुमने गलती की .. दोबारा किसी के साथ मत करना .. ये कह के मैं वहां से निकल गई .. निकलते समय मैंने…ग्राउंड की अथॉरिटी को इन्फोर्म किया कि पार्किंग मैं कोई लड़का जख्मी पड़ा है और उसे फर्स्ट ऐड की जरूरत है।

उसके बाद मैं होटल पहुँची, करीबन 7 .30 बजे। उसने आते ही पूछा- कहाँ गई थी? मैंने कहा- जहाँ तुम गए थे! कहता- मैं तो कहीं नहीं गया, यहीं था, थोड़ी देर के लिए सर के कमरे में गया था, लौटा तो देखा तुम कमरे में नहीं हो।

मैंने कहा,’ जब तुम्हे झूठ बोलना आता नहीं तो बोलते क्यूँ हो… क्यूँ मारा तुमने उस लड़के को…’ वरुण कहने लगा ..’किस लड़के को .. तुम किसकी बात कर रही हो .. ‘

मैं चुप हो गई मैं उसके जख्मों को कुरेदना नहीं चाहती थी .. और न ही दोबारा झगड़ा करना चाहती थी .. हम दोनों बहुत थक गए थे .. और आज भी कल ही की तरह बिना खाए पिए सो गए .. और उस दिन मुझे चैन की नींद आई .. क्यूंकि मैं आश्वस्त हो चुकी थी की वरुण के दिल में भी मेरे लिए कुछ न कुछ तो जरूर है…

सुबह 10 बजे हमारा फाइनल था मुंबई टीम के साथ .. मैं जल्दी उठ गई .. आज का दिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था .. इसलिए नहा धोकर पूजा की .. तब तक वरुण भी उठ गया .. रोज़ की तरह आज फ़िर से वो मोर्निंग वाक् पे गया ..जाने से पहले उसने मुझसे पूछा ..पर मैंने ही मना कर दिया .. क्यूंकि कमरे पर और भी काम थे करने को .. पैकिंग करनी थी .. चेक आउट करना था…

जब वो मोर्निंग वाक् से आया तब तक मैं दोनो बिस्तर ठीक कर चुकी थी, हम दोनों के बैग पैक कर चुकी थी उसके पहनने वाले कपड़े निकाल के रख दिए थे (बिल्कुल बीवियों की तरह ) आने के बाद उसने पूछा- अरे! ये कमरा इतना व्यवस्थित कैसे हो गया? मैंने कहा- मैंने किया और कौन करेगा? कहता- तुम कबसे इस होटल की सफाई कर्मचारी बन गई… और यह कहके हंसने लगा… मैंने भी उसकी बैटन को मजाक मैं लेते हुए कहा .. जब से तुम जमादार बने हो तभी से…

मैं उसके आने तक तैयार हो चुकी थी, आने के बाद वो भी नहा धो के तैयार हो गया, हम दोनों अपने अपने बैग ले के नीचे पहुंचे। सर हमारा इंतजार कर रहे थे। हम तीनों ने रजिस्टर पर चेक आउट करने के लिए हस्ताक्षर किए और सामान उठा के स्टेडियम चले गए। वहां लॉकर में सामान रख दिया। तब तक 9 .45 हो चुके थे, मैच शुरू होने में सिर्फ़ 15 मिनट बाकी थे।

मैच शुरू हुआ। मुंबई टीम का लड़का बेहद स्मार्ट था, और लड़की सांवली सी थी लेकिन उसके फीचर बहुत अच्छे थे। उनकी टीम बहुत अच्छे खेल के प्रदर्शन के बाद यहाँ तक पहुँची थी। मैं बहुत नर्वस थी (ऐसे मौकों पर मैं अक्सर नर्वस हो जाया करती हूँ ) मुझे ख़ुद पे भरोसा नहीं था कि मैं इन्हे चुनौती दे भी पाऊँगी या नहीं, पर वरुण पे भरोसा था…उनकी टीम ने हमारा खेल पिछले दो मैचों में देखा था।

खैर पहला सेट हम जीत गए, पर दूसरा सेट शुरू होने के साथ बाल बार बार मेरी तरफ़ ही आ रही थी और वरुण बार बार भाग कर बाल अपने बल्ले पर ले रहा था। वो जानता था कि मैं कांफिडेंट नहीं हूँ और ये बात सामने वाली टीम को भी पता थी। इसीलिए वो हमारी कमजोरी का फायदा उठा रहे थे। आखिर कार वही हुआ जिसका डर था- वरुण भी आखिर कब तक अकेले मोर्चा संभालता, वो भी इन्सान है उसे भी थकन होती है, नतीजतन हम दूसरा सेट हार गए और फ़िर एक के बाद एक तीसरा और चौथा भी ..

हम मैच हार गए ..

और सब कुछ हुआ मेरे कारण .. जब ये बात मैंने वरुण से कही .. तो उसने कहा हम मैच तुम्हारी वजह से नहीं हारे .. हम मैच इसलिए हारे क्यूंकि .. मेरी प्रक्टिस वंशिका के साथ हुई थी, तुम्हारे साथ नहीं, ऐसे में दिक्कतें तो आती ही हैं। सर ने भी मुझे दिलासा देते हुए कहा- कोई बात नहीं बेटे ! तुम तीन में से 2 मैच तो जीते न, ये मत देखो कि तुम आखिर में हारे या जीते .. तुम ये देखो कि तुमने खेल भावना से खेले या नहीं .. अगर हाँ तो तुम हारने के बावजूद जीत गए क्यूंकि इस से तुम्हे बहुत कुछ सीखने को मिला और फ़िर हर हार के बाद कोई कुछ न कुछ तो सीखता ही है, तुमने भी सीखा ही होगा .

जब तक खेल में कोई हारेगा नहीं तो सामने वाला जीतेगा कैसे…!! सर की बातों ने मुझ पे और मेरे मूड पे काफी असर किया .. उसके बाद हमने कुछ रेफ्रेश्मेंट्स ली और थोड़ी देर आराम करने के बाद हम वहां से 2 बजे निकल पड़े बस लेने के लिए। बसों की हड़ताल थी इसलिए हमें टैक्सी करनी पड़ी। सर साथ में थे इसलिए रास्ते भर हमने ज्यादा बातचीत नहीं की और सर ने मुझे करीबन 7 बजे और वरुण को मेरे बाद टैक्सी से ही हमारे घर छोड़ा।

इस एक्सपेरिएंस के बाद मुझे तो पूरा यकीन हो गया भले वरुण बाहर से दिखाता न हो .. पर उसके मन में एक सॉफ्ट कार्नर जरूर है मेरे लिए .. शायद इसलिए क्यूंकि .. मैं उसकी सबसे करीबी और अच्छी दोस्त थी .. या फ़िर शायद कुछ और…

ये आपको मेरी आगे वाली कहानियों में पता चलेगा… कि उसके दिल में आखिर क्या था .. और वो मुझ से दूर जाने की कोशिश क्यूँ करता था ….

आपको मेरी यह कहानी कैसी लगी मुझे अपने विचार केवल और केवल ईमेल के ज़रिये भेजें .. मुझे आपके फीड बैक का इंतज़ार रहेगा ..

मेरी मेरे पाठकों से तहे दिल से गुजारिश है कि वो मुझसे केवल कहानी से जुड़े सवाल ही करें… अश्लील सवालों के उत्तर नहीं दिए जायेंगे ..
पाठको से ये भी अनुरोध है कि आप अपनी लेखिका कि मजबूरी को समझ कर निजी से ज़िन्दगी से जुड़े सवाल भी न करें… मैंने वरुण और अपनी कहानी अन्तर्वासना पर भेजने से पहले वरुण से ये वायदा किया है कि .. मैं अपनी से जीवन से जुड़ी कोई बात यहाँ नहीं लिखूंगी .. जैसे कि मेरा नाम, शहर, मेरी उमर, मेरी फिगर .. इसलिए आपसे अनुरोध है कि ऐसे सवाल न करें जिनका मैं जवाब न दे सकूँ…
कहानी पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद… Hindi Sex Stories

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समय पीछे चला जाता है लेकिन Hindi Sex Stories उसकी कुछ खट्टी मीठी यादें जो मन पर अपना प्रभाव बनाए ही रखती हैं! और जब वे यादें बेचैन करने लगती हैं तो बस बेचैनी से बचने का एक ही मार्ग होता है वह यह कि उन्हें किसी से बांट दिया जाए! यह कुछ ऐसी ही याद है जो मैं आपसे बांटना चाहता हूँ!

मेरी बी-टेक की परीक्षा का अन्तिम से पहला सेमेस्टर बजाय दिसंबर जनवरी के अप्रैल महीने में समाप्त हुआ। तभी गोरखपुर से चाचा जी की बेटी यानि कि दीदी का फोन आ गया कि घर जाने से पहले तीन-चार दिन के लिए आ जाओ।

मैं बचपन से ही उनसे लगा था। लेकिन इधर कई साल हो गये उन्हें देखा भी नहीं था, उधर गांव से भी फोन आ गया कि गोरखपुर हो कर आना।

दीदी की शादी हुए लगभग दस साल हो गये थे। जीजा जी बिजली विभाग में क्लर्क हैं, ऊपरी आमदनी का प्रभाव घर के रखरखाव से तुरन्त ही लग गया।

स्कूल से लौटे तो मैंने देखा कि टीना और अनिकेत तो इतने बड़े हो गये कि पहचान में ही नहीं आ रहे थे, लेकिन अनुमान लगाने में को कठिनाई नहीं हुई, मगर उनके आने के कुछ देर बाद जो अजनबी लड़की में आई उसे देखकर मैं चौंका। सामान्य से अधिक लम्बी, स्कर्ट के नीचे मेरी निगाह गई तो उसकी लम्बी और पतली सुन्दर और चिकनी टांगे देख कर मन अजीब सा हुआ।

उसने ‘मामा जी नमस्ते’ कहा तो मेरी दृष्टि ऊपर गई। देखा आंखें फट सी गईं। शरीर के अनुपात से कहीं भारी, लम्बी और भारी उसकी दोनों छातियां उसके खूबसूरत प्रिन्टेड ब्लाउज फाड़कर बाहर निकलने को आतुर दिखीं। उसने संभवतः मुझे देखते हुए देख लिया।

वह शरमाई तो मैंने निगाहें नीचे कर लीं। तभी अन्दर वाले कमरे से दीदी आ गईं। मैंने तब उनको भी ध्यान से देखा। जो दीदी पहले दुबली पतली थी अब उनका शरीर भर गया था और काफी सुन्दर लगने लगी थीं।

दीदी ने बताया- यह सोनम है जेठ की बेटी। गांव से आठ पास करके साथ ही है अबकी बार बी ए के प्रथम वर्ष की परीक्षा दे रही थी और आज ही अन्तिम पेपर था।

शाम तक सोनम मुझसे काफी घुलमिल गई। वह बेहद बातूनी और चंचल थी। अब तक कई बार वह किसी न किसी बहाने अपने शरीर को मेरे शरीर से स्पर्श करा चुकी थी।

उसकी बातों के केन्द्र में गर्लफ्रेन्ड और लड़के ही अधिक थे। दोनों बच्चे भी परीक्षा देकर अगली कक्षाओं में आ गये थे, अभी पढ़ाई का दबाव भी अधिक नहीं था।

सोनम तो मेरे आने से बहुत ही प्रसन्न थी। असल में मेरा गांव और दीदी के गांव से बहुत दूर नहीं था। दो दिन बाद उसे मेरे साथ उसे भी जाना था।

जीजा जी इधर काम के कारण काफी देर से आने लगे थे इस लिए सब्जी लेने दीदी ही जातीं। शाम में वह अनिकेत को लेकर मार्केट चली गई तो घर में मैं टीना और सोनम ही थे।

टीना अभी नादान थी। फर्श पर बिछे गद्दे पर मैं लेटा था। टीना मेरे पैर की उंगलियों को चटका रही थी।
बातें करते सोनम ने कहा- लाओ मैं सर दबा दूं।

फिर मेरे बिना कुछ कहे ही मेरे सिर के पास आकर बैठ गई। और सर में अपनी उंगलियां धीरे-धीरे चलाने लगी। धीरे-धीरे उसके शरीर की सुगंध मुझे मस्त करने लगी। मैंने आंखें ऊपर उठाकर देखा तो उसकी बड़ी नुकीली चूचियां मेरे सर पर तनी थी। संभवतः वह भी उत्तेजित सी थी, क्योंकि मुझे लगा कि उसके चूचुक भी तने हैं। उसने ब्रा नहीं पहनी थी।

मैंने अंगड़ाई लेने के बहाने हाथ पीछे किया तो मेरे पंजे उसकी चूचियों से छू गये। लेकिन मैंने रुकने नहीं दिया और टीना से कहा- अब बस, जाओ.

वह जाकर टीवी देखने लगी। सोनम उसी तरह मेरे बालों में उंगली किये जा रही थी। मैंने फिर सामने टीना की तरफ देखते हुए फिर हाथों को पीछे ले जाकर उसकी चूचियों से स्पर्श कराते हुए वहीं रोक दिया। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, हां हाथ अवश्य रुक गये।

एक पल रुकने के बाद मैं हौले हौले उसकी चूचियों पर हाथ फिराने लगा। कुछ क्षणों बाद उसने मेरे हाथ को वहां से हटाकर धीरे से कहा- टीना छोटी नहीं!

उसके इस उत्तर से मेरी बांछें खिल उठीं। मैंने हाथ को अंगड़ाई के बहाने ले जाकर उसकी जांघों पर रख दिया। वह चिकनी और संभवतः बरफी की तरह सफेद थीं। मैं रह-रह कर उसके पेड़ू को भी छू देता। उसने कच्छी नहीं पहन रखी थी। उसकी झांटों और मेरे हाथों के बीच उसकी सलवार का झीना कपड़ा ही था।

सामने मेरा लिंग अकड़कर खड़ा हो गया और मेरे लोअर के अन्दर बांस की तरह तनकर उसे उठा दिया। जब सोनम की दृष्टि उस पर पड़ी तो वह मुस्कुराने लगी।

मैंने अपने हाथों को फिर ऊपर लेजा कर उसकी चूचियों से स्पर्श कराया तो लगा कि उसकी घुंडियां बिल्कुल तन कर खड़ी हो गई हैं।

छुआ-छुई का यह खेल चल ही रहा था तभी टीना फिर आ गई और पास बैठ गई। हम दोनों रुक गये। मैंने झट अपनी लम्बी टी-शर्ट को नीचे खींच दिया, लेकिन हमारे महाराज जी झुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे तो मैं झट से उठ गया।

सोनम भी मेरे साथ ही उठ गई। उसने चुन्नी अपने सीने पर नहीं रखी थीं। चूचियां कपड़े के ऊपर से ही वह पूरी तनी बिल्कुल स्तूप की तरह लग रही थीं।
रसोई की तरफ जाते हुए मैंने कहा- चाय पीने का मन हो रहा है।

“चलो बना दूं।” कहते हुए वह मेरे पीछे रसोई में आ गई।

अन्दर जाते ही मैंने उसे कचकचाकर लिपटा लिया और पूरी शक्ति से उसके शरीर को जकड़ लिया। वह कसमसाकर कुछ कहती इससे पहले ही अपने ओंठ उसके ओंठों पर रखकर जबरदस्ती उसके मुंह में अपनी जीभ डाल दी।

ह गों-गों कर उठी तो जीभ को निकाला। तब वह कांपते स्वर में बोली- छोड़ो अभी टीना आ जाये तो!
मैंने उसे छोड़कर कहा- भगवान कसम … अभी तक मैंने इतनी कसी और सुन्दर चूचियां तो फिल्मों की हीरोइनों तक की नहीं देखी!

वह अब स्थिर हो चुकी थी, बोली- तुम तो बहुत हरामी हो मामा!
मैंने धीरे से कहा- सोनम मैं बिना तुमको लिए छोड़ूंगा नहीं!

उसने ठेंगा दिखाते हुए कहा- बड़े आये लेने वाले!
और फिर मेरे अभी तक खड़े लन्ड को ऊपर से नौच कर भाग गई।

दीदी सामान लेकर आईं और रसोई में चली गईं। दोनों बच्चे पढ़ने बैठ गये तो मैं छत पर चला गया और कुछ देर बाद सोनम को भी पुकारकर ऊपर बुला लिया। हमारी दीदी का मुहल्ला निम्न-मध्यवर्गीय मुहल्ला था। छतें एक दूसरे से सटी थीं। अंधेरा पूरी तरह से घिर आया था, इसलिए इक्का-दुक्का लोग ही अपनी छत पर थे।

“सोनम दोगी नहीं?”
“क्या?”
“बुर! या अगर हो गई हो तो चूत!”
“मतलब?”
“मतलब यह कि अगर किसी से चुदवा चुकी हो तो चूत हो गई होगी नहीं तो अभी बुर ही होगी! बताओ क्या है?”
“हट!”

“हट नहीं! नहीं प्लीज सोनम! दे दो न!” मैंने उसे पलसाने के लिए कहा।
“बहुत बड़ा पाप है। फिर तुम तो मामा हो!”
“मैं कोई सगा मामा थोड़ी न हूं?”
“चाहे जो हो, मैं यह काम नहीं करूंगी। मुझे डर लगता है!”

उसने इस अन्दाज में कहा कि मुझे लग गया कि अभी तो बात बनने वाली नहीं, तो मैंने बातो को दूसरी तरफ मोड़कर कहा- अच्छा सच बताओ किसी से करवाया है कि नहीं?
“भगवान कसम नहीं।”
“मिंजवाई हो?”
“भला कौन लड़की होगी जिसकी किसी न किसी ने कभी मींजी न हो।”

फिर उसने कहा- तुमने मामा? तुमने मींजी हैं?
“हां, तुम्हारी ही!”
“धत! पहले?”
“मींजी तो कइयों की है, और ली भी है, लेकिन पूछना नहीं किसकी। कभी बाद में बताऊंगा। अच्छा बताओ तुम इसके बारे में ठीक से जानती हो?”
उसने मुस्कुराकर कहा- किसके?”

मैंने खीजकर कहा- बुर की पेलाई या कहो चुदाई के संबंध में!
“हाय राम यह भला कौन नहीं जानती होगी? इतना तो टीना को भी पता होगा!”
“अच्छा अपनी बताओ कि तुम को कैसे पता चला?”
“क्यों बताऊं?”

मैंने अन्त में कहा-सोनम मैं बिना लिए तुम्हारी छोड़ूंगा नहीं!

और फिर इधर उधर की बातें होने लगीं। बात फिर आकर पेलने, चोदने और लन्ड, बुर पर रुक गई। अन्त में सोनम ने यह वादा किया कि ऊपर से मैं चाहे जो कर लूं, लेकिन वह किसी भी कीमत पर मेरा लन्ड अपनी बुर में डालने नहीं देगी।

बाद के दो दिनों में वह सोई तो दीदी के कमरे में क्योंकि दीदी को माहवारी आ रही थी। यह भी उसी ने बताया, लेकिन दिन में जैसे ही अवसर मिलता हम दोनो एक दूसरे को नौचने चूसने में लग जाते। एकाध बार तो वह बुरी तरह से उत्तेजित भी हो गई, लेकिन उचित अवसर ही नहीं मिला। दीदी भी न जाने क्यों हमें अकेला नहीं छोड़ रही थीं।

यद्यपि मुझे अन्त तक यह लगने लगा कि अगर अकेले मिल जाए तो करवा लेगी।

मैं तीसरे दिन के बजाय चौथे जाने के लिए तैयार हुआ। उस दिन इतवार था। शहर से हमारे गांव की दूरी अधिक नहीं थी। तीन घण्टे बस से लगते थे। बीच में बदलकर अन्त में चार किलोमीटर का पैदल या फिर अपने निजी वाहन का रास्ता है। पैंसजर ट्रेन भी जाती थी, समय थोड़ा अधिक लगता था परन्तु आराम था।

बारह बजे की गाड़ी थी। प्रोग्राम यह बना कि चार बजे के लगभग गाड़ी पास के कस्बे पहुँच जायेगी फिर वहां से बस पकड़कर एकाध घंटे में अपने गांव की सड़क पर पहुंच जायेंगे। आगे अगर फोन लग गया तो कह दिया जायेगा कोई आ जायेगा, नहीं तो किसी रिक्शा या हम लोग पैदल ही निकल जायेंगे।

हमारा क्षेत्र बहुत शांत है। किसी तरह की चोरी डकैती या दूसरी घटनाओं से मुक्त! इसलिए हम लोगों को आने जाने का भय नहीं होता अक्सर किसी कारण से देर हो जाने के बाद लोग बारह-बारह बजे रात तक में अकेले आ जाते।

यद्यपि सोनम ट्रेन से आने में घबरा रही थी, कहीं लेट न हो जाये!

हुआ भी वही, बारह से एक बज गया फिर दो, तब जाकर कहीं गाड़ी आई। घर फोन से बात करने की कोशिश की लेकिन संभवतः सम्पर्क ना होने के कारण बात नहीं हो पाई। अभी हमारे यहां यह सुविधा उतनी अच्छी नहीं थी। जाते जाते चाचा कह गये कि मुहानी पर कोई आ गया तो आ गया, नहीं तो वहीं सम्पत साह के यहां सामान रख कर पैदल ही चले जाना।

हम लोग बैठे तो देर हो जाने की घबराहट थी लेकिन गाड़ी में बैठते ही हवा हो गई। सोनम खिड़की तरफ बैठी, फिर मैं। हम लोगों की यात्रा तो ऐसे कटी जैसे पति पति पत्नी हों। वह लगातार मेरे हाथों से खेलती रही। कभी-कभी अपने हाथों की कुहनियों को मेरे लंड पर पैंट के ऊपर से दबाती मेरे हाथ तो पूरी यात्रा में किसी न किसी तरह उसकी चूचियों के संपर्क में ही रहे।

अवसर देखकर कामुक बातें भी होती रहीं। मुझे उसकी जानकारियाँ सुनकर आश्चर्य हुआ। उसने बताया कि दीदी और जीजा कभी कभी गंदी फिल्म देखते हैं। जिसमे कभी दो आदमी एक की लेते हैं तो कभी एक दो की!

कहने लगी कि चाचा चाची की निरोध लगाकर ही करते हैं। उसने यह भी बताया कि उसने दरवाजे में एक छेद ऐसा कर रखा है कि जिससे वह जब चाहे उन लोगों की चुदाई देखे, मगर वह जान नहीं सकते।

ऐसे में यात्रा जब समाप्त हुई तो पता चला कि गाड़ी रास्ते और लेट हो गई। स्टेशन पर पहुंचते-पहुंचते सात बज गये। हल्का अंधेरा हो गया। सोनम डरने लगी। लेकिन बस जल्दी ही मिल गई। कुछ दूर जाने के बाद पहिया पंक्चर हो गया। और देर होती देख सोनम घबराने लगी, लेकिन मेरा मन प्रसन्नता से झूम उठा। मैंने निश्चय कर लिया अब सोनम को कुंआरी नहीं रहने दूंगा।

जब हम लोग मुहानी पर पहुंचे तो आठ का समय हो गया था। अंधेरा घिर आया था, लेकिन चांद भी निकलने की तैयारी में था। सोनम तो रोने लगी कि अब क्या होगा!

मैंने दिलासा दिया तो जाने को तैयार हुई।

सामान साह जी के यहां रखने गये तो योजना के अनुसार सोनम को थोड़ा दूर खड़ा करके कह दिया कि चाची हैं। वह अड़ गये कि सायकिल ले लो, लेकिन मैंने यह कहकर मना का दिया कि वह पैदल ही जायेंगी।

गांव में जाने का एक थोड़ा निकट का रास्ता था, लेकिन वह पलाश और कुश के छोटे से जंगल में से जाता था। मैंने वही रास्ता पकड़ा तो वह रुक गई।

क्योंकि उसे पता था कि एक सड़क भी है, लेकिन मेरे समझाने और डर समाप्त करने के बाद ही वह जाने को तैयार हुई। पगडंडियां तमाम थीं। मैंने जानबूझकर अलग पगडंडी पकड़ी। चूंकि बचपन से मैं इतनी बार इधर से गया था कि मुझे रास्ते का चप्पा चप्पा पता था। मेरे कंधे पर छोटा सा बैग था। जिसमे मेरे कपड़े थे। उसका सामान तो रख दिया था।

उसने मजबूती से मेरा हाथ पकड़ लिया था।
थोड़ी दूर जाकर मैंने कहा- हाथ छोड़ो, मैं जरा मूत लूं!
वह बोली- नहीं मुझे डर लग रहा है, यहीं मूतो!

तब तक चांदनी के प्रकाश का प्रभाव वातावरण में उभर गया था। मैं उत्तेजित होने लगा। मुतास के कारण मेरा लंड पहले से ही खड़ा था मैंने उसी के सामने लंड को पैंट से निकाला और छल छल मूतने लगा। मूतने के बाद जब लंड हिलाकर बूंदें गिराने लगा तो वह बोली- बीज गिरा रहे हो मामा?

मैंने कहा- बीज तो तुम्हारी बुर में गिराऊंगा।
“कैसे?”
“तुम्हें चोदकर और कैसे?” इतना कह कर मैं लंड को यूं ही बाहर लटकाये चल पड़ा।

और हाथ उसके कंधे पर रखकर बगल से उसकी चूचियों को सहलाने लगा। वह कड़ी होने लगीं तो और तेज मलने लगा। वह उत्तेजित होकर मुझसे चिपकने लगी। चूचियां बड़े लम्बे आम का रूप धारण करने लगीं। मैंने रुककर मुंह में सटाकर अपनी जीभ उसके मुंह में डालकर जो चूसा तो बोली- मामा लगता है कि आज तुम मुझे खराब करके ही छोड़ोगे!
“मतलब?”
“मतलब न पूछो!” कहकर वह बोली- मुझे भी मूतना है!
कहकर वह वहीं सलवार खोलकर बैठ गई।

जानवरों को चारा खिलाने वाली नाद की तरह उसके चूतड़ सामने आ गये। वह सीटी बजाती शर-शर मूतने लगी। मैं अपने खड़े लन्ड को उसकी कनपटियों से रगड़ने लगा।
मूत कर उठी तो सलवार बांधने से पहले ही मैंने उसकी झांटों से भरी चूत को मुट्ठी में पकड़ लिया वह मूत से गीली हो रही थी। उसने हल्का सा प्रतिरोध किया- छोड़ो न!

अब तक चांदनी खिल चुकी थी। चारों तरफ सन्नाटा था। मुझे याद आया कि थोड़ा अन्दर एक छोटी सी पोखर है। मैं उसी तरफ उसे लिपटाये चला गया।

पोखर में पानी तो कम था, लेकिन उसके किनारे साफ स्थान था। पास में सफेद पुष्प खिले थे। वातावरण मादक था। उसने मस्ती भरे स्वर में कहा- यहां क्यों आये?
मैंने कहा- तुम्हें लेने के लिए।
फिर उससे खड़े ही खड़े ही लिपट गया।

वह मेरे ही बराबर थी। उसके बाल खुल गये थे। उसकी कड़ी होकर पत्थर चूचियां मेरे सीने से टकराकर मेरे अन्दर आग भर रही थीं। मैंने हाथ को पीछे ले जाकर उसके उभरे चूतड़ों को पकड़ लिया और मुंह को उसके मुंह से लगाकर उसके चेहरे और होंठों को चूसने लगा। उसने भी मुझे जकड़ लिया। मेरा लंड खड़ा होकर सलवार के ऊपर से उसकी चूत को चूमने लगा।
वह थोड़ी देर बाद अलग होकर बोली- अब चलो मुझे डर लग रहा है।

मैंने उसकी बात को अनसुना करते हुए बैग खोल कर अपनी लुंगी निकाल कर बिछा दी और कहा- अब न तो मैं बिना चोदे रह सकता हूं और नहीं तुम बिना चुदाये!

फिर मैंने उसे भूमि पर लिटा दिया और उसके ऊपर चढ़कर उससे लिपट गया। उसने भी मुझे कस लिया। पांच मिनट की लिपटा-लिपटी के बाद मैं उठा और उसे उठाकर उसकी कुरती को शमीज़ सहित ऊपर खींच कर उतार दिया। वह ऊपर से नंगी हो गई। दोनों छातियां ऐसी गोरी चिकनी और फूलकर खड़ी हो गई थीं मानो उन्हें अलग से चिपका दिया गया हो। उन्हें नीचे से ऊपर मींजते सहलाते हुए कहा- सच बताओ सोनम मेरे अतिरिक्त तुम्हारे दो पपीतों को किसी और मींजा है?”

“भगवान कसम नहीं। जब मैं गांव में थी तो संध्या भाभी जरूर मींजती और कभी कभी चूसतीं भी थीं, लेकिन तब यह छोटी थीं। कामता भैया कलकत्ता रहते थे। वह अपनी चूचियां चुसाती भी थीं। यहां किसी ने कभी नहीं कुछ किया।”

“तो आज मैं सब कुछ करूंगा!”कहते हुए मैंने उसकी चूचियों को चूसना आरम्भ कर दिया। उसका सीना मेरे थूक भीग गया। वह वहीं लेट गई और अकड़ने लगी।

तब मैं उठा और अपनी पैंट और चड्ढी साथ उतार दी। बल्ल से मेरा लंड सामने आ गया। वह उसे ही देखने लगीं। मेरी झांटे काफी बड़ी हो गईं थीं। नसें तनकर अकड़ गई थीं। मैंने उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया। वह वैसे ही पकड़े रही। उसकी खड़ी चूचियां मेरे होंठों के सामने तनी थीं। तब मैंने कहा- सहलाओ।”

वह बोली- शरम आती है।
“लो अभी मैं शरम मिटाता हूं।” कहकर मैंने उसके सलवार का नाड़ा पकड़कर खींच दिया।
सलवार खुल गई। नीचे से पकड़कर खींचा तो उतर गई। वह शरमाने लगी। उसकी भी झांटे काफी बड़ी थीं। उसकी बुर उसी में छुपी थी।

“कभी-कभी इसे साफ कर लिया करो।” कहकर मैं हथेली से उसकी बुर सहलाने लगा।
सोनम सिसियाते हुए बोली- तुम्हारी भी तो बड़ी है।
और फिर मेरे लंड पर अपनी हथेलियां चलाने लगी।

मेरी उत्तेजना चरम पर पहुंच गई, लगा कि अब मैं कही झड़ न जाऊं। उसकी बुर भी गीली हो गई थी। उसकी बुर का दाना उभर आया था। यद्यपि मैंने तो रास्ते में सोचा तो बहुत कुछ करने के लिए था, लेकिन लगा कि अब मैं कहीं बिना अन्दर डाले ही न झड़ जाऊं तो उससे कहा- टांगें फैलाकर लेटो।”
वह लेटते हुए बोली- छोड़ दो न मामा!
“पागल हूं मैं!” कहकर मैंने अपनी शर्ट उतार दी ओर उसके पूरे शरीर को सहलाया और फिर उसकी टांगों के बीच में जाकर उसकी बुर के छेद को हाथों से टटोलकर उसपर अपने लंड का सुपाड़ा रखकर औंधे मुंह उसपर लेट गया और कमर पर दबाव डाला तो भीग चुकी उसकी बुर में मेरा लंड सक से चला गया।

“हाय राम मैं मरी!” उसने कहा।
मैंने कहा- झिल्ली फट गई?
“पता नहीं!”

मैं एक पल के लिए रुका फिर कुहनियों को भूमि पर टिका कर उसकी चूचियों को मलते हुए कमर चलाते हुए सोनम को हचर-हचर चोदने लगा। सात आठ धक्के के बाद वह भी कमर चलाने लगी और अपने हाथों से मुझे कस लिया। मैं उसे चोदे ही जा रहा था। उसका शरीर महकने लगा। उसके मुंह से हों-हों का स्वर निकलने लगा।

मेरी कमर और तेज चलने लगी। उसने किचकिचाकर मुझे दबोच लिया। अन्त में मैं भल्ल से उसकी चूत में झड़ गया। मैं कुछ देर बाद उसके ऊपर से उठा। मेरा लंड बीज से सना था। उसकी चूत भी वैसे ही बीज से भरी थी। वह लम्बी लम्बी सांसे भर रही थी। मैंने पास पड़ी पैंट से रुमाल निकालकर पहले अपने गीले लंड को पौंछा फिर उसकी बुर को।

अब वह स्थिर हो गई थी। बोली- मामा अगर कहीं बच्चा ठहर गया तो?”
“पागल एक बार में बच्चा नहीं ठहरता है। उठो! बैठकर मूत दो! बीज नीचे गिर जायेगा।”

मूत कर वह उठी तो मैंने उसे अपनी टांगों को सीधे फैला लिया और उसकी टांगों को अपनी कमर के दोनो तरफ करवा कर बैठा लिया। उसकी चूत से मेरा सिकुड़ा लंड स्पर्श कर रहा था। मांसल चूचियां मेरे सीने से पिस रही थीं। उसके खुले बाल उसकी पीठ पर फैलकर वातावरण को मादक बना रहे थे।

वह बोली- अब चलो। अपनी तो कर ही ली। देर हो जायेगी।”
“देर तो हो गई। थोड़ी और सही। ऐसा सुनहरा अवसर अब तो कभी नहीं मिलेगा।”

उसने कोई उत्तर नहीं दिया इसका मतलब था कि उसकी भी मौन स्वीकृति थी। मेरे हाथ उसकी पीठ से लेकर उसके नाद जैसे भारी चूतड़ों की दरार तक चल रहे थे।

वह भी मेरे बालों में अंगुलियाँ चला रही थी। कभी कभी मेरी कनपटियों को भी सहलाने लगती।
मैंने यूं ही पूछा- सोनम कभी सोचा था कि तुम्हारी चुदाई ऐसे रोमांटिक वातावरण में होगी?
उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

मैंने उसे खड़ा किया तो वह रोबोट की भांति खड़ी हो गई। बिल्कुल नंगी! मैं भी मनुष्य के आदिम रूप में था। हम नंगे पोखर के किनारो पर टहलने लगे। उसके चूतड़ चलते में हिल रहे थे। चिकने थे। एक भी रोयां नहीं था। जांघ और पिंडलियां भी चिकनी थी। झांटें जरूर पेड़ू तक फैली थीं। चूची हिल नहीं केवल थरथरा रही थी।

मैंने टहलते हुए बुर पर हथेली रखते हुए कहा- सोनम झांट हेयर रिमूवर से बना लिया करो। अभी लगता है एक बार नहीं किया?

“नहीं साफ तो किया है, लेकिन मुझे शरम आती है। जब चाची को याद आता है तब लाकर देती हैं तो करती हैं, स्वयं तो एकदम चिकना किए रहती हैं।”

फिर दोनों हाथों की अंगुली और अंगूठे को मिलाकर चूत का आकार देते हुए कहा- भोंसड़ा हो गई है, फिर भी!

मैंने कहा- उन्हें चुदना जो होता है, जब तुम लगातार चुदोगी तो अपने आप साफ रखोगी।
“तुम तो चोदते हो तब भी जंगल उगा लिया है।”
कहकर वह मेरे लंड को पकड़ कर खेलने लगी और पेलड़ की गोलियों से खेलने लगी।

मुझे न जाने क्या सूझी कि मैंने उसे उठाकर सामने से उसे अपने कंधे पर बैठा लिया। उसकी टांगें पीठ की तरफ हो गईं। उसकी चूत मेरे मुंह के सामने आ गई और मन में आया कि लाओ चूम लूं, लेकिन सोचा पता नहीं क्या सोचे तो अपनी ठुड्डी उसकी बुर से रगड़ने लगा। उसकी झांट के बालों का स्पर्श चेहरे को अजब आनन्द दे रहा था।

इसी के साथ मैंने अपने हाथों को ऊपर उठाकर उसके दोनों दूधों को मसलने लगा। बुर चूत की बातें होती रहीं और हम फिर उत्तेजित हो गये। मेरा लंड दुबारा कील की तरह खड़ा होकर ऊपर उठ गया। इसी तरह पोखर का तीन चक्कर लगाते-लगाते वह उत्तेजित हो गई । तो बोली- मामा चलो फिर चोदो मगर दूसरी तरह से।”

मैं उसके इस खुले आमन्त्रण से हिल गया। कंधे से उतार कर ले जाकर लुंगी पर उसे झुका दिया और हथेली पर अपने और उसके मुंह से थूक लेकर अपने लण्ड पर मला और चूत को ढके झांटों को इधर-उधर करके छेद पर रखकर कसा तो एकदम अन्दर चला गया। फिर कमर हिलाहिलाकर उसे चोदने लगा।

कुछ पल बाद लंड निकाला तो देख कि उसकी बुर का छेद खुल चुका था। उसका चना भी फूल गया था। फिर मैं भूमि पर लेट गया। मेरा लंड हवा में तना था।

मैंने उससे कहा- सोनम आओ! इसपर टांगें फैलाकर बैठो।
वह बोली- नहीं! पूरा अन्दर चला जायेगा! दर्द होगा!
“यह सब कहने की बात है, और मजा आयेगा। बैठकर तो देखो!”

वह दोनों टांगों को इधर उधर करके बुर के छेद को लंड के निशाने पर लेकर बैठी तो एकाएक कमर को पकड़कर दबा दिया। वह घप्प से गिर गई। सट से लंड अन्दर पूरा उसकी बुर की जड़ तक चला गया। पहले मैंने नीचे से अपनी कमर को हिलाया फिर वह भी हचर-हचर अपनी कमर चलाने लगी। मैं सामने उसकी स्तूप की तरह हिल रही चूचियों को सहलाने लगा। बढ़ती उत्तेजना के साथ मेरी और उसकी गति तेज हो गई। अन्त में मैं फल्ल-फल्ल झड़ने लगा। वह अजब अजब स्वर निकालने लगी और औंधे मुंह मेरे ऊपर गिर पड़ी।

तो मित्रो मेरा यह अनुभव या अगर चाहें तो कहानी कहें कैसा लगा? मेल करें. Hindi Sex Stories

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आपने अभी तक पढ़ा Sex Stories कि कैसे ट्रेन के सफ़र में मैंने शिल्पा की चुदाई की शुरुआत की और उसने मुझे अपने अंकल द्वारा अपनी पहली चुदाई का किस्सा सुनाया।

मैं उसको चोदने के बाद फिर सीट पर आ कर बैठ गया। वो भी थोड़ी देर में मेरे बगल में बैठ गई और पूछा- मज़ा आया?

मैंने कहा- हाँ, तुम तो प्रोफेशनल हो !

वो बोली- हाँ अब तो काफी अनुभव हो गया है।

मैंने पूछा- फिर तुम्हारे अंकल ने तुम्हें अगले दिन भी चोदा होगा?

वो बोली- नहीं वो मुझे लंड का चस्का लगाकर अगले दिन ही चले गए और मैं तड़प कर रह गई। रोज़ अपने आप ही अपनी चूत रगड़ कर काम चलाती रही।

मैंने पूछा- फिर दुबारा मौका तुम्हें कब मिला?

वो बोली- बताती हूँ !

उन दिनों गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थी तो मैं अकेली घर पर ही रहती थी। मम्मी पापा दोनों सुबह निकल जाते थे।

मैंने घर पर ही इन्टरनेट पर गन्दी वेबसाइट्स देखना शुरू कर दिया। फिर लड़कों के साथ चैट करती थी और उनके साथ इन्टरनेट पर ही सेक्स का मज़ा लेती थी।

पर ऐसे मुझे मज़ा नहीं आ रहा था। फिर एक दिन हमारे घर जो कामवाली आती थी वो अपने लड़के को एक दिन अपने साथ काम में हाथ बंटाने के लिए लेकर आई। वो जब तक खाना बनाती थी उसका लड़का घर का झाडू पोंछा करता था।

मुझे एक शरारत सूझी, वो जब काम करने आया, मैं अपने कमरे में अपने बेड पर अपनी स्कर्ट थोड़ी ऊपर करके उलटी लेट गई, और सोने का नाटक करने लगी।

थोड़ी देर में वो लड़का मेरे कमरे में पौंछा लगाने आया। मैंने धीरे से आँखें खोलकर सामने शीशे में देखा, वो बेड के बगल में खड़ा हुआ मेरी टांगों को देख रहा था। उसने फिर अपने लंड को पजामे के ऊपर से रगड़ना शुरू किया। फिर उसने अपना पजामा और अंडरवियर नीचे किया और लंड बाहर निकाल लिया और मेरी टांगों को देखकर मुठ मारना शुरू किया।

मैं उसको शीशे में देख रही थी और चाह रही थी कि वो लंड मेरी चूत की शोभा बढ़ाये। पर वो आगे उससे ज्यादा हिम्मत नहीं कर पाया।

अगले दिन मैं अपनी पूरी स्कर्ट को उल्टा करके लेट गई। वो मेरे कमरे में आया, फिर अपना लंड निकला और मुठ मारने लगा।

मुझे गुस्सा आ रहा था, एक लड़की अपनी खोल के उसे निमंत्रण दे रही थी और वो मुठ मारने में लगा था।

उस दिन उसने बस इतनी हिम्मत की अपना लंड पीछे से आकर मेरी पैंटी से रगड़ने लगा, थोड़ी देर में वो झड़ गया और मुझे वहीं तड़पता छोड़ कर चला गया।

अगले दिन मैंने पैंटी ही नहीं पहनी और लेट गई। पर उस दिन वो मेरे कमरे में बस झांक कर चला गया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कोई ऐसा मर्द भी हो सकता है जो ऐसा मौका छोड़कर चला जाये।

थोड़ी देर में कामवाली दरवाज़ा बंद करके चली गई।

मुझे नींद आ गई। अचानक घर में किसी के घुसने की आवाज़ हुई, मैं जाग गई, मैं समझ गई कि कामवाली का लड़का छोटू ही होगा और अब मुझे तृप्त करने आया है।

मैं अपने बेड पर सीधी हो कर अपनी आँखें बंद करके लेट गई. वो मेरे कमरे में आया और मेरे बेड पर चढ़ गया।

मैंने अपनी आँखें नहीं खोली उसने मेरे बगल में आकर मेरे मम्मों को सहलाना शुरू किया। उसने मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर मेरे होठों को चूमना शुरू किया।

मैं निहाल हो गई। फिर मेरी स्कर्ट ऊपर उठाकर अपनी ऊँगली से मेरी चूत को छेड़ना शुरू किया, उसने फिर मेरी चूत में अपनी ऊँगली डाल दी और अंदर बाहर करने लगा।

मैंने अंगड़ाइयाँ लेनी शुरू कर दी और आह अ आह की आवाजें निकालनी शुरू कर दीं। अचानक मैंने महसूस किया कि मेरे मम्मों को भी कोई और दबा रहा था।

मैंने आँख खोली तो देखा कि छोटू अपने दोस्त को अपने साथ लेकर आया है और अब तक उसका दोस्त ही मुझे छेड़ रहा था, अब छोटू ने भी मेरे मम्मे दबाने शुरू कर दिए।

लेकिन अब मैं लंड के लिए इतना तड़प रही थी कि मैंने विरोध नहीं किया और दोनों के साथ मज़े लेने का फैसला किया।

छोटू ने इस बीच मेरी शर्ट ऊपर उठा दी और मेरे मम्मों को मेरी ब्रा के ऊपर से चूमने लगा। उसका दोस्त मेरी चूत के साथ खेल रहा था।

मैंने हाथ पीछे ले जाकर अपनी ब्रा के हुक खोल दिए और छोटू ब्रा को ऊपर उठाकर मेरे चूचियां चूसने लगा।

नीचे उसके दोस्त दोस्त ने मेरी टांगों को मोड़ कर फैला दिया और मेरी चूत चाटने लगा। मैं पागल हो चली थी।

इसी के लिए तो इतने दिन से तड़प रही थी. मेरी चूत और मेरे मम्मे चूसे जा रहे थे और मैं पागल हो रही थी।

फिर अचानक उन दोनों ने मुझे छोड़ दिया और उठकर दरवाज़े की तरफ चल दिए। मुझे कुछ समझ नहीं आया, मैं घबरा गई कि आज भी क्या मैं प्यासी रह जाउंगी।

मैंने उनसे पूछा- क्या हुआ?

वो बोले- आज नहीं, फिर करेंगे !

मैं बोली- प्लीज़, ऐसे छोड़ के मत जाओ !

उन्होंने कहा- ठीक है, पर तुम्हें वही करना होगा जो हम कहेंगे !

मैंने कहा- ठीक है !

छोटू का दोस्त बोला- यहाँ नहीं करेंगे, ड्राइंगरूम में आओ।

वह जाकर सोफे पर बैठ गया और बोला- अब अपने कपड़े उतारो।

मैंने पहले अपनी टीशर्ट और ब्रा उतारी फिर अपनी स्कर्ट उतार कर उनके सामने नंगी खड़ी हो गई।

वो बोला- अब कुतिया बनकर यहाँ आओ और मेरा लंड निकाल कर चूसो !

मैं अपने हाथों पैरों पर कुतिया की तरह चलकर उसके पास पहुंची, फिर मैंने उसकी पैंट की जिप खोलकर उसका लंड बाहर निकाला और मैंने उसको अपने मुंह में लिया। मैं पहली बार किसी का लंड चूस रही थी इसलिए मुझे बड़ी मुश्किल हो रही थी।

वो बोला- साली, अच्छे से चूस ! मज़ा नहीं आ रहा !

और मेरा सर नीचे दबाकर जोर जोर से मेरे मुँह को चोदने लगा।

शुरू में मुझे मुश्किल हुई पर बाद में सब आसान हो गया। वो मेरे मुंह में झड़ गया और उसने अपना सारा जूस मुझसे चुसवाया।

वो बोला- अब छोटू का भी लंड चूस !

मैं कुतिया बन कर छोटू के पास गई और उसका लंड निकाल कर चूसने लगी।

उसका दोस्त मेरे पीछे से आकर मेरी गांड पर अपना लंड रगड़ने लगा। थोड़ी देर में उसका फिर खड़ा हो गया।

इधर छोटू के लंड का भी पानी निकल गया, उसे भी मैं पूरा पी गई।

उसके दोस्त ने अब कहा- चल अब तेरी इच्छा भी पूरी कर देते हैं ! चल कारपेट पर लेट जा !

मैं नीचे लेट गई और टाँगें मोड़ कर फैला दी।

वो बोला- तू साली बहुत बड़ी रंडी बनेगी !

उसने नीचे आकर लंड मेरी चूत में घुसेड़ दिया।

मैं इतनी देर से इसी पल का इंतज़ार कर रही थी। फिर उसने मुझे चोदना शुरू किया। मैं पागल होती जा रही थी। बगल में छोटू आकर लेट गया और मेरे मम्मे चूसने लगा। अब छोटू का लंड भी फिर खड़ा हो गया।

जैसे ही मेरी पहली चुदाई ख़त्म हुई उसका दोस्त बोला- चल अब तू इस रांड को चोद !

छोटू ने भी मुझे दबाकर चोदा। पर उसके बाद भी मेरा मन नहीं भरा।

वो जब जाने लगे तो मैंने पूछा- कम से कम मुझे अपना नाम तो बताते जाओ !

वो बोला- मैं सुनील हूँ ! और लगता है तेरी प्यास बुझी नहीं ! तुझे पूरे मोहल्ले से चुदवाना पड़ेगा !

इस तरह उसकी दूसरी चुदाई का किस्सा ख़त्म हुआ और मेरा लंड उसको दूसरी बार चोदने के लिया तैयार था।

पर उससे पहले मैंने पूछा- तुमने अपना नाम नहीं बताया?

वो बोली- शिल्पा !

मैंने कहा- शिल्पा, क्या तुम फिर चुदने को तैयार हो?

वो बोली- मैं तो हमेशा ही चुदने के लिया तैयार रहती हूँ।

मैंने कहा- ठीक है, अब मैं नीचे लेटता हूँ, तुम मुझे ऊपर से चोदो !

मैं नीचे लेट गया उसने दोनों घुटने मेरी दोनों तरफ़ रखकर मेरा लंड अपने हाथ से पकड़ा और उसको अपनी चूत में घुसा लिया।

अब वो ऊपर से धक्के मारने लगी, उसके मम्मे मेरे ऊपर झूल रहे थे। मैंने उनको अपने हाथ से पकड़कर दबाना शुरू कर दिया।

उसको भी आनंद आ रहा था, उसके धक्के धीरे धीरे तेज होने लगे और वो थोड़ी देर में झड़ गई। साथ में मैं भी झड़ गया।

उसके बाद उसने मुझे अपने बाकी के किस्से बताये जो मैं आपको अगली बार बताऊंगा। Sex Stories

Antarvasna Stories

तो रूबी कहने लगी- इतना मजा Antarvasna Stories पहली बार ले रही हूँ ! आज तक जिन्दगी में इतना मजा और तृप्ति मुझको कभी नहीं मिली !

मैं कहने लगा- रूबी, अब मैं चलता हूँ !

तो रूबी कहने लगी- अभी नहीं ! एक बार और हो जाये राम !

मैंने कहा- रूबी जी ! आपको खुश कर दिया, यही मेरा काम था। यहीं पर मेरा काम खत्म हो जाता हैं। अब रूबी जी मेरी फीस दो ! मैं चलता हूँ !

तो रूबी नशीली आँखों से मुझको देखकर बोली- आपकी फीस मिल जायेगी और वो भी मुँह माँगी। मुझको पता है कि आप फीस अपने हिसाब से लेते हो ! पर कोई बात नहीं अभी एक बार मेरी आग शान्त करके जाना जोकि बहुत दिन से भड़की हुई थी राम। यार राम ! ओ मेरे राम ! बस एक बार ! आप नाराज तो नहीं हो गये?

मैंने कहा- नहीं रूबी जी, ऐसी बात नहीं ! पर मेरा जो उसूल है, मैं उस पर ही अमल करता हूँ।

तो रूबी बोली- चलो आप अपना उसूल भी मत तोड़ो, मेरी एक छोटी सी बात मानोगे?

मैंने कहा- क्या ?

राम, मैंने आपसे दोस्ती के लिए कहा था !

चलो आपने कहा था कि मैं दोस्ती कर सकता हूँ पर आपने जो कहा था आपको आपकी फीस मिलेगी !

क्या अपने दोस्त की इतनी छोटी सी बात नहीं मानोगे राम।

मैंने कहा- चलो ठीक है, पर जैसा मैं चाहूँगा वैसा करूगाँ रूबी जी।

रूबी कहने लगी- मुझको सब कुछ मंजूर है, आप जो कहोगे वही होगा ! किसी बात पर भी कोई भी मेरी तरफ से आपत्ति नहीं होगी।

मैंने कहा- चलो ठीक है ! मुझको फँसा ही लिया आखिरकार तुमने ! चलो कोई बात नहीं।

रूबी खड़ी होकर चलने लगी तो मैंने कहा- मेरी जान कहाँ चली?

रूबी बोली- राम, बातों ही बातों में हम दोनों ठण्डे हो गये। मैं पहले आपके खाने के लिए कुछ लेकर आती हूँ !

और रूबी नंगी ही खड़ी होकर चल दी, मैं भी रूबी के पीछे पीछे चल दिया तो रूबी कहने लगी- राम जी, आप आराम करो, मैं अभी लेकर आती हूँ !

मैंने कहा- मैं भी साथ में चलता हूँ !

रूबी ने फ्रिज से तीन बीयर निकाली और पनीर निकाला और ड्रांइग रूम में मेज़ पर रखा। हम दोनों ने पनीर को छोटे टुकड़ों में काटा और एक दूसरे के नंगे बदन को देखकर हँसते रहे। फिर हमने बीयर पी वो भी एक ही गिलास में डालकर बारी बारी से। रूबी को अपनी गोद में बिठाकर २०-२५ मिनट तक हम दोनों जब तक बीयर खत्म नहीं हुई पीते रहें और पनीर खाते रहे। कभी मैं रूबी को अपने हाथ से पिलाता और कभी रूबी मुझे पिलाती।

हम दोनो ऐसे ही पीते रहे और एक दूसरे के साथ छेड़छाड़ करते रहे। अब हम दोनों पूरे शबाब में थे।

मैं बोला- रूबी ये तुम्हारी टांगों के बीच में क्या है?

तो रूबी बोली- राम मेरी नहीं ये तो आपकी टांगों के बीच में है !

हम दोनों नशे में एक दूसरे को पता नहीं क्या क्या बकते रहे और दोनो ऐसे ही झूमते रहे। फिर रूबी काफी देर के बाद बोली- राम कुछ करते हैं !

मैंने कहा- अब क्या करेंगे?

अरे आप तो बडे़ नशेड़ी निकले जो सब कुछ भूल गये?

मैंने कहा- राम कुछ नहीं भूलता ! आपके बदन की आग ठण्डी नहीं हुई क्या।

रूबी बोली- अबे राम ये नशे में तू क्या बोलने लगा?

मैंने कहा- रूबी जी, अब राम तो अपने घर जायेगा।

रूबी बोली- ओ राम, तू यहीं पर रहेगा !

मैं बोला- नहीं मैं तो अपने घर जाऊँगा !

और हम दोनों ऐसे ही बच्चों की तरह झगडने लगे- यार रूबी तेरे साथ तो झगड़ने बड़ा ही मजा आता है, तू तो बिल्कुल ही बच्ची है !

रूबी ऐसे बोली- बे राम, हम बच्चे ही तो हैं !

मैंने कहा- मेरी जान रूबी, आज मैं तो तेरी प्यारी गाँड मारूँगा ! तू मेरे लन्ड को खड़ा तो कर !

तो रूबी कहने लगी- नहीं राम, पहले तू मेरी चूत फ़ाड़ेगा !

मैं बोला- नहीं मैं तो पहले तेरी गाँड फ़ाडूँगा !

हम दोनों ऐसे ही झगड़ने लगे क्योंकि मैं भी नशे में था और रूबी भी ! क्योंकि हम दोनों ने मिलकर ५ बीयर जो डकार ली थी।

रूबी बोली- राम ऐसा करते हैं, जो पहले बैडरूम में जायेगा उसकी जीत होगी और पहले उसकी मर्जी मानी जायेगी !

मैंने कहा- कोई बात नहीं रूबी, हमें सब कुछ मंजूर है।

और हम दोनों लड़खड़ाते हुए बैडरूम की तरफ चलने लगे। मैं रूबी से आगे निकला ही था कि रूबी ने पीछे से मेरी टांग खींच ली और मैं गिर पड़ा तो रूबी तेजी से भागी। मैं भी कहाँ कम था, मैंने भी उठकर रूबी को बाहों में भर कर पीछे गिरा दिया और रूबी से पहले बैडरूम में पहुँच गया।

रूबी कहने लगी- ओ राम, तू तो बड़ा ही चीटर है।

मैंने कहा- रूबी तू बड़ी चीटर है।

और हम दोनों फिर झगड़ने लगे। रूबी मुझे गाली देती और मैं रूबी को गाली देता- साली हरामी चीटर, रूबी कहती- साले राम तू बड़ा चीटर है।

फिर हम दोनों में फैसला हुआ कि हम दोनों ही चीटर हैं। दोनों बारी बारी से अपनी अपनी जगह पर चुदाई करेंगे। मैंने रूबी से कहा- रूबी जी पहले आपकी बारी है।

तो रूबी कहने लगी- पहले आप करो ना ! अपना लण्ड मेरी गाँड में डालो !

मैंने कहा- नहीं, कोई बात नहीं ! पहले आप मेरे लन्ड को अपनी चूत में लो !

हम दोनों फिर ऐसे ही झगड़ने लगे।

मैंने कहा- यार रूबी, हम तो दोनों ही असली बात को भूल गए हैं और झगड़ने में लग गए हैं। चलो, मैं आपको गर्म करता हूँ ! आप मुझे गर्म करो !

और फिर हम दोनों ६९ की पोजीशन में होकर एक दूसरे को गर्म करने लगे। मैं रूबी की चूत को अपनी जीभ से चाट चाट कर गर्म करता और रूबी मेरे लन्ड को मुंह में लेकर चूसती और हाथ से मुठ मारती। ७-८ मिनट में मेरा लन्ड लोहे की रॉड की तरह से अकड़ गया। रूबी कहने लगी- यार तेरा औजार तो बहुत ही बड़ा हो गया है और मेरे मुहँ में भी नहीं आ रहा, अब क्या करूँ राम?

मैंने कहा- यार रूबी, तेरी चूत भी रस छोड़ने लगी है !

हाँ यार राम, मुझे तो बड़ा ही मजा आ रहा है, चलो अब मेरी चूत को फाड़ डालो राम।

मैंने कहा- नहीं रूबी, मैं तो पहले तेरी गाँड फाडूँगा !

तो रूबी बोली- राम अब हम झगड़ेंगे नहीं, क्योंकि हम अब नशे में नहीं हैं !

मैंने कहा- चलो कोई बात नहीं ! आप अब बैड से नीचे उतरो, मैं आपको एक नया ऐहसास देता हूँ।

रूबी एकदम से बैड से नीचे उतर करके नीचे खड़ी हो गई।

मैंने कहा- माई डियर रूबी जी, अब आप बेड के साथ दीवार के पास खड़ी हो जाओ !

तो रूबी ऐसे ही खड़ी हो गई। मेरा लन्ड तो सीधा था, मैंने रूबी से कहा- आप अपनी एक टांग बैड के ऊपर रखो !

अब मुझे रूबी की चूत पीछे से दिखाई देने लगी और रूबी की चूत का मुँह भी खुल गया। मैंने रूबी से पूछा- आप मेरा लन्ड अपनी चूत में लेने के लिए तैयार हो क्या?

रूबी कहने लगी- मैं तो तैयार हूँ, पर यह देख लेना कि मुझे नुकसान नहीं पहुँचे !

मैंने कहा- नहीं आप सिर्फ नये अनुभव का मजा लो !

तो कहने लगी- यार राम मुझे आप पर विश्वास है, आप जैसे चाहो करो, मैं आपका पूरा साथ दूँगी।

मैंने कहा- रूबी जी ठीक है !

और यह कहकर मैंने अपना लन्ड रूबी की चूत पर रखा, देखा कि रूबी की चूत तो पूरी तरह से गीली है और अपने लन्ड का दबाव बनाकर जोरदार धक्का मारा और मेरा लन्ड जड़ तक रूबी की चूत में उतर गया। रूबी की चूत गीली होने के कारण हल्का सा दर्द हुआ पर वो सहन कर गई। अब मैंने रूबी की चूत में पीछे से धक्के मारने शुरू किये और कुछ ही देर में रूबी को मजा आना लगा। मैं रूबी की दोनों चुचियों को हाथ से पकड़कर मसलने लगा और रूबी के मुँह से सिसकारी निकलने लगी और कहने लगी- राम आप में तो कमाल का जादू है, आप तो चुदाई के हर काम में माहिर हो।

मैंने कहा- रूबी इसीलिए तो मेरी डिमांड हमेशा रहती है और मैं अपना फोन नम्बर भी किसी को नहीं देता क्योंकि मुझको पता है कि लोग मुझको परेशान करेंगे।

राम, आप बात को छोड़कर आज मुझे सबसे प्यारे जहान की सैर करा रहे हो बस मुझे ऐसे ही मजा देते रहो- आ आअअअइइइइई ओइइइआआ ओ नो यस कम आन राम कम आन राम ! मुझे भी और भी जोश आ गया और मैं भी जोर जोर से से धक्के मारने लगा। कुछ ही देर में रूबी का शरीर अकड़ने लगा और रूबी की चूत ने पानी छोड़ दिया। रूबी ढीली पड़ने लगी और फिर मैंने अपना लन्ड रूबी की चूत से निकाल कर रूबी को कहा- अपना पैर बैड से नीचे कर लो और अपने हाथ बेड पर रख कर घोड़ी बन जाओ ! रूबी जी अब मैं आपकी गाँड में अपना लन्ड डालूँगा।

रूबी बोली- राम मैं अपनी गाँड पहली बार आपके हवाले कर रही हूँ, जरा ध्यान से करना राम, मेरे दोस्त राम।

मैंने कहा- मेरी जान रूबी, आपने पहली बार जब अपनी चूत फ़ड़वाई थी तो तब जितना दर्द हुआ था, उससे कम ही होगा।

रूबी बोली- राम, अब चाहे जो भी हो, आप करो ना ! मुझे देर पंसन्द नहीं !

मैंने रूबी की गाँड पर अच्छी तरह से थूक लगाया और अपने लन्ड पर रूबी की चूत का रस लगाकर खूब गीला किया, रूबी की गाँड पर हल्का सा दबाव बनाया तो मेरा लन्ड जोकि पूरा ही लोहे की तरह से सख्त था, उसका सुपाड़ा अन्दर गया तो रूबी को बहुत ही तेज दर्द हुआ और रूबी बुरी तरह से चिल्लाई !

तो मैंने कहा- रूबी जी अगर आप को परेशानी है तो अपना लन्ड बाहर निकाल लेता हूँ !

रूबी बोली- राम, यह तो कुछ भी नहीं, जब पहली बार चूत चुदाई थी तो इससे भी ज्यादा दर्द हुआ था, अब तो कुछ भी नहीं हुआ। अब तो कोई बात ही नहीं, चाहे दर्द हो या कुछ भी हो। आपने हमारी इच्छा पूरी की और अब हमारा भी तो फ़र्ज़ बनता हैं कि हम आपकी इच्छा भी पूरी करें। राम आप अपना काम करो !

फिर क्या था, मैं अपने हाथ से रूबी की चुचियों को मसलने लगा और अपना लन्ड पहले धीरे धीरे से फिर स्पीड बढ़ाने लगा।

रूबी को मजा आने लगा और रूबी कहने लगी- आप में ऐसी क्या कशिश है कि आप जो भी काम करते हो उसमें पूरा मजा देते हो। ओ राम आ ई ईआ आअ इऐऐ ऐ ऐ ऐ ऐ एए ई ई ई ओ राम, बस जिन्दगी में आज पहली बार ऐसा मजा आया है।

मेरा छुटने को आया तो मैंने कहा- रूबी जी, अब आप बैड पर सीधी लेट जाओ !

रूबी सीधी लेट गई और मैं रूबी की टांगों को अपने कंधों पर रखकर अपना लन्ड रूबी की चूत में एक ही बार में पूरा उतार कर दनादन धक्के मारने लगा और ३-४ मिनट के बाद में ही मेरे लन्ड ने अपना पानी रूबी की चूत में छोड़ दिया। मैं रूबी के ऊपर लेट गया और पता ही नहीं चला कि हम दोनों को कब नींद आ गई।

सवेरे आठ बजे मेरी आँख खुली तो मैं देखता हूँ कि मेरे शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था, मेरे कपड़े कमरे में इधर उधर पड़े थे। मैंने अपने कपड़े पहने और कमरे के बाहर निकला ही था तो रूबी की आवाज आई- राम फ्रेश हो लो।

मैंने रूबी से कहा- नहीं, मैं अब निकलता हूँ !

रूबी बोली- नहीं, पहले नहा लो !

तो मैं नहाने के लिए बाथरूम में गया और नहा धोकर फ्रेश होकर बाहर निकला तो रूबी ने नाश्ता तैयार कर दिया था। हम दोनों ने नाश्ता किया। मैं रूबी को देखकर बोला- आपको हमारी सेवा कैसी लगी?

रूबी हँसकर कहने लगी- यार राम, जिन्दगी ऐसे लम्हें मुश्किल से मिलते हैं, आपने तो हमारी पूरी रात यादगार बना दी। हम इन लम्हों को हमेशा अपनी यादों में सम्हाल के रखेंगे।

रूबी जी ! हमें जाने की इजाजत दो !

रूबी कहने लगी- ठीक हैं राम। अगर मुझे आपको बुलाना पड़े तो आपको फोन करके बुला सकती हूँ ना?

मैंने कहा- हाँ, मेरा काम ही यही है, आपको जब भी जरूरत पडे तो आप याद करना।

रूबी कहने लगी- फिर आज आप क्या कर रहे हो?

मैंने कहा- घर जाकर पूरा दिन सोना है बस और कुछ नहीं !

तो रूबी कहने लगी- फिर आज के दिन मेरे साथ ही रूक जाओ, मैं भी दो दिन तक अकेली ही रहूँगी।

मैंने कहा- नहीं, आज नहीं ! फिर कभी !

तो रूबी ने अपनी बाँहे मेरे गले में डालकर कहा- राम मत तड़फाओ, आपको पता है कि औरत को तड़फाना अच्छी बात नहीं होती मेरी जान, अब मान भी जाओ न मेरे प्यारे राम, प्लीज प्लीज !

मैंने कहा- ठीक है, पर अभी मैं दो घन्टे के लिए सोने जा रहा हूँ, मुझे डिर्स्टब मत करना।

रूबी बोली- चलो, मैं आपको बैडरूम में छोड़ देती हूँ !

रूबी मुझे अपने बैडरूम में ले गई मैं अपने कपड़े उतारने लगा तो रूबी ने कहा- राम अपने कपड़े मुझे दे दो, मैं इनको धो देती हूँ !

मैंने रूबी को अपने सारे कपड़े उतार कर दे दिये। अब मेरे शरीर पर सिर्फ़ अन्डरवीयर ही था। मैं जैसे सोने के लिए बैड पर लेटा तो मुझको रूबी तिरछी नजर से निहार रही थी और मुस्कुरा रही थी। रूबी की मुस्कुराहट को देखकर मेरा लन्ड खड़ा होने लगा तो रूबी बोली- राम आपका औजार तैयार है, अगर आपको कोई एतराज ना हो तो कुछ हो जाये?

मुझे लगा कि पूरा दिन जब यहीं बिताना है तो ठीक है, मैंने कहा- अब आ जाओ !

रूबी ने कपड़े रख दिये और मेरे ऊपर चढ़ गई और फिर हम दोनों एक दूसरे में समा गये। आधे घन्टे तक हम दोनों की कामक्रिया चली और मैं वहीं पर सो गया। रूबी कपड़े धोने के लिए चली गई और अपने घर का काम खत्म करके रूबी भी मेरे ही पास सो गई। उस दिन हम दोनों ने हर तरीके से खूब जमकर चुदाई की। और फिर मैं शाम को ८.०० बजे अपने घर जाने लगा तो रूबी मुझको पूरे ८० हजार रूपये देने लगी तो मैंने कहा- रूबी, ये तो मेरी फीस से ज्यादा हैं !

तो रूबी ने कहा- नहीं, ये पार्ट टाइम के भी हैं। राम आपने मुझको जो पूरी रात और आज दिन में दिया, उसके बदले में तो ये कुछ भी नहीं हैं, मैं आपको और भी देती हूँ, बस हमारी आपसे विनती यही है कि जब भी हम आपको बुलाएँ आपको ही आना पड़ेगा।

मैंने कहा- रूबी, यह तो मेरा काम है कि मैं अपनी तरफ से अपने ग्राहक को पूरी तरह से खुश करूँ, बस आखिरी बार यही जानना चाहूँगा कि हमारे साथ में आपका अनुभव कैसा रहा।

रूबी जी ने कहा- राम यह अनुभव नहीं, यह तो एक पिकनिक जैसा रहा, जो कभी कभी ही नसीब होता है।

फिर मैंने जाने के लिए रूबी से इजाजत माँगी तो रूबी ने मुझको अपनी बाँहों में भरकर गले लगा लिया, होठों से होंठ मिलाकर एक लम्बा किस किया और मुझको बाहर तक छोड़ने आई।

और मैं अपने घर वापिस आ गया। Antarvasna Stories

Antarvasna stories

लेखक: जतीन, हाय Antarvasna, अपनी पहली कहानी में मैंने बताया की मेरा दोस्त नवीन रसोई में मेरी भाभी के मम्मे दबा रहा था, किस भी कर रहा था लेकिन उन्होंने ज्यादा कुछ नही किया मै घर में था। मुझे पता था कि वो भाभी को खूब दबा के चोदेगा। मैं देखना चाहता था कि वो यह सब कैसे करता है, मैने एक योजना बनाई और उन दोनों को मूवी देखने जाने के लिये कहा। पहले तो वो मना करने लगी पर जब मैने बताया कि नवीन भी है तो मान गयी।

भाभी ने गहरे गुलाबी रंग का स्लीव्लैस सूट पहना। उनके बूब्स उस तंग सूट में काफ़ी उभर आये थे और वो बहुत प्यारी और सेक्सी लग रही थी। नवीन अपनी बाइक पर आया तो मैने भाभी से कहा कि मेरे स्कूटर में हवा कम है इसलिये वो सनी के बाइक पर बैठ जायें। वो मान गयी औरतके पीछे बैठ गयी। मैं आराम से पीछे आ रहा था, तो मैने देखा कि वो बार बार ब्रेक मार रहा था और भाभी उसके ऊपर झुकी हुई थी और उसके मोटे मम्मे उसकी पीठ पर गड़े जा रहे थे। वूऊऊओ, साले को कितने मजे आ रहे होंगे मैं सोच कर ही एक्साइट हो रहा था। दोनो पता नहीं क्या बात कर रहे थे पर भाभी हंस रही थी। प्लान बना कर मैं ने ऐसी मूवी का टिकट लिया जिसमे कम भीड़ थी। हम मूवी देखने लगे। थोड़ी देर बाद मैं ने महसूस किआ कि भाभी जो हम दोनो के बीच में बैठी हुई थी थोड़ी बेचैन हो रही है।

मैं ने अंधेरे में नजर घुमाई तो देखा उसने एक हाथ भाभी के मम्मे पे रखा हुआ है और दबा रहा था। ऊऊऊऊऊओ। यहां भी वो कोई मौका नहीं छोड़ रहा था धीरे धीरे वो अपने हाथ नीचे ले गया और सूट के अंदर डाल दिआ, उसका हाथ उनकी टांगो के बीच था। वो उसका हाथ हटाने की कोशिश कर रही थी पर शायद उन्हे मजा भी आ रहा था। मैं समझ गया कि मेरे रहते कुछ नहीं होगा सो मैं ने फोन आने का बहाना बनाया। उनहे बताया कि मुझे अर्जेन्ट काम से जाना पड़ रहा है और वो मूवी देख के घर चले जायें मैं बाद में आ जाउंगा।

मैं हाल के बाहर पहुंचा और एक कोने से उन्हे देखने लगा थोड़ी देर मैं दोनो के बाहर आते देखा। दोनो बाइक पर बैठ कर निकल गये। मैं ने पीछा किया तो देखा कि वो एक होटल में चले गये। मैं ने सोचा था कि शायद वो घर ले जायेगा पर होटल में नहीं सोचा था। मैं अंदर गया और रिसेप्शन पे थोड़ी पूछ ताछ करने की कोशिश करी पर कुछ हाथ नहीं आया मैं मायूस हो रहा था उन्हे करीब २० मिनट हो गये थे और मैं सोच कर परेशान हो रहा था कि वहां क्या चल रहा होगा। जब मुझसे नहीं रुका गया तो मैं ने नवीन का फोन लगाया। बेल जाती रही पर उसने नहीं उठाया। वो ऐसी कंडीशन में थे कि उस समय फोन नहीं उठा सकता हो। मै बहुत बेचैन हो उठा।

मैं काल पे काल करता रहा आखिर उसने उठाया तो मैं ने बोला कहां हो यार।

पूछने लगा क्या हुआ, उसकी आवाज़ मेँ गुस्सा था। मैं ने बोला मेरा प्रोग्राम केन्सल हो गया है और मैं हाल के बाहर उनका इंतजार कर रहा हूं।वो कुछ देर चुप रहा मैं ने पूछा क्या हुआ? तो बोला यार मूवी अच्छी नहीं थी इसलिये हम बाहर आ गये और अब मार्केट में हैं, भाभी को शोपिंग करनी थी मेरी भाभी को किस चीज़ की शोपिंग करा रहा था मैं सब समझ रहा था। मैं ने कहा मुझे शोप बताओ मैं वहीं आता हूं, गुस्से में उसने भाभी को फोन दिया और बोला भाभी बतायेंगी।

जब मैं भाभी से बात कर रहा था उनकी सांसे फ़ूली हुई लग रही थी। बीच बीच में रुक रही थी, शायद मेरे से बात करते वक्त वो उनके साथ कुछ कर रहा था, अंतत: उन्होने मुझे एक शोप पे बुला लिया। थोड़ी देर में दोनो तेजी से होटल के बाहर आये जब वो घर से गयी थी उनके बाल बंधे हुए थे और अब बाल खुल गये थे मुझे वो एक शोप में मिले तो नवीन नाराज सा दिख रहा था और भाभी बहुत बेचैन और परेशान थी पर मुझे उनके चेहरे के भाव देख कर मजा आ रहा था लेकिन और मजा आता अगर दोनो को एक्शन में देखता। इसके लिये मैं ने एक और प्लान सोचा है जो जल्दी ही पूरा होगा, जब दोनो को एक होता हुआ देखुंगा। Antarvasna

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